Book Title: Siddhant Swadhyaya Mala - Uttaradhyayan Dashvakalik Nandi Uvavai Sukhvipak Sutrakritang
Author(s): Hiralal Hansraj
Publisher: Hiralal Hansraj

View full book text
Previous | Next

Page 84
________________ (८०) श्रीजैनसिद्धान्त - खाध्यायमाला ११ ॥ १२ ॥ ॥ १४ ॥ ॥ १५ ॥ १६ | ॥ ॥ १९ ॥ कहं चरे कहं चिट्ठे, कहमाए कहं सए । कहं भुंजन्तो भासतो, पावकम्मं न बंधइ ॥ ७ ॥ जयं चरे जयं चिट्ठे, जयमासे जयं सए । जयं भुंजन्तो भासतो, पावकम्मं न बंधइ ॥ ८ ॥ सर्व्वभूयप्पभूयस्स, सम्मं भूयाइ पासओ । पिहिआसवस्स दंतस्स, पावकम्मं न बंधइ ॥ ९ ॥ पढमं नाणं तओ दया, एवं चिट्ठइ सङ्घसंजए । अन्नाणी किं काही, किं वा नाही सेयपावगं ॥ १० ॥ सोचा जाणइ कल्लाणं, सोच्चा जाणइ पावगं । उभयं पि जाणइ सोच्चा, जं सेयं तं समायरे ॥। जो जीवे विनयाण, अजीवे वि न याणइ । जीव जीवे अयाणंतो, कहं सो नाहीइ संजमं ॥ जो जीवे विया, अजीवे वि वियाणइ । जीवाजीवे वियाणतो, सो हु नाहीइ संजमं जय जीवमजीवे य, दोबि एए वियाणइ । तया गई बहुविहं सवं जीवाण जाण ॥ जया गई बहुविहं, सङ्घजीवाण जाणइ । तथा पुण्णं च पात्रं च, बंधं मुक्खं च जाणइ जया पुणं च पावंच, बंधं मुक्ख च जाणइ । तया निव्विंदए भोए, जे दिव्वे जे य माणुसे || जया निव्विंद भोए, जे दिव्वे जे य माणुसे । तया चयइ संजोगं, सब्भिन्तरं बाहिरं जया चयइ संजोगं, सब्भितरं बाहिरं । तया मुंडे भवित्ताणं, पचइए अणगारियं जया मुंडे भवित्ताणं, पवइए अणगारियं । तया संवरमुकिहुं, धम्मं फासे अणुत्तरं जया संवरमुक्किडं, धम्मं फासे अणुत्तरं । तया धुगइ कम्मरयं, अबोहिकल कर्ड ॥ जया धुणइ कम्मरयं, अबोहिकलसं कडं । तया सच्चत्तगं नाणं, दंसणं चाभिगच्छइ जया सव्वत्तगं नाणं, दंसणं चाभिगच्छइ । तया लोगमलोगं च, जिणो जाणइ केवली ॥ जया लोगमलोगं च, जिणो जाणइ केवली । तया जोगे निरंभित्ता, सेलेसिं पडिवजइ ॥ २३ ॥ जया जोगे निरंभित्ता, सेलेर्सि पडिवज्जइ । तया कम्मं खविचाणं, सिद्धिं गच्छइ नीरओ || २४ ॥ जया कम्पं खवित्ताणं, सिद्धिं गच्छइ नीरओ । तथा लोगमत्थथत्थो, सिद्धो हवइ सासओ ॥ २५ ॥ मुह सायगहस समणस्स, साया उलगस्स निगामसाइस्स । उच्छोलणापहोअस्स, दुल्लहा सुगई तारिसगस्स ॥ २६ ॥ तवोगुणपहाणस्स, उज्जुमइ खन्तिसंजमरयस्स । परीसहे जिणंतस्स, सुलहा सुगई तारिसगस्स ॥ ६७ ॥ पच्छा वि ते पयाया, खिष्पं गच्छंति अमरभवणाई । जेसिं पिओ तो संजमो अ, खंती अ वभचरं च ।। २८ ।। इच्चेयं छज्जीवणिअं, सम्मदिट्ठी सया जए । दुल्लहं लहित्तु सामण्णं, कम्पुणा न विराहिञ्जासि ॥ २९ ॥ २० ॥ ॥ २१ ॥ २२ ॥ त्ति बेमि ॥ इअ छज्जीवणिआ णामं चउत्थं अज्झयणं समत्तं ॥ ४ ॥ ॥ १३ ॥ १७ ॥ १८ ॥

Loading...

Page Navigation
1 ... 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112 113 114 115 116 117 118 119 120 121 122 123 124 125 126 127 128 129 130 131 132 133 134 135 136