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ब्युच्छेद
व्युत्सर्ग
च्छेद अर्थात् असत् का अभाव होना अनुत्पादानुच्छेद है. क्योकि सत्के असत्त्वका विरोध है। यह पर्यायार्थिक नयके आश्रित व्यव. हार है । ३ यहॉपर चूकि सूत्रकारने उत्पादानुच्छेद का ( अर्थात् पहले भेदका) आश्रय करके ही अभावका व्यवहार किया है, इसलिए प्रकृतिवन्धका सद्भाव ही निरूपित किया गया है । इस प्रकार इस ग्रन्थका बन्धस्वामित्व विचय नाम संगत है। गो. क./जी. प्र /१४/८०/४ ब बव्युच्छित्तौ द्वौ नयौ इच्छन्तिउत्पादानुच्छेदोऽनुत्पादानुच्छेदश्चेति । तत्र उत्पादानुच्छेदो नाम द्रव्यार्थिक तेन सत्त्वावस्थायामेव विनाशमिच्छति । असत्त्वे बुद्धिविषयातिक्रान्तभावेन वचनगोचरातिक्रान्ते सति अभावव्यवहारानुपपत्ते । तस्मात भाव एव अभाव इति सिद्ध। अनुत्पादानुच्छेदो नाम पर्यायार्थिक' तेन असत्त्वावस्थायामभावव्यपदेशमिच्छति । भावे उपलभ्यमाने अभावत्वविरोधात् । • अत्र पुन' सूत्रे द्रव्याथिकनय. उसादानुच्छेदोऽवलम्बित उत्पादस्य विद्यमानस्य अनुच्छेद. अविनाश. यस्मिन् असौ उत्पादानुच्छेदो नय । इति द्रव्याथिकनयापेक्षया स्वस्वगुणस्थानचरमसमये बन्धव्युच्छित्ति. बन्धविनाश । पर्यायाथिकनयेन तु अनन्तरसमये बन्धनाशः । - व्युच्छित्तिका कथन दो नयसे किया जाता है-उत्पादानुच्छेद और अनुत्पादानुच्छेद। तहाँ उत्पादानुच्छेद नाम द्रव्यार्थिकनयका है। इस नयसे सत्त्वको अवस्थामें ही विज्ञाश माना जाता है, क्योकि बुद्धिका विषय न बननेपर तब वह अभाव वचनके अगोचर हो जाता है, और इस प्रकार उस अभावका व्यवहार हो नहीं हो सकता । इसलिए सदभावमे ही असदभाव कहना योग्य है यह सिद्ध हो जाता है। अनुत्पादानुच्छेद नाम पर्यायार्थिक नयका है। इस नयसे असत्त्वकी अवस्थामें अभावका ज्यपदेश किया जाता है। क्योकि, सदभावके उपलब्ध होनेपर अभावपनेके होनेका विरोध है। यहाँ सूत्र में द्रव्याथिक नय अर्थात् उत्पादानुच्छेद का अबलम्बन लेकर वर्णन किया गया है। उत्पादका अर्थात विद्यमानका अनुच्छेद या विनाश जिसमे होता है अर्थात सद्भावका विनाश जहाँ होता है, वह उत्पादानुच्छेद नय है। इस प्रकार द्रव्यार्थिक नयको अपेक्षासे अपनेअपने गुणस्थानके चरम समयमें बन्धव्युच्छित्ति अर्थात् बन्धका विनाश होता है। पर्यायार्थिक नयसे उस चरम समयके अनन्तर वाले अगले समयमे बन्धका नाश होता है, ऐसा समझना
चाहिए। व्युच्छेद-दे० व्युच्छित्ति । व्युत्सगे-बाहरमें क्षेत्र वास्तु आदिका और अ-पन्तरमे कषाय
आदिका अथवा नित्य व अनियत कालके लिए शरीरका त्याग करना व्युत्सर्ग तप या व्युत्सर्ग प्रायश्चित्त है। व्युत्सर्ग प्रायश्चित्तका अपर नाम कायोमर्ग है जो दैवसिक, रात्रिक, चातुर्मासिक आदि दोषोके साधनार्थ विधि पूर्वक किया जाता है। शरीरपरसे ममत्व बुद्धि छोडकर, उपसर्ग आदिको जीतता हुआ, अन्तर्मुहूर्त या एक दिन मास व वर्ष पर्यंत निश्चल खडे रहना कायोत्सर्ग है। १. कायोत्सर्ग निर्देश
१. कायोत्सगका लक्षण नि सा /म् /१२१ कायाईपरदठवे थिरभाव परिहरत्त, अप्पाणं । तस्स हवे तणुसग्ग जो झायह णिन्विअप्पेण ।१२१३ -काय आदि परद्रव्यों में स्थिर भाव छोडकर, जो आत्माको निर्विकल्परूपसे ध्याता
है, उसे कायोत्सर्ग कहते है । १२१॥ मू. आ /२८ देव स्सियणियमादिसु जहूत्तमाणेण उत्तकालम्हि । जिणगुण चितणजुत्तो काओसग्गो तणुविसग्गो ।२। -दैव सिक निश्चित
