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________________ A. तवयर व्याकरण-विद्या-वारिधि-सिद्धान्तं-भारती-दर्शन-चिन्तामणि कवि-शिरोमणि-ज्योतिविद्-दिनमणि. स्व० श्रीमद्विजयधर्मधुरन्धर-सूरीश्वर-महाराज विरचितो ग्रन्थ-चतुष्टय-सन्चयः १--पन्चपरमेष्ठि-गुणमाला (सौरभवृत्ति-गूर्जर भाषानुवाद-युता) २-चतुर्विंशति-जिनस्तुतयः (अन्वय-वृत्तिभ्यां विलसिताः) ३-वर्णक्रम-सूक्ति-पन्चाशिका-(समश्लोक-गूर्जरानुवाद-मण्डिता) ४-श्रीगौतमस्वामि-चरित्रम् (गूर्जरभाषात्मक-पद्यानुवाद-गद्यानुवादाभ्यां सनाथित च) K ANDAR ORRORAKOOTDOORDAROORDAROKAR प्रधान-सम्पादक: पं० श्रोधर्मध्वजविजयो गणी सम्पादकः प्राक्कथनिका-लेखकश्च - डॉ० रुद्रदेवत्रिपाठी, एम० ए०, आचार्यः, पी-एच० डी०; डी० लिट. प्रकाशक: - श्रीस्याद्वादामृत-प्रकाशन-मन्दिर-न्यासः (ट्रस्ट) न पालीताणा (गुजरात) Ka [विक्रम सं० 2050 श्रीवीरनिर्वाण सं० 2520] ____ मूल्यम् : 25-00 रूप्यकाणि / P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ ... ain2010 4.20A // ॐ अईं नमः / / श्रीस्याद्वाद-प्रकाशन सप्तम् पुष्प शासन-सम्राट-श्रीविजयनेमिसूरीश्वर-सद्गुरुभ्यो नमः / ONOROSCREEOD INTETinnitiKriKinarinaarikakaaaaaaaaaaa तपागच्छाधिपति-शासनसम्राट-भट्टारकाचार्य-महाराजश्रीमद्विजयनेमिसूरीश्वर-पट्टालेङ्कार-कविरत्न-शास्त्र विशारद आचार्य-श्रीविजयामृतसूरीश्वर-महाराज-विनेयरत्नविनय-निधान-मुनिवर्य-श्रीपुण्यविजयजिन्महाराज चरणकमल-मधुकर-काव्यकलानिधि-परमपूज्यश्रीमविजय धर्मधुरन्धरसूरीश्वर-महाराज-विरचितो ग्रन्थ-चतुष्टय-सन्चयः १-पन्चपरमेष्ठि-गुणमाला (सौरभवृत्ति-गूर्जरभाषानुवादयुता), २-श्रीचतुर्विशति-जिनस्तुतयः (अन्वय-वृत्तिभ्यां विलसिता), ३-वर्णक्रम-सूक्ति-पन्चाशिका (समश्लोकगूर्जरभाषानुवादमण्डिता) 4 - श्रीगौतमस्वामि-चरित्रम् (गूर्जरभाषात्मक-पद्यानुवाद-गद्यानुवादाभ्यां समलकृतम् च ) , प्रधान-सम्पादकः -- पं० श्रीधर्मध्वजविजयो गणी सम्पादक: प्राक्कथनिका लेखकश्चडॉ० रुद्रदेवत्रिपाठी, आचार्यः, साहित्य-सांख्ययोग-दर्शनाचार्यः एम० एम० (संस्कृत तथा हिन्दी) पी-एच० डी०, डी० लिट्. प्रकाशक: - श्रीस्याद्वादामत-प्रकाशन-मन्दिर-न्यासः (ट्रस्ट) पालीताणा (गुजरात) श्रीवीरनिर्वाण सं० 2520] मूल्यम् 25-00 रु. [विक्रम सं० 2050 न 00000000000000000000000000 लaa P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ 75128 प्रकाशकश्रीस्याद्वादामृत-प्रकाशन-मन्दिर (ट्रस्ट) केसरियानी नगर, तलाटी रोड, पालीताणा-३६४२७० (गुजरात), Serving JinShasan 075928
[email protected] सर्वेऽधिकाराः सुरक्षिताप्रथमं संस्करणम् 550 पुस्तिकाः वीरनिर्वाण संवत् 2520 .. वि० सं० 2050, सन् 1994 ई० मूल्य 2500 रुपये मुंद्रकः - स्यावाद मुद्रणालय पालीताणा (गुजरात) P.P. Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ विषयानुक्रमणिका प्रकाशक 1 -प्रकाशकीय निवेदन २-श्रीमङ्गलाष्टकम् ३-स्वागतम् ४-आनन्दोमि अने संक्षिप्त निवेदन ५-गुरुगुण-स्तुत्यष्टकम् 6 -प्राक्कथनिका, [सम्पादकीय] पं० श्रीधर्मध्वजविजय गणी पं० श्रीशीलचन्द्रविजय गणी प्रधान संपादकीय श्रीकपूरचन्द ख्वारया, पालीताणा डॉ. रुद्रदेव त्रिपाठी १-पंचपरमेष्ठि-गुणमाला श्रीमद्विजयधर्मधुरन्धरसूरीश्वरविरचित-संस्कृत-सौरभवृत्तिविभूषिता गूर्जरभाषानुवादसहिता च आचार्यवर्य-विरचिता पृ० 1-48 पृ० 1-16 २-श्रीचतुर्विंशति-जिनस्तुतयः श्लोकान्वय-वृत्तिभ्यां विराजिता। ३--वर्णक्रम-सूक्ति-पन्चाशिका . गुजराती समश्लोकी अनुवाद मण्डिता ४-श्रीगौतम-स्वामि-चरित्रम् श्रीमद्विजयधर्मधुरन्धरसूरीश्वरविरचितगूर्जरभाषामयपद्यानुवादगद्यानुवादाभ्यां समन्वितम् पृ० 1-32 . पृ० 1-10 अनु० श्रीभानुभाई व्यास, 'बादरायण' पृ० 1-16 P.P. Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ प्रकाशकीय निवेदन * 'पंच-परमेष्ठि-गुणमाला' आदि चार कृतिओनो एक उत्तम संचय प्रकट करतां अमे अति आनंदनो अनुभव करीए छीए. परमपूज्य आचार्य श्रीमद्विजय-धर्मधुरन्धरसरीश्वरजी महाराजे पोताना दीक्षा-पर्यायना गालामां निरंतर तपःसाधना अने साहित्य-सर्जनामां बहुलक्षो साहित्यनु सर्जन कर्यु हतुं / तेओ आडवर-विहीन जीवन जीवता हता, पण क्रियामा सर्वोच्च लक्ष्यने पहोंचवा माटे जैनशासनने आवी आवी सुन्दर कृतिओ आपी गया छे, के जेमां अध्यात्म, योग, दर्शन, साहित्य, व्याकरण, क्रिया-काण्ड, धर्म, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, मन्त्रशास्त्र, स्तुति विगेरे सर्वसुलभ रीते काव्यरूपमां अथवा गद्यरूपमा संस्कृत, हिन्दी, प्राकृत अने गुजराती-भाषाओमा छटापूर्ण रचित छे. आवा परमउपकारी गुरुदेव श्रीसूरीश्वरजी महाराज नी घणी रचनाओ पहेलां प्रकाशित थई चुकी छे, छतां हजु घणुं प्रकाशन बाकी छ / श्रीसूरीश्वरजीनी भावना मुजब तेओश्रीना ग्रन्थोने प्रकाशित करवानुमार्गदर्शन वर्तमान पूज्य आचार्य भगवंत अने तेमना शिष्यवृन्दगणिवरो, मुनिवरो वडे अमने मळी रह्य छे. तेमां पण पूज्य पंन्यास श्रीधर्मध्वजविजयजी गणी महाराज पोते खूब परिश्रम लई तेमनां अप्रकाशित साहित्यनु सम्पादन, संशोधन विगेरे करी छपाववा माटे प्रेरणा आपी रह्या छे, ते अमारुं सद्भाग्य छे. आ ग्रंथ-चतुष्टयनो संचय उज्जैन स्थित डॉ० रुद्रदेव त्रिपाठीजी (एम.ए, पी-एच.डी डी लिट्.) आचार्य महाराजश्री प्रत्ये श्रद्धा धरावी, प्रस्तावनाथी संयुक्त करी पोतानां निर्देशनमां सुन्दर मुद्रण कराव्यु छे, तदर्थ 'स्याद्वादामृत-प्रकाशन-मंदिर-ट्रस्ट-पालीताणा' तरफथी तेमनो आभार मानीए छीए. -प्रकाशक P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ प्राक्कथनिका [ सम्पादकीय ] वर्तमान युग में मानवीय जीवन की व्यस्तता अत्यधिक शिखर पर पहुंची हुई है / कोई भी धार्मिक व्यक्ति अच्छे महापुरुषों के वचनों को सुनकर, गुरुजनों के उपदेशों को अपनाकर, स्वयं निष्ठा-पूर्वक कुछ आत्मकल्याण की अभिरुचि रखते हुए भी सांसारिक क्रिया-कलापों में ऐसा उलझा रहता है कि कुछ कर ही नहीं पाता / इस स्थिति को महामाया का प्रभाव बतलाकर धर्मशास्त्रों में इससे बचने के भी अनेक उपाय बताये गये हैं जिनमें सर्वोत्तम उपाय है-'स्वाध्याय' / सभी धर्मों में स्वाध्याय को सर्वोपरि सिद्ध करते हुए आचार्यों ने उसके पथ का प्रकाशन किया है। स्वाध्याय शब्द उत्तम, शास्त्रसम्मत, धर्म-मार्ग-प्रवर्तकप्रेरक साहित्य के अध्ययन के अर्थ को प्रकट करता है। स्वाध्यायशील मानव पथभ्रष्ट नहीं होता, उसके आचार-विचार, आहार-व्यवहार तथा आदान-प्रदान में अनियमितता, अधर्मता और असंगतता को अवकाश नहीं मिलता। ये सब गुण सहज ही स्वाध्याय से प्राप्त हो जाते हैं / इन्हीं के आधार पर उत्तरोत्तर उज्ज्वल जीवन बनता है और स्व-पर-कल्याण का मार्ग प्रशस्त बनता है। आज शान्ति और सन्तोष के लिये मनुष्य इधर-उधर भटक रहा है / मृगतृष्णा के कारण कहीं स्थिर समाधान उसे नहीं मिल रहा है किन्तु उसके पास जो अनन्त ज्ञान-भण्डार आयामों और आचार्यो की निर्मल वाणी में भरा है, उसे वह पहचान ही नहीं पा रहा है। पूर्वीचार्यों ने प्रायः उत्तमोत्तम साहित्य का निर्माण शास्त्रीय संस्कृत, प्राकृत, अर्धमागधी आदि भाषाओं में किया है / किन्तु उस भाषा का ज्ञान अब प्रायः सीमित हो गया है। इसीलिये परमोपकारी मुनिवर्य लोकभाषा में उसे अनूदित करके जन-जन तक पहुंचा रहे हैं / P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ इस शताब्दी के समर्थ विद्वान् आचार्य, श्रीमविजयधर्मधुरन्धर सूरीश्वरजी महाराज ने भी ऐसी अनेक कृतियों का निर्माण किया, जिनका स्वाध्याय उभयलोक को सार्थक बनाने में पूर्ण समर्थ है / कवि-शिरोमणि पूज्यवर सूरीश्वरजी महाराज काव्यरचनाओं के साथ ही पूर्वाचार्यो द्वारा निर्मित, महत्त्वपूर्ण प्रौढ संस्कृत भाषा की कृतियों को व्याख्याओं द्वारा, सरल भाषानुवाद द्वारा समाज को परिचित कराने का भी सदा उपक्रम करते रहे / इस सन्चय में 'पन्चपरमेष्ठि-गुणमाला' का प्रथम पाठ काव्यरचना की दृष्टि से बहुत ही उत्तम कृति है / शिखरिणी छन्द की स्तुति-साहित्य में जैसी मधुरता, पद-विन्यास, आलकारिक-विशिष्टता, सुमधुर गेयता प्रसिद्ध है, वैसी ही रचनाविदग्धता इस गुणमाला में सहज समाविष्ट है / गुणों की माला में गूंथे हुए पुष्पों की सुगन्धि से पाठक-स्तोता को आनन्दित करने के लिये 108 पद्यों पर सौरभवृत्ति लिखकर उसका गुजराती भाषा में अनुवाद भी आपने प्रस्तुत कर दिया है / यह 'गुणमाला' स्वयं श्रीमद्विजयधर्मधुरन्धर सूरीश्वरजी ने ही निर्मित की है, ऐसा आभास भी हमें इसके अन्तिम पद्य की डेढ़ पंक्ति में 'शुभध्याने मित्रा अमृत-पद-पुण्योधुर - धुरं-धरा धर्माध्वाना' , में आये अमृत, पुण्य और धुरन्धर पदों से होता है / किन्तु यह गुप्त नामांकन पद्धति कैसे आई ? यह निश्चित नहीं कहा जा सकता। वृत्ति में भी यह स्पष्ट नहीं किया गया है, अतः इसे पूर्वांचार्यकृत ही माना गया है / - द्वितीय रचना 'श्रीचतुर्विशतिजिनस्तुतयः' है / यह रचना भी अत्यन्त प्रौढ है / 'शार्दूलविक्रीडित छन्द में इसका निर्माण हुआ है / 28 पद्यों में पूर्ण यह रचना व्याकरण-शास्त्र के क्लिष्ट-क्रिया-प्रयोगों से पूर्णत: सुसम्पन्न है / यङन्त और यङलुगन्त-प्रक्रिया के माध्यम से निर्मित क्रियापदों का इस स्तुति के प्रत्येक चरण में समावेश किया गया है / ये प्रयोग प्रायः सर्वसाधारण संस्कृतज्ञ के ज्ञान से भौ परे हैं / इनका अर्थज्ञान तो दूर की बात है ही / अत: सूरीश्वरजी ने प्रत्येक क्रियापद की व्याख्या में उसका निर्माण-प्रकार व्याकरण की दृष्टि से अत्यन्त स्पष्ट कर दिया है / इसका गम्भीरता से अध्ययन करने पर प्राचानी विद्वानों की यह उक्ति नितान्त सत्य सिद्ध हो जाती है कि-'टीका गुरूणां गुरुः' टीका गुरुओं की गुरु है, जिसके द्वारा नवनिर्माण की प्रेरणा भी प्राप्त होती है। यह 'वृत्ति' P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ आचार्यश्री के व्याकरण-शास्त्रीय अगाध ज्ञान की गरिमा को सिद्ध करती है। स्थान-स्थान पर आपने व्याकरणशास्त्र की दृष्टि से रूप-सिद्धि और उसके सिद्धस्वरूप को सिद्ध बताने के लिये तर्क-वितर्क भी दिये हैं। साहित्य-शास्त्र अनेक शाखाओं में विभक्त है। वह काव्य में कहाँ किस रूप में अभिव्यक्त हो रहा है, इस तथ्य को पहचानने से रचनाकार के सौष्ठव का परिज्ञान होता है, जो कि एक सहृदय विशेषज्ञ द्वारा पद-पद पर बहुत ही सूक्ष्मता के साथ आचार्यश्री ने समझाने का प्रयास किया है। व्याख्याकार रचनाकार के अन्तरंग से पाठक का साक्षात्कार तभी करा सकता है, जब उसकी रचना को विभिन्न माध्यमों से आलोडन-विलोडन करके उसकी अच्छाइयों को पुरस्कृत करे / उपयुक्त दोनों वृत्तियों में यह प्रवृत्ति आचार्यश्री की बहुधा परिस्फुट हो रही है। तृतीय रचना सुभापित-पद्धति में स्वयं आचार्यजी ने निर्मित की है और उसकी एक अभिनव विशेषता यह भी है कि अ से क्ष तक के सभी वर्गों को आदिस्थान देकर अनुष्टुप् छन्द में 51 पद्य बनाये हैं। रचना प्रासादिक, उपदेश प्रद तथा मनोरम है / इसका गुजराती पद्यानुवाद श्रीभानुभाई व्यास ने और गद्यानुवाद आचार्यश्री ने किया है। चतुर्थ कृति 'श्रीगौतमस्वामि-चरित्रम्' है। यह 'भुजंग-प्रयात' नामक छन्द के 34 पद्यों में निर्मित है / वैसे इसके प्रत्येक पद्य का चौथा चरण-'नमो गौतमस्वामिने मंगलाय' द्वारा पूरित है और पद्य के शेष 3-3 चरणों में प्रारम्भ से लेकर श्रीगौतमस्वामी चरित्र को क्रमशः गुम्फित किया है / इस प्रकार यह चरित्रबोधक स्तोत्र है / इसकी रचना सरल, भावपूर्ण एवं प्रसादगुणयुक्त है / नित्य पाठ करनेवालों के लिये छन्द भी गायन-परिपाटी के अनुकूल लिया है / पूज्य आचार्यश्री ने इसकी रचना की है और साथ ही इसका गुजराती में पद्यात्मक तथा गद्यात्मक अनुवाद भी कर दिया है / संस्कृत भाषा का असीम प्रवाह हमारे जैन-पूर्वांचार्यों ने समस्त जैन-वाड्मय में बहाया है / उसी पूर्व-परम्परा को इन रचनाओं के द्वारा यथावत् आगे बढ़ाते हुए परम उपकारी गुरुवर श्रीविजयधर्मधुरन्धर सूरीश्वरजी ने अपने जीवन में एकरसता प्रदान की, यह उनकी साहित्य-सम्पदा से प्रमाणित होता है। श्रद्धय पं. श्रीधर्मध्वजविजयजी गणिवर्य अपनी गुरुभक्ति का अभिनव आदर्श प्रस्तुत करते हुए उनकी बहुमूल्य किन्तु अब तक अप्रकाशित-कृतियों को प्रकाश में P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ लाने का निरन्तर प्रयास कर रहे हैं। उनके चिन्तन-मनन में हृदय से लगे हुए हैं और इतस्तत: विकीर्ण ग्रन्थसम्पदा को उपलब्ध करके परिश्रम-पूर्वक प्रेम-कॉपी तैयार कर छपाने की व्यवस्था में तत्पर हैं यह सभी के लिये अनुकरणीय और प्रशंसनीय है। ईश्वर ऐसे सत्कार्यों में उनकी तथा समाज की निष्ठा को उसरोत्तर उत्कर्ष प्रदान करे, यही प्रार्थना है। उज्जैन 7-5-94 -रॉ० रुद्रदेवत्रिपाठी .. सम्पादक P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ महामंगलकारी, परमोपकारी, केसरियाजी नगर मण्डन भगवान श्री केसरिया जी स्वस्तिश्रीणां सदागारा विमलामृतमर्तयः / केशराचित-सर्वागां; पान्तु श्री के स राभिधाः॥ P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ शासनसम्राट, सर्वतन्त्र-स्वतन्त्र, सूरि चक्र-चक्रवर्ती प. पूज्य आ. श्रीविजयनेमिसूरीश्वरजी महाराज 16 शासने सर्वजीवानां कल्याण-करणे रताः / जयन्ति विजयि-श्रीमद्-नेमिसूरीश्वरेश्वराः॥ P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ // श्रीमङ्गलाष्टकम् / / कर्ता- धर्मध्वजविजयो गणी ... नाभेयादि-जिनोत्तमा जितभया विश्वे सदा पावनाः, सौभाग्यावलिकारकाः सुखकरास्तीर्थङ्कराः शङ्कराः / विश्वानन्दकरास्तमोदिनकराः कन्दर्प-दापहा, रोगातङ्कहरा जनस्य सततं कुर्वन्तु नो मङ्गलम् // 1 // सिद्धाः शान्तरसाः स्वभावविमलाः शान्ति दधाना जने, सिद्धानन्तचतुष्टया अनिजरा-मृत्यादिभिर्वजिताः / राजन्तः शमिनो मनोऽमलगहे ध्यातानि कर्माणि यैर्ये ख्याता भुवनेऽखिले खलु तके कुर्वन्तु नो मङ्गलम् // 2 // विख्याता भुवि पुण्डरीकगणिनः श्रीगौतमाद्यास्तथा, सूरीशा गुणशालिनो जिनमते श्रीभद्रबाहादयः / अङ्गोपाङ्ग-विशारदा गुणयुताः श्रीपाठका निर्मला, दान्ताक्षा मुनयोऽनघाः खलु समे कुर्वन्तु नो मंगलम् // 3 // सम्मेतावरवतामरगिरि - श्रीचित्रकूटाचला:, श्री सिद्धाचलपावको गजपदस्तारंग-वैभारको / श्रीकैलासनगोत्तमो हिमगिरिश्चम्पा-प्रभासादयो, विश्वे तीर्थमतल्लिकाः खलु समे कुर्वन्तु नो मंगलम् // 4 // श्रीजम्बूमुनिवसिंहगिरयः श्रीस्थूल - भद्रादयः, सन्तः श्रेष्ठि-सुदर्शनादय इमे गंगोमिशीलान्चिताः / . श्रीसङ्घो गुणशेवधिः प्रवचनाधारो जिनजितो, धर्मः सर्वदयामयः खलु समे कुर्वन्तु नो मंगलम् // 5 // ब्राह्मी चन्दनबालिका च सुलसा सीता सुभद्राऽन्जना, सेना शीलवती शिवा द्रुपदजा कुन्ती कलावत्यपि / रेणा राजिमती तथा नलनप * प्राणप्रिया देवकी, सत्योऽन्या अपि शोभनाः खलु समाः कुर्वन्तु नो मंगलम् // 6 // P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ श्रीनाभिप्रमुखा जिनेन्द्रपितरः सिद्धार्थभूपस्तथा, विख्याता जिनमातरो जगति या: सौभाग्यभाग्य प्रदाः / चक्रास्त्रा भरतेश्वराश्च भरतश्री - ब्रह्मदत्तादयः, शिष्टा ये श्रुतपारगाः खलु समे कुर्वन्तु नो मंगलम् // 7 // शौर्यस्वा प्रतिविष्णु-विष्णबलिनो मोक्षेच्छका ये तथा, सङ्घ शान्तिकराः सदा गुणिरताश्चक्रेश्वरीमुख्यकाः। श्रीमातङ्ग-कपदिमुख्यविबुधाः सम्यग्दृशां विघ्नहाः, सर्वे ते जिनशासनोन्नतिकराः कुर्वन्तु नो मंगलम् // 8 // P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ // नमो नमः श्रीगुरुनेमि-सूरये // सु-स्वागतम् 'विद्वन्मर्धन्य' और 'महामनीषी' जैसे विशेषण जिनके लिये समुचितरूप से प्रयुक्त किये जासकें, ऐसे परमपूज्य आचार्यप्रवर श्रीविजयधर्मधुरन्धरसूरीश्वरजी महाराज की कतिपय महत्त्वपूर्ण तथा प्रगल्भ रचनाओं का स्वागत करते हुए हृदय हर्षित होता है। उनकी रचनाएं बहुत अधिक हैं और उनमें भी प्रत्येक रचना में कुछ न कुछ ऐसा वैशिष्ट्य अथवा वैलक्षण्य है कि जिसके कारण उनकी रचनाओं का मुझे तो सतत तीव्र आकर्षण रहता है, और इसी लिये, उनकी रचनाएं जितनी बन सके उतनी ही शीघ्रता से प्रकाशित हों, ऐसा आग्रह, मैं, उनके शिष्यरत्नों से करता ही रहा हूं। और आनन्द की बात यह है कि पं० श्रीधर्मध्वजविजयजी गणीने, मुझ जैसे अन्यान्य अभिलाषियों के आशावाद को प्रोत्साहन मिले उस प्रकार उनकी रचनाओं के संग्रह धीरे-धीरे प्रकाशित करना प्रारम्भ किया है, यह एक अभिनन्दनीय बात है। प्रस्तुत ग्रन्थ में-पंचपरमेष्ठि-गुणमाला-सवृत्ति, चतुविशतिजिनस्तुति-सटीक, वर्णक्रम-सूक्तिपंचाशिका-समश्लोक गूर्जरानुवादयुत तथा श्रीगोतमस्वामिचरित्र सविवरण-इस प्रकार चार लघु किन्तु प्रसादमधुर रचनाओं का संग्रह हुआ है। जैन-दर्शन के प्राण 'पंचपरमेष्ठि-पद' हैं। अरिहंत, सिद्ध, सूरि, उपाध्याय तथा मुनि-इन पाँच परमेष्ठियों में जैनसम्मत देव-गुरु तत्त्व का समावेश होता है, और इससे 'इनकी आराधना ही धर्मतत्त्व है' ऐसा मानने में कोई औचित्यभंग नहीं माना जाता। ये पांच परमेष्ठी कोई व्यक्तिविशेष-परक पदार्थ नहीं हैं, किन्तु किसी भी आत्मा में विकसित होते हुए विशिष्ट गुण-धर्मों के आधार पर उसे उस-उस परमेष्ठी पद पर आरूढ आत्मा मानकर उसकी उपासना करनी होती है। इसमें अनानुपूर्वीक्रम से देखें तो 27 विशिष्ट गुणों को प्राप्त करे वह 'मुनि' पद प्राप्त कर सकता है, 25 विशिष्ट गुणों का विकास साधे वह 'उपाध्याय' बन सकता है, 36 गुणों का धारक हो, तो वह 'आचार्य' पदारूढ हो सकता है, 12 P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ लोकोत्तर गुगों के आत्मिक प्रकाश से प्रकाशमान बनानेवाला आत्मतत्त्व 'अरिहंत' माना जाता है, और अनन्त आत्मगुणों के घनीभूत स्वरूप जैसे आठ गुणों द्वारा विकसित होते हुए संसारातीत आत्मतत्त्व को 'सिद्धपरमेष्ठी' के रूप में पहचाना जाता है। तथा इन पाँचों परमेष्ठियों के २७,२५,३६,१२,८-गुणों की जोड़ होगी 108 / यह 108 का अंक अखण्ड अंक तो है ही, परन्तु और भी अन्य अनेक रूप से दृष्टि से जैन अथवा अजैन दर्शनों में इस अंक का बहुत महत्त्व है / मूल बात यह है कि पाँच परमेष्ठियों के 108 गुण हैं उनमें से एक-एक गुण पर एक-एक श्लोक बनाकर कुल 108 श्लोकों की रचना 'पन्चपरमेष्ठी-गुणमाला' नाम की रचना है / इस रचना की टीका तो कर्ता ने बनाई ही है, साथही-साथ बालजीवों की सुगमता के लिये उन्होंने स्वयं ही उन 108 पद्यों का सरल अनुवाद भी गुजराती भाषा में दे दिया है। दूसरी कृति 24 तीर्थंकरों की स्तवनारूप रचना है। केवल 28 पद्यों में निर्मित इस लघु रचना की विशेषता, इसके प्रत्येक पद्य में, और बहुधा तो प्रत्येक वाक्य में किये गये पौन:पुन्यदर्शक (यङ लुबन्त और यङन्त) प्रयोगों में है। ऐसे प्रयोगों से काव्यरचना कुछ क्लिष्ट हो जाती है, इसका ज्ञान ऐसे पण्डितजनों को होता ही है, और इसी लिये उन्होंने ऐसे विशिष्ट प्रयोग होने पर भी ये पद्य क्लिष्ट न हों अथवा माधुर्य, सर्वथा नहीं खो बैठें, इसका पूरा ध्यान रखा है / यह उनकी एक लाक्षणिकता है / यह 'जिन-स्तुति' सामान्य संस्कृतभाषा के ज्ञानवाले पाठक, भी समझकर भक्ति का लाभ प्राप्त कर सकें, इसके लिये प्रत्येक पद्य का 'अन्वय' तथा विस्तृत 'वृत्ति' भी इसके साथ मुद्रित की गई है / 'हैमव्याकरण' के अनुसार प्रयोगों की रूपसिद्धि को भी वृत्ति में स्पष्ट किया है। 28 शिखरिणी छन्दों में यह कृति पूर्ण हुई है। तीसरी रचना है-'वर्णक्रम-सूक्ति-पंचाशिका'। यह बहुत ही रसप्रद और विस्मयप्रेरक कृति है। मुझे व्यक्तिगत रूप से तो इसमें बहुतही आनन्द मिला है। - इस प्रकार की रचनाएँ कब से प्रारम्भ हई ? इसका मैं अन्वेषण करने गया, तो इस प्रकार की रचना का प्रारम्भ छठी शती से तो निश्चित रूप से चालू हो गया था, ऐसे उदाहरणों की स्थिति ज्ञात हो P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ गई। इससे पूर्व भी यह प्रकार प्रयोग में आया हो, तो वह असम्भव नहीं है, ऐसा भी ज्ञात हुआ। यह तो संस्कृत को बात हुई। तदनन्तर उत्तरकाल में प्राकृत-अपम्रश, गुर्जर आदि भाषाप्रकारों में रचित साहित्य में प्रकाशित भी हुई हैं / इस प्रकार की रचनाएँ मातृका क-कक 'अक्खरावट' आदि नामों से मध्यकालीन साहित्य में प्रसिद्ध हैं। ऐसी रचनाओं में बारहखड़ी के बावन अक्षरों को लेकर जो जो पद उन अक्षरों से आरम्भ होते हों, ऐसे उपदेशात्मक अथवा चरित्रात्मक दोहे, चौपाई आदि के निर्माण में जैन कवि भो बहुत निपुण थे। कभी ‘क-का-कि-कीकु-क-के-कै-को-को-कं-कः' इस प्रकार प्रत्येक अक्षर की बारहखड़ी के बारह-बारह दोहे वाली दीर्घरचनाएँ भी निर्मित होती। इस पुरातन और मध्यकालीन रचना-परम्परा के साथ अर्वाचीन युग का अंक जोड़ सके वैसी अथवा इस परम्परा में अपने समय की प्रतिनिधि रचना के रूप में खड़ी रह सके, वैसी एक सशक्त संस्कृत रचना इस संग्रहग्रन्थ में आचार्य श्री की ओर से हमें प्राप्त हुई है, यह गौरवास्पद घटना है / और इसमें भी अधिक आनन्द की बात यह है कि गूजराती के प्रख्यात कवि श्री बादरायण ने इस रचना के पद्यों का समश्लोकी तथा कक्का के उसी क्रम का निर्वाह करने वाले सरस अनुवाद की रचना करके गूजराती पद्यात्मक साहित्य को एक सुन्दर सर्जन दिया है। चौथी रचना में 'गौतम-चरित्र' है यह पूरा चरित्र बहत सारपूर्ण ढंग से प्रस्तुत है। इसके पद्य और गद्यात्मक अनुवाद भी यहां हैं। ऐसी उत्तम कृतियाँ देने के लिये इनके कर्ता आचार्य श्री को तो हम वन्दन करते ही हैं, साथ ही उनके शिष्यरत्न पंन्यास श्री धर्मध्वजविजयजी गणी को ये सभी रचनाएँ विद्वज्जगत् तक पहुंचाने के लिये पुनः पुनः अभिनन्दन भी देते हैं, और आचार्य श्री की शेष रही हुई समस्त कृतियों का शीघ्रतापूर्वक प्रकाशन करके अपना शिष्यधर्म सम्पादित करें, ऐसा साग्रह अनुरोध भी करते हैं। जैन उपाश्रय नया विकासगृह मार्ग पालड़ी, अहमदाबाद-७ शीलचन्द्र विजय दिनांक 7-5-94 P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ आनन्दोमि अने संक्षिप्त निवेदन -प्रधानसम्पादकीय शासनसम्राट, सर्वतन्त्र-स्वतन्त्र, सूरिचक्र-चक्रवर्ती, परमपूज्य 'श्रीविजयनेसूरीश्वरजी महाराजनां पट्टाम्बर-अम्बर-मणि, शास्त्रविशारद, कविरत्न, पीयूषपाणि, पूज्य आचार्य प्रवर श्रीविजयअमृतसूरीश्वरजी महा राजनां विनयेरत्न, मुनिवर्य श्रीपुण्यविजयजी महाराजनां चरणपद्मसेवक, व्याकरण-विशारद, विद्यावारिधि, सिद्धान्त-भारती, दर्शन-चिन्तामणि, कविशिरोमणि तथा ज्योतिर्विद् दिनमणि, परमपूज्य गुरुदेव स्व० श्रीमद् विजयधर्मधुरन्धरसूरीश्वरजी महाराजनी साहित्य-सम्पदा अतिमूल्यना रत्नोवडे अलंकृत छे. लगभग 70 रचनाओनी हारमाळा छपावीने प्रचार प्रसार पामी छे, पण हजु 40 जेटली पुस्तको अप्रकाशित छे. पूज्यश्रीनां स्वर्गप्रस्थान पछी ते पुस्तकोनं प्रकाशन थाय ते तेमनां सर्वे शिष्यो, भक्तो अने प्रशसकोने अभीष्ट होवा छतां विशेष प्रगति थई शकी नथी, ए चिन्तानी वात छेज. _छतां 'अकरणान्मन्दकरणं वरम्' ए लोक उक्तिने अनुसरी 'श्रीस्याद्वादामृत-प्रकाशन-मन्दिर, पालिताणाना ट्रस्टीओनी प्रेरणा अने पूज्य आचार्य, गणिवर्य तथा मुनिराजोना हार्दिक सहकारथी अमे कईंक करवा प्रयत्न करीए छीए. पहेला सं. 