Book Title: Meri Drushti Meri Srushti
Author(s): Mahapragna Acharya
Publisher: Adarsh Sahitya Sangh

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Page 148
________________ १४६ मेरी दृष्टि : मेरी सृष्टि युवाचार्य-मैंने पहले ही कहा है कि कट्टर लोग कहां नहीं होते। पांचजन्य-अन्य मुसलमानों ने इसका विरोध भी तो नहीं किया। यह मामूली सवाल तो है नहीं, सम्पूर्ण राष्ट्र की अस्मिता का सवाल है। युवाचार्य-तमिलनाडु में भी तो ऐसी ही घटनाएं हुई थी... पांचजन्य-परन्तु उनकी निष्ठा.... | युवाचार्य-निष्ठा का सवाल बहुत जटिल हो गया है। तमिलनाडु को अलग करने की मांग क्या थी? हिन्दुस्तान के प्रति निष्ठा है क्या? खालिस्तान को अलग करने की मांग क्या है ? इस मांग का मतलब ही यही है कि उनकी निष्ठा यहां से नहीं है। देश का कानून और संविधान भी सबके लिए समान नहीं है । मुसलमान तो पांच शादियां कर सकता है परन्तु और कोई नहीं-ऐसा क्यों? परिवारनियोजन के साथ भी यही बात है । सही माने में इन परम्पराओं को धर्म की दृष्टि से नहीं बल्कि राष्ट्रीय दृष्टि से देखा जाए। इसके खिलाफ कहीं से कोई आवाज भी तो नहीं उठ रही है। पांचजन्य-यह तो धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है... युवाचार्य-लेकिन धर्म लोग कहते किसको हैं? राष्ट्रीय दृष्टि से कानून और चिन्तन एक हो । सबके पीछे तो राजनीति काम कर रही है। पांचजन्य-इसका साफ मतलब है कि धर्मनिरपेक्षता से हिन्दुस्तान को खतरा बढ़ता जा रहा है। युवाचार्य-मैं तो मानता हूँ कि यह शब्द भी खतरनाक है, भ्रामक है । इससे बड़ा नुकसान हुआ है । डॉ० संपूर्णानन्द जैसे विद्वान की इससे असहमति थी, वे इसे बदलने के पक्ष में थे। मजहब निरपेक्ष हो सकता है, धर्म नहीं। पांचजन्य-मजहब और धर्म में क्या फर्क है? युवाचार्य-मजहब तो सम्प्रदायवाचक है। धर्म व्यापक है । सम्प्रदाय से निरपेक्ष हुआ जा सकता है, धर्म से नहीं । सम्प्रदाय अपनी कुछ खास मान्यताओं को लेकर चलता है, वह देश-काल की परिधि में सीमित रहता है परन्तु धर्म तो सार्वभौम है, उसे आप न बांध सकते हैं, न बांट सकते हैं। हिन्दू शब्द के आसपास जटिलताएं बढ़ती जा रही हैं । यह अस्पष्ट वातावरण का निर्माण कर रही है जिसका न कोई अर्थ है, न अवधारणा । सब उलझता जा रहा है। अगर पूरे समाज का स्वरूप राष्ट्रव्यापी होता तो यहां के मुसलमान भी Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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