Book Title: Jainendra Siddhanta kosha Part 3
Author(s): Jinendra Varni
Publisher: Bharatiya Gyanpith

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Page 616
________________ वैश्य जैन व वैशेषिक मतकी तुलना e. वैशेषिको की भाँति जैन भी पर्यायार्थिक व सद्भूत व्यवहार नयकी दृष्टिसे द्रव्यके गुण व पर्यायोको, उसके प्रदेशो को तथा उसके सामान्य व विशेष सर्व भावोको पृथक्-पृथक् मानते हुए द्रव्य क्षेत्र, काल व भाव रूप चतुष्टयसे वस्तु भेट करते है (ENV/४ परन्तु उसके साथ-साथ द्रव्यार्थिक नयको दृष्टिसे उसका विरोधी अभेद पक्ष भी स्वीकार करनेके कारण जैन तो अनेकान्तवादी है (दे नय / V / २.१), परन्तु मेोषिक लोग अभेद पक्षको सर्वथा स्वीकार न करनेके कारण एकान्तवादी है। यही दानोमे अन्तर है । ) वैश्य -म पु / सर्ग / श्लोक - वेश्याश्च कृषिवाणिज्यपशुपा जोविता । ( १६ / १०४] । ऊरुभ्या दर्शयन् यात्राम् असाक्षीद चणि प्रभु जस्वलादियात्राभि या यत । ( १६ / २४४ ) । वणिजोऽर्थार्जनान्न्याय्यात् । ( ३८ / ४६ ) । जो खेती, व्यापार तथा पशुपालन आदिके द्वारा जीविका करते थे वे वेश्य कहलाते थे । ( १६ / १८४ ) । भगवान् ने अपने उरुओसे यात्रा दिखलाकर अर्थात् परदेश जाना सिखनाकर वैश्योकी रचना की सो ठीक ही है, क्योकि, जल, स्थल आदि प्रदेशोमे यात्रा कर व्यापार करना ही उनकी मुख्य आजीविका है । ( १६ / २४४ ) | न्याय पूर्वक धन कमाने से वेश्य होता है । ( ३८/४६ ) । वैश्रवण- -१ लोकपाल देवोका एक भेद - दे० लोकपान । २ आकाशोपपन्न देवोमे से एक दे० [देव]/11/२। ३ विपाकी दक्षिण श्रेणीका एक नगर - दे० विद्याधर । ४ हिमवान् पर्वतका एक कूट व उसका रक्षक देव-दे० लोक ५ / ४ । ५. विजयार्ध पर्वतका एक कूट व उसका रक्षक देव - दे० लोक ५/४६ पद्म हृदके वनमे स्थित एक कूट- दे० लोक५ / ७।७ रुचक पर्वतका एक कूट- दे० लोक५/१८ पूर्व विदेहका एक वक्षार व उसका कूट तथा रक्षक देव दे० लोक ३/३१ मानुषोत्तर पर्वतके नार कुमार देव दे० सोच/५/१० । ६०९ वैश्रवण- १ प पु / ७ / श्लोक - यक्षपुरके धनिक विश्रवसका पुत्र था । १२६ विद्याधरोके राजा इन्द्र द्वारा प्रदत्त लकाका राज्य किया, फिर रावण द्वारा परास्त किया गया | २४६ । अन्तमें दीक्षित हो गया । २५११ २, म पु / ६६ / श्लोक - कच्छकावती देशके वीतशोक नगरका राजा था |२| तप कर तीर्थंकर प्रकृतिका बन्ध किया और मरकर अपराजित विमानमे अहमिन्द्र हुआ । १४ - १६ । यह मल्लिनाथ भगवानका पूर्वका दूसरा भव है । दे० मल्लिनाथ । वैश्वानर - अपर नाम विशालनयन था । यह चतुर्थ रुद्र हुए है- दे० शलाका पुरुष / ७ । वैष्णव दर्शन--१. दर्शनको अपेक्षा भेद परिचय इस दर्शन में भक्तिको बहुत महत्त्व दिया जाता है। इसके चार प्रधान विभाग है- श्री सम्प्रदाय, हंस सम्प्रदाय, ब्रह्म सम्प्रदाय, रुद्र सम्प्रदाय | श्री सम्प्रदाय विशिष्टाद्वैतवादी है जो रामानन्दी भी कहलाते है । (दे० वेदान्त / ४ ) । हस सम्प्रदाय द्वैताद्वैत या भेदाभेदवादी है । इन्हे हरिव्यासी भी कहते है ( दे० वेदान्त / 111, V)। ब्रह्म सम्प्रदाय द्वैतवादी है इन्हे मध्य या गौडिया भी कहते है (दे० वेदान्त) सम्प्रदाय खात नाही है। इसे विष्णु स्वामी या वल्लभ सम्प्रदाय भी कहते है । वेदान्स ७. - दे० २. शक्ति