2040 मां 1- साहित्यशिक्षा-मंजरी, २-काव्य-विमर्श, ३-शब्द-वृत्तिमीमांसा अने,४--'शिशुहिता' व्याख्यासहित-अनुभव-सिद्ध-सारस्वत-स्तव-रूप चार पुस्तकोनुं सम्पुट तेमज 1 -सूक्तिसुधा-स्रोतस्वती- (जिन-स्तुति-चतुर्विंशतिका-अवचूरिसहित) P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ Janathai-anand आ २-श्रीकदम्बगिर्यष्टक अने, 3 - चतुविशति-जिनस्तुति साथे त्रण रचनाओ- बोनुं सम्पुट सं. 2042 मा प्रकाशित थयां हतां / त्यार पछी छेक शिथिलता आवी गई पण अमारा उत्साहमां न्यूनता नहि आवा देतां आ वर्षे आ श्रीजु प्रकाशन रजू थाय छ, पूज्य गुरुदेवश्रीनो रचना-विश्व - सामान्य मानवीने ज्यारे सरस्वतीनी कृपानो प्रसाद मळे छे, तो तेनां मनमा सार्वभौम प्रवृत्तिओ जागे छे, उमळकाभेर ते एकलो ते प्रसादनो आनन्द नहि लेतो बीजाने पण वेचवानी भावना करे ज छे. ज्यारे तेवो प्रसाद महामति, लोक-कल्याणना अभिलाषी अने परमसंयमी संतने मळे तो ते माटे शुं कहेवू ? आपणा गुरुदेवने सरस्वतीनो आ दिव्यप्रसाद नानी उमरमां ज मळयो हतो। साधुजीवनमां आव्या पछी तेओ अत्यन्त उदारभावथी जिनशासननी सेवामां तत्पर बन्या हता। दैनिक साधुचर्यामांथी जेटलो समय तेमने मळयो तेमां तेओश्री कई ने कई लखताभणता ज रहेता. प्रतिक्षण पसार पामती तेमनी प्रतिभा कोई ने कोई सर्जन कर्या ज करती. तेना शुभ परिणामे तेओनां सजित-साहित्यनो संग्रह विविधलक्षी, विविध विषयवाळो तेमज विविधभाषामां सर्जायेलू तेमनी हैयातीमां ज बहार पड्य हतुं / ज्यारे तेओ पोतानी जीवनलीलाने संकेरी निर्वाण पाम्या, ते वखते पण तेमनुं सर्जन ढगळाबंध छपाववा माटे शेष हतुं / हवे तेनां प्रकाशनमाटे अमे प्रयत्न करीए छीए / आ प्रकाशनमां १-पंचपरमेष्ठि-गुणमाला (सौरभवृत्ति साथे), तेमज तेनो पूज्यश्रीवडे करायेल गूजराती अनुवाद, २-श्रीचतुर्विंशति-जिनस्तुतयः, ANUAmarAR P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ 3 - वर्णकप-सूक्ति-संचाशिका (श्रीभानुभाई व्यास, 'बादरायण' कृत समश्लोकी गूर्जर-भाषानुवादयुता तथा ४-श्रीगौतम-स्वामिचरित्र (गूर्जर-भाषात्मक-पद्यानुवाद-गद्यानुवादाभ्यां सनाथितम्-एम चापुस्तकोनो सम्पुट प्रस्तुत थाय छे... आ संपुटनां सम्पादन तथा प्रकाशनकार्यमां अमारा सुपरिचित विद्वान डॉ० रुद्रदेव त्रिपाठीए पर्याप्त श्रम उठावीने पज्यश्री प्रत्ये अने अमार= संघ प्रत्ये जे सहकार कर्यों छे, तेनी अनुमोदना साथे आ प्रकाशन पूज्य गुरुदेवने अर्पण करुं छं. आनां मुद्रणमां अथवा अन्य प्रकाशनमां कोई त्रुटि रही गई होय, त - ते माटे 'मिच्छामि दुक्कडं' लऊं छु. पालीताणा (गुजरात) 13-5-94 (वर्षीतपपारणादिवस) पूज्य श्रीमद्विजयधर्मधुरन्धरसूरीश्वरचरणरेगु धर्मध्वजविजय ... P.P.AC.GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ / / श्री आदीश्वरभगवते नमः / / पर्वतराज हिमालयना उच्च शिखर पर विराजमान परमाराध्यदेव, लोक गुरु, श्री आदीश्वरभगवान् ने महाराजा भरत चक्रवर्ती सपरिकर वन्दन करवा आवेल ते वखत पूज्य श्रीनी साधना-मुद्रानुं 11. पुण्य-स्मरण करवा साथे विनम्र भक्तिभावे तेमनां पवित्र चरण-कमलोमां ‘पञ्च-पर मेष्ठी गुणमाला' आदि चार ग्रन्थोनो __आ सम्पुट समर्पित करीए छोए। गुरु पूर्णिमा सीहोर (गुजराज) श्री गुरुवर-चरणरेणु धर्मध्वजविजय गणी P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ शास्त्रविशारद, कविरत्न, पीयूषपाणि पू. पूज्य आ. श्रीविजय अमृतसूरीश्वरजी महाराज RSITETTER A S aintifestaTSASparera PARENA MAHI R पीयषपाणयः पूज्या विज्ञाः शास्त्रविशारदाः / विजयामृतसूरीशा जयन्ति कविहीरकाः॥ P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ सिद्धान्त-भारती, दर्शनचिन्तामणि, कविशिरोमणि, प. पूज्य आ. श्रीविजयधर्मधुरम्धरसूरीश्वरजी महाराज विद्या-विद्योतित-स्वान्ता निर्मल-ज्ञान-सागराः / विजयन्ते सूरिवराः पूज्या धर्म-धुरन्धरा // P.P. Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ पंचपरमेष्ठि-गुणमाला सौरभ-वृत्ति-विभूषिता श्रीमद्विजयधर्मधुरन्धरसूरीश्वरविरचित-गूर्जरभाषानुवाद-सहिता च P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ // श्रीपरमात्मने नमः / / “पञ्चपरमेष्ठिगुणमाला" १-अर्हद्गुणमाला अयं रक्तः कामं तदपि गतरागाननुगतः, प्रमाणेनोच्चैः श्रीजिनवरतनोदिशगुणः। . सदा गीतं गायन् दलचलनदम्यानुसरणावशोको लोकानामपहरति शोकं तरुवरः // 1 // सौरभ-टोकाया मङ्गलम् ॐ ह्रीं अर्ह वरं मन्त्रं प्रणिधाय परं महः / परमेष्ठि-गुणग्रामं ससौरभमभिष्ट्रमः // सौरभः- कामम्-पर्याप्तम् / रक्तः-अरुण: / लोहित इति यावत् / यद्यपीति शेषः / तदपि-तथापि / गतरागान्-वीतरागान्, अर्हत इति यावत् / अनुगतः-अनुवर्तमानः। प्रमाणेन-परिमाणेन / श्रीजिनवरतनो-श्रीमह वपुषः। द्वादशगुणः-द्वादशगुणाधिकः / उच्चः-उन्नतः / दलचलन-दम्यानुसरणात्-पत्रान्दोलनच्छलाश्रयणात् / सदा-सर्वदा / गीतम्-गानम् / “गीतं शब्दितगानयोः" इत्यनेकार्थः / गायन्-आलपन् / अयम्-पुरोवर्ती। अशोकः-कङ्केलिः, वजुल इति यावत् / “अशोको कङ्केलि-वजुली" इत्यनेकार्थः / तरुवरः-वृक्षश्रेष्ठः / लोकानाम्-जनानाम् भुवनानां वा। "लोकस्तु भुवने जने" इत्यमरः। शोकम-खेदम्, पुत्रवियोगमरणादिजनित-वैवलव्याख्य-चित्तवृत्ति-विशेषमिति यावत् / तथोक्त रसगङ्गाधरे-"पुत्रवियोग-मरणादि-जन्य-वक्लव्याख्यश्चित्तवृत्ति-विशेषः शोकः" इति / "शोकः शुक् शोचनं खेदः 2 / 213 // इत्यभिधानचिन्तामणिः। अपहरति-निवारयति, विनाशयतीति यावत् / अत्र-रक्तस्य विगत-लौहित्यानुगमनं विरोधः, विरहितरागद्वेषानुगमनार्थत्वेन समाधानमिति विरोधस्याभासीकरणात् "आभासत्वे विरोधस्य विरोधाभास इष्यते" इति चन्द्रालोकोयलक्षणलक्षितो विरोधाभासो नामालङ्कारः। स्वनोऽयं न P.P.AC. Gunratnasuri M.S.. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ 2/ अर्हद्गुगमाला दलचलनजनितः किन्तु गानप्रयोज्य इति "कैतवापनुतिर्व्यक्तौ व्याजाद्यनिह= पदैः” इति चन्द्रालोकलक्षितलक्षणः कैतवापनुतिरलङ्कारश्च / / 1 / / सरोजाद्यां जानूच्छ्तिमधुपवाद्यां सुमनसामधोवृन्तां वृष्टि विदधतितरां यत्सुमनसः / चतुष्क्रोशावन्या समवसरणे तज्ज्ञपयते , सुमेष्वस्त्रत्यागं निकृतिजनितं सार्वपुरतः // 2 // सौरभः-सुमनसः-सुष्ठ शोभनं मनोऽन्तःकरणं येपान्ते तथा देवाः / "सुमन प्राज्ञ-देवयोः / जात्यां पुष्पे" इत्यनेकार्थः / चतुष्क्रोशावन्याम्-योजनमितभूम समवसरणे-देवविरचित-तीर्थकृद्देशनासभायाम् / यत् / सुमनसाम्-कुसुमानाम् सरोजाद्या म्-सरोजं कमलमाद्यं यस्यां सा सरोजाद्या तान्तथा / कमल-वहुलामि यावत् / जानूच्छ्रितमधुपवाद्याम्-जानूच्छ्रिताः-जानुप्रमाणोन्नता चासो मधुपा भ्रम वाद्यं यस्यां सा मधुपवाद्या च जानूच्छ्रितमधुपवाद्या तूर्य्यतुल्य-भ्रमरझङ्क! करम्बिता तान्तथा / अधोवृन्ताम् / अधोऽधोमुखं वृन्तं पुष्पबन्धनं यस्यां साSE वृन्ता तां तथा / "वृन्तं प्रसवबन्धनम्"-४।१९३॥ इत्यभिधान-चिन्तामणि "वन्धनं पुष्पफलयोन्तमाहुः" इति कात्यश्च / वृष्टिम्-वर्षणम् / " वृष्टिवष इत्यमरः / विदधतितराम्-सातिशयमाचरन्ति / तत् सार्वपुरतः-अर्हदने / निकृ। जनितम्-तिरस्कारप्रयोज्यम् / सुमेष्वस्रत्यागम्-सुमेपुणा पुष्पबाणेन कामेन-अ त्यागः-पुष्पात्मनिजास्रपरित्यागः सुमेष्वस्रत्यागस्तं तथा / ज्ञपयते-विज्ञापयति, सूत्र तीति यावत् // 2 // सुधायाः सौहार्द मधुमधुरताया ‘मधुरिमा, स्वराणां स्वारस्यं निखिल-निनदानां निनदता। श्रुतीनां सद्भतिर्व्यथनमथनं सम्मदमदो, ध्वनिदिव्यो भव्यो जयति जिनराजास्य-जनितः॥३॥ ... सौरभः- जिनराजास्यजनित:-जिनेश्वर-वदनकमलप्रादुर्भूतः / सुधायाः-प षस्य / सौहार्दम्-मित्रतारूपः / सादृश्यं लक्ष्यते / मधुमधुरतायाः-माक्षिकमाधुयर मधुरिमा-मधुरिमरूपः / स्वराणाम्-निषादादित्वेन प्रसिद्धानाम् / स्वारस्यम्-स्व सता, सामञ्जस्यमिति यावत् / निखिल-निनदानाम्-समस्तध्वनीनाम् / निनद ध्वनित्वरूपः / श्रुतीनाम्-श्रवणानाम् / सद्भूतिः-सती समीचीना चासो भूति तिस्तथा, विभूतिसर्वस्वमिति यावत् / व्यथनमथनम्-दुःखसमुन्मूलनरूपः सम्मद हर्षप्रकर्षाभिमानरूपः / "मुत्प्रीतिः प्रमदो हर्षः प्रमोदामोदसम्मदाः" इत्यमरे P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ पञ्च-परमेष्ठि-गुणमालायाम् /3 NMORENAMRin भव्यः-शोभनः / दिव्यः-अलौकिकः / ध्वनिः / जयति-विजयते / सर्वोत्कर्षेण-वर्तते इति भावः / रूपकालङ्कारः // 3 // शयाब्जेऽस्वप्नानां प्रमदभरलास्यं विदधती, जिनास्याजं प्रेक्ष्योदित-मुदितहास्याङकुरवती / चकोरद्वन्द्वं वाऽतुलधवलिमापूरितगतिः, . ... सुखं केषामेषा जनयति न वा चामरततिः // 4 // सौरभः- अस्वप्नानाम्-न स्वपन्ति निद्रातीत्यस्वप्ना वास्तेपां तथा / "देवाः सुपर्व.... गीर्वाणा "मरुतोऽस्वप्ना विधा दानवारयः" / 2 / 3 / / इत्यभिधानचिन्तामणिः / शयाजे-करकमले, "शयः शमः हस्तः पाणिः करः" 3 / 255 / / इत्यभिधानचिन्तामणिः // प्रमदभरलास्यम्-हर्पोद्रेकप्रयुत्त.नृत्यम् / विदधती-कुर्वती / जिनास्यानम्-जिनेश्वरवदनकमलम् / प्रेक्ष्य-समवलोक्य / उदितमुदित हास्याकुरबती-समुत्पन्नहर्पप्रयोज्यहासाकुरशालिनी / चकोरद्वन्द्वम्-चकोर मिथुनम् / वाइव / "वा समुच्चय एवार्थ उपमान-विकल्पयोः" इति मेदिनी। अतुलधवलिमाअतुतोऽनुपमो घवलिमा शुक्लता यस्याः सा तथा // आपूरितगतिः-अनवरुवप्रसरा / एषा-प्रत्यक्ष दृश्या / चामरततिः-बालव्यजनावलिः / "चामरं बालव्यजनं रोमगुच्छः प्रकीर्णकम्" 3 / 381 // इत्यभिधानचिन्तामणिः। केषाम्-जनानामिति शेपः / नृखम्-आनन्दम् / न वा-नहि / जनयति-उत्पादयति ? / अपि तु सर्वेषामेवानन्दं जनयत्येवेति भावः / उपमालङ्कारः / / 4 / / महामोहद्रोहाद्यरि-करिविनाशाय रचितं , सुवर्णं स्वर्णाङ्गं वरघृणिमणीपूर्ण-खचितम् / क्रमान्दोलत्पीठं सुकृतजननं दिव्यनयनं , जिनानामास्थानं विलसति मगेन्द्रासनमहो / / 5 / / सौरभः- महामोहद्रोहाद्यरिकरिविनाशाय-महामोहद्रोहादयो येऽरयः शत्र, वस्त एव करिणो मत गजास्तेषां विनाशो विध्वंसो-महामोहद्रोहाद्यरिकरिविनाशस्तस्मै तथा / रचित न्-निमितम् / सुवर्णम्-सुष्ठु शोभनो वर्णों रूपं यस्य तत्तथा। स्वर्णाङ्गम्-काञ्चनमयावयवम् / वरघृणिमणीपूर्णखचितम्-वरा श्रेष्ठा घृणिः किरणो यासां ता वरघृगयस्ताश्च ता मणयो रत्नानि वरघृणिमणयस्ताभिः पूर्ण यथा स्यात्तथा खचितं-व्याप्तं तथा / मणिशब्दवन्मणीशब्दोऽपि प्रयुज्यतेऽभियुक्तस्तथा हि - ." बोधागा सुपदपदवी-नीरपूराभिरामं , जीवाऽहिंसाऽविरतलहरीसङ्गमागाहदेहम् / P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ ४/अर्हद्गुणमाला चूलावेगं गुरुगममणी - सङ कुलं दूरपारं, सारं वीरागमजलनिधि सादरं साधु सेवे ।।इति // क्रमान्दोलत्पीठम्-क्रमाभ्यां चरणाभ्यामान्दोलन्तः परिचलन्तः पीठाः फलका यत्र तत्तथा / " चरणः क्रमणः पादः पदोऽह्रिश्चलनः क्रमः" ।३।२८०॥इत्यभिधानचिन्तामणिः / सुकृत-जननम्-पुण्योत्पादकम् / दिव्यनमन म्-दिव्यानां दिविभवानां नमनं प्रणिपातो यत्र तत्तथा // 5 // सहस्रादित्यानां समुदितविभातोऽप्यतिशया, प्रभा ते वाहन ! विलसतितरां निर्मलतरा / न लोका लोकन्तेऽमहसमथवाऽत्यन्त - महसं , विभात्येतन्मत्वा सुररचित - भामण्डलमिदम् // 6 // सौरभ:- वहिन् ? सर्वलोकातिशय-प्रशस्य जिनेश्वर ! सहस्रादित्यानाम्-दशशतसंख्यकदिवाकराणाम् / समुदितविभातः / एकत्रीभूतप्रभातः / अपिखलु / अतिशया अधिका। निर्मलतरा-अतिनिर्मला / ते-श्रीमतो भवतः / प्रभाकान्तिः / विलसतितराम्-संशोभते / लोका:-जनाः। अमहसम्-नास्ति महस्तेजो यस्मिस्तं तथा / अथवा / अत्यन्तमहसम्-सुमहत्प्रतापम् / 'महस्तूत्सव-तेजसोः'' इति मेदिनी / पदार्थ जनं-वेति शेषः / न-नहि / लोकन्ते-द्रष्टुं न शक्नुवन्तीति भावः / एतत्-इदम् / मत्वा-अवधार्य / इदम्-प्रत्यक्ष दृश्यम् / सुररचित-भामण्डलम् - देवविनिर्मितप्रभामण्डलम् / विभाति-दीप्यते। समधिकतेजसं श्रीमत भवन्तं द्रष्टुमशक्नुवतामनुग्रहाय-देवै रचितं भामण्डलमिदं शोभते इति सारांशः // 6 // अनादेरज्ञानान्निखिलजनता - निद्रिततमा, .. तमस्तस्या हर्त रविरुदयति श्रीजिनवरः। तदायानां ज्ञप्त्यं श्रवणमधुरः पूरितनभाः, पुरस्तादुच्चस्तात् प्रसरणपरो दुन्दुभिरवः / / 7 // सौरभः- अनादिकालप्रवाह-पतितात् / अज्ञानात्-अविद्यातः / निद्रिततमा-अत्यन्तं निद्रिता / तस्याः-जनतायाः / तमः-अज्ञानम् / हर्तुम्-विनाशयितुम् / श्रीजिनवरः-श्रीमदहन् / रविः- सूय्यंः / उदयति-प्रकाशते / तदायानां जप्त्य-श्रीजिनेश्वर-दिनक राऽऽगमन-निवेदनाय / श्रवणमधुरः-कर्णसुखकरः / पुरस्तात्-अग्रतः / उच्चस्तात्-उपरि / प्रसरणपरः-प्रसरणशीलः / पूरितनभाः - परिपूरिताकाशः / दुन्दुभिरवः-बुन्दुध्विानः / प्रादुर्भवतीति शेषः / / 7 // P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ १ञ्च-परमेष्ठि-गुणमालायाम्५ त्रिलोक्याः साम्राज्यं यदधिगतवान् धर्मवरत- : श्चतुष्प्रान्तश्च की सुरनरवराभ्यचितपदः / - ततस्तत्पुण्यर्द्धरतिशय - भरेणोच्छ्तितमं, वदातं तच्छत्रत्रय भवतु सन्मौक्तिकमदः // 8 // सौरभः- सुरनरवराभ्यचितपदः-देवाधीश-नराधीशोभयसम्पूजितचरणः / धर्मवरतश्चतुष्प्रान्तः-धर्मवरचतुरन्तः / “धम्मवरचाउरन्त" इत्यागमोक्तेः / चक्री-चक्रवर्ती। धर्मचक्रवर्तीति यावत् / यत्-यस्मात् / त्रिलोक्याः-भुवनत्रयस्य / साम्राज्यम्-आधिपत्यम् / अधिगतवान्-प्राप्तवान् / ततः-तस्माद्धेतोः / तत्पुण्यद्धःतदीयधर्मसमृद्धः। अतिशयभरेण-अतिशयमाधिक्येन / उच्छ्रिततमम्-अत्यन्तमुन्नतम् / सन्मौक्तिक म्-जात्यमुक्तासमुदय-विलसितम् / वदातम्-अवदातम्, विशदमिति यावत् / "वष्टि भागुरिरल्लोपमवाप्योरुपसर्गयोः" इतिभागुरिमतेन "वदातम्-इति रूपं द्रष्टव्यम् / अदः-विप्रकृष्टत्वेन प्रत्यक्षदृश्यम् / तच्छत्रत्रयम्तदीयातपत्रितयम् / अवतु-रक्षतु / भुवनत्रयमिति शेषः / पदार्थाः षड् लोके गुणनिकरपायनिचयावनन्तौ, तज्ज्ञानं मतिमुखचतुष्कान्न भवति / समस्तं तज्ज्ञातुं चरमममलं केवलमलं, जिनेन्द्र तन्नित्यं समतिशयितं ज्ञानमुदितम् / / 9 / / RATTRACT DITIHAR सौरभः- लोके-जगति / पदार्थाः-वस्तूनि / षट्-पट्त्वसङ्ख्याकलिताः / गुणनिकरपर्याय निचयों-गुणपर्यायसमुदयौ / अनन्तो-अन्तविरहितो, अपरिच्छिन्नमिति यावत् / मतिमुखचतुष्कात्-मतिप्रभृतिज्ञानचतुष्ट यात् / तज्ज्ञानम्-पदार्थ-गुणनिकर-पर्याय-निचयाववोधः / न-नहि / भवति-जायते / समस्तम्-सम्पूर्णम् / तत् पदार्थादि / ज्ञातुम्-वेदितुम् / चरमम्-अन्तिमम् / 'अमलम्-विशुद्धम् / केवलम्केवलज्ञानम् / अलम् पर्याप्तम् / समतिशयितम्-समतिशयम् / नित्यम्-शाश्वतम् / तत्-केवलात्मकम् / ज्ञानम्-जिनेन्द्रे-जिनेश्वरे / उदितम्-उत्पन्नम् / ... वचसि अ वचांसि श्रेयांसि प्रहत - चरितान्यत्र भुवने, परेषां नो केषां रुज इव तनूनन्तिनिभूतम् / वचांसि श्रेयांसि प्रशमरस - पूर्णानि भविनां; समेषामहस्ते विदधति यथान्नं जलधराः // 10 // सौरभः- अत्र-अस्मिन् / भुवने- लोके / परेषाम्-अन्यदर्शनिनाम् / पहत P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ 6 अर्हद्गुणमाला चरितानि-प्रहतं विनाशितं चरितं चारित्रं येभ्यस्तानि-तथा / वचांसि-उपदेश-वचनानि / रुजः-व्याधयः / तनूः-शरीराणि / इव-यथा / निभृतम्-एकान्ततः / वेषाम्जनानाम् / श्रेयांसि-कल्याणानि, सुकृतानि वा / धनन्ति-नाशयन्ति / “अथ संस्कृते / व्युत्पन्न प्रहत क्षुण्णा: "339 // इत्यभिधानात् प्रहतशब्दस्य संस्कृतशब्दपर्यायत्वानुसन्धाने तु" प्रहतचरितानीति श्रेयो विशेषणपरत्वेनोन्नेयम् / अर्हन् ? जिनेश्वर ! प्रशमरस-पूर्गानि परिपूर्ण-शान्तरस-प्रत्याय नपराणि, ते-श्रीमतो-भवतः / वचांसि-देशना-वचनानि / जलधरा-मेघाः / अन्नम्-सस्यम् / यथा-इव / समेषाम्सर्वेषाम् / भविनाम्-भत्र्यात्मनाम्-भव्यात्मनाम् / श्रेयांसि-क्षेमाणि मोक्षान् वा / विदधति-कुर्वन्ति / उपमालङ्कारः / / 10 // श्रुतं नो नो दृष्टं सुरपतिभिरर्चा विरचिता , यथा तेऽर्हस्तादृक त्रिजगति परस्य क्षणमिति / अहो सौभाग्यं ते महनमपि वैराग्यजननं , महत्त्वं विस्तारं व्रजति भवतोऽर्चातिशयतः // 11 // सौरभः- अहन् ! जिनेश्वर ! सुरपतिभिः-इन्द्रः / यथा-येन प्रकारेण / ते-श्रीमतो भवतः / अर्चा-पूजा। विरचिता-विहिता / तादृक्-तथा / त्रिजगतिभुवनत्रये / परस्य-भवदतिरिक्तस्यान्यदर्श निनः / क्षणम्-तदात्म-सूक्ष्मकालमभिव्याप्यमपि / (विरचिता) इति-इत्यम् / नो-नहि। श्रुतम्-आकणितम्, श्रावणप्रत्यक्षविपयतामापादितमिति यावत् / नो-नहि। दृष्टम्-अवलोकितम् / चाक्षुषप्रत्यक्षविषयतां नीतमिति यावत् / ते-भवतः / सौभाग्य म्-सुष्ठु-शोभनो भगो ज्ञानादिसम्पत्तिर्यस्य स सुभग-भगस्तस्य भावस्तथा। अहो-आश्चर्यकारकम् / ते-श्रीमतो भवतः / महनम्-पूजनम् / अपि खलु वैराग्यजनन म्-विरागभावोत्पादकम् / भवतःश्रीमतस्तव / अर्चातिशयतः-समधिकसपतिः / महत्त्वम्-माहात्म्यम् / भव्यानामिति शेषः / विस्तारं-वृद्धिम्, प्रसारमिति यावत् / व्रजति-गच्छति / / 11 / / अपायानामाप्तिर्भवति .. भवकाराऽशुभगृहे , जराधिव्याधीनां मरणचरमाणामनुपलम् / भवाँस्तस्यामूलं दुरितनिकरं यत्कषितवाँस्ततोऽपायान्मुक्तोऽतिशयकलितो रक्षतु भवात् // 12 // सौरभः- भवकाराऽशुभगृहे-भवः-संसार एव कारात्मकमशुभममङ्गलं गृह सदनं-भवकाराऽशुभगृहन्तस्मिस्तथा / अनुपलम्-प्रतिक्षणम् / मरणचरमाणाम्-मरणं मृत्युश्चरममन्तिमं येपान्तेपान्तया, मरणसहितानामित्यर्थः। जराधिव्याधीनाम् P.P. Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ पञ्च-परमेष्ठि-गुणमालायाम्/७ जीर्यतेऽगमनयेति जरा-विस्रसा च-आधिमानसी व्यथा च व्याधिः शरीररुजा च / जराधिव्याधयस्तेषान्तथा / अथ विससा जरा" 3 / 4 // इत्यभिधानचिन्तामणिः। "पुंस्याधिर्मानसी व्यथा" इत्यमरः / अपायानाम्-विनाशानाम् / आप्तिः-प्राप्तिः / भवति-जायते / भवान्-श्रीमांस्त्वम् / यत्-यस्माद्धेतोः / तस्याः-तादृशायप्राप्तेः / मूलम्-निदानम् / दुरितनिकरम्-पापकदम्बकम् / कपितवान्-मुन्मूलितवान् / ततःतस्मात् / अपायात् विनाशात् / मुक्तः-विरहितः अतिशयकलितः-अतिशयान्वितः / सन् / भवात्-संसारात् / रक्षतु-त्रायताम् / भविकर्मन्नितिः // 12 // २-अथ सिद्धगुणमाला निगोदेऽनन्तांशं ... प्रकटमभवज्ञानमसम, ततो व्यक्ताव्यक्तं क्रमश उदितं यद् व्यवहतौ। परं पूर्ण नासीद् भवसदसि कस्यापि किमपि , प्रसिद्धं सिद्धानां तदतुलमनन्तं विलसति // 13 // सौरभः - यत्-बुद्धिविषयीभूतम् ज्ञानम् / निगोदे-अनाद्यव्यवहारे / अनन्तांशम्-अतिसूक्ष्मम् / असमम्-निकृष्टत्वेनानुपमम् / प्रकटम्-व्यक्तम् / अभवत्-समजायत / ततः-तदनन्तरम् / क्रमशः क्रमात् / व्यवहृतौ-व्यवहारे / व्यक्ताव्यक्तम्स्फुटास्फुटम् / उदितम्-उत्पन्नम् / परम्-किन्तु / भवसदसि-संसारभवने / पूर्णम्सर्वाङ्गपरिपूर्णम् / ज्ञानमिति शेषः / कस्यापि-किमपि-कथमपि / न-नहि / आसीत्अभवत् / तत्-ज्ञानम् / अतुलम्-उत्तमत्वेनानुपमम् / अनन्तम्-पूर्णम् / सिद्धानाम्सिद्धात्मनाम् / प्रसिद्धम् / विलसति-विदोषेण शोभते / / 13 // विना सामान्यं नो प्रभवति विशेषोऽत्र कृतिनां , विशेषात सामान्यं भवति ननु सिद्धात्मसु परम् / त्रिलोक्यानकाल्यं पतति प्रतिबिम्बं हि नितरामखण्डे कैवल्ये विमलमुकुरे दर्शनगुणे // 14 // सौरभः- अत्र-लोके / कृतिनाम्-विदुषाम् / “विद्वान् कृती कविविचक्षणः 3 // 5 // इत्यभिधानचिन्तामणिः / सामान्यम्-सामान्यज्ञानम्, * निर्विकल्पकज्ञानमिति यावत्, दर्शनोपयोगमिति तु हृदयम् / विना-अन्तरेण / विशेषः-विशेषज्ञानम्, सविकल्पकमिति यावत् / ज्ञानोपयोगमिति हृदयम् / नो-नहि / प्रभवति-प्रकर्षण जायते / परम्-किन्तु / सिद्धात्मसु-सिद्धाः सिद्धभावमिता आत्मानों जीवाः सिद्धात्मा P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ ८/अहंद्गुणमाला ! नस्तेषु तथा / विशेषात्-विशेषज्ञानात् / ननु-निश्चयेन / सामान्यम्-सामान्यज्ञानम भवति-उत्पद्यते / ज्ञानावरणीय-दर्शनावरणीययोरुभयोर्मध्ये प्रथम-प्रथमस्य (ज्ञानावरणीयस्य) नाशात् केवलज्ञानोत्पत्त्या सामान्याति सामान्यतयाऽपि सवलस्यादि वस्तुनो ज्ञानमुत्पद्यते इति तेषां ज्ञानोपयोगानन्तरं दर्शनोपयोगो भवतीति भावः / तमेव विषयं भङ्ग्योत्तरार्धन निदर्शयति-त्रिलोक्यास्त्रकाल्यमित्यादि / हि-निश्चयेन / अखण्डे-कवल्ये / दर्शनगुणे-विमलमुकुरे / अखण्ड-केवल-दर्शनगुणात्मनिर्मलादर्श त्रैकाल्यम्-भूतभविष्यवर्तमानतत्त्रितयकालावच्छेदेन / त्रिलोक्या:-भुवन त्रयस्य प्रतिबिम्बम्-प्रतिरूपम् / "अर्चा तु प्रतेर्मायातना निधिः प्रतिरूपम् / “अर्चा 6 प्रतेर्मा यातना निधिः / छाया छन्दः कायो रूपं बिम्बं मान-कृती अपि" 6.100 / इत्यभिधानचिन्तामणिः। नितराम्-अतिशयेन / पतति-निपतति // 14 // 1 शरीरं विध्वंसि प्रबलशतदुःखानि ददते , क्षणं नो संसारे भवति वपुषो योगविरहः / तृतीयं वेद्याख्यं दुरितमपि दुःखाय नियतं; महानन्देऽमन्दं सुखमपरतन्त्रं विलसति // 15 // . .... सौरभः- विध्वंसि-विनशनशीलम् / शरीरम्-देहम् / प्रबलशतदुःखानि प्रकृष्टं बलं सामर्थ्य येषां तानि तानि शतानि-शतसङ्ख्याकानि, दुःखानि-व्यथाः प्रवलशतदुःखानि तानि तथा / "पीडा बाधा व्यथा दुःखमामनस्यं प्रसूतिजम् इत्यमरः / ददते-ददाति / संसारे-भवपरम्परायाम् / क्षणम्-तदात्मकसूक्ष्मकालविशेष मभिव्याप्यापि / वपुषः-शरीरस्य / योगविरहः-असम्बन्धः / नो-नहि / भवति जायते / भवे सर्वदैव शरीरसम्बन्धो भवत्येवेति भावः / तृतीयम् / वेद्याख्यम्-वेद नीयम् / दुरितम्-कर्म / दुःखाय-क्लेशाय / नियतम्-निश्चितम्, नियन्त्रितमिदि यावत् / महानन्दे-मोक्षे / अमन्दम्-अनत्पम्-समधिकं यथा स्यात्तथा / अपरतन्त्रम् स्वतन्त्रम् / सुखम्-सौख्यम्, निर्वृतिरिति यावत् / विलसति-शोभते // 15 // 1- इतः परं पद्यमिदंपाठान्तरेणात्र लिखितमस्ति, परं व्याख्या नास्ति / ... शरीरं विध्वंसि प्रबलशतदुःखानि . दवते, ऽभवे नस्याभावात् स्ववश-सुखमन्तेन रहिताः। - तृतीयं वेद्याख्यं शिवसदसि कर्मैव विगतं , , .. ततस्तत्रानन्तं.,.. सुखमपरतन्त्रं - विलसति // 15 // . P.P.AC. Gunratnasuri.M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ पञ्च-परमेष्ठि-गुणमालायाम्/९ पाठान्तरम् - वनेभः कश्चिद्वै नगरमुपयातो नृपगृहे ; स्थितो भोगान् भुक्त्वा पुनरपि वनं सत्वरमितः। वनस्थानां सोऽयं नगरसुखमुद्बोधयति यत् , परं नेष्टे तद्वत् शिवसुखमिहत्येषु न गतम् // 16 // सौरभः-व-निश्चयेन / कश्चित् / वनेभूः-वनेचर: किरातादिरिति यावत् / नगरम्-पुरम् / उपयातः उपगतः / (तत्र)-नृपगृहे-राजभवने / स्थितः / भोगान्भोज वस्तूनि / भुन्या -उभुज्य / पुनरपि-भूयः / सत्वरम्-स्वरितम् / वनम्-काननम्। इतः-प्राप्तः। सोऽयम्-किरातः / वनस्थानाम्-वनेचराणाम् / नगरसुखम्-नगरभवमानन्दम् / यत्-यस्मात् / उद्बोधयति-प्रबोधयति / परम्-किन्तु / न-नहि / ईप्टेप्रभवति / उद्बोधयितुमिति यावत् / तद्वत्-तेनैव प्रकारेण / शिवसुखम्-मोक्षानन्दः / इहत्येपु-भवस्येषु / न-नहि / गतम्-ज्ञातम् / यथा किरातो नगरमागत्य तत्रत्यं सुखमुपभुज्यापि परं न तदुबोधयितुं प्रभवति तथा भवस्था न मोक्षसुखं वेदितुं प्रभवन्तीति भावः / कथानकञ्चैवं प्रचलति - "म्लेच्छः कोऽपि महारण्ये वसति स्म निराकुलः / अन्यदा तत्र भूपालो दुष्टाश्वेन प्रवेशितः // 1 // म्लेच्छेनासा नृपो दृष्ट: सत्कृतश्च यथोचितम् / / प्रापितश्च निजं देशं सोऽपि राज्ञा निजं पुरम् // 2 // ममायमुपकारीति कृतो राज्ञातिगौरवात् / .. विशिष्ट भोगभूतीनां भाजनं जनपूजितः // 3 // ततः प्रासादशृङ्गेषु रम्येपु काननेषु च / वृतो विलासिनी-सार्थर्भुङ्क्त भोगसुखान्यसी // 4 // अन्यदा प्रावृषः प्राप्तौ मेयाडम्बर-मण्डितम् / .. व्योम दृष्ट्वा ध्वनि श्रुत्वा मेघानां स मनोहरम् // 5 // जातोत्कण्ठो दृढं जातोऽरण्यवासगमं प्रति / विसजितश्च राज्ञापि प्राप्तोऽरण्यमसौ ततः // 6 // पृच्छन्त्यरण्यवासास्तं नगरं तात . कीदृशम् / स स्वभावान् पुरः सर्वान् जानात्येव हि केवलम् // 7 // न शशाकतमां तेषां गदितं स कृतोद्यमः / वने वनेचराणां हि नास्ति सिद्धोपमा तथा // 8 // .. P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ 10 अहंद्गुणमाला महामोहोद्रेकात् क्षणविलयि सङ्कल्पकलितं,.. सुखं दुःखाभिन्नं भवति भवभावे भवभृताम् / परं मक्ती मोहक्षयजनित आत्मानमभितः , परानन्दस्पन्दो. नियमितममन्दं रमयति // 17 // सौरभः- भवभृताम्-संसारिजीवानाम् / भवभावे-सांसारिक-स्थिती / महामोहोद्र कात्-महामोहप्राबल्यात् / क्षणविलयि-क्षणविनश्वरम्, क्षणविध्वंसीति यावत् / साल्पकलितम्-मानसिक कर्मजनितम् / "सकङ्ल्पः कर्ममानसम्" इत्यमरः, अथवा-क्षणविलयिसङ्कल्पकलितम् 'इत्येकं पदम्' तथा च-क्षणविल यो यः सङ्कल्पस्तेन कलितं तथेति व्याख्येयम् / सुखम्-शर्म / दुःखाभिन्नम्-दुःखसाभिन्नम् ,दुःखरूपमेवेति यावत् / भवति-जायते / परम्-किन्तु / मुक्ती-मोक्षस्थिती। मोहक्षयजनितःमोहात्यन्तं विनाशोद्भवतः / परानन्दस्पन्दः-महानन्द सञ्चा: / नियमितम्-निदिचतम् / अमन्दम्-अनल्पम्, सातिशयमिति यावत् / अभितः-सर्वतः / आत्मानं-चेतनम् / रमयति-क्रीडयति / परमानन्दरूपतामधिगमयतीति यादत् / / .. अघोरन्धे तिर्यग्गतिगतभवे मानवगतो, सुरेऽस्मिन् संसारे सततमटनं वै व्यवसितम् / स्थितिः स्यात सिद्धानां क्षयविरहिताऽऽयष्यविगमाद, गुण : वन्दे कान्तं -निरुपममकान्तं तमकलम् // 18 // सौरभः- अघोरन्ध्र-पाताले, नरकगताविति यावत् / तिर्यग्गतिगतभवेतिर्यग्गतौ / मानवगतौ-मनुष्यगतौ / सुरे-देवगा। (इति) / अस्मिन्-चातुगंतिके / संसारे-भवे / व-निश्चयेन / सततम्-निरन्तरम् / अटनम-भ्रमणम् / व्यवसितम्विहितम् / सिद्धानाम्-सिद्धिमितानाम् / आयुष्य विगमात्-आयुविरहितत्वात् / क्षयविरहिता-अक्षया / स्थिति:-अवस्थानम् / स्यात्-भदेत् / तम्-प्रसिद्धम् / कान्तम्मनोहरम् / अकान्तम्-दुःखविनाशक म् / निरुपम म्-अतुलनीयम् / अकलम्-निष्कलम् / गुणम्-अक्षयस्थित्यात्मकम् / वन्दे-अभिवादये // 18 // यथा चित्रं : नानाविधमुपनयेच्चित्रकृदलं , तथा नामात्मानं नटयति विचित्रं भवपुरे / स्वरूपं नीरूपं . भवति भवमुक्त ऽनुपमितं , न केषां तंच्चित्रं जनयति पवित्रं समुदितम् // 19 // सौरभः यथा-येन प्रकारेण / चित्रकृत्-आलेख्य कृत् / नानाविधम्-अनेक P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ पञ्च-परमेष्ठि-गुणमालायाम्/११ प्रकारम् / चित्रम्-आलेख्यम् / अलम्-पर्याप्तं / यथास्यात्तथा / उपनयेत्-प्रापयेत् / तथा तेन प्रकारेण / नाम-नामनामकं षष्ठं कर्म / भवपुरे-भवः संसार एव पुरं नगर भवपुरं तस्मिंस्तथा / आत्मानम्-जीवम् / विचित्र म्-नानाप्रकारेण / न्टयति-नर्तयति / भवमुक्त-भवात्-संसाराज्जन्मनो वा मुक्तो भवमुक्तः सिद्धस्तस्मिस्तथा। स्वरूपम्-नीरूपम्-वर्णादिरहितम् / भवति-जायते / निरुपम म्-अनुपमितम् / पदिप्रम्-विशुद्धम् / समुदितम्-समुत्पन्नम् / तत्-नीरूपं स्वरूपम् / केषाम् / जनानामिति शेषः / चित्रम्-आश्चर्य म् / न-नाहि / जनयति-समुत्पादयति / अपि तु सर्वषामिति भावः / / 20 / / .... ... . कुले जन्म - प्राप्तेर्भवति गुरुता सम्मदकरी, भवे दुवंशाप्तेरनभिजनता लाघवकरी / न गोत्रं सिद्धानामगुरु: लघुभावो भवति तां, नमो नित्य तस्मै गतगुरुलघुत्वाय महसे // 20 // सौरभः- भवे-संसारे / कुले-अभिजने-सत्कुले इति यावत् / जन्मप्राप्तेःजननाधिगमात् / सम्मदकरी-प्रमोदावहा / "मुत्प्रीतिः प्रमदो हपंः प्रमोदामोदसम्मदाः" इत्यमरः / गुरुता-गुरुत्वबुद्धिः / भवति-जायते / दुर्वशाप्तेः-दुष्कुलजन्माधिगमात् / अनभिजनता-अकुलीनता / लाघवकरी-लघुतापादिका, “अहं लघुः"इत्याकारक-लघुत्वबुद्धि-सम्पादिकेति यावत् / भवतीति शेषः / सिद्धानाम्-मुक्तानाम् / गोत्रम्-नाम, कुलञ्च / तन्त्रत्वादिति बोध्यम् / "सकृदुच्चरितस्य शब्दस्यानेकार्थ-बोधकत्वं तन्त्रत्वम्" इति स्मरणात् / “नाम गोत्रं कुल गोत्रं गोत्रश्च धरणीधरः" इति कोशः / तत्-तस्मात् / गुरुल घुभावः-गुरुताल घुत्वे / न-नहि / भवतिजायते। गतगुरुलघुत्वाय-अगुरुलघुगुणाय, गौरवलाघवर हितायेति-यावत् / महसेतेजोरूपाय / तस्मै-प्रसिद्धाय, सिद्धायेति यावत् / नित्यम्-सदा / नमः-नमस्कारः / अस्त्विति शेषः // 21 // नदानं नो लाभो लसति न च भोगोऽपि परमोपभोगोवीयं वा भव-भवनगानामभिमतम् / / धनं विघ्नं निधनं शिव-सदसि निघ्नन्ति वशिनो, लभन्ते चानन्तं वितरणमुखं... पञ्चकमहो! // 21 // सौरभः- भवभवनगानाम्-भवः-संसार एव भवनमायतनं भवभवनन्तत्रगच्छन्तीति भव-भवनगास्तेषां तथा, संसारिणामिति यावत् / अभिमतम्-अभीष्ट. मनुकूलमिति यावत् / दानम्-वितरणम् / 'न नहिं / संसारिणः-कामं न वितरीतुं P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ १२/अर्हद्गुणमाला शक्नुवन्तीति भावः / लाभः-धनादि-प्राप्तिः / नो-नहि / लसति-शोभते / भोग'स्रक्चन्दनाङ्गानादिसेवनम् / अपि-खलु / न च-नैव / परमोपभोगः-स्वर्गादलौकिक - सुखसाक्षात्कारः। वा-अथवा। वीर्यम्-विक्रमः / न च लसतीत्युभयत्रानुबन्धनीयम् / वशिनः-स्वायत्ताः, जितेन्द्रियाः सिद्धा इति यावत् / विघ्नम्-अन्तरायकर्म / निघ्नम्-स्वायत्तं यथा स्यात्तथा / निघ्नन्ति-समूल काषं कषति, समुन्मूलयतीति यावत् / च-पुनः। शिव-सदसि-सिद्धस्थाने। अनन्तम्-अपरिमितम्, अपरिमित्कालावस्थायीति यावत् / वितरणमुखम्-दानप्रमुखम् / पञ्चक म्-दानलाभ भोगोपभोगवीर्यात्म-पञ्चनिकुरम्बम् / लभन्ते-प्राप्नुवन्ति // 22 // अथाचार्य-गुणमाला न नारीणां स्पर्श कमलदलवत्कोमलमलं; समोहन्तेऽस्वप्ने विदितकरि-कष्टा वशिवराः / सहन्ते शीतोष्णं वरणरहिता आत्मनिहिताः, स्तुवे तानाचार्यान् प्रवरवशिनश्चारुचरितान् // 22 // सौरभः- विदितकरिकष्टा:-विदितं ज्ञातं करिणां हस्तिनां कष्टं क्लेशो य येषां वा ते तथा। वशिवरा:-जितेन्द्रियश्रेष्ठाः / कमलदलवत्-शतपत्र-पत्रवत कोमलम्-सुकुमारम् / नारीणाम्-स्त्रीणाम् / स्पर्शम् / अलम्-अत्यर्थम् / स्वप्ने निद्रायाम् / अपीत्यर्थतो गम्यम् / न-नहि / समीहन्ते-कामयन्ते / आत्मनि-आत्म विषये / हिताः-उपकारकाः, स्वात्मोपस्कारका इति यावत् / वरणरहिताः-अप्रति हताः, शीतातपादि-प्रयोज्यक्लेश-त्राणापहच्छत्रोपानहादि-विरहिता इति यात् शीतोष्णम्-शीतञ्च तदुष्णञ्च शीतोष्णं तत्तथा / शैत्यमातपञ्चेति यावत् / सहारे मर्षयन्ति / चारुचरितान्-रमणीयशीलान् / प्रवर-वशिनः-प्रवरा:-श्रेष्ठायच / वशिनोऽपरतन्त्राः प्रवरवशिनस्तांस्तथा / तान्-प्रसिद्धान् / आचार्यान्-सूरिवरान् स्तुवे-स्तोमि // 23 // . .. - स्वदन्ते स्वारस्यान्नवनवरसं ये रसनया , लभन्ते सन्तापं विरसमनिशं मीनवदिमे / इति ज्ञात्वा लोल्यं विदधति न विज्ञाः कथमपि , स्तुवे तानाचार्यान् प्रवरवशिनश्चारुचरितान् // 23 // P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ पञ्च-रमेष्ठि-गुणमालायाम्/१३ सौरभः- ये-बुद्धिविषयाः / नरा इति शेषः / स्वारस्यात्-स्वाभिप्रायात्, स्वेच्छानुसारमिति यावत् / रसनया-जिह्वया , र सजाये ति यात् / नवनवरसम्नूतननूतनमधुरामललवण-कटुकपायादि-नानाभेद-भिन्न रसम् / स्वदन्ते-आस्वादयन्ति / रासनप्रत्यक्षविपयं कुर्वन्तीति यावत् / इमे-ते / इदं शब्दस्य-तच्छब्दार्थतादर्शनात् / मीनवत्-मीनमत्स्यैस्तुल्यं तथा / अनिशम्-ततम् / 'सन्तानारताश्रान्तसन्तताविरतानिशम्" इत्यमरः / विरसम् वरस्यापादव र था स्यात्तथा / सन्तापम्संज्वरम् / 'सन्ताप. संज्वरः समी" इत्यमरः / लभन्ते-समासादयन्ति / इतिइत्थम् / ज्ञात्वा-मत्वा / विज्ञाः-लोक्शास्त्रविचक्षणा म्हानुभावा: / व थमपि-केनापि प्रकारेणापि / लोल्यम्-रसनाचापल्यम् / भोज्योपभोग्यपदार्थ-मार्थाऽऽदित्साचापल्यमिति यावत् / न-नहि / विदधति-कुर्वन्ति / स्तुवे तानित्यादिचरम-पादवाक्यं यथाव्याख्यातमवसेयम् / / 23 / / द्विरेफा अम्भोजे जहति करणं नव-निहता , जना गन्धासक्तास्तनुमतनुविनां दधति तत् / स्वजन्ते नात्यन्तं परिमलपथे स्वस्थ-मनसः , स्तुवे तानाचार्यान् प्रवरवशिनश्चारचरितान् // 24 // सौरभः- द्विरेफा:-मधुकराः / ननिहताः-नऋण-सिव या / घ्राणेन्द्रियेणेति यावद्, हता-मारिता: स्ववशप्रापिता इति तथा / गन्धज्ञा-भपिका / नासाघ्राणं / घोणा विकूणिका। "नकं नर्कुटकं" 3 / 20 / इत्यभिधान-चिन्तामणिः / अम्भोजे-कमले / करणम्-शरीरम् / “करणं साधकतम क्षेत्रगात्रेन्द्रियेप्वपि" इति मेदिनी / “इन्द्रियातनुमङ्गविग्रही क्षेत्रगात्रतनुमूध नास्त नूः / मूतिमत्करणकाय मूर्तयो वेर-संहनन-देहसंचराः" 3 / 227 / / इत्यभिधान-चिन्तामणिः / जहादि-त्यजन्ति / ब्राणेन्द्रियवशीभूतप्रवृत्ता म्रियन्त इति भावः / जनाः-लोकाः। गन्धार.क्ताः-गन्धाघ्राणप्रवणाः सन्तः। अतनुवित्राम्-दुर्गन्धान्विताम् / तनु-शरीरम् / दधति-धारयन्ति / प्रायेण गन्धासक्ता जनाः परिणामेऽत्यन्तदुर्गन्धशरीरा भवन्त ति शेषः / तत्तस्माद् हेतोः / स्वस्थमनसः-विशुद्धहृदयाः / परिमलपथे-गन्धमार्गे / अत्यन्तम्-अतीव, सातिशयमिति यावत् / न-नहि। स्वजन्ते-आसक्ता भवन्ति / स्तुवे तानाचार्यानित्यादिवाक्यं व्याख्यातपूर्व द्रष्टव्यम् // 24 // विशद्धं स्वं रूपं. समधिगतवन्तो गणधराः, परस्मिन् रूपेऽस्मिन् न खलु विलसन्ति क्षणमपि / अयन्ते नो मृत्युं शलभवदमी रूपपतनात् ,. . स्तुवे तानाचार्यान् प्रवरवशिनश्चारुचरितान् // 25 // P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ 14 अहंद्गुणमाला सौरभः– विशुद्धम्-निर्मलम् / स्वम्-आत्मीयम, स्वीयमिति यावत् / .. स्वरूपम्, आत्मतत्त्वमिति यावत् / समधिगतवन्तः समासादितवन्तः। गणधरा: श्रीगौतमस्वामि-प्रमुखगणिनः / परस्मिन्-अन्यस्मिन् , आत्मतत्त्वभिन्ने इति यावत् / अस्मिन्-लोकप्रत्यक्षविषये, पौद्गलिके इति यावत् / रूपे-चक्षुमीत्र ग्राह्यगुणे कामिनीकमनीयत्वादी च / रूपं तु लोकशब्दयोः / पाशावाकारे सौन्दर्य नाणके नाटकादिके / ग्रन्थावृत्ती स्वभावे चे" ति हैमानेकार्थः। खलु-निश्चयेन / क्षणमपि-तदात्मकसूक्ष्मकालविशेषमभिव्याप्यापि / न-नहि। विलसन्ति-शोभन्ते / अमी-मणधराः / रूपपतनात्-सौन्दर्यसमासक्तत्वात् / शलभवत् - शलभः पत गस्तुल्यन्तथा / मृत्युम्-मृतिम् / नो-नहि / अयन्ते-लभन्ते / शलभा यथा रूपमात्राकृष्टा अभ्यग्न्हि पतन्तो म्रियन्ते न तथा ते कामिनीकमनीयत्वाधाकृष्टा निकृति यान्तीति भावः / प्रवरवशिनः, चारुचरितान् तान् आवार्यान् स्तुवे // 25 // जिनेन्द्राणां वाक्यामृत-हितरसः कर्णकुहरं, प्रविष्टो येषां ते न खलु गणिनो यन्ति कुगतिम् / प्रगीतः सङ्गीतः क्वचिदपि यथा हन्त हरिणाः, स्तुवे तानाचार्यान् प्रवरवशिनश्चारुचरितान् / / 26 / / सौरभः- जिनेन्द्राणाम्-श्रीमदीश्वर-प्रमुख-जिनेश्वराणाम् / वाक्यामृतहित रसःवचनारमपीयूषवदुपकारकरसः / येषाम्-वुद्धिविषयाणां गणिनामिति यावत् / वर्णकुहरम्-श्रवणविवरम् / प्रविष्टः-प्राविशत् / ते-बुद्धिविषयाः। गणिनः-गणधराः, आचार्या इति यावत् / प्रगीत:-प्रकर्षण गीतानि-गानकर्मीकृतानि प्रगीतानि . तैस्तथा। सङ्गीतैः, हरिणा:-मृगाः। तेषां गीतप्रियत्वात् / 'कुरङ्ग मातङ्ग पतङ्ग-भङ्ग-मीना हताः पञ्चभिरेव पञ्च / एकः प्रमादी स कथं न हन्यते यः सेवते पञ्चभिरेव पञ्च।" इति श्रवणात् हरिणानां श्रोन्द्रियहतत्वमवसेथम् / यथा-इव / क्वचिदपि-कुत्रापि / देशे काले विषये चेत्यर्थः / कुगतिम् दुर्दशाम् / न-नहि / यन्ति-प्राप्नुवन्ति / खलु-निश्चयेन / हन्त-हर्षे। हन्त वाक्यारम्भखेदविस्मयाऽऽमोदसम्भ्रमे" इति मेदिनी। प्रवरवशिनः चारुचरितान् तान् आचाान् स्तुवे // 26 // न यत्र स्यात स्त्रीणा वसतिरथ तिर्यग्गतिमता, म च क्लीवानां वा विदधतितमां तत्र वसतिम / विशुद्धः स्वाध्यायः प्रभवति यथा ध्यामविसरः, स्तुवे तानाचार्यान् प्रवरवशिनश्चारुचरितान् / / 27 // P.P. Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ पञ्च-परमेष्ठि-गुणमालायाम् /15 सौरमः- यत्र-यस्मिन् स्थले / स्त्रीणाम्-सीमन्तिनीनाम् / “स्त्री योषिदचला योषा नारी सीमन्तिनी वधूः" इत्यमरः / अथ-समुच्चये / “अथ समुच्चये / मङ्गले संशयारम्भाधिकारानन्तरेषु च" इति हैमानेकार्थः / तिर्यग्गतिमत्ताम्तिरश्वाम्, पशुपक्ष्यादीनामिति यावत् / वसतिः-निवासः / न-नहि / स्यात्-भवेत् / वा-अथवा / क्लीवानाम्-नपुंसकानाम्, तृतीयप्रकृतीनामिति यावत् / (वसतिः) न च-न खलु / भवेदिति शेषः / तत्र-तस्मिस्थले। वसतिम्-वासम् / यथाकालमित्यर्थवशसम्पन्नम् / विदधतितमाम्-कुर्वन्ति / यथा-येन प्रकारेण / विशुद्धः अतिनिर्मलः / स्वाध्यायः- अध्यापनादिगा धर्मप्रचारः / ध्यानविसर:-भावनाप्रकरः / प्रभवति-समुपपद्यते / प्रवरवशिनश्चारुचरितान् तान् आचार्यान् / स्तुवे-स्तवीमि / / 27 // असौ बाला बाला युवतिरियमद्यद्गतिमति-. स्तथा मुग्धा-दुग्धालय - कलसपीना पुनरसौ / .. न सुभ्र णामित्थ' विदधति कथा ब्रह्मणि रता स्तुये तानाचार्यान् प्रवरवशिनश्चारुचरितान् // 28 // .. सौरभः- ब्रह्मणि-आत्मनि / रताः-निरताः / मात्मनिरत-चेतस इति यावत् / "असो-इत्थम् / वाला-कुमारी। बाला-लावण्यकान्ति-परिपूरित्तवदना वाला / अर्थान्तरसंक्रमितवाच्यध्वनिः / "कदली कदलीत्यादिवत् / " इयम्-एषा। युवतिः-तरुणी / उद्यद्गतिमतिः-उद्यन्ती गतिर्गमनं दशा च मतिर्बुद्धिश्च यस्याः सा तथा / तथा-किञ्च / मुग्धा-अप्राप्तयौवना / असौ-पुनः। दुग्धालय-कलसपीना-दुग्धस्य-क्षीरस्य आलयो, आधारभूतौ इति यावत् ती चासो कलसौ पयोधरावित्ति यावत् / ताभ्यां पीना, तयोस्तदवच्छेदेन पीना, पीनस्तनीति यावत् / इत्थम्-अनेन - प्रकारेण / सुध्र णाम्-सुष्ठु नवौ नेत्रोपरितनभागौ यासां ताः सुभ्र वः सुनयना - इति यावत् / तासां तथा / कथाः-गोष्ठी: विचारणा इति यावत् / न-नहि / विदधति-कुर्वन्ति / प्रवरवशिनः चारुचरितान्, तान्, आचार्यान् स्तुचे-स्तवीमि // 28 // निविष्टा यद्देशे क्षणमपि मृगाक्षी तदवनों , श्रयन्ते नो स्थित्या जितमनसिजा जातुचिदपि / अणूनां सञ्चारादत्तिरुदयते तत्र कृतिनः, स्तुवे तानाचार्यान् प्रवरवशिनश्चारुचरितान् / / 29 / / सौरभः- यद्देशे-यस्मिन् प्रदेशे, यत्स्थानावच्छेदेनेति यावत् / क्षणमपि THRITTETTETTTTTTTTI 1- "इतीत्थं नो स्त्रीणां" इति पाठान्तरम् / P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ 14 अहंद्गुणमाला सौरभ:- विशुद्धम्-निर्मलम् / स्वम्-आत्मीयम, स्वीयमिति यावत स्वरूपम्, आत्मतत्त्वमिति यावत् / समधिगतवन्तः-समासादितवन्तः। गणघर: श्रीगौतमस्वामि-प्रमुखगणिनः / परस्मिन्-अन्यस्मिन, आत्मतत्त्वभिन्ने इति यावत अस्मिन्-लोकप्रत्यक्षविषये, पौद्गलिके इति यावत् / रूपे-चक्षुर्मात्रग्राह्यगुणे कामिनी कमनीयत्वादी च / रूपं तु लोकशब्दयोः / पाशावाकारे सौन्दर्य नाण के नाटकादिक / ग्रन्थावृत्ती स्वभावे चे" ति हैमानेकार्थः। खलु-निश्चयैन / क्षणमपि-तदात्मक सूक्ष्मकालविशेषमभिव्याप्यापि / न-नहि। विलसन्ति-शोभन्ते / अमी-मणधरा रूपपतनात्-सौन्दर्यसमासक्तत्वात् / शलभवत् - शलभैः पत गस्तुल्यन्तथा / मृत्युम-मृतिम् / नो-नहिं / अयन्ते-लभन्ते / शलभा यथा रूपमात्राकृप्टा अभ्यरित्र पतन्तो म्रियन्ते न तथा ते कामिनीकमनीयत्वाधाकृष्टा निकृति यान्तीति गावाप्रवरवशिनः, चारुचरितान् तान् आवार्यान् स्तुवे / / 25 // जिनेन्द्राणां वाक्यामृत-हितरसः कर्णकुहरं,. प्रविष्टो येषां ते न खलु गणिनो यन्ति कुगतिम् / प्रगीतः सङ्गीतः क्वचिदपि यथा हन्त हरिणाः, स्तुवे तानाचार्यान प्रवरवशिनश्चारुचरितान् // 26 // सौरभः- जिनेन्द्राणाम्-श्रीमदीश्वर-प्रमुख-जिनेश्वराणाम् / वाक्यामृतहितरस:वचनामपीयूषवदुपकारकरसः / येषाम्-बुद्धिविषयाणां गणिनामिति यावत् / न कुहरम्-श्रवणविवरम् / प्रविष्ट:-प्राविशत् / ते-बुद्धिविषयाः। गणिनः-गणधराः, आचार्या इति यावत् / प्रगीत:-प्रकर्षेण गीतानि-गानकर्मीकृतानि प्रगीतानि तैस्तथा। सङ्गीतः, हरिणा:-मृगाः। तेषां गीतप्रियत्वात् / 'कुरङ्ग मातङ्ग पतङ्ग-भङ्ग-मीना हताः पञ्चभिरेव पञ्च / एकः प्रमादी स कथं न हन्यत यः सेवते पञ्चभिरेव पञ्च / " इति श्रवणात् हरिणानां श्रोग्रेन्द्रियहतत्वमवसेथम् / यथा-इव / क्वचिदपि-कुत्रापि / देशे काले विषये चेत्यर्थः / कुगतिम् दुर्दशाम् / न-नहि / यन्ति-प्राप्नुवन्ति / खलु-निश्चयेन / हन्त-हर्षे / हन्त वाक्यारम्भखेदविस्मयाऽऽमोदसम्भ्रमे" इति मेदिनी। प्रवरवशिनः चारुचरितान् तान् आचाान् स्तुवे // 26 // न यत्र स्यात स्त्रीणां वसतिरथ तिर्यग्गतिमा, म च क्लीबानां वा विदधतितमां तत्र वसतिम् / विशुद्धः स्वाध्यायः प्रभवति यथा ध्यामविसरः, स्तुवे तानाचार्यान् प्रवरवशिनश्चारुचरितान् / / 27 // P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ पञ्च-परमेष्ठि-गुणमालायाम् /15 __. सौरभः - यत्र-यस्मिन् स्थले / स्त्रीणाम्-सीमन्तिनीनाम् / “स्त्री योषिद बला योषा नारी सीमन्तिनी वधूः" इत्यमरः / अथ-समुच्चये / “अथ समुच्चये / मङ्गले संशयारम्भाधिकारानन्तरेषु च" इति हैमानेकार्थः / तिर्यग्गतिमत्ताम्तिरश्वाम्, पशुपक्ष्यादीनामिति यावत् / वसतिः-निवासः। न-नहि / स्यात्-भवेत्। वा-अथवा / क्लीवानाम्-नपुंसकानाम्, तृतीयप्रकृतीनामिति यावत् / (वसतिः) न च-न खलु / भवेदिति शेषः / तत्र-तस्मिस्थले। वसतिस्-वासम् / यथाकालमित्यर्थवशसम्पन्नम् / विदधतितमाम्-कुर्वन्ति / यथा-येन प्रकारेण / विशुद्धः अतिनिर्मलः / स्वाध्यायः- अध्यापनादिना धर्मप्रचारः / ध्यानविसर:-भावनाप्रकरः। प्रभवति-समुपपद्यते / प्रवरवशिनश्चारुचरितान् तान् आचार्यान् / स्तुवे-स्तवीमि // 27 // अप्सो बाला बाला युवतिरियमद्यद्गतिमतिस्तथा मुग्धा-दुग्धालय - कलसपीना पुनरसौ / न सुभ्र णामित्थ' विदधति कथा ब्रह्मणि रता स्तुवे तानाचार्यान् प्रवरवशिनश्चारुचरितान् // 28 // . सौरभः-- ब्रह्मणि-आत्मनि / रताः-निरताः / आत्मनिरत-चेतस इत्ति यावत् / “असो-इत्यम् / वाला-कुमारी। बाला-लावण्यकान्ति-परिपूरित्तवदना बाला / अर्थान्तरसंक्रमितवाच्यध्वनिः / "कदली कदलीत्यादिवत् / " इयम्-एषा। युवतिः-तरुणी / उद्यद्गतिमतिः-उद्यन्ती गतिर्गमनं दशा च मतिर्वृद्धिश्च यस्याः सा तथा / तथा-किञ्च / मुग्धा-अप्राप्तयौवना / असौ-पुनः / दुग्धालय-कलसपीना-दुग्धस्य-क्षीरस्य आलयो, आधारभूतौ इति यावत् ती चासौ कलसी पयोधरावित्ति यावत् / ताभ्यां पीना, तयोस्तदवच्छेदेन पीना, पीनस्त नीति यावत् / इत्थम्-अनेन प्रकारेण / सुध्र णाम्-सुष्ठु भ्र वो नेत्रोपरितनभागौ यासां ताः सुभ्र वः सुनयना इति यावत् / तासां तथा / कथाः-गोष्ठी: विचारणा इति यावत् ।