Book Title: Patrimarg Pradipika
Author(s): Mahadev Sharma, Shreenivas Sharma
Publisher: Kshemraj Krishnadas

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Page 130
________________ भाषाटीकासहितम् । (१२९) o n .. . - * स्थिरमैत्रीवशात् द्वादशवर्गबलचक्रम्. र. चं. | मं. । बु. | गु. । सु. | . ५ देष्काण. || २ || २ | 3:13. | ४ ४ चतुर्थीक. । ५ . पंचमांच. पष्ठांश. | २४ २:: ||२४| • सप्तमांच. २५। :: :: २०१० पत्रांचा. : : एकादवांच. || २१|२४|| २ | बाकांव. एकादशांचा. योग, विंशोपकात्मकचलम्. ४५ म. म. म. म. म. म. म. बल. | स्वभस्वोच्चान्यतरस्थितौ ग्रहस्य प्रथम हर्षपदम् ॥ ५॥ स्वराशि वा अपनी उच्चराशिमेसे कोई भी राशिका जो यह हो (ग्रह स्वराशिका हो वा अपनी उच्चराशिका हो)वो उस ग्रहका प्रथम हर्ष-पद होता है ॥ ५० ॥ गोत्रिषटक्वीशबाणांत्यगेषु सूर्यादिषु द्वितीयम् ॥५१॥ सूर्यको आदि ले गो ९, त्रि ३, षट् ६, कु १, ईश ११, बाण ५ अन्त्य १२ बारहवें स्थानमें यथाक्रम ग्रह स्थित हो तो द्वितीय हर्षपद होता है, Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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