Book Title: Jain Yug 1934
Author(s): Mohanlal Dalichand Desai
Publisher: Jain Shwetambar Conference

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Page 108
________________ उपरोक्त प्रस्ताव जुन्नेरके अधिवेशनमें पास किये गये प्रस्तावसेभी बढ़ जाता है । जुन्नर परिषद्के प्रस्तावका सिर्फ यही मतलब था कि दिक्षा लेनेवालेको अपने मातापितादि संबंन्धियोंकी तथा जहां दीक्षा होनेवाली हो वहां के श्री संघ की सम्मतिसे योग्य प्रगट करनेके बाद दीक्षा देना चाहिये अर्थात् उसमें दो सीधी बातें थी। एक तो माता पिता की आज्ञा और दूसरे दीक्षा स्थल के संघ की सम्मति हो तो दीक्षा दी जा सकती है। परन्तु मुनिसम्मेलनके प्रस्ताव में तो दोनों बातें हैं ही इनके अतिरिक्त अपने माश्रित संबन्धियों का निर्वाह किये हुए वयस्क दीक्षार्थीको दीक्षा देना, अठारह दोपोंका अभाव, और अपनेसे बडे मुनियों की सम्मतियें और मिलादी हैं। यह ऊपरोक्त प्रस्ताव वास्तवमें प्रस्ताव बनानेवालेकी दीर्घदृष्टि, सूक्ष्मविचार शक्ति, समयज्ञाता का सूचक है। जिस प्रश्नने समाज को चक्कर में डालकर छिन्नभिन्न कर दिया था उस प्रश्न का सुन्दर समाधान करके मुनि सम्मेलनने जो अपना गौरव बढ़ाया है। इसके लिये मुनि महाराजोंको हमारा कोटिशः धन्यवाद है। (२) साधु है प्रधान जिस संघमें ऐसे साधु, साध्वी, श्रावक, श्राविकारूप चतुर्विध संघको श्रमण संघ कहना चाहिये और अपने कार्यमें श्रावक श्राविकाओंको पुरा अधिकार है इतनाही नहीं परन्तु कोई साधु या साध्वी अत्यन्त अनुचित करे तो श्रावक संघ उसका उचित प्रबन्ध कर सकता है। इस प्रकार मुनि सम्मेलनने श्रमण संघ और श्रावक संघका संबन्ध बताकर जो महान् कार्य किया है वहभी प्रशंसनीय है। (३) श्रावक संघसे संबल्ध रखनवाले दुसरे प्रस्ताव ये है कि प्रभुके निमित्तसे बोलनेवाली बोलीका द्रव्य तथा उपधान माला आदि की आमदानी देव द्रव्य गिनी जावे और वह जिनचैत्य, जिनमूर्ति, जिनपूजा और जीर्णोद्धारके कार्यमें लगाई जावे । साधु लोग साधारण द्रव्यकी वृद्धि के लिये मंदिर की प्राचीनता नष्ट न हो जाय यह सावधानी रखते हुए जीर्णोद्धार करानेक लिये, किसीपर आक्षेप किय विना लोकमें भिन्नता न मालूम हो श्रोताके मिथ्यात्व और पापकी वृद्धि न हो इस बातको ध्यान में रखकर वीतराग प्रणीत धर्म-प्रधान उपदेश देना। . इन प्रस्तावोंसें संघमें शांति और समाधानीके भाव फैलेगे, यह निःसंदेह है । इसके लिये मुनि सम्मेलन जो धैर्य दृढ़ता और प्रतिज्ञाका प्रदर्शन किया है वह प्रशनीय है । कार्य सफलता. चतुर्विध संध रचनासे हमें यह बात भली भांति समझमें आ जाती है कि जीवन की प्रत्येक समस्याओं को वह बड़ी खूबी के साथ हल कर सकता था इसी प्रकार आज वह कसौटोका काम दे सकता है। वर्तमान समय की समस्याओं को हम उसी कसौटीपर कसकर हेयोपादेय का निर्णय कर सकते हैं। इस लिये मेरी तो यही धारणा है कि यदि हम अपने पवित्र व पूज्य जैन धर्मके तत्वों का उचित अनुसंधान कर सकें तो अवश्यही हम समाज सुधारके राजमार्गकी कुंजी पा सकते हैं। और वही हमारा बेडा पार लगा सकती है। जो धर्म मोक्ष लक्ष्मीको प्राप्त करनेमें समर्थ है उसके लिये इह लोकिक सुख प्राप्त करा देना क्या बड़ी बात है ? पर शर्त यह है कि हम में वैसी प्रबल इच्छा होनी चाहिये। उसके अनुकूल साधन जुटाना चाहिये वीतरागकी वीतरागता और उससे उपदेशित धर्म की वैज्ञानिकता जो कोई मन, वचन, काय पूर्वक साधेगा, नियम से उसके कार्य सफल होंगे। समाज सुधारकी कठिन समस्याओं को जिस घडी आप राग द्वेप रहित हो कर मानापमानका ख्याल न करके समाजहित के भावोंसे प्रेरित हो कर समझनेका प्रयत्न करेंगे-उसकी विशेष जानकारी हासिल करेंगे व उसमें मन वचन, कायाका योग मिलावेंगे तब अवश्यही आपको सुधारका राजमार्ग दिखाई पड़ेगा । उसके पहोंचनेमें जो विघ्न बाधाए होंगी, उनको आप तोड़ सकेंगे। आपको सुधारकी खुबिये हस्तामलकवत् सुझने लगेंगी और आप एक आदर्श उपस्थित कर अपना कल्याण करेंगे । और आप जिन शासनकी वास्तविक प्रभावना करनेको समर्थ होगें।

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