-न-नहि / विदधति-कुर्वन्ति / प्रवरवशिनः चारुचरितान्, तान्, आचार्यान् स्तुवे-स्तवौमि // 28 // निविष्टा यद्देशे क्षणमपि मृगाक्षी तदवनी, श्रयन्ते नो स्थित्या जितमनसिजा जातचिदपि / अणनां सञ्चारादत्तिरुदयते तत्र कृतिनः, स्तुवे तानाचार्यान् प्रवरवशिनश्चारुचरितान् / / 29 / / --... सौरभः- यद्देशे-यस्मिन् प्रदेशे, यत्स्थानावच्छेदेनेति यावत् / क्षणमपि 1- "इतीत्थं नो स्त्रीणां" इति पाठान्तरम् / / - .. P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ १६/अहंद्गुणमाला तंदात्मकसूक्ष्मकालमभि व्याप्य खलु / मृगाक्षी-मृगस्य हरिणस्याक्षिणी नयने इवाक्षिणी यस्याः सा तथा / निविष्टा-उपविष्टा / भवेदिति शेषः / जितमनसिजा:विजितमदनाः / गणिन इति शेपः / जातुचित्-कदाचित् / अपि-खलु / तदवनीम् - तद्भुमिम् / क्षणमपि मृगाक्षी-समाश्रितस्थानमिति यावत् / स्थित्या-अवस्थानेन / नो-नहि / श्रयन्ते-सैवन्ते / तत्र-न तिष्ठन्तीति भावः / “अणनाम्-परमाणूनाम् / सञ्चारात्-संचरणात् / रतिः-अनुरागः / * उदयते-उत्पद्यते" तत्र-तद्विषये कृतिन विचक्षणाः सावधाना इति यावत् / चारुचरितान्-प्रवरवशिनस्तान् आचार्यान स्तुवे // 29 // स्त्रीणां यद्वत् - नरा नारीणां यद् विकृतिजननाङ्गानि नयने , निधायान्तमाहं मनसि जमथानीय विफलम् / लभन्ते सन्तापं मनसि न तथाऽलीकवितथाः, स्तुवे तानाचार्यान् प्रवरवशिनश्चारुचरितान् / / 30 // सौरभ:- नराः-पुरपाः / यद्वत्-यथा / स्त्रीणाम् नारीणाम् / विकृतिजनन / गानि-विकारजनकशरीरावयवान् / नय ने-नेत्र निधाय-संर थाप्य, कृरवेति यावत् अन्तः-हृदये। मोहम्-मूढताम् (लभन्ते) / अथ- अनन्तरम् / मनसिजम्-कामम विफलम्-व्यर्थम् / आनीय-कृत्व। / विफलकामा भवन्त इति यावत् / मनसि-चेतसि सन्तापम्-संज्वरम् / "सन्तापः संज्वर: समो" इत्यमरः। तथा-तेन प्रकारेणअलीकवितथाः-अलीकं वितथम सत्यं येषान्ते तथा / सर्वदा सत्य भाषण,निरता इति यावत् / न-नहि / लभन्ते इति शेषः / चारुचरितान्-प्रवरवशिनस्तान् आचार्यान स्तुवे // 30 // निवासो दम्पत्योर्भवति यदि कुड्यान्तरगतः , स्मरार्ता .तद्वार्ता श्रुतिपथमनभ्यासमयते / इति ज्ञात्वा स्थान जहति तदमी संयतपथाः, स्तुवे तानाचार्यान् प्रवरवशिनश्चात्चरितान् / / 31 / / सौरभः- यदि-चेत् / कुड्यान्तरगत:-केवलभित्तिव्यवहितः / दम्पत्योः. जाया च पतिश्च दम्पती तयोस्तथा / निवास:-अवस्थानम् / भवति-जायते / तत्तदा / स्मरार्ता-स्मरेण आमेनाऽऽर्ता विलन्ना रत्य भिव्यजिवे ति यावत् / वाताप्रवृत्तिः / दम्पतिभणितिरिति यावत् / अनायासम्-अनवधानेनापि। श्रुतिपथम्श्रवणगोचरताम् / अयते प्राप्नोति / इति-इदम् / ज्ञात्वा-अवगत्य / अमी-ते / P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ पञ्च-परमेष्ठि-गुणमालायाम्/१७ संयतपयाः-संयमिनो गणिवराः। तत्-भित्तिमात्रव्यवहित-दम्पत्याधारभूतम् / स्थानम्-स्थलम् / जहति-त्यजन्ति / प्रवरवशिनश्चारुचरितान्; तान् आचार्यान्, स्तुवे / / 31 // सलज्ज निर्लज्ज निधुवनमतान्यङ्गनतया , स्वयेति स्मृत्वा कि व्यथयति मनोऽपि क्षणमपि / यदीयं ये लोके ननु न विकलाः सामयिकवत् , स्तुवे तानाचार्यान् प्रवरवशिनश्चारुचरितान् // 32 // सौरभवत्तिः- सलज्जम्-लज्जया त्रपया सहितं यथा स्यात्तथा, निर्लज्जम्लज्जाया निर्गतं लज्जाविरहितं यथा स्यात्तथा। अङ्गनतया-अङ्गः स्तनादिभिरवयवनंताऽङ्गनता 'स्तोकनम्रा स्तनाभ्या' मिति यावत् / तथा-तथा अथवा अङ्नायाः प्रमदाया भावोऽङ्गनता तया-तथा। विशेषास्त्वङ्गना भीरुः कामिनी कामलोचना, 'प्रमदेत्यमरः / त्वया। निधुवनम्-सुरतम् / अतानि-व्यधायि / इति-इत्थम् / स्मृत्वा-चिन्तयित्वा / अपि-खलु / यदीयम्-यत्सम्बन्धि / मनः-अन्तःकरणम् / व्यथयति-किं विकलतामनुभवति किमु ? नैवानुभवतीति यावत् / ये-बुद्धिविषया:सुरिणः। लोके-जगति / सामायिकवत्-सामयिकेन तुल्यन्तथा / "सामयिको हि पूर्वतृतीयभवे आर्द्र कुमारजीवः / तथा च तद्वत्तम् // 32 // भवादर मततृतीयेऽहं भवे कौटुम्बिककोऽभनम् / श्रीवसन्तपुरे सामयिको बन्धुमतीपतिः / / अन्येयुः सुस्थिताचार्याद् धर्म श्रुत्वा प्रियायुतः / आत्तव्रतः क्रमाज्जातो गीतार्थों गुरुसन्निधी / / रागवानेकदाऽभूवं पश्यन् बन्धुमती प्रियाम् / निजाभिप्रायमाख्याञ्च पुरस्तस्याः स्वयोषितः / / सा तु स्वशीलरक्षार्थ हित्वा प्राणान् निजान् क्षणात् गृहीतानशना शुक्ललेश्यया देवतामगात् // वीक्ष्येत्युत्पन्न-वैराग्यरङ्गोऽनशनमाश्रयम् समाधिना मृति प्राप्याऽभूवं च त्रिदशस्ततः ॥इति।। ननु निश्चयेन / न-नहि / विकला-व्यग्रमनसः भवन्तीति शेषः। प्रवरवशिनश्चारुचरितान् तान् आचार्यान् स्तुवे / इति / / P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ 18 आचार्यगुणमाला .: घृतं दुग्धं भोज्यं मदन-कदनायैव नियतं , ततो भूत्वा भोज्याद् विकृतिजनकाद् दूरमनिशम् / तपस्यालीलानां कथमपि मनो नैव विकृतं , स्तुवे तानाचार्यान् प्रवरवशिनश्चारुचरितान् // 33 // सौरभवृत्तिः- भोज्यम्-भक्षणीयम् / घृतम्-नवनीतम् / दुग्धम्-क्षीरम् / नियतम्-निश्चितम् / मदनकदनाय-कामोद्रकाय / एव-खलु / भवतीति-शेषः / अतः-तस्माद् हेतोः / विकृतिजनकात्-विकारोत्पादकात् / भोज्यात्-भक्षणीयपदार्थात्-घृतदुग्धादेरिति यावत् / अनिशम्-सततम् / दूरम्-विप्रकृष्टम् / भूत्वा, स्थितानामिति शेषः / तपस्यालीलानाम्-तपोनिरतानाम् / सूरिवगणामिति शेषः / मनः-अन्तःकरणम् / कथमपि-केनापि प्रकारेण / विकृतम्-अधिगतविकारम् / नैवन खलु / भवतीति शेषः / प्रवरवशिनः चारुचरितान्, तान् आचार्यान् स्तुवे / / 33 // मितं रूक्षं भक्ष्यं तदपि विहितं शास्त्रवचनहितं तद्ग्रहणन्ति प्रभवति समाधिर्यदचिरम्। ततः कामं निघ्नन्त्यरि-निकरमन्तः सुमनसः , स्तुवे तानाचार्यान् प्रवरवशिनश्चारुचरितान् / / 34 / / सौरभवत्तिः- सुमनसः-धीरा आचार्य्याः / मितम्-परिमितम् स्वल्पमिति यावत् / रूक्षम्-घृतादिप्रयोज्यसंमृष्टतादिविरहितम् / यद्यपीति शेषः। तदपितथापि / शास्त्रवचन:-आगमसम्बन्ध्याहारादि-नियामकवाक्यः / हितम्-उपकारकम् / विहितम्-कृतम् / तत्-बुद्धिविषयीभूतम् / भक्ष्यम्-भोजनीयं वस्तु / गृह्णन्तिउपयुज्यते, उपाददत इति यावत् / यत्-यस्मात् / अचिरम्-शीघ्रम् / समाधिःएकतानतापन्नं ध्यानम् / प्रभवति-समुत्पद्यते / ततः तस्माद्ध तोः' मितरूक्षाऽऽगमविहितपथ्याऽहारोपयोगादेवेति यावत् / अन्तः-आभ्यन्तरम् / कामक्रोधादिक मिति यावत् / अरिनिकरम्-शत्रुसमूहम् / कामम्-पर्याप्तं यथास्यात्तथा। निघ्नन्ति-समूलका कषन्ति समुन्मूलयन्तीति यावत् / प्रवरवशिनश्चारुचरितान् तान् आचार्यान् स्तुवे / / 34 // कचानां संस्कारो वपुषि च2 विभषा-विरचनं, लघु-स्नानाभ्यङ्गी तनुमतनुतापां जनयतः / 1- विकृतिमिति पाठा० / 2- न इति पाठा० / P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ पञ्च-परमेष्ठि-गुणमालायाम् /19 इति ज्ञात्वा काये किमपि नहि शोभां विदधते , स्तुवे तानाचार्यान् प्रवरवशिनश्चारुचरितान् // 35 // सौरभवत्तिः- कचानाम-केशानाम् / संस्कारः परिमार्जनम्, सुरभितलादिनातिशुश्रूषेति यावत् / तनुम् जनूम् / अतनुतापाम्-समधिकसन्तापाम् जनयतीति शेषः / वपुषि-शरीरे / च-पुनः / विभूषाविरचनम्-कटककुण्डलाद्यलङ्कारघटनम् / तनुं तथा जनयतीति शेषः / लघुस्नानाभ्यगौ-स्वल्पाभिषेकाङ्गरागौ। तनुम् , अतनुनापाम् / जन्यना-कुरुतः। इति-इदम् / ज्ञात्वा विदित्वा / काये-शरीरे / किमपि / शोभाम् छविम् / नहि-नव / विदधते-कुर्वन्ति / प्रवरवशिनस्तान् चारुपरितान् आचार्यान् स्तुवे // 35 // रुषाविष्टाः कामं ज्वलदनलसन्तप्तमनसो; भवेयुनिर्दग्धाः स्वपरहितयोर्हन्त ! हतये / विवित्वेत्थं विज्ञाः कथमपि न ये रोषकलिताः , स्तुवे तानाचार्यान् प्रवरवशिनश्चारुचरितान् / / 36 // सौरभवृत्तिः- हन्त-खेदे। रुषा-क्रोधेन / आविष्टा:-व्याप्ताः। कामम्पर्याप्तम् / ज्वलदनल - सन्तप्तमनसः-प्रज्वलदग्निसंज्वलितचेतसः। (अत एव) निर्दग्र्धाः-निःशेष-दग्धाः / स्वपरहितयो:-निज-परकल्याणयोः / हतये विनाशाय / भवेयुः-सम्पद्येरन् / इत्थम् अनेन प्रकारेण / विदिवा-ज्ञात्वा / विज्ञा:-मनीषिणः। ये-बुद्धिविषया गणीश्वराः / कथमपि-केनापि प्रकारेण / रोषकलिता:-क्रोधात्मकपायकलुपितान्तःकरणा: / न-नहि / भवन्तीति शेषः / प्रवरवाशिनश्चारुचरितान् तान् आचार्यान् स्तुवे / / 36 // .. - प्रमाद्यन्तो दात स्वजनमपि निन्दन्ति नितरा-1... मकृत्ये कृत्ये वा विजहति विशेष गुरुगुणम् / न चाहङकुर्वन्ति त्रसितमद-मायाः क्वचन ये, स्तुवे तानाचार्यान् प्रवरवशिनश्चारुचरितान् // 37 // tatatu सौरभवत्तिः- प्रमाद्यन्तः-अनवदधता, प्रमादवशवतिन इति यावत् / जना इति शेषः / दत्-अभिमानात् / स्वजनम्-निजपरिवारम्, आत्मीयकुटुम्बमिति t 1- निपुणम्-इति पाठा० 2- न वाऽकृत्ये-इति पाठा० / P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ 20 आचार्य गुणमाला यावत् / अपि-खलु / नितराम-अत्यन्तम् / निन्दन्ति-तिन स्कुर्वन्ति / वा-अथवा / कृत्ये कर्तव्ये / अकृत्ये-अकर्तव्ये / तदुभय-विषये इति यावत् / गुम्गुणम्-गुरवा-महान्तो गुणा हेयोपादेयता-प्रयोजकज्ञाना हि-यस्मात्स गुरुगुणस्तन्तथा / विशेष म्-वल. क्षण्यम् / विजहति-त्यजन्ति / कृत्याकृत्य-विवेकरहिता भवतीति यावत् / ये-बुद्धिविषयाः सूरीश्वराः। च-पुनः / त्रसितमदमाया:-त्रसिता त्रासं प्रापिता मदस्य मायाशक्तिविशेषो यस्ते तथाः / सन्त इति शेषः / न-नहि / अहङ्कुर्वन्ति-अभिमन्यन्ते, साहङ्कारा भवन्तीति यावत् / प्रवरवशिनश्चारुचरितान् तान् आचार्यान् स्तुवे / / 37 // इयं माया साक्षादसम - तमसा सद्म परमं , महामोहोन्मादान् वरितुमतिवामा प्रणयिनी / / मनो येषां तस्या विभव-निवहो न व्यथयति , स्तुवे तानाचार्यान् प्रवरवशिनश्चारुचरितान् // 38 // सौरभवृत्तिः- इयम्-प्रत्नक्षमनुभूयमाना / माया-कैतवम् / साक्षात्-प्रत्यक्षम् / असमतमसाम्-अनुपमाज्ञानान्धकाराणाम् / परमम्-कृष्टम् / सद्म-सदनम् / आश्रय इति यावत् / महामोहम्-महानतिशयितश्चासौ मोहो महामोहस्तन्तथा। कामम्-पर्याप्तम् / वरितुम्-स्वीकर्तुम् / अतिवामा-अत्यन्तं प्रतिकूला / प्रणयिनीवल्लभा। तद् पेति यावत् / येषाम्-बुद्धिविषयाणामाचार्याणाम् / मनः-अन्तःकरणम् (कर्म) तस्याः बुद्धिविषयीभूताया मायायाः। विभवनिवहः-ऐश्वर्यसमूहः / नमहि / व्यथयति-पीडयति / प्रवरवशिनश्चारुचरितान् तान् आचार्यान् स्तुवे // 38 // असौ लोभः क्षोभं दुरित-विषयं त्याजयति वै , विधत्ते संस्तोभं सुकृतकरणेऽशोभनतमम् / मुनीन्द्राणां येषां कथमपि स नान्तः प्रविशति , स्तुवे तानाचार्यान् प्रबरवशिनश्चारुचरितान् // 39 // सौरभवृत्तिः- असो-वुद्धिविषयः प्रसिद्धो वा / लोभः-लिप्सा / "लोभस्तृष्णा लिप्सा वशः स्पृहा" 3194 // इत्यभिधानचिन्तामणिः। व-निश्चयेन / दुरितविषयम्-दुरितं-पापं विषयः प्रयोजको यस्य स दुरितविषयस्तं तथा-दुरितजनितमिति यावत् / क्षोभम-विक्षोभम्, वैमनस्यमिति यावत् / त्याजयति-निवारयति, 1- महामोहं कामं जनितुमतिवामा प्रणयिनी / इति पाठान्तरम् / P.P. Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ पञ्च-परमेष्ठि-गुणमालायाम्/२१ दूरीकरोतीति यावत् / सुकृतकरणे-पुण्याचरणे / अशोभनतमम्-अतिदुष्टम् , महानर्थप्रयोजकमिति यावत् / संस्तोभम्-प्रतिरोधक म्, प्रतिवन्धक मिति यावत् / विधत्तेकुरुते, आपादयतीति यावत् / सः-लोभः / कथमपि-केनापि प्रकारेण, महताऽपि प्रयासेनेति यावत् / येषाम्-बुद्धिविषयाणाम् आचार्याणाम् / अन्तः-हृदये / न-नहि / प्रविशति-अवतरति / प्रवरवशिनश्चारुचरितान् तान् आचार्यान् स्तुवे / / 39 // सुसूक्ष्म स्थले वा त्रिविधकरणः प्राणिनिवहे , ऽतिपातं प्राणानां किमपि न हि तन्वन्ति कुहचित् / दयाया दारिद्रयं विदधति विदुर सपदि ये , स्तुवे तानाचार्यान् प्रवरवशिनश्चारुचरितान् // 40 // सौरभवत्ति - ये बुद्धिविषया आचार्याः / सुसूक्ष्मे-अत्यन्तश्लक्ष्णे. एकेन्द्रिय | इति यावत् / "सूक्ष्मं पुनः श्लर्ण च पेलवम्" // 6 // 33 / / इत्यभिधानचिन्ता मणिः / वा-अथवा / स्थूले-स्थूरे परिपुष्टाङ्गे, पञ्चेन्द्रियादाविति यावत् / प्राणिनिवहे-जीवकदम्बके / त्रिविधकरणः-त्रिविधानि त्रिप्रकाराणि च तानि करणानि मनोवाक्कायानि तैस्तथा / कुहचित्-कुत्रापि / किमपि-किञ्चिदपि / प्राणानाम्असूनाम् / "पुंसि भूम्न्यसवः प्राणाः" इत्यमरः / अतिपातम्-अपायम्, अतिक्रमणमिति यावत् / नहि-नव / तन्वन्ति-कुर्वन्ति / दयायाः-अनुकम्पायाः कृपाया इति / यावत् / दारिद्रयम्-दुर्विधत्वम्, अभावमिति यावत् / सपदि-शीघ्रम् / विदूरम् अत्यन्तविप्रकृष्टम् / विदधति-कुर्वन्ति / तान् प्रवरवशिनश्चारुचरितान् आचार्यान् / स्तुवे / / 40 // मृषा क्रोधाल्लोभाद् भयत उत हास्यादपि सकृन्न भाषन्ते सन्तो गुणिनि विलसन्तोऽत्र भवने। ऋतं' तथ्यं पथ्यं वचनविषयं ये विदधते , स्तुवे तानाचार्यान् प्रवरवशिनश्चारुचरितान् / / 4 / / MANARNIRAM सौरभवत्तिः- क्रोधात्-कोपात् / लोभात् लिप्सातः / भयतः-भीतेः / उतअथवा / "उत प्रथवितर्कयोः / समुच्चये विकल्पे च" इत्यनेकार्थः / हास्यात्हासात् / सकृत्-एकवारम् / अपि-खलु / मृषा-मिथ्या / न-नहि / भाषन्ते-ब्रुवन्ति / अत्र-अस्मिन् / भुवने-लोके / गुणिनि-गुणशालिनि / विलसन्तः-शोभमानाः / सन्तःसज्जनाः / ये-बुद्धिविषयाः / वचनविषयम्-वाणीसम्बन्धि / ऋतम्-इयति गच्छति / 11- सदा-इति पाठा० / . P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ २२/आचार्य गुणमाला 42 / / 3 . जन:-प्रत्ययमति ऋतम् तत्तथा / तथ्यम्-तथा साध्विति तथ्यम्, तत्तथा / पथ्यम् पथो मार्गादनपेतं पथ्यम्, तत्तथा / विदधते-कुर्वन्ति / प्रवरवशिनश्चारुचरितान् तार आचार्यान् स्तुवे // 41 // चतुर्भदै भिन्न प्रथितमिह शास्त्रे प्रशमिनामधोशा येऽदत्तं सुलभमपि नेच्छन्ति किमपि। स्वयं सर्वा सम्पद् भवति यदधीना परवशा , स्तुवे तानाचार्यान् प्रवरवशिनश्चारुचरितान् / / 42 / / सौरभवृत्तिः- प्रशमिनाम्-प्रशमः प्रकृष्टः शमोऽस्त्येषामिति प्रशमिन मुनयस्तेषान्तथा / अधीशाः-स्वामिनः / ये-बुद्धिविषयाः आचार्य प्रवराः। इह अस्मिन् लोके इति यावत् / शास्त्रे-जिनागमे / चतुर्भेदैभिन्न-प्रथितम् प्रकार चतुष्ट येन पृथक्तया प्रमिद्धम् / अदत्तम् अनर्पितम् / सुलभम्-सुखेन लाधु योग्यम् / अपि खलु / किमपि-किञ्चित् / वस्त्विति-शेपः / न-नहि / इच्छन्ति-अभिलषन्ति / सवा समस्ता / सम्पत्-कुप्याकुप्याणिमादिसम्पत्तिः। परवशा-परतन्त्रा। सतीसि शेषः स्वयम्-आत्मनैव / यदधीना-यदायत्ता / भवति-जायते / प्रवरवशिनचारुचरिता तान् आचार्यान् स्तुवे // 42 // स्मरं मार मारं विदधति न ये ऽब्रह्मकलुषं , तिरश्चीनं हीनं दिविजमथ मानुष्यकमलम् / परब्रह्मासीनाः पथि परपदे लीन मनसः , स्तुवे तानाचार्यान प्रवरवशिनश्चारुचरिताम् // 43 // सौरभवृत्तिः-- परब्रह्मासीना:-पर मुत्कृष्टं च-तद्ब्रह्म-परब्रह्म, सत्रासीना एतदाहित-चेतसः परमात्मध्यानारूढा इति यावत् / परपदे-पर मुत्तमं, पदमास्प: यस्मिंस्तस्मिंस्तथा / पथि-मागें / मोक्षमार्गे इति यावत् / लोनमनस:-लीनं निमग्न मनोऽन्तःकरणं येषां ते तथा / ये बुद्धिविषयाः सूरीश्वराः। स्मरम्"मदनम् / मार मारम्, निहत्य, स्ववशीकृत्येति-यावत् / हीन म्-अपकृष्टम् / अलम्-सुन्दरम् तिरश्चीनम्-पशुपश्वादिसम्बन्धजनितम् / दिविजम्-देवाङ्गनादिसम्पर्कस मुद्भूतम् अथ समुच्चये / मानुष्यकम्-मानवसम्बन्धि / कलुषम्-वरस्यावहम् / अब्रह्म-असंर मम् / न-नहि / विदधति-कुर्वन्ति / प्रवरवशिनश्चारुचरितान् तान् आचार्या स्तुवे / / 43 // जना मच्छी धित्वा परवशतया हन्त हतका , भजन्ते सन्तापं परमतनुताप प्रतिपलम् / P.P. Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ पञ्च-परमेष्ठि-गुणमालायाम्/२३ इति ज्ञात्वा सुज्ञाः किमपि परिगृह्णन्ति न च ये , स्तुवे तानाचार्यान् प्रवरवशिनश्चारुचरितान् // 44 / / सौरभवत्तिः - हतका:-लोभादिसमाकृष्टतया-विन्नाटा: / जनाः-साधारणमनुजाः / परवशतया-पराधीनतया / मू म्-मोहम् / श्रित्वा-समासेव्य / प्रतिपलम्-पतिक्षणम् / परमतनुतापम्-परमो महान् तनुतापः शरीरज्वलनं यस्मिन् स परमतनुतापस्तन्तथा / सन्तापम् संज्वरम् / “सन्तापः संज्वरः समौ"-इत्यमरः / हन्त ! खेदार्थवमव्ययम् / इति पूर्वोक्तम् / ज्ञात्वा-विज्ञाय / ये-बुद्धिविषया: / सुज्ञाः-सृष्ठुजानन्ति पदार्थतत्त्वमिति तथा / विमपि-अशनीयं पेयं कुप्यमकुप्यं वा किञ्चित् / न च-नहि / परिगृह्णन्ति-आददति / प्रवरवशिनः चारचरितान् तान् आचार्यान् स्तुवे इति निगदितार्थः / / 44 / / गृहीत्वा सद्भावं जिनवरवचोऽधीत्य विधिना , विशुद्धार्थान् भव्यान् समवगमयन्त्यश्रममहो / शुचिज्ञानाचारे नियतमतयो ये श्रुतधना:, स्तुवे तानाचार्यान् प्रवरवशिनश्चारुचरितान् // 45 // सौरभवत्तिः - शुचिज्ञानाचारे-विशुद्धज्ञानोपार्जन-व्यवसाये / नियतमतयःदृढ सङ्कल्पाः / श्रुतधनाः-श्रुतानि शास्त्राणि एव धनानि विभवा येपान्ते तथा / येबुद्धिविषयाः-आचार्याः / सद्भावम्-सन् शोभनश्चासौ भावो भावना सद्भावस्तन्तथा गृहीत्वा-आदाय, चमत्कारिणमाशयं मनसि कृत्येति यावत् / विधिना शास्त्रोक्तप्रकारेण / जिनवरवचः-त्रिपदीसमुद्भूतकल्पसूत्राद्यागमम् / अधीत्य-पठित्वा। अश्रमम्-अनायासं यथा स्यात्तथा / भव्यान्-मोक्षगमनयोग्य-भविकजीवान् / विशुद्धा न्-विशुद्धा मोक्षोपयोगित्वेन दोषरहिताश्च तेऽर्था विषया अभिधेयाः, वस्तुनिप्रयोजनानि वा विशुद्धार्थास्तांस्तथा / "अर्थो विपयार्थनयोर्धन कारणवस्तुपु / अभि धेये च शब्दानां निवृत्तौ च प्रयोजने" इति मेदिनी। समवगमयन्ति-अवबोधयन्ति / = अहो-आश्चर्ये / प्रवरवशिनश्चारुचरितान् तान् आचार्यान् स्तुवे-इत्युक्तार्थः / / 45 / / प्रकारैरष्टाभिनियतमिह ये दर्शनचणा, वपन्ते सद्बोधि भविकजनकेदार, निचये / यतोऽर्हत्साम्राज्यं जयति जगति ख्यातमहिम , स्तुवे तानाचार्यान् प्रवरवशिनश्चारुचरितान् / / 46 // सौरभवत्तिः- दर्शनचणाः-दर्शनेन रत्नत्रितयमध्यमेन ज्ञानेन वा वित्तास्तथा / "तेन वित्ते चञ्चुचणी" 7 // 1 // 175 // इत्यनेन चणः प्रत्ययः / ये-बुद्धि P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ २६/आचार्यगुणमाला सौरभवत्तिः - इह-अस्मिन् / अवनितले-भूतले। अवद्यत्यागेन-ग_परिवर्जनेन / अनवद्यमिति यावत् / "निकृष्टमणकं गोमवा" 6178 // इत्यभिधानचिन्तामणिः। अमितजनसमुल्लासि-अपरिमितलोकमानसोल्लास दम् / मितम्परिमितम् / सत्यम्-तथ्यम् / अपि-खलु / प्रियप्राय म्-बाहुल्येनाभिमतम् / “हित मनोहारि च दुर्लभं वचः" इत्युक्त्या प्रायपदमित्यनुसन्धेयम् / वचनम्-३चः / वदन्तः-निगदन्तः / ये-बुद्धिविषयाः / वाचंयमवराः-वाचं यच्छन्ति-नियमयन्तीति वाचंयमाः श्रमणास्ते च ते वराः श्रेष्ठास्तथा / भाषासमितिम्-दधाना: धारयन्तः / विराजन्त इति शेषः / प्रवरवशिनश्चारुचरितान् तान् आचार्यान् स्तुवे इति निगदितार्थः / / 51 / / . . . द्विचत्वारिंशद्गोचर - चरणदोषविरहितं, विशुद्ध भिक्षाया अशनमखमादाय समिती / तृतीयस्यां येषां विलसति मनो निजित रसं , स्तुवे तानाचार्यान् प्रवरवशिनश्चारुचरितान् / / 52 / / सौरभवत्ति:-द्विचत्वारिंशद् गोचरचरणदीप:-द्वाचत्वारिंशत्संख्याक गोचर गतदूपणः / विरहितम्-परित्यक्तम् / (अत एव) विशुद्धम्-सुपवित्रम् / भिक्षाय' मुखम् / अन्नजलादिकम् / आदाय-गृहीत्वा / तृतीयस्याम्-तृतीयायाम् / समित अशनएषणाख्यायाम् / स्थितानामिति शेषः / येषाम्-बुद्धिविपचाणामाचार्याणाम् निजितरसम् / निजितो रमो विस्वादो येन तत्तथा।"