Book Title: Jain Hiteshi 1914 Ank 01 02
Author(s): Nathuram Premi
Publisher: Jain Granthratna Karyalay

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Page 112
________________ ११० जैनहितैषी जनसाधारणकी भाषामें प्रत्येक वर्णके स्त्रीपुरुषोंके सामने दिया था और जातिभेदको तोड़कर क्षत्रिय महाराजाओं, ब्राह्मण पण्डितों और अधमसे अधम गिने जानेवाले मनुष्योंको भी जैन बनाया था तथा स्त्रियोंके दर्जेको भी ऊँचा उठाकर वास्तविक सुधारकी नीव डाली थी। उनके 'मिशन ' अथवा 'संघ' में पुरुष और स्त्रियाँ दोनों हैं और स्त्री-उपदेशिकायें पुरुषोंके सामने भी उपदेश देती हैं। इन बातोंसे साफ मालूम होता है कि महावीर किसी एक समूहके गुरु नहीं, किन्तु सारे मनुष्यसमाजके सार्वकालिक गुरु हैं और उनके उपदेशों से वास्तविक सुधार और देशोन्नति हो सकती है। इस लिए इस सुधारमार्गके शोधक समयको और देशको तो यह धर्म बहुत ही उपयोगी और उपकारी है। इसलिए केवल श्रावककुलमें जन्मे हुए लोगोंमें ही छुपे हुए इस धर्मरत्नको यत्नपूर्वक प्रकाशमें लानेकी बहुत ही आवश्यकता है । प्राचीन समय में इतिहास इतिहासकी दृष्टिसे शायद ही लिखे जाते थे। श्वेताम्बर और दिगम्बर सम्प्रदायके जुदा जुदा ग्रन्थोंसे, पाश्चात्य विद्वानोंकी पुस्तकोंसे तथा अन्यान्य साधनोंसे महावीरचरित तैयार करना पड़ेगा। किसी भी सूत्रमें या ग्रन्थ महावीर भगवान्का पूरा जीवनचरित नहीं है और जुदा जुदा ग्रन्थकारोंका मतभेद भी है। उस समय दन्तकथायें, अतिशयोक्तियुक्त चरित और सूक्ष्म बातोंको स्थूलरूपमें बतलाने के लिए उपमामय वर्णन लिखनेकी आधिक पद्धति थी और यह पद्धति केवल जैनोंमें ही नहीं किन्तु ब्राह्मण, ईसाई आदिके सभी ग्रन्थों में दिखलाई देती है । इस लिए यदि आज कोई पुरुष पूर्वके किसी महापुरुषका बुद्धिगम्य चरित लिखना चाहे तो उसके लिए उपयुक्त स्थूल वर्णनों, दन्तकथाओं और भक्तिवश लिखी हुई आश्चर्यजनक बातोंमेंसे खोज करके वास्तविक मनुष्यचरित लिखनेकायह बतलानेका कि अमुक महात्मा किस प्रकार और कैसे कामोंसे उत्क्रान्त होते गये और उनकी उत्क्रान्ति जगतको कितनी लाभदायक हुई-काम बहुत ही जोखिमका है। मगधदेशके कुण्डग्रामके राजा सिद्धार्थकी रानी त्रिशलादेवीके गर्भसे महावीरका जन्म ई० स० से ५९८ वर्ष ( ? ) पहले हुआ। श्वेताम्बर ग्रन्थकर्ता कहते हैं कि पहले वे एक ब्राह्मणीके गर्भ आये थे; परन्तु पीछे देवताने उन्हें त्रिशला क्षत्रियाणीके गर्भमें ला दिया ! इस वातको दिगम्बरग्रन्थकर्ता स्वीकार नहीं करते Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org

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