Book Title: Bhavi Jineshwar Amamswami Charitra Mahakavya Part 01
Author(s): Muniratnasuri, Vijaykumudsuri
Publisher: Manivijay Ganivar Granthmala

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Page 248
________________ श्रीअमम // 236 // जिनचरित्रम् पराजित कदम्बेन स्वीकृता दीक्षा कृताभ्यां लोकस्याऽऽदर्शयेतामांकवत् // 57 // तौ कांस्यतालबत्ताम्रचूडवत्प्रलयेऽद्रिवत् / आस्फलन्तौ मिथो देवैरपि सत्रासमीक्षितौ // 58 // नियुद्धकलया चासीत्तदा चक्रारवत्तयोः / परिवृत्तिकृतोर्वेगादधिोऽवस्थितिः क्रमात् // 59 // अद्योरिव तयोः पादन्यासभारातुरा धुरा / शेषसूकरकूर्मेशैरपि क्लेशादधार्यत // 60 // क्रौञ्चबंधमथो बद्धो बन्धविद्याविपश्चिता / विजिग्ये नलराजेन कदम्बो बलवानपि // 61 // एवं दृष्ट्वादियुद्धेष्वप्यसौ भरतचक्रीवत् / श्रीबाहुबलिनेवाशु नलेन बलिना जितः // 62 // हिमेनेव निका| रेण तेन म्लानतनुस्तदा / कदम्बद्रुमवद्दध्यौ कदम्ब इति चेतसि // 63 // न खंडितं मया क्षत्रव्रतं किन्त्वधिको नलः / प्राक् तपो| वेतनक्रीतैबलैर्मामजयजवात् // 64 // इतो मे संमुखस्यापि विमुखस्यापि निश्चितम् / मृत्युरागात्कीर्णंकीच्योरेव लोकेत्र मेलकुत् // 65 // वैमुख्येनापि चेजैनी प्रव्रज्यामाश्रये ततः / तत्प्रभावादिहाकीर्तिन मे बाहुबलेरिव // 66 // भवित्री परलोके च मुक्तिकांतां स्वयंवरा / विमृश्येत्यपसृत्याशु स्वयं तक्षशिलापतिः // 67 // द्वेधापि विग्रहं त्यक्त्वा वैराग्याद्देवतार्पितः। व्रती भूत्वोपकरणैस्तस्थौ * प्रतिमया स्थिरः // 68 // त्रिभिर्वि०॥ तं गृहीतव्रतं वीक्ष्य वैलक्ष्यप्रत्यलो नलः / जगाद भवतैवैवं हारिते जीयते मुने ! // 69 // अहं न केवलं जिग्ये जिग्ये मानोऽपि दुर्जयः। मोहोऽपि तज्जयाजिग्ये दिग्ये यद्विरतिस्त्वया // 70 // निर्जितानां तदस्माकं त्वं गृहाण | जिताहव ! / राज्य क्रमो वा यद्वाह्या जिष्णुभिर्विजितश्रियः॥७१॥ इत्थं बद्धांजलिनम्रः प्रार्थनापेशलो नलः / जितकर्मकदम्बेन कदम्बेनेक्षितोऽपि न // 72 / / अधोलोकसखीं द्वधा युक्तं यत्कठिनां क्षमाम् / मुक्त्वाऽयमग्रहीदुर्द्धलोकदां मृदुला मुनिः // 73 // स्तुबेति तं नलो नत्वा तद्राज्येऽस्यैव नन्दनम् / जयशक्तिमिव स्वस्य जयशक्ति न्यवीविशत् / / 74 // नलराजोऽप्यथो जिष्णुः प्रभात्यागदयान्वितः / संसाध्य भरतस्यार्द्ध कोशलां कुशली ययौ सर्ग-६ // 236 //

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