रमः स्वादे जले वीर्य शृङ् रादौ विषे द्रवे" / इत्यनेकार्थः / मनः-अन्तःकरणम् / विलसति-शोभते / प्रवरशिनश्चारुचरितान् तान् आचार्यान् स्तुवे / / 52 / / मनोयोगं दत्त्वा विमलविधिना वीक्ष्य विशदं, समादानक्षेगावुपकरणमुख्यस्य - ' दधते / तुरीयां ये विज्ञाः समितिमिति रक्षन्ति नितरां , स्तुवे तानाचार्यान् प्रवरवशिनश्चारुचरितान् / / 53 // सौरभवत्तिः- मनोयोगं दत्त्वा-अन्तःकरणेन विचार्य / विमलविधि विमलो-निर्मलश्चासा विधिः प्रकारो विमलविधिस्तेन तथा। विशद म्-समुज्ड यथा स्यातथा / वीक्ष्य-समवलोक्य / उपकरण-मुख्यस्य-वस्त्रपात्र छुपकरणस समादानक्षेपो-ग्रहणत्यागौ / दधते-धारयन्ति / वस्त्रादिषु यदेव यावदेव सप्रय तदेव तावदेव गृह णन्ति त्यजन्ति पुनरन्य दितिभावः / इति इत्थम् / ये-बुद्धिवि आचार्याः / तुरीयाम्-चतुर्थाम् / समितिम् / नितराम्-अत्यन्तम् / रक्षन्ति-- P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ पञ्च-परमेष्ठि-गुणमालायाम् 27 यन्नि / प्रवरवशिनश्चारुचरितान् तान् आचार्यान् स्तुवे इति चतुर्थपादान्वयोऽवगतार्थः / / 53 // मलं मत्रं चान्यत् किमपि सविवेकेन मनसा , विमञ्चन्ति स्थाने विविध-विधजीवविरहिते। अहो ! ये रक्षन्ति प्रकट - लसदुत्सर्गसमिति , स्तुवे तानाचार्यान् प्रवरवशिनश्चारुचरितान् // 54 // सौरभवृत्तिः- मलम्-पुरीपम् / मूत्रम्-प्रनावम् / च-पुनः / अन्यत्अपरम् / किमपि-किञ्चिदपि / वस्त्विति शेषः। सविवेके न-विवेककलितेन / मनसा-चेतसा / विवेकमाधायेति-पदद्वयस्यार्थः / विविधविधजीवः-अनेकप्रकारप्राणिभिः / विरहिते-शून्ये / यत्र कोऽपि जीवो न तिष्ठतीति यावत्, तादृशे इति भावः / स्थाने-भूमौ / विमुञ्चन्ति-त्यजन्ति / अहो! -आश्चर्य। ये-बुद्धिविषयाआचार्याः / प्रकट-ल सदुत्सर्ग समिति म्-प्रकटं लसन्ती या उत्सर्गसमितिस्तां तथा, रक्षन्ति-पालयन्ति / प्रवरवशिनरचारुचरितान् तान् आचार्यान् स्तुवे इत्यवगतार्थः // 54 // मनोमीनो येषां प्रथितविभवो वौत-वजिनो , दिकल्पानां जाले पतति न पराभूतिभवने / मनोगुप्त्या गुप्तो विलसति समाधौ जलनिधौ , स्तुवे तानाचार्यान् प्रवरवशिनश्चारुचरितान् // 55 // ___ सौरभवृत्तिः-प्रथितविभवः-प्रथितः प्रसिद्धो विभव ऐश्वर्य यस्य स तथा / "विभवो रे मोक्षश्वर्य" इति मेदिनी / वीत वृजिनः-वीतं विशेषेणेतं गतं वृजिनं पापं यस्मात्-स तथा / येषाम् -बुद्धिविषयाणामाचार्याणाम् / मनोमोनः-मनोऽन्तः करणमेव मानो मत्स्यन्तथा। पराभूतिभवने-पराभूतेः पराभवस्य भवनं सदनम्, समुत्पादकमिति यावत् पराभूतिभवनन्तस्मात्तथा / विकल्पानाम्-सन्दिग्धविचारणानाम् / जाले-आनाये / “जालं तु गवाक्षे क्षारके गणे / दम्मानाययोश्च" इत्यनेकार्थः / न-नहि / पतति-निपतति / (किन्तु) मनोगुप्त्या प्रसिद्धया। समार्धाजलनिधी समाधिरूपसमुद्रे गुप्तः तिरोहितः / विलसति-शोभतेत राम् / प्रवरवशिनश्चारुचरितान् तान् आचार्यान् स्तुवे इति व्याख्यातमेव चतुर्थपाद-वाक्यमवसेयम् / रूपकालङ्कारः / / 55 / / ययायोगं संज्ञामिह हि परिहायाक्षरचणाः, ... समालम्बन्ते ये विमलवचनं मौनमयवा / / P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ २८/उपाध्याय-गुणमाला वचोगुप्ति नित्यं सविधि परिरक्षन्ति सुधियः , स्तुवे तानाचार्यान् प्रवरवशिनश्चारुचरितान् // 56 // सौरभवृत्तिः- अक्षरचणा:-कुशलाक्षराः / ये-बुद्धिविषया आचार्यवराः / यथायोगम्-योगानुसारम् / संज्ञाम्-आहारादिसंज्ञाम् / परिहाय-सन्त्यज्य / इहलोके / विमलवचनम्-सर्वप्राणिहितं विशुद्ध वचः / अथवा / मौनम्-वाचंयमत्वम् / समालम्बन्ते-समाश्रयन्ति / (अथ च ये) सुधियः-मनीषिणः / नित्यम्-सततम् / सविधि-यथाविधानम् / वचोगुप्तिम्-आर्हतप्रसिद्धाम् / परिरक्षन्ति-सर्वतोभावेन पालयन्ति / प्रवरवशिनश्चारुचरितान् तान् आचार्यान् स्तुवे इति व्याख्यातं द्रष्टव्य तुरीयपादवाक्यम् // 56 // प्रसङ्ग क्रूरस्यातुलितमुपसर्गस्य पतिते , प्रथन्ते ये ध्यानं वपुरथ समुत्सृज्य रुचिरम् / तन गुप्तिर्येषामभिमतफला कल्पलतिका , स्तुवे तानाचार्यान् प्रवरवशिनश्चारुचरितान् / / 57 // सौरभवत्तिः- अतुलितम्-तुलनातीतं यथास्यात्तथा। ऋरस्य-नृशंसस्य तत्सम्बन्धि न इति यावत्.। उपसर्गस्य प्रसङ्गे-अवसरे / पतिते-सम्प्राप्ते। सतीति शेषः / ये वुद्धिविषया आचार्याः / वपुः समुत्सृज्य-कायोत्सगंमाधाय / अथ-अनन्त रम्। रुचिरम्-मनोहरम् / ध्यानम्-एकाग्रतया शुक्लादिध्यानम् / प्रथन्ते-विस्तारयन्ति येषाम्-बुद्धिविषयाणामाचार्याणाम् / तनूगुप्तिः-कायगुप्तिः। अभिमतफला-अभिमत मभिलाषास्पदं फलं यस्याः सा तथा / अभिमतफलदायिनीति यावत् / कल्पल तिका कल्पलतारूपा। अस्तीति शेषः / प्रवरवशिनश्चारुचरितान् तान् आचार्यान स्तुवे / / 57 // अथोपाध्याय-गुणमाला श्रुतस्कन्धों यत्राध्ययनगणनावाचकगुणा , नवद्वी राजन्ते दशशतपदान्यागमवरै / तदाचारानं ये समभिदधत बाचन-विधावुपाध्यायान् वन्दे विनयवशिताँस्तानभिमतान् // 58 // P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ पञ्च-परमेष्ठि-गुणमालायाम् /29 सौरभवृत्तिः- यत्र-बुद्धिविषयीभूते आचारागे / आगमवरे-आगमश्रेष्ठे / श्रुतस्कन्धी-श्रुतस्कन्धद्वयम् / यत्र पञ्चविंशत्यध्ययनानि, अष्टादशसहस्र-पदानि च सन्ति / अध्ययन-गणना-अध्ययनसंख्या अध्ययनानीति यात् / वाचकगुणा:-वाचकस्योपाध्यायस्य गुणास्तथा। नवद्विः-दशशतपदानि-अष्टादश-सहस्रपदानि / आगमवरे-श्रुतश्रेष्ठे, आचाराने / गजन्ते-शोभन्ते / तद्-आचाराङ्गं / ये-उपाध्यायाः / वाचनविधौ-वाचनाया विधौ-विधाने / समभिदधते-कथयन्ति / तान्-विनयेन, वशिनान्-वशङ्गतान् / अभिमतान्-स्वेष्टान् / उपाध्यायान्-वाचकान् / वन्दे-प्रणमामि / 58 // श्रुतस्कन्धाभ्यां यद् विलसति विशिष्टाध्ययनकस्त्रयोविंशत्याऽपि द्विगुणपदसंख्यः प्रथमतः / द्वितीयाङ्गं तद् वै मधुरवचसा गीतमचिरादुपाध्यायान् वन्दे विनयवशितांस्तानभिमतान् // 59 // सौरभवत्तिः- यद्-द्वितीयाङ्ग। श्रुतस्कन्धाभ्यां-आगमस्थ स्कन्धाभ्यां ! प्रयोविंशत्या विशिष्टाध्ययनकैः / त्रयोविंशतिसंख्य कविशिष्ट रध्ययनस्तथा। प्रथमतःपूर्वापेक्षया / द्विगुणितसंख्यः-पत्रिशत्सहस्रसंख्यकः / पदैरपि-यथा स्यात् तथा। विलसति-शोभते / तद् द्वितीयाङ्ग-सूत्रकृताङ्ग / यःवाचकप्रवराः / मधुरवचसासुमधुरर्वचोभिः / गीतम्-श्रावितम्, अस्तीति / अचिरात्-तत्कालं / तान्-प्रोक्तगुणगणलसितान् / उपाध्यायान्-वाचक-प्रवरान् / विनय-वशितान्-दिनयेन वशीभूतान् / अभिमतान्-ममेष्टरूपान् / वन्दे-प्रणमामीति // 59 // गहीत्वाऽऽद्यां संख्यां दशपरिमितायां बहुविधाः, पदार्याः स्थाप्यन्तेऽध्ययनदशतो यत्र समये / नयन्त्येतत् सूत्रं सविधि विशदं ये 'मुनिवरानुपाध्यायान् वन्दे विनयवशितांस्तानभिमतान् / / 60 // सौरभवत्तिः- अध्ययनदशतः-दशभ्योऽध्ययनेभ्यः / आद्यां प्रारम्भिको / संख्यां-गणनां / गृहीत्वा-नीत्वा / दशपरिमितायां-दशसंख्यां यावत्, एकतो दशपर्यन्तं / बहुविधा:-अनेके / पदार्थाः-विषयाः। स्थाप्यन्ते-विहिताः सन्तीति / एतत्स्थानाङ्ग सूत्रं / सविधि-विधिपूर्वकं / विशदं स्पष्टरीत्या / ये-वाचकाः। मुनिवरान् ग्राहयन्ति-ददति / तान्: प्रोक्तगुणलसितान् विनयवशितान् उपाध्यायान् अभिमतान् वन्दे / इति पूर्वनिगदितमेव / / 60 / / .... ... P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ __३०/उपाध्याय-गुणमाला शतं संख्या यावद विविध-समवायो विजयते , पदानां स्थानाङ्गाद् द्विगुणिततया यत्र गणितम् / तदङ्गं तुर्यं यद्वद्वदनकमले भृङ्गतितरामुपाध्यायान् वन्दे विनयवशितांस्तानभिमतान् // 6 // सौरभवृत्तिः- शतं संख्या:-शतमिताः / संख्या:-गणनाः / यावत् / विविधसमवायो-नकेषां पदार्थानाम् / समवायो-समुदायो / विजयते-जयं प्राप्नोति / तथा / यत्र-यस्मिन् / पदानां संख्या-पद संख्या / स्थानाङ्गात्-तन्नामक-सूत्रापेक्षया / द्विगुणिततया-द्विगुणिता / चतुश्चत्वारिंशत्सहस्रोत्तरंकलक्षमिता पदानां संख्या विद्यत इति / तच्चतुर्थमङ्ग तुर्य-चतुर्थम् / 'समवायाङ्ग'। येपा-वाचकवराणां / वदन-कमले-मुखारविन्दे / भृङ्गतितराम्-अतिशयेन भृङ्गमिवाचरति / तानभिमतान् विनयेन वशङ्गतानुपाध्यायान् वन्दे, इति सुलभोऽर्थः // 61 // अनन्तैरथैर्यत सुनय-गम-भः परिगतं , शतानां चत्वारिंशदतिविमला यत्र घटना / प्रथन्तेऽङ्गं तद् ये मुनिवर-समूहे भगवतीमुपाध्यायान् वन्दे विनयवशितांस्तानभिमतान् // 62 / / सौरभवत्तिः- यत्-अङ्ग / अनन्तः-अगणितैः / अर्थः पदार्थः / सुनय-गमभङ्गः-नयः, गम भङ्गश्च, परिगतं-युक्तमस्ति / यत्र-यस्मिन् अङ्ग विशेषे / शतानां चत्वारिंशद्-चत्वारिंशत् संख्यक-शतकानां / अतिविमला-परम निर्मला / घटनारचना / विद्यते, तद् भगवतीनाम्ना प्रथितमङ्ग। ये-वाचकवराः / मुनिवरसमुहे श्रेष्ठमुनीनां / समूहे-समवाये / प्रथन्ते-विस्तारयन्ति / तान् विनयवरितान् अभिमतान् उपाध्यायान् वन्दे / इत्युक्त एवार्थः / / 62 / / श्रुतस्कन्धौ यत्र प्रविलसत ' आद्ये नवदश , कथा अन्त्ये धा अपि दशमितास्तास्ततगुणाः। अहो! ज्ञाताङ्गं ये विनयिनि विवृण्वन्ति विबुधा , उपाध्यायान् वन्दे विनयवशितांस्तानभिमतान् // 63 // सौरभवृत्तिः- यत्र-यस्मिन् / द्वौ। श्रुतस्कन्धौ / प्रविलसतः-विराजेते / तत्र आद्य-प्रथमे / नवदश-एकोनविंशतिमिताः / कथाः सन्ति / द्वितीये चान्त्येश्रुतस्कन्धे / दशमिता:-दशसयाकाः / कथा राजन्ते / ता:-कथाः / ततगुणाःविस्तृतगुणमण्डिताः / धाः धर्मपोषिकाश्च / विद्यन्ते / तत्-'ज्ञाताधर्म-कथाङ्ग, P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ पञ्च-परमेष्ठि-गुणमालायाम्/३१ सूत्रमिति यावत् / ये-वाचकप्रवराः / विनयिनि-शिष्ये। शिष्यजनसमक्षं / विवृण्वनि-विवरण-पूर्वकं वोधयन्ति / तानभिमतान् विनय-वशितानुपाध्यायान् वन्दे / इति / / 63 // श्रुतस्कन्धे यत्राध्ययनदशके देश-विरतिश्रितानन्दाद्योपासकदशक-सम्यगव्रतकथा / तदङ्ग षष्ठाग्नं समभिदधते ये मुनिवरानुपाध्यायान् वन्दे विनयवशितांस्तानभिमतान् / / 64 // सौरभवृत्तिः- यत्र-दशाध्ययनवति श्रुतस्कन्धे-आगमे / देश-विरतिश्रितानन्दामोरासक-दशक-सम्यग्-व्रत कया-देशविरति-स्वीकृतानाम् आनन्दादि-दशानामुपासकानाम् / सम्यक्त्वपूर्वकानां व्रतानां कथा वर्तते। तत् सप्तमं / 'उपासकदशाङ्ग' नामकमङ्गं / ये-गचक-प्रवराः। मुनिवरान्-मुनिप्रवरान् / सम्यक्तया वोधयन्ति / तान् विनयवशितान् अभिमतानुपाध्यायानहं वन्दे / इति / / 64 // श्रुतस्कन्धो यत्राध्ययन-नवती रम्यरचना, विभान्त्यष्टौ वर्गा लसति पदनन्तार्थसदनम् / दिशन्त्यङ्गं शिष्यांस्तदतिविमलं येऽष्टममहो, उपाध्यायान् वन्दे विनयवशितांस्तानभिमतात् // 65 // सौरभवृत्तिः- यत्र-यस्मिन् / एकः / श्रुतस्कन्धो विद्यते / तथा यत्र अध्ययनानां नवतिः-नवतिसंख्यामितान्यध्ययनानि / विद्यन्ते / येषां / रम्य-रचना:शोभना रचनाः सन्ति / किञ्च यत्राष्टौ वर्गा:-अष्टसंख्यका वर्गाः। विभान्तिशोभन्ते / यच्च-सत्रं / अनन्तार्थसादनं सूबहनामनां। सदनं-मन्दिरं / विद्यते / अतिविमलं-परमनिर्मलं / तादृशं / अष्टममग-अन्तगडदशाङ्गाभिधमळ / ये-वाचकप्रवराः। शिष्यान्-मुनीन् / दिशन्ति-उपदिशन्ति, सम्यगववोधयन्ति / तान् विनयवशितानभिमतानुपाध्यायानहं वन्दे / इति // 65 // .. श्रुतस्कन्धे यस्मिन् स्फुरति परमानुत्तरगतात्पनां वार्ता वर्गत्रयगुणगुणाकाध्ययनजा / अहो! ये व्याख्यान्ति प्रवरनवमाडं विनयिनामुपाध्यायान् वन्दे विनयवशितांस्तानभिमतान् / / 66 / / सौरभवृत्ति:- एकQतस्कन्धरूपिणि यस्मिन्-आगमे / परमानुत्तरगता P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ ३२/उपाध्याय-गुणमाला मनां-श्रेष्ठानुतर-विमानं गतानामात्मनां / वार्ता-कथा / वर्गत्रय-गुण-गुणाङ्काय यनजा-त्रिषु वर्गषु, प्रयस्त्रिंशदध्ययनेषु स्फुरति-कथिताऽस्ति / तत्-प्रवर-नवमानअनत्तरोपपातिक-नामकमगं / ये-वाचकप्रवराः / विनयिनां-शिष्याणां कृते / व्याख्यान्ति-कथयन्ति / तान् विनयवशितानभिमतानुपाध्यायानहं वन्दे-प्रणमामि / इति / / 66 / दशाङ्के प्रश्नव्याकरण इह धर्माध्ययनके , श्रुतस्कन्धे यस्मिन् दशविध-गभीरार्थ-घटना / तदङ्गं तेऽप्यन्तः-करणविषयं लान्ति रभसा दुपाध्यायान् वन्दे विनयवशितांस्तानभिमतान् / / 67 / / सौरभवत्तिः- इह-यस्मिन् / दशाङ्के-दशसंल्य के / प्रश्नव्याकरण-नाम्नि / एकयुतस्कन्ध-शालिनि / दशविध-गभीरार्थघटना-दशप्रकारकाणां गभीरार्थानां / घटना-योजना / वतंत इति शेषः। तद्-अङ्ग दशमं प्रश्नव्याकरणाभिध / येवाचकप्रवराः। रमसात्-सत्वरं / सानन्द-सहर्ष / अन्तःकरणदिषष-हृद्गतं / लान्तिकानयन्ति, हृदि स्थापयन्ति / तान् विनयवशितानिति पूर्ववत् // 6 // श्रतस्कन्चो यत्राध्ययन-गणना विशं तिरयो, पानां सा शन्यत्रय नयन-वहत्य विध-गजभू. / विपाकाङ्गं साधूंस्तदपि वदितुं ये व्यवसिता, उपाध्यायान वन्दे विनयवशितांस्तानभिमतान् / / 68 // सौरभवृत्तिः- यत्र-यस्मिन् / श्रुतस्कन्धौ-द्वी श्रुतस्कन्धौ स्त इति / यत्र व अध्यनगणना-अध्ययन संख्या विंशतिः-विंशतिमिता विद्यते / अयो-अथ च पदानां मनपाठाना / मृन्यत्रयनयन-वल्यधिगजभू.द्वात्रिशत् सहन-चतुरसीतिलोत्तरव नोटिमिका-विद्यते / तदेकादशसंख्यकं / विपाकाग-विपाकसूत्राङ्ग। तदपि ताहानपि / साधुन्-साधुजनान् / वदितुं-वादितुं / कथयितुं ये-उपाध्याय प्रवराः / व्य निजा-अनुरजाः सन्ति, तान् विनयवशितानभिमतानुपाध्यायान् वन्द इति / / 68 / अहो ! यस्मिन् चम्पा-समवसरणं वणितमलं , यदाद्योङ्गोपाझं जयति जगतामेक-हितदम् / तदात्यान्ति प्रज्ञाविधिवदतुलं ये मनिजना नुपाध्यायान् वन्दे विनयवशितांस्तानभिमतान् / / 69 // सौरभवृत्तिः - अहो आश्चर्यम् / यस्मिन्-आद्य उपाङ्गे, उबवाइयनामव P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ पञ्च-परमेष्ठि-गुणमालायाम् ||33 चम्पा-समवरणं-चम्पानगयाँ सम्पन्नं समवसरणं / जगतां-जगज्जनानाम् / एकहितदम्-सर्वात्मना हितप्रदम् / यद्-वक्ष्यमाणं / आद्योपाङ्ग-प्रथममुपाङ्गं / जयति सर्वोत्कण वर्तते / तद्-उपाङ्गं / प्रज्ञाविधिवद्-मनीषाविध्यनुसारं / ये-उपाध्यायप्रवरा: / मुग्निजनान्-साधुगणान् / अतुलं-समग्रं / आख्यान्ति-कथयन्ति / तान्उपाध्यायान् विनयवशितान् अभिमतान् वन्द इति / / 69 // : प्रदेशि-प्रश्नानां प्रतिवचनकं केशि-कथितं, द्वितीयस्मिन् यस्मिन् त्रिदशवरसूर्याभनटनम् / उपाङ्गं तद् येषां वदन - सदने नत्यतितरामुपाध्यायान् वन्दे विनयवशितांस्तानभिमतान् // 70 / / . सौरभवृत्तिः- यस्मिन्-यत्र / प्रदेशि-प्रश्नानां-प्रदेशिनामकेन भूपतिना विहितानां प्रश्नानां / केशि-कथितं-के शिगणधरभगवदभिरुत्तराणि-यस्मिन्-'रायपसेणिय'-नामके / द्वितीयस्मिन्-द्वितीयोपाङ्गे / त्रिदश-वर-सूर्याभ-नटनं-त्रिदशो देवः स एव वरः श्रेष्ठस्तेन सू भदेवाभिधेन विहितं नटनं तत्तथा / वर्णितमस्तीति / तादृशमुपाङ्ग / येषां-उपाध्याय-प्रवराणां। वदन-सदने-मुखमेव सदनं तस्मिन् / नृत्य तितराम्-अतिशयेन विराजते / तदुपाङ्गं येषां मुखे विलसति तान् विनयवशितानभिमतानुपाध्यायान् वन्दे / इति / / 70 / / यतो जीवाजीवाभिगममुपयन्त्यान्तरधना, यतो ज्ञप्तिनन्दीश्वर-विजय-देवादि-विषया / तृतीयोपानं तद् यदुदितमुदेति स्थिरधियामुपाध्यायान् वन्दे विनयवशिताँस्तान भिमतान् // 71 // सौरभवृत्तिः- यतः-यस्मात् / आन्तरधनाः-अभ्यन्तरलक्ष्मीवन्तः / महा- पुरुषा इति यावत् / जीवाजीवाभिगम-इमे जीवा इमे अजीवा इति विषयकम् / अभिगम-ज्ञानं / उपयन्ति- प्राप्नुवन्ति / यतः-यस्माच्च / नन्दीश्वर-विजयदेवादिविषया-नन्दीश्वराभिधद्वीपस्य तथा विजयदेवप्रभृतीनां / ज्ञप्तिः-ज्ञानं / लभन्त / इति यावत् / तत्-तृतीयमुपाङ्ग 'जीवाभिगम'नामकं / यदुदितं-येषां मुखात् ज्ञातं सत् / स्थिरधियाम्-सुस्थिरमतिमतां / उदेति-जाति / यदध्ययनेन पूर्वोक्तं ज्ञानमुद्भवति / तान् विनयवशितानभिमतानुपाध्यायान् वन्दे / इति // 71 // यदर्थरत्यर्थै विशदमथ षट्त्रिंशदतुलैः, पदैः पूर्ण तूर्णं व्रजति वृजिनं यच्छ्रवणतः / P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ 34/ उपाध्याय-गुणमाला उपाङ्गं तत्तूयं विलसति यदध्यापितमहो , उपाध्यायान् वन्दे विनयवशिताँस्तानभिमतान् // 72 // सौरभवत्तिः-यत्-तुरीयमुपाङ्ग 'पन्नवणा' ऽभिधया प्रसिद्ध / अत्यर्थ - विशदं अतिशयपूर्णरर्थ-विस्तृतं विद्यतेः। अथ-किञ्च / षट्त्रिंशद्-पडुत्तर-त्रिंशत्संख्यकः / पंदैः-पदविशेषः / पूर्ण-परिपूर्णमस्ति / यच्छ्र-णतः-यस्य श्रवणात् / तूर्णंशीघ्र / वृजिनं-पापम् / व्रजति-गच्छति, नश्यतीति / तत्-पन्नवणा-नामक / तुर्य चतुर्थम् / उपाङ्ग / यद्-अध्यापितं-येषां पाठनात् / विलसति-शोभते / अहो! आश्चर्यम् / तान् अंभिमतान् विनयवशितान् उपाध्यायान् वन्दे / / 72 // विनिर्णीता यत्र धुमणि-मुखजामण्डलततिः, स्वरूपं ताराणां स्तुत-नगशर-प्राभतवरे / तुरीयाङ्गोपाङ्गं तदभिरमते यन्मुखविधा-- वुपाध्यायान् वन्दे विनयवशिताँस्तानभिमतान् / / 73 // सौरभवत्तिः- यत्र-यस्मिनु / उपाङ्गे / धुमणि-मुखजामण्डलततिः-सूर्यादि मण्डलानां विस्तारः / विनिर्णीता-विशिष्य निश्चिता, वणिता विद्यते / तथा, स्तुत नग-शर-प्राभृतवरे-स्तुते-सप्तपञ्चायत्तमे प्राभृत-श्रेष्ठे / ताराणां-तारकाणां / स्व रूप-यथोक्तं रूपं / वणितमस्तीति / तत् / तुरीयाङ्गोपाङ्ग-चतुर्थाङ्गस्य उपाङ् सूर्य प्रज्ञप्ति-नामकं / यन्मुखविधौ-येषां वदनचन्द्रे / अभिरमते-शोभते / तान-तादृश गुणोपेतान् / अभिमतान विनयवशितान् उपाध्यायान् वन्दे // 73 // चतुःषष्ट्या शक्रविहितमतिभक्त्या जिनजनुमहो यस्मिन् जम्ब-प्रथम-पर-प्रज्ञप्ति-समये / अवः षष्ठोपाङ्ग विकसति यदीयास्य-किरणा दुपाध्यायान् वन्दे विनयवशितांस्तानभिमतान् / / 74 / / सौरभवत्ति:- यस्मिन्-षष्ठ उपागे / जम्बू-प्रथम-पर-प्रज्ञप्तिसमये जम्वूप्रज्ञप्ति-नाम्त्युपाङ्गे, चतुःषष्टया-चतुःषष्टि वृत्तः / शक्रः इन्द्रः। अतिभक्त्य अतिशयभक्तिभावेन | जिनजनुर्मह -जिनेश्वराणां / जनुषः-जन्मनः। महः-उत्सव: श्रीजिनेश्वर-जन्म-महोत्सवः / विहितम्-कृतम् वर्णितमस्ति / अदः-तत् / षष्ठ पाङ्ग-जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति-नामकमङ्ग / यदीयास्य-किरणात्-येषां वदनरूप-सूर्यर किरणात् / विकसति-विकासं प्राप्नोति / तान् अभिमतान् विनयवशितान् उप ध्यायान् वन्दे / / 74 / / P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ पञ्च-परमेष्ठि-गुणमालायाम्/३५ नभः कृष्णां यस्मिन् प्रतिपदमुपादाय घटना ,. कृता घट्यादीनां गणनविशदा प्राभूतभति / विधु-प्रज्ञप्तिस्तद् यदुदितमुपाङ्गं समुदिया दुपाध्यायान् वन्दे विनयवशिताँस्तानभिमतान् / / 75 // सौरभवृत्तिः - यस्मिन् पञ्चाशत् प्राभृतयुक्ते सत्तम उपागे / नभ:कृष्णां-श्रावण-कृष्णपक्षमयीं / प्रतिपद-प्रति तिथि / उपादाय-आदाय / घट्यादीनांघटी-प्रभृतीनां / गणन-दिशदा-गणन्या विस्तृता / कृता-विहिता / तद्-विधु-प्रज्ञप्तिः चन्द्रप्रज्ञप्तिः। उपाङ्गं / यत्-यः, उदितम्-उक्तम् / समुदियात्-उदयं प्राप्नुयात् / तान् अभिमतान् विनय वशितान् उपाध्यायान् वन्दे / / 75 // कलि कृत्वा कालादिक-दश कुंमारा निरयकं, गतास्तद् वृत्तान्तं स्फुटमचकथद् यत्र भगवान् / मुखाद येषां तद् वै श्रवणमधिगत्यामृतमिता, उपाध्यायान् वन्दे विनयवशितांस्तानभिमतान् / / 76 / / सौरभवत्तिः- यत्र-यस्मिन् / उपाङ्गे / भगवान्-परमात्मा / कालादिकदश कुमारा:-'काल' प्रभृतयो दश संख्यकाः कुमाराः / कलि-व लहं / कृत्वा-विधाय / निरयकं नरकं / गताः-याताः / तद्-वृत्तान्तं-तेषां वृत्तजातं / स्फुट-यथातथम् / अचकथत्-कथितवान् / येषां-उपाध्याय प्रवराणां / मुखात्-आननात् / श्रवणम्आकर्णनं / अधिगत्य-प्राप्यः / अमृतम्-अमरत्वं। इता:-श्रितवन्तः / तान् अभिमतान् विनयवशितान् उपाध्यायान् वन्दे / / 76 // श्रिता यस्मिन् पद्मादिक-दशकुमाराः सुकृतिनः; धयित्वा: चारित्रं सूरपदमिता आयतिहिताः। अदोऽष्टाग्रोपानं मुनिषु नियतं ये व्यपदिश-- न्त्युपाध्यायान् वन्दे विनयवशिताँस्तानभिमतान्॥७७।। सौरभवत्तिः- यस्मिन्-नवम उपाङ्गे / पद्मादिक-दशसंख्यककुमारा:- पद्म-प्रभृतयो दशसंख्यकाः कुमारा: / सुकृतिनः-पुण्यशालिनः / आयतिहिताः-सौभाग्याय समुचिताः। चारित्रं-चारित्र्यं / श्रयित्वा-नीत्वा / सुरपद-स्वर्गलोकम् / इता:-प्राप्ताः / इति कथा यत्र-ता-वणिता / अदः-तत् / अष्टाग्रोपाग-नवमः मुपाङ्गं / ये-उपाध्यायप्रवराः।. मुनिषु-साधुजनेषु, स्वविनेयेषु / नियतं-सर्वदा / व्युपदिशन्ति-विशिष्टरूपेण / उपदिशन्ति / तान् अभिमतान् विनयवशितान् उपाध्यायान् वन्दे / / 77 // PatanAmmon P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ ... 