Book Title: Anusandhan 2002 07 SrNo 20
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
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अनुसंधान-२०
. 15
VF
त्तक्रमौ विश्वतमोलता श्चन्द्रसूर्याविव रुक्चये
वो मुदे वोऽस्त्वनलो विशा| ल | क्षा विपक्षागदवानल श्री
외와
व्याख्या : दत्तक मौ-दत्तजिनपादौ रुक्चयेन- कान्तिसमूहेन विश्वतमोलता-जगत्पातकवल्लरीः अत्तो- भक्षयतः । काविव?, चन्द्रसूर्याविव ।। अथापरार्द्धव्याख्या:- अनलो देवो वो-युष्माकं मुदेऽस्तु । कं(किं) भूत: ?, विशालवक्षा-विस्तीर्णहृदयः । अपरं कथंभूतः ? विपक्षाऽगदवानलश्री:-विपक्षा-- वैरिणस्त एवाऽगा वृक्षाः, तेषां दवानलश्रीः वनवह्निलक्ष्मीः भस्महेतुरित्यर्थः ।।८॥ अथ नवममाह । स्थापना--
मो
मोदरे य: प्रणति तता हं विजित्याशु स मोक्षगा दाति भक्ताय नमीश्वरो नादिलक्ष्मी: शिवमप्युदा | र:
1
लाप
व्याख्या : दामोदरे जिने य: प्रणति ततान-नमस्कारमकार्षीत्, स आशु-शीघ्रं मोहं विजित्य मोक्षगामी-मुक्तिं यास्यति । अपरार्द्धव्याख्याःनमीश्वरो जिनो भक्ताय-जनाय अश्वरत्नादिलक्ष्मीर्ददाति, तथा न केवलमश्वरत्नादिलक्ष्मीर्ददाति, शिवमपि-मोक्षमपि वितरतीत्यर्थः । किंविशिष्टः ?, उदार:दानशौण्डः ॥९॥ दशमवृत्तमाह । स्थापना
श्री | मान् सुतेजाः परमोन्मना ।
खक्षयायास्तु नयैकशा रे त्वयास्ताघ भवार्णवौ त्याकुलोऽस्ताघलसज्जड
ते
।
व्याख्या : श्रीमान् सुतेजा जिन: असुखक्षयाय-दुःखविनाशायाऽस्तु ।
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