Book Title: Meghmala Vichar Author(s): Shravak Bhimsinh Manek, Publisher: Shravak Bhimsinh Manek View full book textPage 3
________________ Jain Educationa ॥ श्री जिनायनमः ॥ मेघमाला विचार. कर्ता श्री विजयप्रनसूरि श्री युगादि प्रज्जुं नत्वा, ध्यात्वा च श्रुत देवताम् । मेघमालाख्यग्रंथोऽयं, रच्यते जनकामदः१ अर्थ- श्री रुषनदेव प्रजुने नमस्कार करीने, तथा शासनदेवतानुं ध्यान धरीने, लोकोना इश्चितने देनारो आ " मेघमाला ” नामनो ग्रंथ रचाय बे. ॥ १ ॥ कार्तिके मार्गशीर्षे वा, संक्रांतौ यदि वर्षति । मध्यमं जायते शस्यं, पौषमा सि सुनिक्षितम २ अर्थ- कार्तिक अथवा मागसर मासमां संक्रांतिने दिवसे, जो वरसाद वरसे, तो मध्यम प्रकारनं धान्य याय, अने पोशमासनी संक्रांतिने दिवसे जो वरसे, तो सुकाल थाय. ॥ २ ॥ | दीपोत्सव दिने वारौ, जौमार्को न शुभावहौ । संक्रांतौ वर्षति चेच्च, शुजमर्यादिके न हि ॥३॥ - दीवालीने दिवसे जो मंगल, तथा रविवार होय, तो ते शुभ करनारां नथी, अने ते संक्रां तिने दिवसे जो वरसाद श्राय, तो ते धन आदिकमां शुभकारक नथी. ॥ ३ ॥ For Personal and Private Use Only jainelibrary.orgPage Navigation
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