क्रियाओमे यथोक्त कालप्रमाण पर्यंत उत्तम क्षमा आदि जिनगुणों की
भावना सहित देहमे ममत्वको छोड़ना कायोत्सर्ग है। रा वा/६/२४/११/५३०/१४ परिमितकाल विषया शरीरे ममत्व निवृत्ति कायोत्सर्ग: । परिमित काल के लिए शरीरसे ममत्वका त्याग करना कायोत्सर्ग है । (चा सा /५६/३)। भा आ/वि /६/३२/२१ देहे ममत्व निरास कायोत्सर्ग । =देहमें
ममत्वका निरास करना कायोत्सर्ग है। यो. सा./अ./१/१२ ज्ञात्वा योऽचेतन काय नश्वर कर्मनिर्मितं । न ___ तस्य वर्तते कार्ये कायोत्सर्ग करोति स. १५२१ -देहको अचेतन,
नश्वर व कर्म निर्मित समझकर जो उसके पोषण आदिके अर्थ कोई कार्य नहीं करता, वह कायोत्सर्गका धारक है। का, अ./मू./४६७-४६८ जलमललित्तगत्तो दुस्सहवाहीसु 'णिप्पडीयारो । मुहधोवणादि-विरओ भोयणसेज्जादिणिरवेक्खो ।४६१ ससरूवचिंतणरओ दुज्जणसुयणाण जो हु मज्झत्थो । देहे वि णिम्ममत्तो काओसग्गो तओ तस्स ।४६८। -जिस मुनिका शरीर जन्ल और मलसे लिप्त हो, जो दुस्सह रोगके हो जानेपर भी उसका इलाज नहीं करता हो, मुख धोना आदि शरीरके संस्कारसे उदासीन हो, और भोजन शय्या आदिकी अपेक्षा नहीं करता हो, तथा अपने स्वरूपके चिन्तनमें ही लीन रहता हो. दुर्जन और सज्जनमें मध्यस्थ हो, और शरीरसे भी ममत्व न करता हो उस मुनिके कायोत्सर्ग नामका तप होता है। नि. सा/ता. वृ./७० सर्वेषां जनानां कायेषु बयः क्रिया विद्यन्ते, सासा निवृत्ति' कायोत्सर्गः, स एव गुप्तिर्भवति। -सब जनोंको कायसम्बन्धी बहुत क्रियाएँ होती है, उनकी निवृत्ति सो कायोत्सर्ग है। वही गुप्ति है। दे० कृतिकर्म/३/२( खडे-खडे या बैठे बैठे शरीरका तथा कषायौंका त्याग
करना कायोत्सर्ग है।)
२. कायोत्सर्गके भेद व उनके लक्षण मू. आ./६७३-६७७ उठ्ठिदउठिद उठ्ठिद णिविठ्ठ उवविठ्ठ-उठिदी
चेव । उवविठ्ठदणि विट्ठो वि य काओसग्गो चदुरठाणो ।६७३। धम्म सुक्क च दुवे झायदि ज्झाणाणि जो ठिदो सतो। एसो काओसग्गो इह उठ्ठिदउठ्दिो णाम ।६७४। अट्ट रुद्द च दुवे झायदि झाणाणि जो ठिदो सतो । एसो काओसग्गो उठ्ठिदणिविठ्दिो णाम ।३७॥ धम्म सुक्क च दुवे झायदि झाणाणि जो णिसण्णो दु । एसो काउसग्गो उबविउठिदो णाम ।६७६। अट्ट रुद च दुवे झायदि झाणाणि जो णिसण्णो दु। एसो काउसग्गो णिसण्णिदणिसण्णिदो णाम ।६७७१ -अस्थितास्थित. उत्थित निविष्ट. उपविष्टोस्थित और उपविष्ट निविष्ट, इस प्रकार कायोत्सर्ग के चार भेद है ।६७३। जो कायोत्सर्गसे खडा हुआ धर्म शुक्ल ध्यानोको चिन्तवन करता है वह उत्थितोत्थित है।६७४। जो कायोत्सर्गसे खडा हुआ आर्त रौद्र ध्यानोको चिन्तवन करता है वह उत्थितनिविष्ट है।६७५। जो बैठे हुए धर्म व शुक्लध्यानोका चिन्तवन करता है वह उपविष्टोत्थित है ।६७६। और जो बैठा हुआ आत रौद्र ध्यानोका चिन्तवन करता है वह उपविष्टोपविष्ट है ।६७७१ (अन.ध.
९/१२३/८३३)। भ. बा./वि/११६/२७८/२७ उत्थितोत्थित, उत्थित निविष्टम्, उपविष्टोत्थित , उपविष्टोपविष्ट इति चत्वारो विकल्पा । धर्मे शुक्ले वा परिणतो यस्तिष्ठति तस्य कायोत्सर्ग' उस्थितोस्थितो नाम । द्रव्यभावोस्थानसमन्वितत्वादुत्थानप्रकर्ष उस्थितोस्थितशब्देनोच्यते। तत्र द्रव्योत्थानं शरीर स्थाणुबदूवं अविचलमवस्थान । ध्येयैकवस्तुनिष्ठता ज्ञानमयस्य भावस्य भावोस्थान। आर्तरौद्रयो परिणतो यस्तिष्ठति तस्य उस्थितनिषण्णो माम कायोत्सर्गः। शरीरोत्थाना
जैनेन्द्र सिद्धान्त कोश
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