Book Title: Bhavi Jineshwar Amamswami Charitra Mahakavya Part 02
Author(s): Muniratnasuri, Vijaykumudsuri
Publisher: Manivijay Ganivar Granthmala
View full book text ________________ श्रीअमम जिनेटा चरित्रम् / // 516 // * लक्ष्मसेनेन गुप्तवृत्या सूरसेना परिवेषिता धृत्वा न क्षिप्वा काष्ठपञ्जरे। क्षुधातुरः पुरः कुरकणानां याचकः कृतः॥५२॥ युग्मम् // अविनीतो ह्ययं वन्हिरिवान्हाय निजं | कुलम् / अकाले भस्मसात्कर्ता भवन्नतिविचारकः // 53 // असौ विवेकी केकीव सुधारसकिरा गिरा / भूत्वा व्यालंगिलोऽप्यद्य प्राप्तो मद्वाणगोचरम् // 54 // कथं ? वासतलस्थो मां लघु द्रष्टा मयाऽधुना / लोष्ठैः पिष्टीकृतस्तुंगक्षमाभृन्मौलिवत्तिना // 55 // बलाधिकस्य मे ग्रीष्मेऽप्यारम्भोऽयं व्यवायवत् / महाभ्युदयसन्तानाधानहेतुर्भविष्यति // 56 // बोधिसच्चाराधकं मां वर्णयन् बन्दिवच्च सः / स्वजीवितार्थी शूरोऽपि कातरखं व्यनक्ति किम् ? // 57 / / त्रपा न वलतस्तेऽब्धेरिवेत्यपि न युक्तिमत् / किं ? कल्पान्तेऽस्तमर्यादो दृष्टो वार्द्धिः क्वचिद् वलन् // 58|| तद्यात सत्वरं संनाहयताऽभिमुखं युधे / सूरं स्वस्वामिन बौद्धधर्मांगीकृतयेऽथवा // 59 // इत्थं विसृज्य भट्टांस्तांस्तदानुपदिकं निजम् / हास्तिकाश्वीयपादातरथ्याभिः सहित तदा // 60 // सेनान्यमादिशल्लक्ष्मसेनः श्येनकनामकम् / संग्रामनाटकमहासूत्रधारमभंगुरम् // 61 // युग्मम् / / कल्पाब्धिनेव तेनापि जलैरिव बलैः क्षणात् / शस्राशस्त्रि कुन्ताकुन्ति शराशरि मिषाद् भृशम् // 62 // विस्तारयद्भिः कल्लोलानालोलयितुमंजसा / प्रारेभे शूरराजस्य सर्वतः सकलं बलम् // 63 // युग्मम् // सूत्थानद्धन्विभिः सादिनिषादै रथिकैरपि / भटैः श्रीसूरराजस्य स्वस्वामिजयकांक्षिभिः॥६४॥ मेषापसृत्याग्रे कृष्ट्वा घातैः पिष्ट्वा च दुःसहैः। श्रान्तं तृषार्त तद् वैरिसैन्यं दैन्यमनीयत // 65 // युग्मम् / / अबद्धकेशं तद्भग्नं विवग्नं चातिवेगतः। क्वापि व्याघुटितं नास्थाद् वेलावारीव वारिधेः॥६६।। अथाग्रसैन्यभंगेन क्रुद्धो बुद्धोपसेवकः / अस्खल्यमानप्रसरः कल्पान्तोद्भ्रान्तवातवत् // 67 // सेनान्यमादिशच्छन्नां नीत्वा सेनां निजां निशि / वैरिसैन्यं वेष्टयन्तीं न्यस्येवलयरूपिणीम् / / 68 // युग्मम् // निरुद्धवीवधासारप्र| सारं तत्तया कृतम् / प्रक्षीयमाणप्राचीनसंचयं क्रमशः स्वयम् / / 69 / / विगलत्पौरुष रंकीभूय भूयस्तरैदिनैः। अश्रमेणैव तेऽवश्यं सग-१८ // 516 //
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