Book Title: Vairagya Shataka
Author(s): Purvacharya, Gunvinay
Publisher: Jindattsuri Gyanbhandar

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Page 135
________________ वैराग्य शतकम् ॥१३३॥ माम जल्पत बहुलं ये बद्धाः चिकणैः कर्ममिः भाषांतर मामा जंपह बहुयं । जे बद्धा चिक्कणेहि कम्मेहिं ॥ सहित सर्वेषां तेषां जायते हितोपदेशः महादोषः वा महाद्वेष संवेसि तेसि जायेइ । हियोवेएसो महोदोसो ॥ ७६ ॥ ॥१३३॥ अर्थ-अयोग्य शिष्योने कृपाथी उपदेश करता गुरुने जोइ, योग्य शिष्यो गुरु प्रत्ये कहे छे के, हे गुरो ! (जे के०) जे पुरुषो (चिक्कणेहि के०) चिकणां एवां (कम्मेहिं के०) कर्मे करीने (बद्धा के०) बंधाया छे, तेमने (यहुयं के०) Kal | घणो (मामा जपह के०) उपदेश न करो, न करो ! केमके, (तेसि के०) ते (सम्वेसि के०) सर्वे अयोग्य शिष्योने ३ (हियोवएसो के०) हितोपदेश जे ते (महादोसो के०) महादोषवालो. अथवा महाद्वेषवालो (जायइ के०) थाय छे. ____ भावार्थ-अयोग्य शिष्यने वारंवार बोध करता देखीने अचार्यमहाराज प्रत्ये मुनियो जे ते, विनंतो करे छे के, 10 | हे भगवन् ! आप तो करुणासागर छो. परंतु काला निविड पत्थर जेवा, आ खल शिष्योने आप गमे तेटलो पति | बोध करशो तोय पण तेओ प्रतिबोध पामवा कठण जणाय छे. केमके, जे प्राणीयो ज्ञनावरणीयादिक निविड करें | 3 करीने बधाणा छे, ते प्राणीयो धर्मोपदेश देवाने योग्य नथी. जेम काचाघडामां नांखेलं पाणी ते पोते नाश पामे छ । अने घडाने पण नाश पमाडे छे, तेम अयोग्य जीवोने बोध करेलु सिद्धान्त रहस्य जे ते, नाश पामे छे. अने ते अयोग्य शिष्य पोताना आत्माने पण नाश करे छे. अथवा ते अयोग्य शिष्योने उपर देव थाय छे. ते कय के केः Jww.jainelibrary.org. Jain Education Inter For Private & Personal Use Only 2 010_05

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