Book Title: Siddhant Swadhyaya Mala - Uttaradhyayan Dashvakalik Nandi Uvavai Sukhvipak Sutrakritang
Author(s): Hiralal Hansraj
Publisher: Hiralal Hansraj

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Page 97
________________ श्रीदसवैकालिकसूत्र - अट्ठमाध्ययनम् (९३) ६१ ॥ पोग्गलाणं परिणामं, तेसिं नच्चा जहा तहा । विणीअतिण्हो विहरे, सीईभूएण अप्पणा ॥ ६० ॥ बाइ सङ्ग्राह निक्खतो, परिआयट्ठाणमुत्तमं । तमेव अणुपालिज्जा, गुणे आयरियसंमए ॥ तवं चिमं संजमजोगयं च सज्झायजोगं च सया अहिट्ठ ए । सूरे व सेणाइ सम्मत्तमाउहे, अलमप्पणो होइ अलं परेसिं ।। ६२ ।। सज्झायसुज्झाणरयस्स ताइणो, अपावभावस्स तवे रयस्स । विसुज्झई जं सिमले पुरेकर्ड, समीरिअं रुप्पमलं व जोइणा ।। ६३ ।। से तारिसे दुक्खसहे जिइंदिए, सुएण जुत्ते अममे अकिंचणे । विरायई कम्मघणम्मि अवगए, कसिणन्भपुडावगमै व चंदिम ॥ ६४ ॥ तिमि || इअ आयारपणिही णाम अट्ठममज्झयणं समत्तं ॥ ८ ॥ ॥ अह विणयसमाही णाम नवममज्झयणं ॥ थंभा व कोहा व मयप्पमाया, गुरुस्सगासे विणयं न सिक्खे । सो चेव उ तस्स अभूइभावो, फलं व कीअस्स वहाय होइ ॥ १ ॥ जे आवि मंदिति गुरुं वित्ता, डहरे इमे अप्पसुए त्ति नच्चा । हीलंति मिच्छं पडिवजमाणा, करंति आसायण ते गुरूणं ॥ २ ॥ पईए मंदा विभवंति एगे, डहरा वि अ जे सुअबुद्धोववेआ । आयारमंता गुणसुट्ठिअप्पा, जे हीलिआ सिहिरिव भास कुजा || ३ || जे आवि नागं डहरं ति नच्चा, आसायए से अहिआय होइ । वारियों पि हु हीलयंतो, निअच्छई आइपहं खु मंदो (दे) ॥ ४ ॥ सीविसो वावि परं सुरुट्ठो, किं जीवनासाउ परं न कुजा । आयरिआया पुण अप्पसन्ना, अबोहिआसायण नत्थि मुक्खो ॥ ५ ॥ जो पावगं जलिअमवक्कमिज्जा, आसीविसं वा वि हु कोवइज्जा । जो वा विसं खायइ जीविअट्ठी, एसोवमासायणगा गुरूणं ॥ ६ ॥ सिआ हु से पावय नो डहिज्जा, आसी विसो वा कुबिओ न भक्खे | सिआ विसं हालहलं न मारे, न आवि मुक्खो गुरुहीलणाए ॥ ७ ॥ जो पवयं सिरसा भित्तुमिच्छे, सुत्तं व सीहं पडिबोहइज्जा । जो वा दए सत्तिअग्गे पहारं, एसोबमासायणया गुरूणं ॥ ८ ॥ सिआ हु सीसेण गिरिं पि भिंदे, सिआ हु सीहो कुविओ न भक्खे | सिआन भिंदिन वसत्तिअग्गं, न आवि मुक्खो गुरुहीलसाए ॥ ९ ॥ आयरिअ पाया पुण अप्पसन्ना, अबोहिआसायण नत्थि मुक्खो । तम्हा अणाबाहसुहाभिकंखी, गुरुप्पसायाभिमुो रमिज्जा ॥ १० ॥ जहाहि अग्गी जलणं नमसे, नाणाहुईमंतपयाभिसित्तं ।

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