Book Title: Maharaj Vikram
Author(s): Shubhshil Gani, Niranjanvijay
Publisher: Nemi Amrut Khanti Niranjan Granthmala

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Page 487
________________ मुनि निरंजनविजयसंयोजित 391 निरंतर मेरे समीप ही रहा करती हैं। इस लिये तुम निर्मल मन में मुझे बैठाओ और अपनी इच्छा के अनुसार इन उद्यान आदि स्थानो का उपभोग करो।' विद्याधर को हैमवती का प्रत्युत्तर यह सुनकर हेमवती कहने लगी कि हे विद्याधर ! ऐसी बातें तुम्हे नहीं करनी चाहिये / क्यों कि परस्त्री गमन करने से लोग नरक में पड़कर अनेक दुःख पाते है। जो स्त्री अपने पतिका त्याग करके निर्लज्ज होकर दूसरे पुरुष से सम्बन्ध जोड़ती है ऐसी कुलटा स्त्री का क्या विश्वास ? परस्त्रीगमन करने से प्राण सदा धोखे में ही रहा करते हैं। परस्त्री गमनसे इस लोक और पर लोक में भी जीवका अनिष्ट ही होता है और यह वैरका परम कारण है। इसलिये परस्त्री गमन कदापि नहीं करना चाहिये। परस्त्रीगमन करने वालेका सर्वस्व नष्ट हो जाता है। वह दुष्ट बन्धन में पड़ता है, उसके शरीर के अवयव छिन्नविछिन्न हो जाया करते हैं। मरनेपर वह पापी घोर नरक को प्राप्त करता है। पराक्रम से संसारको अधीन करने वाले रावणने परस्त्रीगमन की इच्छा मात्रसे ही अपने समस्त कुल को नष्ट किया और स्वयं नरक में गया।' - इसके बाद विद्याधरने कहाकि 'हे हेमवति ! तुम शीघ्रतया मुझको अपने पति रूप में स्वीकार करलो / अन्यथा तुम्हारा बहुत बड़ा अनिष्ट होगा / इस में संदेह नहीं / ' Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org

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