Book Title: Ritthnemichariyam Part 4 1
Author(s): Swayambhudev, Ramnish Tomar, Dalsukh Malvania, H C Bhayani
Publisher: Prakrit Text Society Ahmedabad

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Page 97
________________ रिट्ठणेमिचरिउ घरे घरे देइ दाणु सयलु-वि जणु ८ घरे घरे किउ कुंकुम-संमज्जणु घत्ता ४ जहिं पुरे जिणु उप्पण्णु जं खणु-वि ण सिय परिवजइ । जहिं णिवसइ सई कण्हु तहिं सोह काई पुच्छिज्जइ । [३] अवरण्हइ किर सोहइ विवाहु तहिं तेहए अवसरे णेमिणाहु अहिणव-कमलोवरि संचरंतु जाइ जीवहं पडिवोहणु करंतु वहु-णयरुज्जाणेहिं पइसरंतु भव-जलहिहे भव्व समुद्धरंतु वंसहर-विसय-सहसई णियंतु | णरवर-लक्खहं पावज दिंतु जीव-दयामए णावए धरंतु उज्जेंत-महीहर-सिहरु पत्तु सु-णिविट्ठ सुणेवि तहिं ण किउ खेउ गउ वंदणहत्तिए वासुएउ गय स-रहस स-महिल दस दसार वसुदेवहो सुय वम्मह-कुमार पिहु-दुंदुहि-सिणि-अणिरुद्ध-भाणु अंकूर-विम्हि-सच्चइ-सुभाणु भोयंधय-संवुकुमार-कुंत णइंद-विउर-हरि विणयवंत सिणि-सढ-जरुद्धव-चारुजेट्ट दीवायण सुहि जउ चारुजेट्ठ (?) , घत्ता एवं-वि अवर-वि सव्व णय-मुह पियएहिं वरिट्ठ। जय जय णाह भणंत जणा वर-समवसरणु पइट्ठ॥ ८ _[४] गय-णामु-वि उत्तमु परम-सत्तु तित्थयर-चलण-वंदण-पसत्तु अहिमयर-सम-प्पह-रहवरत्थु वित्थय-वच्छत्थलु सई महत्थु णिय-मुह-जिय-ससहर-सहसवत्तु जिण-मुणि-गुरु-जणण-जणेरि-भत्तु कडि-वलय-परज्जिय-हरि-णियंवु तव-तेहोहामिय-तवण-विवु भुय-जुय-जिय-वड-पारोह-सोहु वहु-चिहुर-विसोहिय-महुयरोहु गुरु-ए(?)णयालंकिय-सयल-गत्तु अवलक्खण-अवगुण-णिवह-चत्तु मंदार-धराहर-पवर-धीरु जल-वाहिणि-पाल-महा-गहीरु ४ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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