36 उपाध्याय-गुणमाला... शशी सूर्यः शुक्रो बहुतनयिका पूर्ण शिवकः शिवो दत्तो माणिर्बहुबल-बलोऽणाहिय इति / उपाध्यायामप" . दुपाध्यायान् वन्दे विनयवशितांस्तानभिमतान् / / 78 / / सौरभवत्तिः- शशी-चन्द्रमाः / सूर्यः-रविः। शुत्र:-भार्गवः / बहुतन यिका-बहुपुत्रिकादेवी। पूर्ण-शिवक:-पूर्णभद्रः / शिव:-तन्नामा / दत्तः-दत्ताख्यः - माणि:-माणिभद्रः / बहुबलबल:-अतिबलशाली बलः / अणाहियः-एतन्नामकः / इति दशानां-दशसङ्ख्यकानां / दिशोपाङ्ग-समयात्-दशमोपाङ्ग-शास्त्रात् / ये-उप ध्यायप्रवराः / वृत्तान्तं-कथानकं / अभिदधति-कथयन्ति / तान अभिमतान् विनर वशितान् उपाध्यायान् वन्दे / / 78 // दश श्री-ही-लक्षमी-धृतिवरसुरा-कीर्तिमतिकाः, ... रसेला-गन्धा यत्समयसमिता गीतचरिताः / उपाङ्गं तद् येऽङ्गं श्रुतमुनिवरेभ्यः प्रवितर-.. न्त्युपाध्यायान् वन्दे विनयवशिताँस्तानभिमतान् / / 79 // सौरभवृत्तिः- श्री-ह्रो-लक्ष्मी-धृति-सुरा-कीति-मति-रसा-इलागन्धा-प्र तयो दश सङ्ख्यकाः / यत्समय-समिता:-यत्र-एकादशे पुष्पचूलिका-नामक उपाङ्गे गीत-चरिता:-गीतं चरितं यासां ताः / सन्ति / तद् अङ्ग-प्रधानम् / उपाङ्ग-एका दशसङ्ख्यकं / ये-उपाध्यायप्रवराः। श्रुतमुनिवरेभ्यः-श्रुतज्ञेभ्यो मुनिश्रेष्ठेभ्यः वितरन्ति-ददति, श्रावयन्ति / तान अभिमतान् विनयवशितान् उपाध्यायान् वन सतां द्वारावत्यां निषधमुखवर्य-प्रशमिना , कुमाराणां यत्रोल्लसति चरितं साधु भणितम् / उपाङ्गं तच्चान्त्यं प्रसरति यदीयास्य-निलया- ... दुपाध्यायान् वन्दे विनयवशितांस्तानभिमतान् // 8 // सौरभवत्तिः-द्वारावत्यां-द्वारावतीनामिकाया नगर्यां / सता-जातानां - निषधमुख-वर्यप्रशमिनां-निषधेश्वर-प्रभृतीनां सज्जनकुमाराणां / यत्र-द्वादश उपाङ् साधु-उत्तमं / भणितं-निगदितं / चरितं-कथानकं / उल्लसति-सोल्लासं. विराजते / सच्च-तद् द्वादशं च / अन्त्यं-अन्तिमम् / उपाङ्ग; ' यदीयास्य-निलयात्-येषामुपा ध्यायप्रवराणां मुख-मन्दिरात् / प्रसरति-प्रसारं प्राप्नोति / तान् अभिमता विनयवशितान उपाध्यायान् वन्दे // 80 // P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ पञ्च-परमेष्ठि-गुंणमालायाम्/३७ मतिज्ञानं सम्यक् श्रुत मवधि यस्मिन्नधिकृतं , मनःपर्यायं केवलमपि यथारूपमुदितम् / अदो नन्दीसूत्रं चरणकरणा ये प्रगुणयन्त्युपाध्यायान् बन्दे विनय शतांस्तानभिमतान् / / 81 // / सौरभवृत्तिः - यस्मिन्-नन्दीसत्र नामके सूचे / मत्तिज्ञानं / श्रुतं श्रुतज्ञानम् / अवधि-अवधिज्ञानं / सम्यक्-समीचीनतया / अधिकृतं-अधिकाररूपेण / तथा, मनःपर्यायं-मनः पर्ययज्ञानं / केवलं केवलज्ञानम् / अपि यथारूप-यथार्थरूपेण / उदितम्-णितम् अस्तीति / अदः तत् / नन्दीसूत्रं-एतन्नामकं सूत्रम् / चरणकरणा:-चरणसप्तति-करणसप्ततिधारकाः / ये-उपाध्याय-प्रवराः / प्रगुणयन्तिप्रकृष्टतया गणयन्ति / तान् अभिमतान् विनयवशितान् उपाध्यायान् वन्दे / / 81 / / चतुर्धा निक्षेपो जिनवर-विशिष्टागम-समा-- गमे हेतुर्गीतः प्रथितविभवो यत्र विशदम् / अनयोगद्वारं वदति गहनं येऽवगमयन्त्युपाध्यायान् वन्दे विनयवशितांस्तानभिमतान् // 82 // सौरभवृत्तिः- यत्र-यस्मिन्, अनुयोगद्वार-सूत्रे / जिनवर-विशिष्टागमसमागमे-जिनेश्वर-भगवभाषितानां विशिष्टागमानां सम्प्राप्तये / चतुर्धा-चतुविधः / निक्षेपः-नामस्थापना-द्रव्य-भावरूप-चतुः प्रकारको निक्षेपः / प्रथितविभवःविस्तृत-वैभवः / विशदम्-यथा स्यात् तथा। हेतुः-कारणं विद्यत इति / गीत:वर्णितः। ईदृशं तत् गहनं-गभीरं। अनुयोगद्वार-सू-एतन्नाम्ना सुप्रसिद्ध। ये. उपाध्याय-प्रवराः / अवगमयन्ति-सम्यगववोधयन्ति / तान् अभिमतान् विनयवशिलान् उपाध्यायान् वन्दे / / 82 // - . अथ-साधुगुणमाला मनो - वाक्कायर्येऽसुहनन-विरामात्मकमहाव्रतं चाद्यं धृत्वाऽभयमिह सुरक्षन्ति निपुणम् / प्रवर्तन्ते नित्यं निजनियतसाध्ये यतनया , मुनीनामेतेषां चरितममलं ही विजयते // 83 / / P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ ३८/साधुभगवद्-गुणमाला सौरभवृत्तिः-मनोवाक्कायः-मनसा, वचसा कर्मणा च तः। ये-मुनिवराः / अहनन-विरामात्मक-महाव्रतं-प्राणिहिंसा-विरति-महाव्रतं / च-तथा / आद्य-पूर्वतनं / घृत्वा-धारयित्वा / अभयं-निर्भयं / इह-अत्र / निपुणम्-यथा स्यात् तया। सुरक्षन्ति-रक्षां कुर्वन्ति / नित्यं-सदैव / यतनया-प्रयत्नपूर्वकं / निज नियतसाध्ये-स्वीयनिश्चते साध्य कर्मणि / प्रर्वतन्ते-संलग्ना भवन्ति / एतेषां मुनीनामा रु चरितं ही विजयते / इति // 83 // निमग्नाः कल्याणे महति विरमन्ति प्रथमतों, मृषावादादात्माऽऽहित-हित विलासा अवहिताः / लभन्ते सौहित्यं मनसि किल ये सत्यवचसा , मुनीनामेतेषां चरितममलं ही विजयते // 84 / / _सौरभवृत्तिः- ये-मुनिवराः। महति-सुदीर्थे। कल्याणे-श्रेयसि / निमग्नाःसंलग्नाः / सन्तः। मृषावादात्-मिथ्यावादात् / विरमन्ति-विरामं प्राप्नुवन्ति / तथा / आत्माऽहित-हितविलासा:-आत्मनि आहिता: स्थापिताः। हितदिलासाः / हितकारिणो विलासाः यस्ते-तादृशाः। अवहिताः-सावधानाः। सत्यवचसा-सत्येन वास्तविकेन, वचसा-वचनेन, मनसि-हृदये / किल-निश्चयेन / सोहित्य-सहितं / लभन्ते-प्राप्नुवन्ति एतेषां / मुनीनां-तेषां मुनिवराणां / अमलं-निर्मलं / चारितंचरित्रं / ही-वस्तुतः / विजयते-विजयं प्राप्नोति // 84 / / अमोघा मोघा वा भवतु निजयाचा तदपि ये, न दत्तं नेहन्ते कथमपि परस्वं तृणमपि / ततः सर्वा सम्पत सपदि वणते यान स्वयमहों, मुनीनामेतेषां ' चरितममलं ही विजयते // 85 // सौरभवृत्तिः- ये-मुनिवराः / निजयाच्चा-स्वकीया याचना / अमोघासफला / मोघा-निष्फला। वा। भवतु-सम्पद्यताम् / तदपि-तथापि, तृणमपिअतितुच्छमपि / वस्तु / परस्वं-परद्रव्यं / न दत्तं / कथमपि-केनापि प्रकारेण / नेहन्ते न वाञ्छन्ति / ततः-तस्मात् कारणात् / सर्बा-सकला / सम्पत्-सम्पदा, वस्तुजातं / स्वयमेव-स्वेच्छयव / सपदि-शीन / अहो !-आश्चर्यम् / यान्-मुनीन् वृणुतेप्राप्नोति / एतेषां ईदृशाणा। मुनीनां-मुनिवराणां / अमलं-निर्मलं शुद्ध। चरितचारित्रं / ही-निश्चयेन / विजयते-विजयं प्राप्नोति // 85 // रतिर्येषां शास्त्रे सततमिह जागति तरला, रतिप्राया:वामाः मनसि नः खलु स्वग्न-विषया। P.P.Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ पञ्च-परमेष्ठि-गुणमालायाम्/३९ Simpure धयित्वा मौनं ये निधुवनमघानां विदधते , मुनीनामेतेषां चरितममलं ही विजयते // 86 // सौरभवत्तिः- येषां-मुनिवराणां / शास्त्रे-आगमे / रतिः-प्रीतिः / इहसंसारे / तरला-भक्तिमती / जागति-वर्तते / विञ्च / रतिप्राया-अत्यन्तं रमणीया रतिरूपा / वामा-नारी / खलु-निश्चयेन / स्वप्न विषया-स्वप्नस्य विषयतां गताऽपि / न-नैव / ये-मुनयः। मौनं-मूकरूपतां / श्रयित्वा-श्रित्वा, अघानां-पापानां, प्रायश्चित्तानाम् / निधुवनं-समापनं / विदधते-कुर्वन्ति / एतेषां मुनीनाममलं चरितं ही विजयते / / 86 / / सदा सक्ता ग्रन्थे तदपि भुवि निर्ग्रन्थवृषभा, निधौ बाह्ये चान्तश्चतुरधिदशाङ्क परिग्रहे / न ये सम्मछन्ति प्रहतममता गीतसमता , मुनीनामेतेषां चरितममलं ही विजयते // 87 // सौरभवृत्तिः- ये-मुनिवराः / सदा-निरन्तरं / ग्रन्थे-शास्त्रे / सक्ताःसंलग्नाः / तदपि-तथापि / भुवि-भूमी। निर्ग्रन्थवृषभाः-श्रेष्ठाः निर्ग्रन्थसाधवः / गण्यन्त इति शेषः / तथा, निधौ-नवप्रकारके / बाह्य-वहिर्भूते / तथा / अन्तश्चतुरधिदशाङ्के-चतुर्दशमितान्तःस्थे / परिग्रहे-संग्रहे / येषां प्रहतममता-प्रहता-प्रणष्टा, ममता-ममत्वं अस्तीति शेषः / एवं विधाः / ये-मुनयः। न-नव / सम्मूछन्तिमोहं न प्रप्नुवन्ति / तथा ते गीत-समताः-समत्वेन प्रख्याताः सन्ति / एतेषां मुनीनाममलं चरितं ही विजयते // 87 // समासक्तं येषां हृदयमिह जीवावनविधौ , ततः सन्त्यक्तं येरशनमथ पानं निशिकृतम् / निपोतं पोयषं समयजनितं यरविरतं , मुनीनामेतेषां चरितममलं ही विजयते / / 88 // तौरभवत्तिः- येषां-मुनिवराणां / हृदयं-स्वान्तं / इह-अस्मिन् संसारे / जीवावनविधी-जीवानां प्राणिनां, अवनस्य-रक्षणस्य यो विधिविधानं, तस्मिन् प्राणिरक्षण-कर्मणि / समासक्तं-संलग्नं / ततः-तस्मात् / निशिकृतम्-रात्री क्रियमाणं / अशनं-भोजनं / अथ-किञ्च / पानं-जलपानं / सन्त्यक्तम्-परित्यक्तम् / यः-मुनिवरः / अविरतं-निरन्तरं / समयजनितं-शास्त्ररुत्पन्नं / पीयूषं-अमृतं / निपीतं-पानं विहितम् / एतेषां-ईदृशानां / तेषां / मुनीनां-साधूनां / अमल-निर्मलं / चरितं-चारित्र्यं / ही-अहो / विजयते-सर्वोत्कर्षेण जयं प्राप्नोति // 88 // TTTTI P.P.AC.Gunratnasuri M.S. . Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ 40 साधु-भगवद्-गुणमाला। गहादेनिर्माणे खनन-कृषिमख्ये कृतिविधी , क्षितेहिसां मत्वा निदधति मनो नाल्पमपि ये। सदा पृथ्वीकायं व्ययत इह रक्षन्ति रुचिरं , ' मुनीनामेतेषां 'चरितममलं ही विजयते // 89 // - सौरभवत्तिः- ये-साधुप्रवराः / गृहादेः-गृहादि-भवनानां / निर्माणे . खनन-कृषि-मुख्ये-खाते कृषिकर्मणां च मुख्ये / कृतिविधी-निर्माण विधौ। क्षिते.पृथिव्याः / हिंसा-हननं / मत्वा-मानयित्वा / गृहादिनिर्माणकार्य-कृष्यादिमुख्यकार्य च पृथ्वीकायस्य हिंसा ज्ञात्वा इह-अत्र लोके / सदा-निरन्तरं। व्ययतः-विनाशात् . पृथ्वीकार्य / रुचिरं-समुचितरूपेण यथा स्यात् तथा / रक्षन्ति-रक्षां कुर्वन्ति / एतेषा मुनीनां निर्मलं चरितं ही विजयत इति पूर्वमुक्तमेव // 89 // अपां पाने सक्ता अपि न खलु पानं विदधते; सचित्तानां तासां न पुनरभिषिञ्चन्ति करणम् / सदा संलीनत्वे वरतपसि ये प्रावृषि रता , मुनीनामेतेषां चरितममलं ही विजयते // 9 // .. सौरभवृत्तिः– ये-मुनिप्रवराः। अपां-प्कायानां / पाने-रक्षणे / सक्ताःलग्नाः / अपि / सचित्तानां-चित्तसहितानां / तेषां-जलानां / पानं-पानकर्म / न खलु-कथमपि नैव / विदधते-कुर्वन्ति / पुनः-तथा च / करणं शरीरं / न अभिषिञ्चन्ति-नवाभिषेक कुर्वन्ति / ये-मुनिगणाः / सदा-सदैव / प्रावृषि-वर्षों / संलीनत्वेसंलीनता-नामिन / वरतपसि-श्रेष्ठायां तपस्यायां / रताः-संलग्नाः। भवन्तीति / एतेषां मुनीनाममलं चरितं ही विजयत इति पूर्ववदेव / / 90 // प्रकाशं तन्वाना अपि गहमणेालनमहो, न कुर्वन्ति ज्योतिः शिशिरसहिता जाड्यरहिताः / स्फूट तेजस्कायं वतिन इह ये पान्ति परितो, मुनीनामेतेषां चरितममलं ही विजयते // 9 // - सौरभवृत्तिः- ये-साधुगणाः / प्रकाशं-ज्योतिः / तावानाः-विस्तारयातः . अपि / गृहमणे:-दीपस्य / ज्वालनं-प्रज्वालनं, अहो आश्चर्य / न कुर्वन्ति-नैव विदधति / जाडयरहिताः-ज्ञानयुक्ताः / ये-मुनयः / शिशिर सहिताः शत्ययुक्ता अपि / ज्योतिः-अग्निं / न ज्वालयन्ति / शीत निवारणायाग्निं प्रज्वाल्य न प्रतपन्तीति / किन्च ये-मुनिप्रवराः / वतिन.-व्रतधराः / स्फुट-स्पष्ट रूपेण / परितः-सर्वतः / तेजस्कायं / पान्ति-रक्षन्ति / एतेषां मुनीनां निर्मलं चरितं ही विजयत इति पूर्ववदव P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ - साधु भगवद्-गुणमा ला/४१ मनो जेतं कामं पवनजयिनः पावनपथा, न ये फूत्कुर्वन्ति व्यजन-भजनाच्चापि विरताः। यथा वायोः कायं नयति कुशलं यद्गतिरलं, मुनीनामेतेषां चरितममलं ही विजयते // 12 // सौरभवृत्तिः- ये साधुगणाः / पावनपथा:-पवित्रमार्गाः। पवनजयिनःवायु-विजयिनः / भूत्वा / काम-यथोचितं / मनो-मानसं / जेतुं-विजेतुं / न फूत्कुर्वन्ति-फूत्कारं-वह्निज्वालनाय मुखाद् वायुक्षेपणं न विदधति / तथा / व्यजन-भजनात्-वायोरुपलब्धये, ग्रीष्मवारणार्थ व्यजनस्य भजनात्-सेवनादपि / विरता:निवृत्ताः, वसन्ति / यथा-मन्ये, तादृशप्रकारेण / यद्गतिः-येषां प्रवृत्तिः / वायो:पवनस्य / कार्य-शरीरं / अलं-पर्याप्ततया / कुशलं-सुखं / नयति-प्रापयति / एतेषां मुनीनाममलं चरितं ही विजयत इत्युक्तमेव / / 92 / / / फलं पुष्पं मूलं त्वचमथ च काष्ठं किसलयं, सचित्तं बीजं ये न पुनरुपयुञ्जन्ति किमपि / तदेवं त्रायन्ते परिहरितकायं परिचितं, मुनीनामेतेषां चरितममलं ही विजयते // 93 / / सौरभवृत्तिः - ये-मुनिवराः / सचित्तं / फलं / पुष्प-कुसुमं / मूलं-कन्दरूपं / त्वचं-त्वग्भागं / काष्ठं / किसलयं-पत्रं / बीजं / पुनः-वा / किमपि किञ्चिदपि / ननहि / उपयुञ्जन्ति-उपयोगं कुर्वन्ति / तदेवं-तदनेन प्रकारेण स्वार्थमुपयोग-राहित्येन / परिचितं-ज्ञातं / परिहरितकायं-वनस्पति कायं / सर्वप्रकारेण / त्रायन्तेरक्षन्ति / एतेषां मुनीनाममलं चरितं ही विजयत इत्युक्तच रमेव / / 93 / / जलका-हीनाङ्गी-शलभमुखजीवायनविधी, यतन्ते ये नित्यं करणफरणानामपि हितम्। त्रसं कायं त्रासादवहिततयाऽवन्ति विधिवन्मुनीनामेतेषां चरितममलं ही विजयते // 94 // प र '9" .. सौरभवृत्तिः- जलूका-जलौकाः / हीनाङ्गी-पिपीलिका-ज्योतिरिङ्गणप्रभृतिजीवानाम् / अवनविधौ-रक्षणकर्मणि / करण-करणानाम्-पञ्चेन्द्रियाणाम् / अपि / हितम्-सुखं / विधातुं / नित्यं-सदेव / ये-मुन्त्रिप्रवराः। यतन्ते-प्रयत्नं कुवन्ति / ये च / वसं कायं-सकायं, तादृशजीवजातं / , कष्टात् / अवहित P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ ४२/पञ्च-परमेष्ठि-गुणमालायाम् तया-सावधान-भावेन / विधिवद्-यथा स्यात् तथा / अवन्ति-रक्षन्ति / एतेषी मुनीनाममलं चरितं ही विजयते / तदिति पूर्ववंदेव / / 94 / / स्वयं दक्ष-द्वयक्षाः क्वचिदपि न चैकान्तनयना, अनेकान्तक्षेण व्यवहृतिपथे यान्ति निपुणम् / सदेकाक्षाणां ये व्यथनविधितोऽत्यन्त-विरता, मुनीनामेतेषां चरितममलं ही विजयते // 95 // सौरभवत्तिः- ये-साधुगणाः। स्वयं-आत्मना / दक्ष-द्वयक्षाः-कुशल-द्विनयनाः / क्वचिदपि कुत्रापि, कस्मिन्नपि विषये। एकान्तनयना-एकान्तदृष्टिवन्तः / च / न-नव / सन्तः / अनेकान्तेक्षण-अनेकान्तनेत्रेण दृष्टया वा / व्यवहृतिपथे-व्यव. हारमार्गे। निपुणं-योग्यरूपेण / यान्ति-प्रचलन्ति / अथ च / सदा-नित्यं / एकेक्षाणां-एकेन्द्रियाणां / व्यंथनविधित:-पीडाविधाने / अत्यन्तविरता:-अत्यन्तं सर्वरूपेण / विरताः-निवृत्ताश्च / वसन्ति / एतेषां मुनीनाममलं चरितं ही विजयत इत्युक्तचरमेव // 95 // जलालोका शुक्तिः कृमिरपि धुणः कम्बुरथ वै.. हिरण्या दुर्नामा द्विकरणतया सन्ति विदिताः। अमीषां रक्षार्थ त्रिविधकरणैर्ये व्यवसिता, मनीनामेतेषां चरितममलं ही विजयते // 96 / / सौरभवृत्तिः- ये-मुनिगणाः / जलालोका-जलौकाः / शुक्तिः-जले वर्तमानः शुक्तिरूपो जीवः। कृमिः-कीटः। धुणः काष्ठभक्षकः कोटविशेषः / अपि-अथ / कम्वुः / शङ्खजीवः कपर्दिका। व-निश्चयेन / हिरण्यादुर्नामा कपर्दकः दीर्घकोशा च। एते सर्वे। द्विकरणतया-द्वीन्द्रियतया / विदिताः-प्रसिद्धाः। सन्ति-विद्यन्ते / अमीषाउक्तानामेतेषाम् / रक्षार्थ-रक्षणाय / त्रिविधकरण:-मनो-वाक-कायेन्द्रियः। व्यवसिताः-समुद्यताः / एतेषां मुनीनाममलं चरितं ही विजयत इत्यागूरितोऽर्थः / / 96 // महाभील रिक्षा किटिभ उपदीकाऽग्निरजको, घृतेली यूकाऽमी भुवि परिचितास्त्रीन्द्रियतया। . सुषप्तावप्येषां न च विदधते येऽभिहननं, .. मुनीनामेतेषां चरितममलं ही विजयते // 7 // सौरभवृत्तिः- ये-मुनिप्रवराः / महाभीरु गोपालिका। रिक्षा-लिक्षा / P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ साधुभगवद्-गुणमाला/४३ किटिभः-मत्कुणः / उपदीका-वम्री / अग्निरजकः-इन्द्रगोपः / धृतेली-पिङ्गकपिशा। यूका-पट् पदी / अमी-एते / त्रीन्द्रियजीवा: त्रीन्द्रियतया-करणत्रयतया। परिचिताःविदिताः सन्तीति शेषः / भुवि-भूमण्डले। एषां-उक्तानामेतेषां जीवानां / सुषुप्तावपि-स्वापावस्थायामपि / ये मुनयोः / अभिहननं-स्वेच्छया विघातं / च / न विदधते-नैव कुर्वन्ति / एतेषां मुनीनाममलं चरितं ही विजयते / स्पष्टमेव // 97 / / अली लालास्रावः शलभ-सरघे सा शतपदी, निमेषाद् दंशी द्रुणक-वरटे वर्षकरिका / अमन ये रक्षन्ति स्वमिव चतुरक्षान् स्वचतुरा; मुनीनामेतेषाममलचरितं ही विजयते // 98 // सौरभवृत्तिः -- ये-मुनिगणाः / अली-भ्रमरः / लालानावः-लूता। शलभःपतङ्गः / सरधा-मधुमक्षिका / शतपदी-कर्णखर्जूरिका / निमेषद्युत्-ज्योतिरिङ्गणः / दंशी-अल्पिका वनमक्षिका / द्रुणकः-वृश्चिकः / वरटा-गन्धोली। वर्षकरिका-झिल्लिका। अमून्-एतान् / चतुरक्षान्-चतुरिन्द्रियजीवान् / स्वचतुराः-स्व-निपुणाः / स्वमिवस्वात्मानमिव / रक्षन्ति-रक्षां कुर्वन्ति / एतेषां मुनीनाममलं चरितं ही विजयत'. इत्युक्तमेव // 98 // न चित्तेन घ्नन्ति क्षणमपि तिरश्चो निरयजान् , . . मनुष्यान् गीर्वाणान् जगति चतुरः पञ्चकरणान् / वचः कायाभ्यां किं पुनरकलुषा ये न परुषा , मुनीनामेतेषां चरितममलं ही विजयते // 19 // सौरभवृत्तिः- ये-मुनिवराः / तिरश्चः-पक्षिणः / निरयजान्-नारकीयान् / मनुष्यान्-मानवान् / गीर्वाणान्-देवान् / चतुरः-उक्तानेतान् चतुःसंख्यकान् / पञ्चकरणान्-पञ्चेन्द्रियान् / चित्तेन-हृदयेन / अकलुषा:-कालुष्यरहिताः। न परुषा:न च कठोराः। क्षणमपि मनसाऽपि / वचः कायाभ्यां-बाचा शरीरेण च / जगतिसंसारे न / घ्नन्ति-न हिंसन्ति / किं पुनः-अन्येषां हननविषयाणां विषये किमु वक्तव्यं ? एतेषां-ईदृशानां सर्वथा हिंसा-विरतानां मुनीनाममलं चरितं ही विजयत इत्युक्तोऽर्थः / / 99 // जिते लोभे सर्व विजितमजितं मोहफटक; गते मोहे मुक्तिः करतलगता स्यादिति विदुः / न लोभं निर्ग्रन्था हृदि निदषते लेशमपि ये, मुनीनामेतेषां चरितममलं ही विजयते // 10 // P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ ४४/पञ्च-परमेष्ठि-गुणमालायाम् सौरभवृत्तिः- लोभे-लुब्धक भावे / जिते-विजिते सति / अजितं-अजेयं / मोहकटकं-मुग्धत्वसैन्यं / विजितं-जितं / भवतीति / किञ्च मोहे-मुग्धभावे / गतेनिवृत्ते सति / मुक्तिः-मोक्षः। करतलगता-स्वाधीनतां प्राप्ता स्यादिति-भंवेदिति / विदुः-आचार्याः प्रजगुः। अतो / निर्ग्रन्था:-साधवः / हृदि-स्वात्मनि / लेशमपि-स्वल्पमपि / लोभ-लुब्धभावं। ये न विदधते मुनयो न जनयन्ति / एतेषां मुनीनां निर्मलं चारित्र्यं विस्मापक सद् विजयं प्राप्नोति / / 100 / / क्षमा शस्त्रं येषां भवति न च तेषां भयमहो , कुतोऽपि भ्राजन्ते दिवि सदा ते सुयशसा / क्षमामेवं मत्वा दधति सततं ये गतरुषो , मनौनामेतेषां चरितममलं ही विजयते // 101 // सौरभवत्तिः- येषां-सत्पुरुषाणां तपस्विनाम् / क्षमा-क्षान्तिः। शस्त्रंआयुधं / भवति अहो !-अनाश्चर्यम् / तेषां च-तद्विधानां च / कुतोऽपीति / तेतादृशाः महापुरुषाः सदा-सदैव / दिवि-स्वर्गे / सुयशसा-उत्तमया कीा / भ्राजन्तेशोभन्ते / एवं-ईदृग्गुणशालिनी / क्षमा-क्षान्तिं / मत्वा-ज्ञात्वा / ये-मुनिवराः / गतरुषः-वीतकोपाः / सततं-निरन्तरं / क्षमां / दधति-धारयन्ति / एतेषां मुनीनाममलं चरितं ही विजयत इत्युक्तमेव / / 101 / / अनुपेक्षा: धा द्वयधिकदशसङ्ख्याः पुनरपि , व्रतानां स्थैर्याथं करणनयनाः शास्त्रविदिताः / चतस्रो मैत्र्याद्या. जहति न च यच्चित्तसदनं , .. .. मुनीनामेतेषां चरितममलं ही विजयते // 102 // - सौरभवतिः- द्वयधिकदशसङ्ख्याः -द्वादशप्रकारिफाः / धौ-धर्मादनपेताः / अनुप्रेक्षा:-अनित्याशरणप्रभृतयो द्वादशभावनाः / पुनरपि-पुनश्च / व्रतानांपञ्च महाव्रतानां / स्थर्यार्थ-स्थिरत्वाय / शास्त्रविदिता:-आगमेषु प्रसिद्धाः / करणनयना:-पञ्चविंशतिसंख्यका भावनाः / तथा च / मैयाद्या:-मैत्रीप्रभृतयः / चतस्रःचतुःसंख्यका भावनाः / यच्चित्तसदनं-येषां साधूनां हृदयभवनं / न जहति-न त्यजन्ति / सर्वा उपर्युक्ता भावना नव विजहति / एतेषां मुनीनां विमलं चरितं ही विजयत इति / / 102 // अमत्रं वस्त्रं वा सदुपकरण यश्च वसतिः, प्रमृज्यन्ते दृष्टया : मृदुलतरया केसरिकया / P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ साधुभगवद्-गुणमाला/४५ प्रमाद्यन्ते नो ये नियत-प्रतिलेखादिक-विधी; - मुनीनामेतेषां चरितममलं ही विजयते // 103 / / सौरभवृत्तिः- यः-मुनिवरैः / अमत्रं-पात्रम् / वस्त्रं-वासः / सदुपकरणंउत्तमसाधनः / वा। वसतिः-उपाश्रय-भूमिः / दृष्टया-अवलोकनेन / मृदुलतरया-अति कोमलया। केसरिकया-पुञ्जणिकया। प्रमृज्यन्ते-प्रकृष्टतया माय॑न्ते / ये ब-ये मुनिवराश्च / नियत-प्रतिलेखवादिक-विधी-नियमित-प्रतिलेखनादि-विधाने / नोट नैव / प्रमाद्यन्ते-प्रमादं कुर्वन्ति / एतेषां मुनीनाममलं चरितं ही विजयते / इति // 103 // लभन्ते नो सिद्धि कथमपि विना संयममहो; . जना भ्रामं भ्रामं विरहित - विरामं भववने / तत: सेवन्ते ये . पदमनुपदं संयमयुजो, मुनीनामेतेषां चरितममलं ही विजयते // 104 // सौरभवृत्ति:- अहो ! -आश्चर्यम् / जनाः-मनुजाः / भववने-संसार-रूपिणि अरण्ये / विरहित-विराम-विश्रामविरहितं / भ्रामं भ्रामं = भूयो भूयो भ्रमणं कुर्वाणाः / संयम-संयमेन / विना-राहित्येन / कथमपि-केनापि प्रकारेण / सिद्धिईप्सिते कर्मणि सिद्धिं / नो-नैव / लभन्ते-प्राप्नुवन्ति / ततः-तदनन्तरं। ये साधु-:गणाः / अनुपदं-शीघ्र / संयमयुजः-संयमशालिनो योगिनः / पदं स्थानं / सेवन्तेआश्रयन्ते / एतेषां मुनीनाममलं चरित ही विजयते / इति // 104 // . पिता-पुत्रौ स्यातां यदि सहचरौ किन्न दुरितं , ददाते दान्तानामपि लघु परिज्ञाय मनसः। मनोज हत्वा ये इति चलमनोगोपनपरा; मुनीनामेतेषां चरितममलं ही विजयते // 105 / / सौरभवृत्तिः- पिता-पुत्री-जनक-तनयो / मनः कामो, यदि-यहि / सहचरीसहचारिणी / स्यानां-भवेतां, तदा / दान्तानामपि-दान्तेभ्यः शान्तेभ्योपि कि दुरितंकि पापं / न ददाते-न वितरतः / इति-एवं / लघु-द्रुतं / परिज्ञाय-पूर्णरूपेण ज्ञात्वा। मनसः-हृदयात् / मनोज-कामं / हृत्वा-दूरे कृत्वा / ये-मुनयः / चलमनोगोपनपरा:बञ्चलस्य मनसो रक्षणाय तत्पराः सन्ति / एतेषां मुनीना विमलं चरितं ही विजयत इति / / 105 / / P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ ४६/पञ्च-परमेष्ठि-गुणमालायाम् वचो नो गुप्तं चेज्जगति कमनथं न जनयेत् ? सुगुप्तं श्रेयांसि प्रवितरति तस्माद् . वशिवरैः। वचोगुप्त्या वाचं यमवचनमाधारि ननु यै र्मुनीनामेतेषां चरितममलं ही विजयते // 106 // .. सौरभवृत्तिः - जगति-संसारे / वचः-वचनं / गुप्तं-रक्षितं, संयतं / नो चेत्न भवेत् चेत् / कम्-किं रूपं / अनर्थ-अनिष्टं / न जनयेत्-नोत्पादयेत् / तदेव वचः। सुगुप्त-सुसंयतं सत् / श्रेयांसि-भद्राणि / प्रवितरति-पूर्णतया ददाति / तस्मात्तत्कारणात् / यः वशिवर:-संयतेन्द्रियः / वचोगुप्त्या-वचनानां सत्प्रयोगेण / यमवचनम्-संयतवचनं। वाचंयम इति नाम / ननु-निश्चयेन / आधारि-आसमन्ताद् अधारि-धारितम् / अस्तीति / एतेषां मुनीनाममलं चरितं ही विजयते जयवद्वर्तत इति // 106 // . . ... .. शरीरं स्वाधीनं नियतमशरीराय घटते , तथाऽनन्तानन्तं जनयति शरीराणि जगति / ततो गुप्त्या कामं सततमिह रक्षन्ति किल ये , ... मुनीनामेतेषां चरितममलं ही विजयते // 107 // - सौरभवृत्तिः- स्वाधीनं-स्वायत्तं / शरीरं-वपुः। वस्तुतः। अशरीरायमोक्षाय / घटते-भवति / तथा-किञ्च / अस्वाधीनं शरीरं / जगति-लोके / अनन्तानन्तं-अपरिमितानि / शरीराणि-वधूंषि / जनयति-उत्पादयति / ततः-तस्मात् / येमुनिगणाः। किल-निश्चयेन / सततं-निरन्तरं। कायं-शरीरं। गुप्त्या-कायगुप्त्या.. रक्षन्ति-रक्षणं कुर्वन्ति / एतेषां मुनीनाममलं चरितं ही विजयते / / 107 / / बुभुक्षाधान द्वाविंशतिमपि सहन्ते परिषहान , प्रमष्टा ते ननं परमपदसौख्यं विदधते / ततो धयं घुत्वा परिषहवलं जितमलं, मुनीनातेषां चरितममलं हो विजयते // 108 // सौरभवत्तिः- बुभुक्षाद्यान्-क्षधाप्रभृतीन् / द्वाविंशति-द्वयुत्तर-विंशतिसंख्याकान् / परिषहान्-तन्नामकव्रतविशेषान् / सहन्ते-क्षमन्ते / ते-परिवहाः / प्रमृष्टाःसुपालिताः। नन-निश्चितरूपेण / परमपदसौख्यं मोक्षसुखं / विदधते-करोति, ददाति / ततः तस्मात् / यः-मुनिगणः / धर्य-शान्ति / घृत्वा-धारयित्वा / अलं-यथास्यात् तथा। पूर्णरूपेण / परिषहबलं-परिषह-सन्यं / जितम्-विजितम् / एता मुनीनां विमलं चरितं ही विजयते / / 108 // P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ साधु-भगवद्-गुणमाला/४७ शुभध्याने मित्रा अमृतपद - पुण्योधुर-धुरंधरा धर्माध्वाना न जिगमिषवो दुर्गतपथम् / न मार्गाच्चाल्यन्ते प्रसरदुपसर्ग: किमपि ये, मुनीनामेतेषां चरितममलं ही विजयते // 109 / / सौरभवृत्तिः- शुभध्याने-शुक्लध्याने / ये-मुनयः। मित्राः-मित्ररूपाः / अमृतपुण्योधुरधुरन्धरा:-मोक्षपदस्य पवित्रस्य / उधुरंधुरन्धराः-समुन्नत-धुराधारकाः / धर्माध्वाना:-धर्मस्य मार्गे गन्तारः। दुर्गप्तपथम्-दुर्गतमार्ग / न-नव / जिगमिषवः-गन्तुमिच्छु काः / ये-मुनिवराः / प्रसरदुपसर्गः-प्रसरभिरुपसगै विघ्नः मार्गात्-पथः। किमपि-मनागपि / न चाल्यन्ते-विचलिताः न क्रियन्ते / एतेषां मुनोनाममलं चरितं ही विजयते / / 109 // // समाप्ता सध्याच्या पञ्चपरमेष्ठि-गुणमाला / / anty P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun GL Aaradhak Trust
