Book Title: Nemidutam
Author(s): Vikram Kavi
Publisher: Parshwanath Shodhpith Varanasi

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Page 150
________________ नेमिदूतम् । १०१ __ त्वत्प्राप्त्यर्थमिति । तत्र त्वत्प्राप्त्यर्थं हेराजन् ! तस्यां द्वारिकायां भवतः संयोगार्थम् । एषा मुहूर्तम् एकचित्ता-राजीमती क्षणम् एकाग्रमना सती। सौभाग्यदेव्याः, सुरभिकुसुमैः पूजां विरचितवती सुगन्धिपुष्पैरर्चनां कृतवती। वा निपुणान् देवज्ञान् पुनः त्रिकालवेदिनो ज्योतिषिकान् । भाषयन्ती क्षणं वार्तालापं कुर्वन्ती मुहूर्त, नयति यापयति स्म। प्रायेण अङ्गनानां बहुशः कामिनीनाम् । रमणविरहेषु एते प्रियतमवियोगेषु ( रमणस्य विरहः- रमणविरहः, ष० तत्०, तेषु ) पूर्वोक्ता । विनोदाः कालात्ययोपायाः भवन्तीति शेषः ।। ९४ ॥ शब्दार्थः - तत्र-वहाँ ( द्वारिका में ) त्वत्प्राप्त्यर्थम्-तुम्हारे प्राप्ति के लिए, एषा-यह राजीमती, मुहूर्तम्-क्षण भर, कुछ समय तक, एकचित्ता ( सती )-एकाग्रचित्त होकर, सौभाग्यदेव्याः-सौभाग्य देवी की, सुरभिकुसुमैः-सुगन्धित पुष्पों से, पूजाम्--पूजा, अर्चना, विरचितवती-करती हुई, वा-पुनः, निपुणान् -त्रिकालज्ञ, दैवज्ञान-ज्योतिषियों से, भाषयन्तीकहती हुई, बोलती हुई, क्षणम्-समय को, नयति स्म-व्यतीत करती थी, प्रायेण-प्रायः, अधिकतर, अङ्गनानाम्-रमणियों के, रमणविरहेषु-प्रियतम के विरह के दिनों में, एते-ये ही, विनोदा:-मन बहलाव के साधन, ( भवन्ति-हुआ करते हैं )। _. अर्थः - ( हे राजन् ! ) वहाँ ( द्वारिका में ) तुम्हारे प्राप्ति के लिए यह राजीमती क्षणभर एकाग्रचित्त हो सौभाग्यदेवी की सुगन्धित पुष्पों से पूजा करती हुई पुनः त्रिकालज्ञ ज्योतिषियों से बोलती हुई समय को व्यतीत करती थी, प्रायः अङ्गनाओं ( रमणियों ) के लिए, प्रियतम के विरह के दिनों में, ये ही मनबहलाव के साधन ( हुआ करते हैं )। याते पाणिग्रहणसमयेऽदि विहाय त्वयोमां, त्यक्त्वा माल्यं सपदि रचिता या त्वया प्रागवियोगे । तामेवैषा वहति शिरसा स्वे निधाय प्रदेश, गल्लाभोगात् कठिनविषमामेकवेणीं करेण ॥६५॥ अन्वयः -- पाणिग्रहणसमये, इमाम्, विहाय, अद्रिम्, याते ( सति ), स्वयि, वियोगे, सपदि, माल्यम्, त्यक्त्वा, या, त्वया, प्राक् रचिता, ताम् कठिनविषमाम्, एकवेणीम्, करेण, गल्लाभोगाद, स्वे प्रदेशे, निधाय, एषा, शिरसा, वहति ॥ ९५॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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