Book Title: Chovish Jina Prachin Stuti Chaityavandan Stavan Thoyadi Sangraha
Author(s): Arunvijay
Publisher: Mahavir Vidyarthi Kalyan Kendra

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Page 13
________________ ५. श्री सुमतिनाथ प्रभुनी स्तुति : वाणी जिनेन्द्र तुज अद्भुत जे सुणे छे, .. पीयूषने तृण समान ज ते गणे छे, मिथ्यात्व मोह हरनार कुबुद्धि कापो, स्वामी ! हे सुमतिदेव ! सुबुद्धि आपो. चैत्यवंदन : सुमतिनाथ सुहकरु, कौशल्या जस नगरी, मेघराय मंगला तणो, नंदन जितवयरी ॥१॥ क्रौंच लंछन जिन राजियो, अणसे धनुषनी देह, चालीस लाख पूरबत', आयु अति गुण गेह ॥२॥ सुमति गुणे करी जे भयो, तयों संसार अगाध, तस पद पद्म सेवा थकी, लहो सुख भव्याबाध ॥३॥ स्तवन :सुमतिनाथ गुणझुं मिलीजी, वाधे मुज मन प्रीत । तेल बिंदु जिम विस्तरेजी, जल माहे भली रीत, सोभागी जिनशें लाग्यो अविहड रंग ॥१॥ सोभागी... सज्जनशु जे प्रीतडीजी, छानी ते न रखाय, परिमल कस्तुरीतणोजी, मही माहे महकाय ॥२॥ सोमागी .. अंगुलीये नवि मेरु ढंकाये, छाबडीये रवि तेज, अंजलिमां जिम गंग न माये, तिम मुज मन प्रभु हेज ॥३॥सोभागी.. हुमो छोपे नहि अधर अरुण जिम, खाता पानसुरंग, पीवत भर भर प्रभु गुण प्याला, तिम तुज मुज प्रेम अभंग॥४॥ सोभागी.. ढांकी ईक्षु फरालशुंजी, न रहे लहि-विस्तार, वाचक यश कहे प्रभु तणोजी, तिम मुज प्रेम प्रकार ॥५॥ सोभागी..

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