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________________ ४६/पञ्च-परमेष्ठि-गुणमालायाम् वचो नो गुप्तं चेज्जगति कमनथं न जनयेत् ? सुगुप्तं श्रेयांसि प्रवितरति तस्माद् वशिवरैः। वचोगुप्त्या वाचं यमवचनमाधारि ननु ये3. मुनीनामेतेषां चरितममलं ही विजयते // 106 // सौरभवत्तिः - जगति-संसारे / वच:-वचनं / गुप्त-रक्षितं, संयतं / नो चेत्न भवेत् चेत् / कम्-कि रूपं / अनर्थ-अनिष्टं / न जनयेतु-नोत्पादयेत् / तदेव वचः। सुगुप्तं-सुसंयतं सत् / श्रेयांसि-भद्राणि / प्रवितरति-पूर्णतया ददाति / तस्मात्तत्कारणात् / यः वशिवर:-संयतेन्द्रियः / वचोगुप्त्या-वचनानां सत्प्रयोगेण / यमवचनम्-संयतवचनं / वाचंयम इति नाम / ननु-निश्चयेन / आधारि-आसमन्ताद अधारि-धारितम् / अस्तीति / एतेषां मुनीनाममलं चरितं ही विजयते जयवर्तत इति / / 106 // . . . . ... शरीरं स्वाधीनं नियतमशरीराय घटते , तथाऽनन्तानन्तं जनयति शरीराणि जगति / ततो गुप्त्या कामं सततमिह रक्षन्ति किल ये, मुनीनामेतेषां चरितममलं ही विजयते / / 107 // - सौरभवृत्तिः- स्वाधीनं-स्वायत्तं / शरीरं-वपुः / वस्तुतः / अशरीरायमोक्षाय / घटते-भवति / तथा-किञ्च / अस्वाधीनं शरीरं / जगति-लोके / अनन्तानन्तं-अपरिमितानि / शरीराणि-वपूंषि / जनयति-उत्पादयति / ततः-तस्मात् / येमुनिगणाः / किल-निश्चयेन / सततं-निरन्तरं। कार्य-शरीरं / गुप्त्या-कायगुप्त्या / रक्षन्ति-रक्षणं कुर्वन्ति / एतेषां मुनीनाममलं चरितं ही विजयते / / 107 / / बुभुक्षाद्यान् द्वाविंशतिमपि सहन्ते परिषहान् , प्रमृष्टा ते नूनं. परमपदसौख्यं विदधते / ततो धयं धृत्वा परिषहवलं जितमलं, मुनीनातेषां चरितममलं हो विजयते // 108 // सौरभवत्तिः- बुभुक्षाद्यान्-क्षुधाप्रभृतीन् / द्वाविंशति-द्वयुत्तर-विंशतिसंख्याकान् / परिषहान्-तन्नामक व्रतविशेषान् / सहन्ते-क्षमन्ते। ते-परिवहाः / प्रमृष्टाःसुपालिताः। नूनं-निश्चितरूपेण / परमपदसौख्यं-मोक्षसुखं / विदधते-करोति, ददाति / ततः-तस्मात् / यः-मुनिगणः / धयं-शान्ति / घृत्वा-धारयित्वा / अलं-यथास्यात् तथा / पूर्णरूपेण / परिषहबलं-परिषह-सन्यं / जितम्-विजितम् / एतेषा मुनीनां विमलं चरितं ही विजयते // 108 // P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ साधु-भगवद्-गुणमाला/४७ शुभध्याने मित्रा अमृतपद - पुण्योधुर-धुरं-. धरा धर्माध्वाना न जिगमिषवो दुर्गतपथम् / न मार्गाच्चाल्यन्ते प्रसरदुपसगै: किमपि ये , मुनीनामेतेषां चरितममलं ही विजयते // 109 / / सौरभवत्ति:- शुभध्याने शुक्लध्याने / ये-मुनयः। मित्रा:-मित्ररूपाः / अमृतपुण्योधुरधुरन्धरा:-मोक्षपदस्य पवित्रस्य / उधुरंधुरन्धरा:-समुन्नत-धुराधारकाः / धर्माध्वाना:-धर्मस्य मार्गे गन्तारः। दुर्गतपथम्-दुर्गतमार्ग / न-नव / जिगमिषवः-गन्तुमिच्छुकाः / ये-मुनिवराः / प्रसरदुपसर्गः-प्रसरभिरुपसगै'विघ्नः मार्गात्-पथः। किमपि-मनागपि / न चाल्यन्ते-विचलिताः न क्रियन्ते / एतेषां. मुनोनाममलं चरितं ही विजयते / / 109 // // समाप्ता सध्याल्या पञ्चपरमेष्ठि-गुणमाला / / P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ પર પંચ પરમેષ્ઠી ગુણમાળા પર . [રચયિતા :- વિજય ધમ ધુરંધર સૂરી મહારાજ ( અતુટુપ) અર્થ :- 3% હ અહ એ પ્રકારના, પરમતિજ સ્વરૂપ પરમ મંત્રનું ધ્યાન ધરીને ભતિ પૂર્વક પંચ પરમેષ્ઠીના ગુણ સમુહની અમે સ્તુતિ કરીએ છીએ. આવા અરિહંત ગુણમાળા - શિખરીણી - અથ ;- આ અશોક વૃક્ષ સ્પષ્ટ લાલ વર્ણન હોવા છતાં પણ અર્થાત સરાગ રત હોવા છતા પણ વિતરાગ પરમાત્માને અનુસરે છે. પ્રમાણથી તીર્થંકર પરમાત્માના શરીરથી બાર ગણે ઉંચે છે. પવનથી ચાલતા પાંદડાઓને બહાને જાણે ગીત ન ગાતો હોય એવો લાગે છે. તે આ અશોક વૃક્ષ લોકોના શાકને હરણ કરે છે. : - - - અર્થ ;- કમળ વગેરે જેમાં મુખ્ય એવા ગોઠણ પ્રમાણુ ઉગે ભમરાના કાકાર ભરી જેનાં ડીટડાં નીચે છે. એવી પુપની વૃષ્ટિ ચાર ગાઉ પ્રમાણુ સમવસરણમાં દેવતાઓ કરે છે. તે પરાજય પામેલા કામદેવે તિર્થંકર પરમાત્માની સમીપે પુષ્ય રૂપ | પિતાના શસ્ત્રોને ત્યાગ કર્યો ન હોય એમ જણાવે છે. * . . . #ડા અથ :- તીર્થંકર પરમાત્માના મુખથી પ્રકટેલ દિવ્ય અને ભવ્ય ધ્વનિ તે અમૃતનું સરસ હૃય છે. મિષ્ટ મધુરતાની મધુરતા છે. સ્વરેનો પોતાનો રસ છે. તિની સંપત્તિ છે. પીડાનો નાશ કરનાર છે. આનંદનો એવો ધ્વનિ જ્યવંત વર્તે છે. અર્થ :- દેવતાઓના કરકમળમાં આનંદથી નૃત્ય કરતી તીર્થંકર પરમાત્માના મુખપી ચંદ્રને જોઇને આનંદના હાસ્યના અંકુરમાં જાણે કે પ્રગટ્યા ન હોય તેવી ચકોર - પક્ષીનાં જોડલા જેવી અજોડ ઉજવળતાને ધારણ કરતી આ ચામરની હાર સતત ગતિવાળી કેને સુખ આપતી નથી ! અર્થાત્ સુખ આપે જ છે. 5 પા અર્થ :- મહામોહ ( અર્થારાગ) અને દોહંદ વિગેરે શત્ર રૂપી હાથીઓના - વિનાશને માટે રચેલું સારા વર્ગનું નાનું બનાવેલું ઉતમ કિરણવાળા માણસેથી ચારેબાજુ જડેલું ચરણથી ચમકતાં પાદપીડવાળું પુણ્યને ઉત્પન કરનારું દેવતાઓએ નમસ્કાર કરાયેલું. તીર્થંકરના બેસવાના સ્થાનભૂત અદભૂત આ સિંહાસન વિલસે છે. 6 P.P. Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ 8 અથ :- હે અરિહંત ! હજુ સુર્યની એકઠી પ્રભા કરતા પણ વિશેષ તમારી નિર્મળ પ્રભા વિલ છે. જગતમાં લોકે નિસ્તેજ ને અથવા અત્યંત તેજસ્વીને , જેતા નથી એમ વિચારીને આ દેવતાઓ એ રચેલું ભામંડળ શોભે છે. શાળા અર્થ - અનાદિ 'અજ્ઞાનથી સમસ્ત જગત ઉઘે છે. તેના અંધકારને દૂર કરવા માટે શ્રી જીનેશ્વર રૂપી સૂર્ય ઉદય પામે છે. કાનને મધુર આકાશને ભરી દેતે આગળ આગળ જોરથી પ્રસરત દુન્દુભીનો અવાજ તેમનું આગમન જર્ણવનાર થાય છે. * અર્થ :- ધર્મના બળે ત્રણલોકનું સામ્રાજય પ્રાપ્ત કરીને દેવતા અને મનુયોથી પૂજાયેલા તીર્થકર ધર્મવિર ચાતુરત ચક્રવતી બન્યા તેથી તેમનો પુણ્ય સમૃદ્ધિના અતિશયપણાથી ઉચે રહેલા સારા મોતીથી જડેલા આ ઉજવળ ત્રણે છું તમારું રક્ષણ કરો. - અ :- લોકમાં પદાર્થો છે. ગુણસમુદાય અને પર્યાયને સમુહ અનંત છે. તે સર્વનું જ્ઞાન મતિજ્ઞાન વિગેરે ચાર જ્ઞાનથી થઈ શકતું નથી. તે જાણવા માટે અંતિમ નિર્મળ એક કેવળ જ્ઞાન જ સમર્થ છે. જીનેશ્વર પરમાત્મા અવિનાશી પણ તે સુંદર અતિશયવાળું જ્ઞાન ઉદય પામ્યું છે. ૧ભા - અથ :- આ જગતમાં ક્યાં ઇતર દેવોના ચારિત્ર વગરને વચન સારી રીતે કલ્યાણને હણતા નથી. જેમ રેગો શરીરનો નાશ કરે છે તેમ. હે અહંત ! તમારા વચનો પ્રશમરસ ભરપુર છે. સર્વભવ્યાત્માઓને કલ્યાણ કરનારા છે. જેમ મેઘ અન્ન ઉત્પન્ન કરે તેમ. 1i " અથ :- હે ભગવાન ઈન્દોએ આપની જે પ્રકારે પૃ કરી છે એવા પ્રકારે ત્રણ જગતમાં બીજા કેઈની પણ ક્ષણવાર પણ પૂજા કરી હોય એવું દેવું કે સાંભળ્યું નથી. અહો ! આપનું ભાગ્ય પણ એનું આશ્ચર્યજનક છે કે આપના પૂજનથી પણ વૈરાગ્ય ઉત્પન્ન થાય છે. આવાં પુનતિશયથી આપની મહત્તા વિસ્તાર પામે છે. ' 12 ' અર્થ :- સંસાર રૂપી જેલખાનાનું સ્વરૂપ અાભ ઘરમાં પ પળ જરા - આધિ-વ્યાધિ છેવટે મરણ રૂ૫ દુખને પ્રાપ્ત થાય છે. તે પ્રાતિના મૂળ કારણ - રૂપ પાપ સમુહને (અર્થાત મને) આપને મૂળમાંથી ઉખેડી નાખ્યું છે. માટે અપાયાપગમાતિશય યુકત એવા આ ભવ્ય રૂપ ભવભય રૂપ અપાયથી રક્ષણ કરો. ૧૧વા P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ શિદ્ધ ગુગુમાળા : અર્થ :- નિગોદ અવસ્થામાં અનંતમાં ભાગનું અસમાન જ્ઞાન પ્રગટ હતું. પછીથી વ્યવહારમાં અનુક્રમે અવ્યકત વ્યક્ત જ્ઞાન પ્રગટ ઉદય પામ્યુ પણ સંસાર રૂપી ઘરમાં તે કઈપણ રીતે પુર્ણ થયું નહિ. અજોડ અને અનંત સંપુર્ણ જ્ઞાન સિદ્ધ પરમાત્માઓને સારી રીતે સિધ્ધ થયેલું શોભે છે. અર્થ :- આ વિશ્વમાં આત્માઓને પણ સામાન્ય સિવાય વિશેષ જ્ઞાન થતું નથી. પરંતુ સિધ્ધાત્માઓને વિશે તે પ્રથમ વિશેષ જ્ઞાન અને પછી સામાન્ય થાય છે. ત્રણે લેકનું ત્રણે કાળમાં સિધ્ધ પરમાત્માના અખંડ કેવળ દર્શન ગુણરૂપી નિર્મળ દર્પગમાં સારી રીતે પ્રતિબિંબ પડે છે. |૧પ અથ :- કેઈક વનેચર બિલનગરમાં ગયો ત્યાં રાજાના ઘરમાં રહીને ભોગો ભાગની વળી પાછો શીદ્ય વનમાં ગયો તે ત્યાં વનમાં બીજા વનેચરોને નગરના સુખને સમજાવે પણ સમજાવી શકતા નથી. તે જ પ્રમાણે શિધ પરમાત્માનું મોક્ષ સુખ સંસારી છે સમજી શકાય તેવું નથી. 16 અર્થ :- સંસારમાં કેઈપણ વખત મહા મોહના ઉદકથી સ્વાધીન સુખ “અનુભવ્યું જ નથી. જે કાંઈક સુખ છે તે કર્મથી ભરેલું અને ક્ષણ વિનશ્વર છે. પરંતુ મોક્ષમાં મોહના સદંતર નાશથી ઉત્પન્ન થયેલ પરમ આનંદને નિસ્પંદન ચારે બાજુથી જોડાઈને પુષ્ટપણે આત્માને રમાડે છે. અર્થાત મોક્ષમાં આત્મા પરમાનંદમાં રમે છે. . . . . . .૧ણા અર્થ :- નારક ગતિમાં તિર્યંચ ગતિમાં મનુષ્ય ગતિમાં અને દેવ ગતિમાં એમ ચારગતિ રૂપ સંસારમાં સતત નિર્ગમ કર્યું પણ આયુષ્ય કર્મના સદંતર નાશથી સિધ્ધપરમાત્માઓની સ્થિતિ અક્ષય છે. તે અક્ષય સ્થિતિ રૂપ અજોડ અને અનુપમ મનોહર અને દુ:ખનો નાશ કરનાર ગુણને હું વંદુ છે. 18 અર્થ :- જેમ ચિતાર વિવિધ પ્રકારના ચિત્રોને રચે છે. તેમનામ કમ આત્માને, સંસાર રૂપી નગરમાં વિચિત્ર રીતે નવે છે. સંસારથી મુકત થયેલા આત્માનું અનુપમ રૂપ વગરનું સ્વરૂપ પવિત્ર અને હિતકર કોને આશ્ચર્ય ઉત્પન્ન કરતું નથી અર્થાત અબૂત છે. 1 અર્થ - સંસારમાં સારકુળમાં જન્મની પ્રાપ્તિ થાય છે. તેથી આત્માને મદને અને સુપને ઉત્પન્ન કરનાર ગોરવ આવી જાય છે. તથા દુષ્કાળમાં જન્મની P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ પ્રાપ્તિ થાય છે. ત્યારે અકુલીનતા લાઘવને ઉત્પન્ન કરે છે. આ સર્વત્ર કમેના પ્રભાવે છે. તે નેત્રકમ જ સિધ્ધ પરમાત્માને નહી હોવાને કારણે તેનામાં અગુરુ લધુ પણ ગુણ પ્રકટે છે. એવા ગુરુ લઘુ ભાવથી સહિત શુધ્ધ તેને સર્વથા નમસ્કાર હો. ToI અર્થ :- સંસાર રૂપી ઘરમાં રહેલા આમાઓને મનપસંદ નથી ધન નથી લાભ નથી ભંગ નથી નથી ઉપભોગ કે નથી વીર્ય મોત રૂપી મંદિરમાં વસનાર આત્માઓ દાનઅંતરાયને સારી રીતે હણી નાખે છે. અને તેથી તેને વિગેરે પાંચેય અનંત પ્રાપ્ત કરે છે. ર૧ આચાર્ય ગુણમાળા : અથ -: જેમણે હાથીનું કટ જાગ્યું છે. એવા વિશેન્દ્રીય આચાર્ય સ્વપ્ન માં પણ કમળ સંમાન કોમળ સ્ત્રીનાં અને ઈછતા નથી પ્રાવણ રહિત અને આત્માના હિતપાળ શીત અને ઉષ્ણને સહન કરે છે. શ્રી વશી અને સુંદર ચારિત્ર્ય વાળા એવા આચાર્યોની હું સ્તુતિ કરું છું 2aaaa અથ :- જેઓ રસનાના લાભથી નવા નવા અને આસ્વાદે છે. તેઓ માછલીની માફક હંમેશા. વિરસ દુઃખને પ્રાપ્ત કરે છે. એ પ્રમાણે જાણીને એવા આચાર્યો કેd ૫ણું પ્રકારે જીભની લુપતાને ધારણ કરતા નથી તે પ્રમ, વશી સુંદર ચારિત્ર્ય વાળા આચાર્યોની હું સ્તુતિ કરૂં છું. રડા - - અર્થ :- કમળમાં ભ્રમર નારીકાથી હણાયેલા શરીરને પણ ત્યાગ કરે છે. ગંધમાં આસકત થયેલા મનુષ્યો મા દુર્ગધી ધારણ કરે છે. તેથી સ્વસ્થ મનવાળાં મુનીવર ગંધના વિષયમાં આસકત થતા નથી. એના પ્રવરથી સુંદર ચારિત્ર્યવાળા આચાર્યોની હુ સ્તુતિ કરું છું. : 24 અથ :- જે આચાર્ય ભગવંતોએ પિતાનું વિશુદ્ધ સ્વરૂપ જોયું છે. તેઓ ક્ષણવાર પણ પારકા રૂપમાં અર્થાત્ પુદલ રૂપમાં ખરેખર વિલાસ કરતા અને તેથી તેઓ પતંગિયાની માફક રૂપમાં પડીને મૃત્યુ - અપમૃત્યુને પ્રાત . કરતા નથી. એવા પ્રવરવી સુંદર ચારિત્રય વાળા આચાલી છે સ્તુતિ કરું છું. | મોરપા ; અથ :- જેમના કવિવરમાં જીનેશ્વરના વચનામૃત રૂપી હિતકાર રસ પ્રવેશે છે તે આચાર્યો સારી રીતે ગવાયેલા સંગીતથી કોઇપણ સ્થળે હરણની માફક P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ ખરેખર કુગતિને પ્રાપ્ત કરતા નથી તેવા આચાર્યોની હુ સ્તુતિ કરું છું પરકા અર્થ :- ત્યાં સ્ત્રીઓને વાસ નથી. જ્યાં તિયાને વાસ નથી અને જ્યાં પોતે વાસ નથી અને જ્યાં સ્થાનનો વિસ્તાર વધે એવો વિશુદ્ધ સ્વાધ્યાય થઈ શકે છે. એવી વસતિમાં તેઓ વસે છે. તે આચાર્યોની હું સ્તુતિ કરું છું. રણા અથ :- આ સ્ત્રી બાળા છે. આ ઉછળતી ચાલવાળી અને ઉછળતી નીવાળી યુવતી છે. આ મુખે પુષ્ટ સ્તન કદવાળી છે. એ પ્રમાણેની સ્ત્રીઓની કથા જેઓ બ્રાચર્યમાં આસકત હોવાથી કદી કરતા નથી. એવા . આચાર્યોની હું યુતિ કરું છું 28aaaa અર્થ :- જે સ્થાન ઉપર ક્ષણવાર પણ સ્ત્રી બેઠેલી હોય છે. તે સ્થાન પર જેમણે કામને છ છે. એવા મુનીવર કોઈપણ રીતે સ્થિતિ કરતા નથી. પરમાણુના સંચાથી રાગ ઉદય પામે છે. એ વાત તેઓ સારી રીતે જાણે છે. એવા આચાર્યોની હું સ્તુતિ કરૂં છું. રા * અર્થ :- મનુષ્યો સ્ત્રીઓના વિકાર ઉત્પાદક અવયવોને જોઇને અંતરમાં મેહ ધારણ કરતા નિષ્ફળ કામને ઉત્પન્ન કરીને મનમાં સંતાપ * પ્રાપ્ત કરે છે. નિષ્ફળ પ્રવૃતિ જેણે દૂર કરેલી છે. એવા આચાર્યોએ પ્રમાણે સંતાપના કારણે જ સવતા નથી. તે આચાર્યોની હું સ્તુતિ કરું છું. *. Hકના અર્થ :- જ્યાં દંપતિનો નિવાસ હોય ત્યાં ભાતને આંતરે કામના આવેશવાળી તેની વાત અનાયાસ સાંભળવામાં આવે એ જાણીને સંયમ માર્ગમાં વિચરનારા આચામાં એવી વસ્તીમાં વસવાનું છોડી દે છે. તે આચાર્યોની હું તુતિ કરું છું. 31aaaa અર્થ :- લાપૂર્વક કે નિર્લજપણે નાંગી થઈને તારા વડે કામક્રીડા વિસ્તારી એ પ્રમાણે ગવાર પણ સાંભળીને જેમનું મન શું વ્યથા પમાડે છે ? અર્થાત પમાડતું નથી તેઓ સામાયિક (આટકુમારના પૂર્વ જન્મનું નામ) ની જેમ લેકમાં વિકળતાને ધારણ કરતા થિી. એવા આચાર્યની હું સ્તુતિ કરૂં છું કરી અર્થ :- ઘી, દુધવિંગેરે) ભોજન ખરેખર કામની પીડાને માટે થાય છે, માટે આવા વિકારને ઉત્પન્ન કરનાર ભજનથી હંમેશા દૂર થઈને તપસ્યામાં લીન રહેનારા આચાર્યાનું મન કોઈ પણ રીતે વિકૃત થતું નથી. તે આચાર્યોની હું સ્તુતિ P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ અથ - રૂક્ષ ભજન પણ શાસ્ત્ર વચનોથી વિહિત કરેલું હિતકારીને માપસર મુનીઓ ગ્રહણ કરે છે. જેથી તત્કાળ સમાધિ થાય છે. તે સમાધિથી સુંદર મનવાળા તેઓ અંદરના શત્ર, સમુહને સારી રીતે હણે છે. એવા આચાર્યની હું સ્તુતિ કરૂં છું. 34 અર્થ :- વાળને ઓળવા વગેરે સંસ્કાર અને શરીરમાં આભુષણે ધારણ કરવાં શેડા જળથી સ્નાન અને તેલ મર્દન વગેરે શરીરમાં કામાગ્નિના તાપને ઉત્પન્ન કરે છે. એમ જાણીને જે શરીરને કાંઈપણ શણગારતા નથી એવા આચાર્યોની હું સ્તુતિ કરૂં છું. ||સંપા . અર્થ :- કોધથી ભરેલા જીવો પ્રજવાતા અગ્નિની જેવા સારી રીતે તપેલા મનવાળા અને બનેલા હોય છે. તેઓ પિતાના અને પરના હિતના નાશને માટે થાય છે. એમ જાણીને સમજુ એવા આચાર્યો કોઈપણ રીતે ક્રોધ યુક્ત થતા નથી તે આચાર્યોની હુ સ્તુતિ કરૂં છું. 36aaaa અર્થ :- મદથી મદોન્મત થયેલા (જીવ) વજનને પણ સારી રીતે નિંદે છે. અને કાર્યાકાર્યના જણાવનારા મોટા ગુણનો ત્યાગ કરે છે. જેમણે મદની માયા જાણી છે. એ આચાર્યો કઈ પણ અહંકાર કરતા નથી. એવા આચાર્યોની હું સ્તુતિ કરૂં છું. ૩૭ના અથ :- આ માયા અનેક અંધકારનું સાક્ષાત ઉત્તમ ઘર છે. વળી તે મહા મેહના ઉનાળે ઉત્પન્ન કરવાને અતિશય સુંદર સુંદરી છે. તે માયાના વૈભવ - સમુદાય જેમના મનને સંતાપતા નથી એવા આચાની 6 સ્તુતિ કરું છું 385 અથ :- આ લેભ પાપ વિષયક લાભને છેડવી દે છે. અને પૂણ્યકાર્ય કરવામાં ખરાબ એવી સ્તબ્ધતા - અકડાઈને ધારણ કરાવે છે. એવા લોભ જે આચાર્યોના અંતઃકરણમાં કઈ પણ રીતે પ્રવેશ પામતા નથી. તે આચાર્યોની હું સ્તુતિ કરૂં છું. 39 અર્થ :- સૂક્ષ્મ કે સ્થૂલ પ્રાણી સમુહમાં પ્રાણાના નાશને ક્યાંય પણ જરા પણું મન વચન ક્રિયાથી જેઓ કરતા નથી અને કહ્ય દયાના દરિયને દુર કરે છે. એવા આચાર્યોની હું સ્તુતિ કરૂં છું. Ilyoll અર્થ :- આ જગતમાં ગુવાન પુરૂષોમાં વિલાશ કરતા સજજનો કોધથી, | P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ તથ્ય અને પશ્ય વચન બોલે છે. એવા આચાર્યોની હું સ્તુતિ કરૂં છું. મારા અર્થ :- મુનિઓના નાયક જે આચાર્ય ભગવંત ચાર પ્રકારે શાસ્ત્રમાં વર્ણવેલું સ્વામી આદત, જવાદત, તિર્થંકરદત ગુરૂદત્ત સુલભ છતાં કાંઈપણ અદત્તને છતા નથી, સર્વ સંપતિ જેમને પરવશ બનીને આધીન રહે છે, એવા આચાર્યોની હું સ્તુતિ કરું છું Liારા અર્થ :- કામદેવને મારી મારીને જેઓ તિર્યંચ સંબંધી હલકું તુચ્છ અને દેવસંબંધી તથા મનુષ્ય સંબંધી સુંદર અબ્રહ્મચર્યના પાપને સેવતા નથી. પરબ્રહ્મમાં રહેલા અને પરમપદના લીન મનવાળા જેઓ છે, તે આચાર્યની હું સ્તુતિ કરું છું. 43aaaa અર્થ - લોકે મૂછને આશ્રયીને બિચારા પરવશપણે અતિશય શરીરને કષ્ટદાયી એવા સંતાપને ક્ષણે ક્ષણે પામે છે. એમ જાણીને જેઓ સુજ્ઞ કંઈપણ પરિગ્રહ રાખતા નથી, એવા આચાર્યોની હું સ્તુતિ કરું છું. ૪૪મા અર્થ :- વિધિ પૂર્વક જીનેશ્વર ભગવાનના વચનને ભણીને તેના સત્ય ભાવોને ગ્રહણ કરીને અમને ગમ્યા સિવાય જેઓ ભવ્ય આત્માઓને વિશુધ્ધ અર્થોને સમજાવે છે. પવિત્ર જ્ઞાનચારમાં જેની મતિ જોડાયેલી છે, અને જેઓ મૃતધન એટલે જ્ઞાન એજ જેનું ધન છે. એવા આચાર્યોની હું સ્તુતિ કરું છું. T૪પા T અથ :- નાચારમાં કુશળ એવા જેઓ આ લોકમાં નિશ્ચય કરીને આઠ પ્રકારે સબધી સમ્યક દર્શનને ભવ્યજન રૂપી ખેતરના સમુહમાં વાવે છે. જેમનાથી અરિહંત પરમાત્માનું સામ્રાજ્ય વિધિમાં વિખ્યાત મહિમાંવાળુ જ્યવંત છે. એવા આચાર્યોની હું સ્તુતિ કરું છું. મઝદા 1. અર્થ :- વ્રત રૂપી કિલામાં જેઓ પોતાના આત્મા રૂપી ઘરનું સદા રક્ષણ કરે છે. વળી ભવ્ય આત્માઓને નિર્મળ રત્નત્રયને આપીને તેના આત્માનું પણ રક્ષણ કરે છે. આ લોકમાં જેઓ ચારિત્રાચારને વિશુદ્ધ કરે છે તે આચાર્યોની 6 સ્તુતિ કરૂં છું. zણા અર્થ :- અહે ! મહાન કમરૂપી પર્વતને તોડવા માટે દેદીપ્યમાન બાર પ્રકારનું તપ ફપી જેઓ વિજ ધારણ કરે છે. અને તેથી જેઓ સાક્ષાત્ ઈન્દ્રની P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ પદવીને અનુભવે છે. આત્મામાં જેઓ સતત રત છે. એવા આચાર્યોની હું સ્તુતિ 48 અર્થ :- વીર્યાચાર વગર આ વિશ્વમાં કોઈપણ રીતે પાપસમુહના વિસ્તૃત હિતકારી અત્યંત અંતને કરી શકતો નથી. એ પ્રમાણે સમજીને જેઓ વીર્યાચારમાં સતત સાવધાન મનવાળા છે, એવા આચાર્યોની હું સ્તુતિ કરું છું. ઝાા અથ :- મોના સંચારથી ખેલા સુર્યના કિરણથી ઉજવળ પરિચિત અને દિવને ભિન્ન નહીં થયેલ એવા માર્ગને ચારે બાજુએથી જોઇને દર્યાસમિતિયુત જેનું ગમન પ્રાણીના સમુદાયનું રક્ષણ કરે છે. એવા આચાર્યોની હું સ્તુતિ કરું છું. અર્થ :- સાવદ્યનો ત્યાગ કરવા પૂર્વક ઘણા આત્માઓને ઉલાસ આપનારો પ્રાયઃ મઘુર, સત્ય અને પરિમિત વચન બોલતા પૃથ્વીતલ ઉપર મુનીઓના નાયક " જેઓ અહિં ભાષાસમિતિને ધારણ કરે છે, એવા આચાર્યોની હું સ્તુતિ કરૂં છું. પલા * અથ :- ગોચરીને આચારની બેંતાળીસ દોષથી રહિત ભિક્ષાથી વિશુધ્ધ . આહાર વગેરે ગ્રહણ કરીને જેઓનું મન, રસને જીતનારૂં ત્રીજી (પણ) સમિતિમાં રમે છે, એવા આચાર્યોની હું સ્તુતિ કરૂં છું. Lપરા અથ :- નિર્મળ વિધિપૂર્વક મનોયોગ દરને સારી રીતે જોઈને વસ્ત્ર વિગેરે ઉપકરણ લે છે અને મૂકે છે એ રીતે જ્ઞાની એવા જેઓ એ થી (આદાન ભંમત નિકપણા) સમિતિનું સારી રીતે રક્ષણ કરે છે, એવા આચાની હું નૃતિ કરું છું પડા અર્થ :- મળ, મૂત્ર વળી એવું કંઈ પણ વિવેકયુક્ત મનપૂર્વક જેઓ નાના પ્રકારના જીવોથી રહિત સ્થાનમાં (શુધ્ધ ધંલિ ભૂમિ) ત્યજે છે. અહા ! જેઓ પ્રકટપણે સુંદર પરિસ્થાનીકા સમિતિનું રક્ષણ કરે છે, એવા આચાર્યોની હું સ્તુતિ કરું છું. પઝા અર્થ :- જેઓનું મતિથી રક્ષા લું, પાપરહિત વિસ્તારવાળા વૈભવવાળું મન રૂપી માછલું પરાભવના મંદિર સ્વરૂપ વિકલ્પોની જાળમાં ફસાતું નથી અને સમાધિરૂપી સમુદ્રમાં વિલાસ કરે છે. એવા આચાર્યોની હું સ્તુતિ કરું છું પપા P.P. Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ - અ :- યોગને સાચવવા પૂર્વક આહાર વિગેરે સંજ્ઞાઓને ત્યાગ કરીને સાક્ષર શિરોમણી જેઓ નિર્મળ વચનને સ્વીકારે છે અથવા મૌનને સ્વીકારે છે એ રીતે વિધિપૂર્વક હંમેશા બુદ્ધિમાન એવા વચનગુપ્તિની સારી રીતે રક્ષા કરે છે એવા આચાર્યોની હું સ્તુતિ કરૂં છું. ' પદા અર્થ :- ક્રૂર ઉપસર્ગનો પ્રસંગ આવી પડવા છતાં જેઓ મનહર શરીરનો ત્યાગ કરીને ધ્યાનને વિસ્તારે છે. જેઓની કાયગુપ્તિ ઇછિત ફળને આપનારી કલ્પવેલડી છે. એવા આચાર્યોની હું સ્તુતિ કરૂં છું. ૧પણા અર્થ :- જે શ્રેષ્ઠ આગમમાં બે તસ્કંધ છે. 25 અધ્યયનો છે. 