Book Title: Pradeshi Charitram
Author(s): Shravak Hiralal Hansraj
Publisher: Shravak Hiralal Hansraj

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Page 90
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shei Kailassagarsuri Gyanmandir प्रदेशी चरित्रं व स्थाने स्थाने निकुंजेषु निजवर्यवर्णसौगंध्यसौंदर्याकृष्टानेकजननयनहृदयाः पाटलादिपुष्पपूजास्तत्र रेजुः. अरण्योद्भवतृणगणप्राशनपरिपुष्टांगा निर्मलनिर्झरजलपानसंतुष्टहृदया मुग्वहरिणगणा निजनिर्दोषपोलादिपरिवारपरिवृता इतस्तत नप्लवंतस्तत्र केषां हृदयेष्वानंदं नोत्पादयामासुः परितो विकीर्णरम्यगैरिकोकरारुणरागरंजिता गिरितलभूमिघृतकौमुंगवसना, सादाविताविनश्रीखि, न वोद्भिन्नदर्जसंदर्जमिषेण रोमांचकंचुकितांगा, कुंदमुचकुंदादिकुसुमोत्करैः प्रकटं हास्यं प्रकटयंती, प. स्तिो वायुविकीर्णविविधपुष्परज पुंजमिषेण कटादप्रक्षेपं वितन्वंती, अरनिमरसलिलावर्त्तदंनेन निजनाजिममलं प्रकटयंती, पक्काम्रादिफलावलिपदेन स्वकीयस्तनस्तबकानाविष्कुर्वती, तुंगगिरिशृंगनि पतद्घनपाषाणोद्भवजीषणध्वनिमिषेण विरहातुरानेकपथिकहृदयस्फोटं चकार. अथ निजप्रियायुतो. ऽवनीपालो रैवताचलवरशिखरेषु ब्रमन् क्रीमाविनोदं कुर्वनेकोत्तुंगगिरिशृंगादवतरतं, निजनपस्तेज सा सहस्रकरकरनिपातमपि तिरस्कुर्वत, मलाक्लैिकवसनमध्यात्मैकध्यानाधिरूढहृदयं, चर्मास्थिमात्रा वशेषशरीरं, अंगशुश्रूषणपराङ्मुखत्वेन मलजिन्नाशेषगात्रं, कषायादिश्वापदसंत्रयैरनपछुतं, प्रशांत. मूर्ति मासोपवासिनं मुनिमेकं ददर्श. तं दृष्ट्वा प्रमुदितांतःकरणो नरेंडोचिंतयदहो धन्योऽयं मुनि For Private And Personal Use Only

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