Book Title: Vairagya Shataka
Author(s): Purvacharya, Gunvinay
Publisher: Jindattsuri Gyanbhandar

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Page 145
________________ पैराग्यशतकम् भाषांतर सहित ॥१४३॥ ॥१४॥ | ते दृष्टांत प्रसिद्ध छे, माटे लख्य नधी. ॥७९॥ शिशिरे काले शीतलनिलस्य लहरीणां सहस्राणि तैः घनं यथा स्यात्तथा भिन्नो देहो यस्य सः सिसिमि सीयलानिल । लहरिसहस्सेहि भिन्नघणदेहो ॥ तिर्यक्त्वे अरण्ये अनंतशः निधनं अनुप्राप्ताः सिरियेत्तणमिणे । अणंतसो निहणम ऽणुपत्तो ॥ ८॥ ___ अर्थ - हे जीव! (तिरियत्तणमि के०) तिर्यचना भवमा (अरणे के०) अरण्य (अटवी) ने विषे (सिसिमि के०) शिशिरऋतु (शियालो के०) आवे सते (सीयलानिल के०) शीतल (टाढो) वायु, तेनी (लहरिसहस्सेहि के०) हजारो JE लहेरोवडे (भिन्नघणदेहो के०) भेदायो छे. एटले पीडायो छे दृढ एवो पण देह ते जेनो, एवो थयो सतो, तुं (अणंतसो | के०) अनंतीवार (निहणं के०) नाशने (अणुपत्तो के०) पाम्यो छे. भावार्थ-हे आत्मन् ! तुं पूर्व अनुभवेलां दुःखने, लगार विचारी जो के, तियेचना भवमा तहारो देह खूब । मजबूत हतो, तोयपण पोष महा महिनानी अत्यंत टाढथी, (हीम पडवाथी) अनंतीवार मरण पाम्यो. एटले आ जीव J. अनेक प्रकारना रसायण जेवां के, बांबु हरिताल विगेरे खाइने शरीरने मजबूत तथा पुष्ट कर धारे छे; तोयपण JE | ते शरीर घोडा जेवू, अथवा पाडा जेवू कहीपण थतुं नथी. तो पण ते शरीरने घोडानी तथा पाडानी उपमा अपाय छे. तेवा घोडा विगेरे तिर्यंचोनां शरीर पण, अत्यंत टाढथी नाश पामे छे. ते नाश पामवादिक दःख ते अनंतीवार كائن فعول وفعاليات المعلنا عاونون مازند ___JainEducation InterIMEI12010-05 For Private & Personal Use Only Aciww.jainelibrary.org

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