Book Title: Niryukti Panchak Part 3
Author(s): Bhadrabahuswami, Kusumpragya Shramani
Publisher: Jain Vishva Bharati

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Page 794
________________ परिशिष्ट ७ : परिभाषाएं ६६३ • संपसारगो णाम असंजताणं असंजमकज्जेसु साम छंदेति उवदेसं वा। गृहस्थों के असंयममय कार्यों का समर्थन करने वाला तथा उनका उपदेश देने वाले को संप्रसारी कहा जाता है। (सूचू. १ पृ. १७८) संमुच्छिम-सम्मूर्च्छिम। सम्मुच्छिमा नाम जे विणा बीएण पुढविवरिसादीणि कारणाणि पप्प उठेति। जो उत्पादक बीज के बिना केवल पृथ्वी, पानी आदि कारणों से उत्पन्न होते हैं, वे सम्मूर्च्छिम कहलाते हैं। (दशजिचू.पृ. १३८) संवर-संवर। संवरो नाम पाणवहादीण आसवाणं निरोहो भण्णइ। प्राणातिपात आदि आस्रवों के निरोध को संवर कहते हैं। (दशजिचू. पृ. १६२, १६३) संवेयणी-संवेजनी। संवेगं संसारदुक्खेहिंतो जणेति संवेदणी। संसार के दु:खों से संवेग प्राप्त कराने वाली कथा संवेजनी है। (दशअचू. पृ. ५५) संसय-संशय। संशय्यते च अर्थद्वयमाश्रित्य बुद्धिरिति संशयः। व्यर्थक शब्द के प्रति बुद्धि में जो विपर्यास होता है, वह संशय है। (उचू. पृ. १८३) संसार-संसार। अट्ठविहो जोणिसंगहो संसारेति पवुच्चइ। आठ प्रकार का योनि-संग्रह-उत्पत्ति-स्थल संसार कहलाता है। (आचू.पृ. ३६) • संसरति तासु तासु गतिष्विति संसारः। विभिन्न गतियों में संसरण करना संसार है। (उचू. पृ. ९७) संहिता-संहिता। संहिता अविच्छेदेण पाढो। संहिता का अर्थ है-अव्यवच्छिन्न पाठ का उच्चारण। (दशअचू. पृ. ९) सकार-संस्कार। शुभाऽशुभकर्म संस्कुर्वन्तीति संस्काराः। जो शुभ-अशुभ कर्मों से वासित करते हैं, वे संस्कार कहलाते हैं। (सूचू.१ पृ. २९) सच्च-सत्य। सच्चं-अणुवधायगं परस्स वयणं। दूसरे का उपघात न करने वाला वचन सत्य है। (दशअचू.पृ. ११) सढ-शठ। शठो नाम अन्यथा संतमात्मानमन्यथा दर्शयति। जो स्वयं को दूसरे रूप में प्रदर्शित करता है, वह शठ है। (उचू. पृ. १३३) सबल-शबल। सालंबो वा जयणाए सेवंतो सबलो भवति। जो पुष्ट आलंबन से अथवा यतनापूर्वक अनासेव्य का सेवन करता है, वह शबल (चारित्री) (दचू. प. ९) सण्णा-संज्ञा। पुव्वदिट्ठमत्थमाहितसंस्कारादि एसा सण्णा। __पूर्वदृष्ट अर्थ से संस्कारित होना संज्ञा है। (दशअचू. पृ. ६७) सभा-सभा। सभा नाम नगरादीणं माझे देसे कीरंति। नगर आदि के मध्य में निर्मित जन-स्थान सभा कहलाता है। (आचू.पृ. ३११) सभिक्खु-सद्भिक्षु। अट्ठविधं कम्मखुहं, तेण निरुत्तं सभिक्खु त्ति। __ आठ प्रकार के कर्मों का भेदन करने वाला सद्भिक्षु होता है। (दशनि.३१७) For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org Jain Education International

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