Book Title: Bhagavati Jod 02
Author(s): Tulsi Acharya, Mahapragna Acharya
Publisher: Jain Vishva Bharati

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Page 525
________________ २२. धुरला समया दोय, अनाहारक नां जाणवा । तृतीय समये सोय, सर्व-बंधकारक थयो । २३. वैक्रिय नुं इम देस, घर त्रिण समया ऊण जे । वर्ष सहस्र दस पेख, देश- बंध स्थिति जघन्य थी ॥ २४. * रत्नप्रभा नारक नों देश बंध, उत्कृष्टो जे काल । समय ऊण इक सागर कहियै, न्याय तास इम न्हाल ॥ सोरठा २५. रत्नप्रभा में संध, अविग्रह उत्कृष्ट प्रथम समय सर्व-बंध, शेष समय ए २६. * एवं यावत अधो सप्तमी, णवरं देश बंध चीन । जेहनीं जेतली जघन्य स्थिति छ, ऊणी समया तीन ॥ सोरठा 1 २७. विग्रह समया तीन ते ऊणो जे जपन्य सर्व नरक में लीन, जघन्य देश बंध स्थिति । देश- बंध | स्थिति | काल ए ॥ नौ काल । ते न्हाल ॥ २८. "जाय सर्व नारक उत्कृष्टो, देश बंध उत्कृष्टी स्थिति जेह नरक में, समय ऊण २६. पंचेंद्री - तिर्यंच मनुष्य में जिम कहि वाऊकाय । तिमहिज पाठ सर्व इहां कहिवा, निमल विचारी न्याय ॥ सोरठा । कहूं ३०. वैक्रिय तनु सर्व-बंध तिरि-पं० मनु इक समय छे। देश -बंध इम संध, जघन्य थकी इक समय हृ ॥ ३१. उत्कृष्टो अवलोय, अंतर्मुहूर्त काल जे । जाव शब्द में जोय, तास न्याय वृत्ति थी । ३२. नारक मुहूर्त्त भिन्न, चिउं तिर्यंच मनुष्य विषे । सुर अर्द्ध मास प्रपन्न, उत्कृष्ट विकुर्वण बढा' ।। हा सामर्थ थी, अंतर्मुहूर्त प्यार । देश-बंध नों काल ते, मतंतरे इम ३३. एह वचन धार ॥ Jain Education International *लय : चौरासी में ममतां रे भमतां १. इस संदर्भ में जीवाभिगम ( ३।१२६) की गाथा इस प्रकार हैभित्तो नरमु तिमि होत बत्तारि । देवेसु अद्धमासो, उक्कोस विन्वणा भगिया ॥ २२. तत्र च समयद्वयमनाहारकस्तृतीये च समये सर्वबन्धकः ( वृ० प० ४०६ ) २३. ततो देशबन्धको वैक्रियस्य तदेवमाद्यसमय त्रयन्यूनं वर्षसहस्रदशकं जघन्यतो देशबन्ध:, २४. उक्कोसेणं सागरोवमं समयूणं । ( वृ० प० ४०६, ४०७) २५. अविग्रहेण रत्नप्रभायामुत्कृष्टस्थितिर्नारकः समुत्पन्नः, तत्र च प्रथमसमये सर्वबन्धको वैक्रियशरीस्य ततः परं देशवन्धकः ( वृ० प० ४०७ ) २६. एवं जाव अहे सत्तमा, नवरं — देसबंधे जस्स जा जणिया दिती या तिसमा कायल्या २७. देव जघन्यो विप्रमत्रयन्नो निजनिजघन्यस्थितिप्रमाणो वाच्यः । ( वृ० प० ४०७ ) २८. जाव उक्कोसिया सा समयूणा । २१. दितिजोगिया वाक्कायाणं मणुस्साण य जहा १०. द्रियमनुष्याणां वैयिसर्वजन्ध एक समर्प देशबन्धस्तु जधन्यतः एक समय ( वृ० प० ४०७ ) ३१. उत्कर्षेण त्वन्तर्मुहुर्तम् । ( वृ० १०४०७) For Private & Personal Use Only ३२. अंतमुहुत्तं निरएसु होइ चत्तारि तिरियमणुएसु । देवे अद्धमासो उक्कोस विउब्वणा कालो || ( वृ० प० ४०७ ) २२. इति वचनसामर्थ्यादन्तचतुष्टयं तेषां देशबन्ध इत्युच्यते तन्मतान्तरमित्यवसेयमिति । ( वृ० प० ४०७) श० उ० ६, डा० १६० ५०५ www.jainelibrary.org

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