व मति आदिकी अपेक्षा भेद व परिचय शक्तिसंग तन्त्र के अनुसार इसके १० भेद है- वैखानस, श्री राधाबलभी, गोकुलेश, वृन्दावनी, रामानन्दी, हरिव्यासी, निम्बार्क, भागवत, पाचरात्र और वीर वैष्णव । १. वैखानस मुनिके उप भा० ३-७७ Jain Education International व्यंतर देशानुसार दीक्षित होनेवाले ये स्मार्त वैष्णव कहे जाते है । २ श्री राम आर्तिक १५०३ ई मे हरिवश गोस्वामी हुए। ये लोग जप, त्याग आदि व्यवहारमे सलग्न रहते है । ३ गोकुलेश कृष्णको केलि या रासलीलाके उपासक है। गौओसे प्रेम करते है। अपने शरीरको सताओ. आभूषणों व मुगदित द्रव्योसे सजाते है । शक्तिके उपासक है । ४ वृन्दावनी विष्णुके भक्त है। अपने पूर्णकाम मानते है। खियाके ध्यान में रहते है | शरीरपर सुगन्धित द्रव्योंका प्रयोग करते हैं । सारूप्य मुत्तिको स्वीकार करते है । ५ रामानन्दी शक्ति शिवके सामरस्य प्रयुक्त आनन्दमे मग्न रहते है। रामानन्द स्वामी द्वारा ई १३०० में इसका जन्म हुआ था । ६ हरिव्यासी विष्णु भक्त व जितेन्द्रिय है । यम नियम आदि अष्टाग योगका अभ्यास करते है । ई १५१० मे हरिराम शुक्लने इसकी स्थापना की थी। ७ निम्बार्क विष्णु भक्त है पूजाके बाह्य स्वरूप नियम पूर्वक लगे रहते है । शरीर एवं वनोंको स्वच्छ रखते है । भागवत विष्णुके भक्त और शिवके कट्टर द्वेषी है । इन्द्रिय बशी है। पाचरात्र शिव के द्वेषी व 'पण्डा' को श्रीकृष्ण के नामसे पूजने वाले है। पचरात्रि चत करते है । १० वीर विष्णु केरल त्रिष्णुके भक्त तथा अन्य सर्व देवताओ के द्वपी है। सादृश्य-३० वैनसिक क्रिया - दे० क्रिया/२/- 1 बेसिक बंध - ३००/ वैसिक शब्द - ० व्यंजन स.सि /१/१८/१९६७ व्यञ्जनमव्यक्त शन्दादिजात । ससि /६/४४/४५५/६ व्यञ्जन वचनम् । १ अव्यक्त शब्दादिके समूह को व्यजन कहते है ) ( रा वा / १/१८/-/६६/२७ ) । २. व्यजनका अर्थ वचन है ( वा २/४४/-१६३४/१० ) । = ध १३/५५.४५ / / १/२/२४८ व्यञ्जन खईमात्रकम् । व्यंजन अर्ध मात्रा वाला होता है। ★ व्यंजनकी अपेक्षा अक्षरोंके भेद-प्रभेद--दे अक्षर । ★ निमित्तज्ञान विशेष - दे० निमित्त / २ | व्यंजन संगम नय—०२ व्यंजन पर्याय दे० ३। व्यंजन शुद्धि- / / ११२/२६१/१० रात्र व्यञ्जनशुद्धिर्नाम यथा गणधरादिभिर्द्वात्रिंशदोषजितानि सूत्राणि कृतानि तेषा तथैव पाठ | शब्दश्रुतस्यापि व्यजते ज्ञायते अनेनेति ग्रहे ज्ञानशब्देन गृहीतत्वात् तन्मूल ही श्रुतज्ञानं गणधरादि आचार्योंने बत्तीस दोपोंसे रहित सूत्रोंका निर्माण किया है. उनको दोष रहित पढना व्यजन शुद्धि है। शब्द के द्वारा ही हम वस्तुको जान लेते है । ज्ञानोत्पत्ति के लिए शब्द कारण है । समस्त श्रुतज्ञान शब्द की भित्तिपर खड़ा हुआ है । अत शब्दोंको 'ज्ञायतेऽनेन' इस विग्रहसे ज्ञान कह सकते है । - (विशेष दे० उभय शुद्धि ) । जनावग्रह - २० व्यंतर-भूत, पिशाच जातिके देवोंको जैनागम मे व्यतर देव कहा गया है । ये लोग वैक्रियिक शरीरके धारी होते है। अधिकतर मध्यलोकके सुने स्थानोंमें रहते है। मनुष्य व तियंचोके शरीर में प्रवेश करके उन्हें लाभ हानि पहुँचा सकते है। इनका काफी कुछ वैभव ब परिवार होता है। जैनेन्द्र सिद्धान्त कोश For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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