18000 પદો છે તે આચારાંગને જેઓ વિધિપૂર્વક વાચનામાં કહે છે. વિનયથી વશ થતા અભિમત એવા ઉપાધ્યાયને હું વંદુ છું. પ૮ અથ :- જે બે તસ્કો વડે વેવીશ વિશિષ્ટ અધ્યયનો વડે અને પહેલા કરતા બમણી સંખ્યાવાળા એટલા 36 000 પદ વડે શોભે છે તે બીજા (સૂતાંગ) અંગને જેઓ મધુર વચને ગાય છે. વિનયથી વશ થતા અને અભિમત એવા ઉપાધ્યાયને હું વંદુ છું. _પલા અર્થ :- એકથી માંડીને દશ સુધીની સંખ્યામાં અધ્યયનોમાં આગમમાં અનેક પદાર્થોનું વિધાન કરવામાં આવ્યું છે તે સૂત્રને સ્થાનાંગ) વિધિપૂર્વક વિશદ રીતે મૂનિવરો. ને આપે છે ને વિનયથી શકતા અને અભિમત એવા ઉપાધ્યાયને હું વંદુ છું 6 અર્થ :- તે સંખ્યા સુધીના વિવિધ પદાર્થોનો સમુદાય જેમાં જ્યવંત વ છે અને જેની પદ સંખ્યા સ્થાનાંગ કરતાં બમણી અર્થાત 144000 પદની છે તે શું અંગ (સમવાયાંગ ) જેમના વદન કમળમાં ભ્રમરની માફક ગુંજારવ કરે છે એવા ઉપાધ્યાયને હું વંદુ છું A , ૬લા અથ :- જે અનંત અર્થો નય. ગમ, ભંગ વડે કરીને યુક્ત છે. જેમાં ચાલીશ શતકની અતિશય નિર્મળ રચના છે તે ભગવતી અંગને જેઓ મુનિવરના સમુદાયમાં વિસ્તારે છે. તે ઉપાધ્યાયને હું વંદુ છું _દરા અર્થ :- જેમાં બે શ્રુતસ્કંધ છે. પ્રથમ તસ્કધમાં 19 કથાઓ છે અને બીજા શું તરકધમાં 10 કથાઓ છે. આ કથાઓ ધમને પુષ્ટ કરનારી અને વિસ્તૃત P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ ગુણવાળી છે. આ જ્ઞાતાધમથાંગ સૂત્રને પંડિત એવા જેઓ શિષ્યોની સમક્ષ વિવરણ કરી સમજાવે છે તે ઉપાધ્યાયને હું વંદુ છું 63aaaa અર્થ :- દશ અધ્યયન વાળા એક છે,તસ્ક ધ રૂપ જે આગમમાં દેશવિરતિ ગ્રહણું કરેલા આનંદ વગેરે દશ શ્રાવકોની સમ્યકત્વપૂર્વકના વતની કથા છે તે સાતમા ઉપાસકદશાંગ અંગને જેઓ મુનિવરેને સારી રીતે કહે છે તે ઉપાધ્યાયોને હું વંદુ છું. ૬ઝા અર્થ :- જેમાં એક શ્રે તસ્કધ છે નેવું અધ્યયોનો છે જેની રચના સુંદર છે. જેમાં આઠવગ છે અને જે અનંત અર્થનું મંદિર છે. અતિશય નિર્મળ એવા તે આઠમાં અંતગડદશાંગને જેઓ શિષ્યોને ઉપદેશે છે તે ઉપાધ્યાયોને હું વંદન પા અર્થ :- એક કુતસ્કંધ સ્વરૂપ જે આગમોમાં અનુત્તર વિમાનમાં ગયેલા આત્માઓની વાત 33 અધ્યયન અને ત્રણ વર્ગમાં કહેલી છે તે નવમાં અનુતરો પપાતિક અંગને જેઓ શિષ્યો સમક્ષ કહે છે તે ઉપાધ્યાયને હું વંદુ છું. 6 અથ :- જે દશએકવચન સ્વરૂપ એક અતધ યુકત દશમાં પ્રશ્ન વ્યાકરણ અંગમાં દશ પ્રકારના ગંભીર અર્થની યોજના છે. તે અંગને જેઓ હપૂર્વક અંતઃ કરણમાં સ્થાપન કરે છે તે ઉપાધ્યાયોને હું વંદુ છું. દુકા અર્થ :- જેમાં બે મુતસ્કંધ છે અને જેમાં વોશ અધ્યયનો છે અને જેમાં 1, 84, ૩ર૦૦૦ પદ તે 11 માં વિપાકાંગને કહેવામાં અપ્રમત છે તે ઉપાધ્યાયને હું વંદુ છું. - 68 અ :- જેમાં ચંપાનગરીનું સમવસરણ સુંદર રીતે અદ્દભૂત વર્ણવ્યું છે. જે પહેલા અંગનું ઉપાંગ જગતને અદ્વિતિય હિતકારી જ્યવંતુ વર્તે છે. મુનિજનોને તે ઉપાંગને વિધિપૂર્વક જ્ઞાનિ એવા જે વાંચના આપે છે તેવા ઉપાયોને હું .60aaaa અથ :- જે બીજા ઉપાંગમાં પ્રદેશ રાજાએ પુછેલા પ્રશ્નો કેશીગણધરે ભગવતે કહેલ ઉત્તરો છે. અને સૂર્યાભદેવે કરેલા નૃત્યનું વર્ણન છે. તે ઉપાંગ જેમના મુખરૂપી ઘરમાં નૃત્ય કરે છે. તે ઉપાધ્યાયોને હું વંદુ છું. મારા P.P.AC. Gunratnasuri -M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ અથ :- જેથી અત્યંતર લમીવાળા મહાપુરૂષો જીવજીવનું જ્ઞાન મેળવે છે. જેમાં નંદીશ્વરદ્વીપ, વિજયે દેવ વગેરેનું જ્ઞાન છે. તે બીજુ ઉપાંગ જેઓ કહે છે તેથી સ્થિર બુદ્ધિવાળા મુનિવરોને સ્થિરતા આપે છે તે ઉપાધ્યાયોને હું I71 અ :-જે અતિશયભર્યા અર્થોથી વિશદ છે. અદ્વિતીય 36 પદોથી ભરેલ છે અને જેના શ્રવણથી પાપ શીધ્ર દૂર થાય છે. તે ચોથું ઉપાંગ જેમના ભણાવવા વડે અહે શોભે છે. એ ઉપાધ્યાયોને હું વદુ છું Iકરા અથ :- જેમાં સૂર્યવિગેરેના માંડલાનો વિસ્તાર કહેવાયો છે. અને પ્રસિદ્ધ 57 પ્રાભૂતમાં તારાઓનું સ્વરૂપ છે તે પાંચમું ઉપાંગ જેમના વદન ચંદમાં વિશે સારી રીતે રમણ કરે છે. તે ઉપાધ્યાયોને હું વંદુ છું 73 અર્થ :- જે જંબુપ્રાપ્તિ આગમનાં 64 'ઈન્દોએ અતિશય ભકિત પુર્વક કરેલા જિનેશ્વર ભગવંતના જન્મોત્સવનું વર્ણન છે તે છે ઉપાંગ જેમના મુખરૂપી સૂર્યથી વિકાસ પામે છે તે ઉપાધ્યાયને હું વંદુ છું અર્થ :- પચાસ પ્રાભૂતયુક્ત જે ઉપાંગમાં શ્રાવણવદ -1 થી આરબીને ઘટી વિગેરેની ગણના સમજાવવામાં આવી છે તે ચંદુપ્રજ્ઞપ્તિ ઉપાંગને જેઓ વર્ણન કરીને વિકાબ પમાડે છે તે ઉપાધ્યાયને હું વંદુ છું અથ :- જે આઠમાં ઉપાંગમાં ભગવાને “કાળ વગેરે દશકુમારે લડાઈ કરીને નારકોમાં ગયા એ વૃતાંત સ્પષ્ટ વર્ણવ્યું છે તે ઉપાંગને જેમના મુખેથી સાંભળીને = ભવ્યાત્માઓ જ્ઞાન મેળવીને મુકિત પામે છે તે ઉપાધ્યાયને હું વંદુ છું. 76 અર્થ :- જે નવમાં ઉપાંગમાં પદમ વગેરે દશ પુણ્યવંત કુમારે ચારિત્ર G લઈને ભવિષ્યમાં જેમનું કલ્યાણ થવાનું છે. તે સ્વર્ગને પામ્યા એ અધિકાર છે તે ઉપાંગને જેઓ મુનીઓને કહે છે તે ઉપાધ્યાયને હું વંદુ છું. પાછા - અ :- ચંદ્ર, સૂર્ય, શુક બહુપુત્રિકાદેવી, પુર્ણભદ, શીવ, દન્ત, માણીભદ્ર, બલ અને અણહિય એ દશનું વ્રત ત જેઓ દશમાં ઉપાંગથી સમજાવે છે તે ઉપાધ્યાય [5781 અર્થ :- શ્રી, હી, લક્ષ્મી, ધૃતિ, સુર–કીર્તિ–મતિ–રસ, દલા, ગન્ધા એ દશ જે ઉપાંગમાં ગવાયેલી છે. તે 11 માં ઉપાંગને જેઓ મુનિઓને સમજાવે છે તે ઉપાધ્યાયોને હું વંદુ છું. P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ અથ ; દ્વારામતિ નગરીમાં થયેલા નિધિમર વિગેરે સજજનકુમારનું ઉ૯લાસભર્યું ચરિત્ર જેમાં કહેવાયેલું છે તે બારમ ઉપાંગ જેમના વદન મંદિરથી પ્રસરે છે તે ઉપાધ્યાયોને હું વંદુ છું. ' 8ol અર્થ :- જેમાં મતિજ્ઞાન, શ્ર તત્તાન, અવધિજ્ઞાનનો અધિકાર છે મનઃ પર્યાય છે અને મનઃ પર્યજ્ઞાન તથા કેવળ જ્ઞાન પણ યથાસ્વરૂપે કર્યું છે. તે આ નદીને ચરણસિતરી અને કરણજિતરીના ધારક જેઓ ગણે છેતે ઉપાધ્યાયને હું વંદુ છું - 81 અર્થ :- જેમાં જિનેશ્વર ભગવતિએ ભાખેલા વિશિષ્ટ આગમને પ્રાપ્ત કરવામાં નામ સ્થાપના -દ્રવ્ય અને ભાવ એ ચાર પ્રકારનો નિક્ષેપ જેનો વિસ્તૃત વૈભવ છે એ સારી રીતે હેતુભૂત છે એમ સમજાવ્યું છે તે અતિગહન અનુયાગ દ્વાર સુત્રને જેઓ સમાન છે તે ઉપાધ્યાયને હું છું કે 8 * અથ :- જેઓ મનવચન, કાયાથી પ્રાણના વિનાશથી વિરમવારૂપ પ્રથમ મહાવ્રતને ઘારણ કરીને આ લેકમાં વિવાદ રીતે અભયની રક્ષા કરે છે પિતાના નિશ્ચિત સામે હંમેશા યત્નપૂર્વક પ્રવૃતિ કરે છે એવા મુનિવરોનું નિર્મળચરિત્ર ખરેખર વિજ્યવતુ વતે છે. 183 અર્થ :- મોના કલ્યાની અંદર નિમગ્ન થયેલા જે મુનિવર કૃપાવાદથી વિરમે છે અને આમાં જેઓને હિતવિલાસ સ્થાપન કર્યો છે. જેઓ સતત ઉપગ વાળા છે જે સત્યવચન વદે છે. અને મનમાં ખરેખર સદહિતને પ્રાપ્ત કરે છે એવા મુનિવરોનું નિર્મળ ચરિત્ર ખરેખર વિવંતુ વતે છે 84 . અય :- જેઓ પોતાની વાચના સકળ થાય કે નિષ્ફળ થાય છતાં પણ તૃણમાત્ર પણ પારકી માલિકીનું નહિ દીધેલું કોઈપણ રીતે ઈછતા પણ નથી ને કારણે જેઓને સર્વ સંપતિઓ શીધ્ર પિતાની મેળે જ વરે છે એવા મુનિવરનું નિકળચરિત્ર અહી વિજયવંતુ વર્તે છે. Li૮પા અર્થ :- અહિ જેઓને નીત્ર સતત શાસ્ત્રને વિષે રતિ રહે છે. રતિ સમા ત્રી જેઓના મનમાં ને પણ આવતી નથી. જેઓ મુનિપણને ધારણ કરીને પાપોનું નિધુવન, નિરકન જેઓ કરે છે તેવા મુનિવરોનું નિળ ચરિત્ર અહીં વિજયવંતુ વતે છે. ૮૬ના P.P. Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ અર્થ :- જેઓ હંમેશા ગ્રંથને વિશે - શાસ્ત્રને વિશે આશકત હોવા છતાં પૃથ્વી ઉપર શ્રેષ્ઠ નિગ્રંથ કહેવાય છે. અને નવ પ્રકારના બાહ્ય અને ચૌદ પ્રકારના આવ્યંતર પરિગ્રહ ઉપર જેઓની મમતા નાશ પામી છે. એવા સહજ પણ મૂછને ધારણ કરતા નથી. જેઓની સમતા વિખ્યાત છે એવા મુનિવરનું નિર્મળ ચારિત્ર અહ વિવંતુ વર્તે છે. 87 અથ :- જેઓનુ હદય આ લોકમાં જીવોનું રક્ષણ કરવામાં સારી રીતે . આંશકત થયેલું છે. તેથી જેઓએ રાત્રિને વિશે અનશન - પાણીનો ત્યાગ કર્યો છે. જેઓએ સતત સિદ્ધાંતથી ઉત્પન્ન થયેલું અમૃત પીધું છે. એવા મુનિવરેનું નિર્મળ ચારિત્ર અહો વિજયવંતુ વતે છે. 885 અથ :- ઘર વિગેરે - બનાવવામાં - ખાવામાં, ખેતીમાં વિગેરેમાં પૃથ્વિકાયની હિંસા જાણીને જેઓ જરા પણ મનને રાખતા નથી. અહિં જેઓ હમેશા સારી રીતે પ્રગટપણે વૃશ્વિકાને રહે છે. તેવા મુનિઓનું નિર્મળ ચારિત્ર અહો વિજયવંતુ વતે છે. . એટલા અથS :- પાણીના જીવોના રક્ષણમાં આસકત હોવા છતાં પણ જેઓ સચિત પાણી વાપરતા નથી અને શરીરને જળથી સિંચતા નથી જેઓ વર્ષાઋતુમાં સંલીનતા નામના શ્રેષ્ઠ તપમાં હંમેશા આસક્ત રહે છે. એવા મુનિવરેનું નિર્મળ ચારિત્ર અહે વિયવંતુ વતે છે. * 11.coll અર્થ :- પ્રકોશને ફેલાવા છતાં પણ જેઓ દીવા સળગાવતા નથી જડતાથી રહીત જેઓ ઠંડી વાય ક્તાં અગ્નિ કરતા નથી. વ્રતધારી જેવો તેજસકાયની ચારે બાજુથી રક્ષા કરે છે. એવા મુનિવરેનું ચારિત્ર વિયવંતુ વતે છે. પહેલા અર્થ :- જે પવિત્ર પંથવાળા પવનનો ય કરીને સારી રીતે મન જીતવા માટે ફુક પણ મારતા નથી. અને પંખો ચલાવવાથી પણ વિરમે છે. તેમની ગતિ સારી રીતે વાયુકાળને પણ કુશળ પમાડે છે. એવા મુનિવરોનાં નિર્મળ ચરિત્ર અહીં જયવંત વતે છે. Tહેરા અર્થ :- જેઓ સચિત્ત ફળ, પુષ્પ, મૂળ, છાલ, કાઠ, પત્ર અને બીજનો કઇપણ ઉપયોગ કરતા નથી અને એ રીતે જેઓ વનસ્પતિકાયની સર્વ પ્રકારે રક્ષા કરે છે. એવા મુનિવરનું નિર્મળ ચારિત્ર અહા જયવંત વતે છે. 93 P.P.Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ અર્થ :- જળ, પતંગીયું વિગેરે જીવોનું રક્ષણ કરવામાં હંમેશા તનાવાળા રહે છે ૫ચેન્ટિના હિતમાં પણ જેઓ સયત્ન રહે છે. વિધિ પૂર્વક જેમા ઉપયોગશીલ બનીને ત્રાસથી ત્રસકાયનું રક્ષણ કરે છે એવા મુનિવરેનું નિમી ચારિત્ર અહો વિજયવંત વતે છે. જા અથ :- પોતે કુશળ અને ચક્ષવાળા છે અને કોઇપણ જગ્યાએ એકાંતદૃષ્ટિને ધારણ કરતા નથી અને કાંત દૃષ્ટિથી વ્યવહાર માર્ગમાં ચતુરાઈ ધારણ કરીને ચાલે છે. અને હંમેશા એકેન્દ્રિઓને વ્યથા પમાડવાથી વિરમે છે એવા મુનિવરેનું નિર્મળ ચારિત્ર અહો વિજયવંત વર્તે છે. 112 અર્થ :- જળ, છીપ, કરમીયા, (કાઠનાં) શંખ, કડી, જળ જેવું લાંબુ જીવ આ બધાં બે ઈન્દ્રિયપણે પ્રસિધ્ધ છે. એ સર્વની મનવચન-કાયાની રક્ષા માં જેઓ ઉઘુ કત છે એવા મુનિવરોનું નિર્મળ ચરિત્ર અહો વિજ્યજંતુ વર્તે છે. 96aaaa - અથ - બગાઈ, લીખ, માંકડ, ઉધઈ, ગોપ (લાલ તે ઈન્દ્રિય જીવ) ઘીમેલ, જ, આ બધા વિશ્વમાં તે ઇન્દ્રિયપણે વિખ્યાત છે. જેઓ આ સર્વેને ઘમાં પણ હણતા નથી. એવા મુનિવરનું નિર્મળ ચરિત્ર અડી વિજયવંતુ વતે છે. - ૯ણા અથ :- ભમરો, કળવું, મધમાખી, કાનખજુરો, આ ગીયું જંગલી માખ, વીંછી, વરટા રેનિદ્રય જીવ) વર્ષ કરીકા, જલ્લીકા વિગેરે ચદ્ધિ જીવોનું પિતાનું હિત સાધવામાં ચતુર એવા જેઓ પિતાની જેમ રક્ષણ કરે છે એવા મુનિવરનું નિર્મળ ચરિત્ર અહા જયવંતુ વતે છે. (જલ્લીકા-ઝાલર જેવા વાજીંત્ર જેવું અવાજ કરનાર પ્રાણી) . . 98 અર્થ :- તિ , નારકીઓમન અને દેવો એ પ્રમાણે જગતના ચારે પ્રકારના પંચેન્દ્રિોને પણ મનથી પણ જેઓ હણતા નથી. કલુપતા વગરના અને કઠોરતા વગરનાં જે વચન અને કાયા વડે ન હણે એમાં શું કહેવું છે એવા યુનિવરોનું નિર્મળ ચરિત્ર અહા જ્યવંત વર્તે છે. I !aa - અ :- લોભને જીતે છે તે જીતી ન શકાય એવું હતું સેન્સ લવ છતાય છે. અને મેહ નય એટલે મુકિત હાથમાં આવી જાય છે. એ પ્રમાણે P.P. Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ 12 જાણનારા જેઓ જે નિગ્રંથ હદયમાં અંશમાત્ર પણ લોભ ધારણ કરતાં નથી એવા મુનિવરોનું નિર્મળ ચારિત્ર અહો જ્યવંત વર્તે છે. - tool અર્થ :- જેઓની પાસે ક્ષમારૂપી શસ્ત્ર છે તેઓને કોઇથી પણ ભય નથી. વર્ગને અને પૃશ્વિમાં નિર્મળ થશથી તેઓ હંમેશા દીપે છે. એવી રીતે સમજીને રોષ વગરના જેઓ સદાકાળ ક્ષમાને ધારણ કરે છે એવા મુનિવરનું નિર્મળ ચરિત્ર અહે ! વિજયવંત વતે છે. : I૧૦ના અથ :- બાર પ્રકારની ધર્માનપેક્ષા (અનિત્ય - અશરણ વિગેરે બાર ભાવના) 'પચ મહાવ્રતાની સ્થિરતા માટે શાસ્ત્રમાં બતાવેલી પચીસ ભાવનાઓ અને મૈત્રી વગેરે ચાર ભાવનાઓ જેઓના ચિત્તરૂપી ઘરને છોડતી નથી. એવા મુનિઓનું નિર્મળ ચરિત્ર અહો ! વિજયવંત વર્તે છે. - કે ૧૦રા અર્થ :- પાત્ર, વસ્ત્ર, સારા ઉપકરણો અને વસ્તીનું જેઓ દૃષ્ટિથી અને કોમળ પુંજણીથી પ્રમાર્જન કરે છે. નિયમિત પડિલેહણ વિધાનમાં જેઓ પ્રમાદ કરતા નથી એવા મુનિવરોનું નિર્મળ ચરિત્ર અહો વિજ્યવંત વતે છે. 103 અથ :- મનો વિરામ રહિત ભવરૂપી જંગલમાં ભમી ભમીને કોઈપણ રીતે સંયમ વિના સિધિને પ્રાપ્ત કરતા નથી. તેથી જેઓ શિધ્ર સંયમ યોગનાં પદને સ્થાનને સેવે છે. એવા મુનિવરોનું નિર્મળ ચરિત્ર અહમ યેવત વતે છે. 104 અથ :- પિતા (મન) અને પુત્ર (કામ) એ સાથે થઈ જાય તે દાન શાન્ત આત્માઓને પણ કયું પાપ ઉત્પન્ન કરાવતા નથી. એ પ્રમાણે શીધ્ર જાણીને મનથી મનોજને દુર કરીને જેઓ અતિચપળ એવા મનને રક્ષણ કરવામાં તત્પર રહે છે એવા મુનિઓનું નિર્મળ ચરિત્ર અહો જયવંત વર્તે છે. ૧૦પા અથ :- વવશ નહિ કરેલું વચન જગતમાં કયા અનર્થને જન્મ આપતું નથી અને સારી રીતે વશ કરેલું વચન કલ્યાણને વિસ્તારે છે. માટે જે મુનિવરો વચનગુપ્તિ ધારણ કરીને “વાચંયમ” એવા પ્રકારનું નામ ધારણ કરે છે એવા મુનિવરનું નિર્મળ ચરિત્ર અહો જયવંતુ વર્તે છે. 106 P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ અર્થ :- સ્વાધીન શરીર ખરેખર અશરીર માટે - મોક્ષને માટે થાય છે. અને અસ્વાધીન શરીર અનંતાનંત શરીરને જગતમાં ઉત્પન્ન કરે છે. અર્થાતશરીરને વશમાં રાખ્યું હોય તો મોક્ષ મળે અને વશમાં ન રાખ્યું હોય તે અનંતાનંત શરીર ધારણ કરવા પડે) માટે જેઓ સતત કાયાનું કાયગુપ્તિથી રક્ષણ કરે છે એવા મુનિવરોનું નિર્મળ ચરિત્ર અને વંતુ વર્તે છે. 107 છે . ) : અથ” :- સુધા વિગેરે બાવાએ પરિસહોને સહન કરેલા તે પરિસહ મોક્ષસુખને આપે છે. એથી જેઓએ ધર્મ ધારણ કરીને સારી રીતે પરિસહ ન્ય જીત્યું છે. એવા મુનિવરનું નિર્મળ ચરિત્ર અહો જયવંતુ વતે છે. 108 . અર્થ :- જેઓ શુભધ્યાનમાં મિત્ર છે. એક્ષપદની પવિત્ર ઉચ્ચ ધૂરાને વહન કરવામાં જેઓ વૃષભ છે ધર્મના માર્ગમાં જેઓ ચાલે છે દુમત માગમાં જેઓ જવાની કદી પણ ઈચ્છા કરતા નથી. જે પ્રસરતા ઉપસર્ગો વડે પણ માર્ગથી જરા પણ ચલિત થતા નથી એવા મુનિવરોનું નિર્મળ ચરિત્ર અહે જ્યવંતુ વતે છે. 19aaaa સમાત - P.P. Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ (2) श्रीचतुर्विंशति-जिनस्तुतया श्लोकान्वय-वृत्तिभ्यां च विराजिता! Jun Gun Aaradhak Trust PP.AC. Gunratnasuri M.S.
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________________ // श्रीपरमात्मने नमः / / // श्रीचतुर्विंशति-जिनस्तुतयः / जयश्रीनेतारं प्रथमजिनपं नोनुवति ये, मुदा मामान्यन्ते त्रिदशवृषभैस्तेऽपि हरिदत् / प्रपेप्रीयन्ते ये वृषभजिन-नेत्रामृतरसैः, प्रपेत्रीयन्ते ते युवतिभिरहो विष्णुपितृवत् // 1 // अन्वयः- ये, जयश्रीनेतारम्, प्रथमजिनपम्, नोनुवति, ते, त्रिदशवृषभैः, . / अपि, मुदा, हरिवत्, मामान्यन्ते, ये, वृषभजिननेत्रामृतरस:, प्रपेप्रीयन्ते, ते, . युवतिभिः, विष्णुपितृवत्, प्रपेप्रीयन्ते, अहो / वत्तिः -ये-यत्प्रकाराः, भव्धजना:, / जयश्रीनेतारम्-जयो विजयश्च श्रीलक्ष्मीश्च जयश्रियौ तयोर्नेता-अग्रणी जयश्रीनेता तन्तथा, विजयस्य लक्ष्म्याश्च / सम्प्रापकमित्यर्थः / प्रथमजिनपम्-जिनानर्हतः पाति रक्षतीति जिनपः, जिनेश्वर इत्यर्थः, प्रथम आदिश्चासी जिनपः प्रथमजिनपस्तन्तथा, वृषभनामानमादिजिनेश्वरमिति यावत् / नोनुवति-पुन: पुनरतिशयेन वा नुवन्तीति 'नु' धातोः 'व्यञ्जनादेरेकस्वरात्"३।४।९।। इत्यनेन यङि प्रत्यये अनमित्तिकत्वादन्तरङ्गत्वेन 'वहुलं लुप्" इति यङो लुपि प्रत्ययलक्षणेन यङन्तत्वात् 'सन् यङश्च "4 / 1 / 3 / / | इति द्वित्वे "आगुणावन्यादे: " 4 / 1147 / / इति गुणे "तिवा शपा" इति परिभा—पया 'इङितः" 3 / 3 / 22 / / इत्यस्याप्रवृत्तौ ‘शेषात्"-३।३।१००।। इति परस्मै=पदे वर्तमानायामन्ति-विभक्तौ "एताः शितः" 3 / 3 / 10 / / इति शित्वे 'नो लुक' -4 / 2 / 96 // इति -लुकि “यङ्लुप् च" इत्यदादित्वात् शवभावे "शिदवित्"_४।३।२०॥ इति ङित्वात् 'नामिनः' 4 / 3 / 4 / / इति गुणाऽप्रवृत्ती "धातोरिवर्णोवर्णस्ये० 2 / 150 / / इत्युवि नोनुवति, पुनः पुनरतिशयेन वा प्रणमन्तीत्यर्थः / ते-तादृशाः-नोनोतार इत्यर्थः / त्रिदशवृषभ:-त्रिदशेषु देवेषु वृषभाः श्रेष्ठाः दशवृषभास्तैस्तथा / अपि-समुच्चयार्थकमव्ययम् "गर्हासमुच्चयप्रश्नशाम्भावनास्वपी" त्यमरः / हरिवत् विष्णुरिव / “यमानिलेन्द्रचन्द्रार्कविष्णपहांशुवाजिषु शुकाहिकपिभेकेषु हरिर्ना कपिले त्रिपु" इत्यमरनानार्थः। . दा-प्रीत्या। 'मुत्प्रीतिः प्रमदो .. हर्षः प्रमोदामोदसंमदाः' इति / Eमरः। मामान्यन्ते पुनः पुनरतिशयेन वा मान्यन्ते इति मान तो: "स्वार्थणिजन्ताद् यङि ‘णेरनिटि" 4 / 3 / 83 // इति णिलोपे, द्वित्वे P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ * २/श्रीचतुर्विंशति-जिनस्तुतयः 'हस्वः 4 / 1 / 39 / / इति ह्रस्वत्वे च 'आगुणा'- 431142 // इत्यात्वे वर्तमानायामन्ते प्रत्यये 'लुगस्यादेव्यपदे' 4 / 1 / 39 / / इत्यकारस्य लुकि मामान्यन्ते-पोपूज्यन्ते / तथेति शेषः / ये-यत्प्रकारा जनाः / वृषभजिन-नेत्रामृतरसै:-वृषभःश्रीआदिनाथश्चासौ जिनोऽर्हन् वृषभजिनस्तस्य नेत्रे नयने वृषभजिननेत्रे तयोरमृतरसाः अमततुल्या अमरप्रख्यकारिणो रसाः वृषभजिननेत्रामृतरसास्तैस्तथा / सौम्यकृपास्निग्धावलोकनैरिति च / कृपास्निग्धत्वात्सौम्यत्वाच्य रसवदवलोकनानि यावा, तेन तथावलोकनानां विषरूप-विषयसपृति-दुःखनाशकत्वादमृतत्वमस्त्येवेति भावः / प्रपेप्रीयन्ते-पुनः पुनरतिशयेन वा प्रप्रीणन्तीति प्रपूर्वात्प्री धातोयङिः द्वित्वादिकार्ये गुणे वर्तमानायामन्ते विभक्तौ, अल्लुकि प्रपेप्रीयन्ते-अवलोलोकिताः प्रीतिमनुभवन्ति, ते-तादृशाः / युवतिभि:-रमणीभिः / विष्णु पितृवत्वेवेष्टि-व्याप्नोति जगदिति विष्णुः कृष्णः, तस्य पिता जनक: विष्णुपिता, तेन तल्यम विष्णुपितृवत्, वसुदेववदित्यर्थः, सौभाग्यगुणाधानादिति भावः / प्रपेप्रीयन्ते-तातृप्यन्ते, अहो-आश्चर्यम् / तदवलोकनस्येद्गाश्चर्यकरं सामर्थ्य मिति भावः / उपमारूपकयोः संसृष्टि: // यज्जन्मकविधौ चतुर्विधसुरैर्मोमुद्यते मेरुवच्छदिव्यविभूषणैर्जगति यो बोभूष्यते स्वाङ्गवत् / . जेजीयादजितः समेन्द्रमहितः सर्वान् रिपून सर्वतः, श्रीहस्त्यङ्कजिनः प्रशीर्णवृजिनः सिद्ध्यै प्रपोपोष्टु नः // 2 // अन्वयः-यज्जन्मैकविधौ, चतुर्विधसुरैः, मेरुवत्, मोमुद्यते, शक्रः, दिव्यविभूषणः, स्वाङ्गवत्, यः जगति, बोभूष्यते, समेन्द्रमहितः, प्रशीर्णवृजिनः, श्रीहस्त्यङ्कजिनः अजितः, सर्वतः, नः, सर्वान्, रिपून, जेजीयात्, सिद्ध्यै प्रपोपोष्टु / वृत्तिः -यज्जन्मकविधौ-यस्य जन्मात्मक: जन्मग्रहणरूप एव एकोऽनिर्वचनीयस्वरूपो बिधि:-' महोत्सवकर्म तस्मिस्तथा, यदीयजन्मग्रहणमहोत्सव इत्यर्थः / चतुर्विधसुरैः-चतुभिः प्रकारैरिति चतुर्विधाः, ते च ते सुरा देवाश्चतुर्विधसुरास्तैस्तथा-देवयक्षादिभिरित्यर्थः, मेरुवत्-मेरौ हेमाद्रौ यथा मोमुद्यते तथा मोमुद्यते-पुनः पुनरतिशयेन वा मुद्यते इति मुद् धातोर्यङि लुद्वित्वगुणेषु सत्सु कर्मणि वर्तमानायां 'तत्साप्यात्'- 3 / 3 / 21 // इत्यात्मनेपदप्रत्यये "क्यः शिबि". 3 / 4 / 60 / / इति क्ये मोमुद्यते-जाहृष्यते / तथेति शेषः / यः यत्प्रकारो जिनः / P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ श्रीचतुर्विंशति-जिनस्तुतयः/३ श:-इन्द्रः / दिव्यविभूषणैः-दिवि स्वर्गे भवानि दिव्यानि-अलौकिकानीत्यर्थः, दिव्यानि, च तानि विभूषणान्यलङ्करणानि मण्डनानीति यावत, दिव्य विभूषणानि तैस्तथा, करणः / स्वाङ्ग वत्-स्वस्य निजस्य आत्मन इत्यर्थः अङ्गानि-शरीरावयवाः स्वाङ्गानि तैस्तुल्यम् स्वाङ्ग वत्-स्वशरीरावयवतुल्यमित्यर्थः / यथा तेनादराच्छोभातिशयार्थं स्वाङ्ग, विभूषित तथाद्रातिरेकादिति भावः / जगति-जगत्याम् भुवने इंति यावत् 'स्याललोको विष्टपं विश्वं भुवनं जगती जगत्" 61 / इत्यभिधानचिन्तामणिः / जिनस्याखिलोत्कृष्ट-प्रभावशालिस्वात्तः पृथिव्यामागत्यैव वोभूष्यते इति भावः / वोभूष्यते-पुनःपुनरतिशयेन वा भूष्यतेऽलक्रियते इति भूष धातोर्यङि लुपि द्वित्वे "द्वितीयतुर्ययोः"- 4 / 1 / 42 / / इति वत्वे, कर्मणि वर्तमानायामात्मनेपदे ते क्ये बोभूष्यते-आवाभ्रियते / यत्तदोनित्यसम्बन्धात् स इत्याक्षिप्य, समेन्द्रमहितः समः सर्वेः इन्द्र:-शक राजभिश्च महित: पूजितः / प्रशीर्णवृजिनः-प्रशीर्णानि विघ्वस्तानि वृजिनानि दुरितानि पापानीति यावद् येन स तथा / सकलकलुषहत्यर्थः / 'अस्त्री पकं पुमान् पाप्मा पापं किल्विषकल्मषम्। कलुषं वृजिनैनोघमंहो / दुरितदुष्कृतम् इत्यमरकोशः ।श्रीहस्त्यङ्कजिनः - श्रीलक्ष्मीस्तया सहितः श्रीसहितः स चासौ हस्ती गजः श्रीहस्ती, मयूरव्यंसकादित्वादुत्तरपदस्य पूर्वसमासीयस्य लोपः, श्रीहस्ती अङ्कश्चिह्न लाञ्छनमिति यावद् यस्य स श्रीहस्त्यङ्कः स चासो जिनोऽर्हन् श्रीहस्त्यङ्कजिन:-श्रीहस्तिकेतुजिनः / “कलङ्काको लाञ्छनञ्च चिह नं लक्ष्म च लक्षणम्" इति कोशः / अजित:-न जितः पराजितः पराभूत इति यावत् केनापीत्यजितस्तन्नामतीर्थङ्कर इत्यर्थः / सर्वतः-सर्वतोभावेन / नः अस्माकम् / सर्वान्-समस्ता आभ्यन्तराज वाह्याश्च / रिपून-शत्रून् / जेजीयात्-पुनः पुनरतिशयेन जीयादिति जिधातोर्यङि, लुब्द्वित्वगुणेषु सत्सु जेजि 'इत्यवस्थायां परस्मैपदे सप्तम्यां यात् प्रत्यये “दीर्घश्च्चि" 13 / 108 // इति दीर्घत्वे जेजीयात्परावोभूयात् / तथेति शेषः / सिद्ध्य-मुक्त्य, अणिमाद्यर्थञ्च / “अणिमा महिमा चैव लघिमा गरिमा तथा / प्राप्ति: प्राकाम्यमीशित्वं वशित्वञ्चाष्टसिद्धयः” // प्रपोपोष्ट-पुनःपुनरतिशयेन प्रपुष्यतु इति प्रपूर्वात्पुष् धातोर्यङि लुब्द्वित्वगुणेषु सत्सु प्रपोपुष् इत्यवस्थायां "विधिनिमन्त्रणाधीष्टसम्प्रश्नप्रार्थने" 5 / 4 / 28 // इत्यनेन प्रार्थनायां पञ्चम्यां तुबि विभक्ती "लघोरुपान्त्यस्य" 4 / 3 / 4 // इति गुणे "तवर्गस्यश्चवर्गष्टवर्गाभ्यां योगे चटवौं” 1 / 3 / 60 // इति P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ ४/श्रीचतुर्विंशति-जिनस्तुतयः टवर्गत्वे प्रप्रोपोष्ट वरिभरीतु / आम्यन्तरवाह्य शत्रुविघटनद्वारा मुक्तिपोषका जायतामित्यर्थः / अत्र रिपुजयस्य सिद्धिपोषणहेतुत्वात्काव्यलिङ्गमलङ्कारः, स्वाङ्गवदित्युपमा च / 'हेतोर्वाक्यपदार्थत्वे काव्यलिङ्गं, निगद्यते” “साम्ये वाच्यमवैधर्म्य वाक्यैक्य उपमाद्वयो" रित्युभयत्र साहित्यदर्पणः // 2 // स्तोतुं यः सुपनीपनीति नवनैः श्रीसम्भवं श्रीभवं, माहात्म्यात्स पनीपदीति जिन ! ते पारं भवाम्भोनिधैः / ... रोदस्योरपनेनयीति दुरितध्वान्तानि मार्तण्डवन्, : मोक्षस्योपरि जेजयीतु स धियं वो वाजिलक्ष्मा जिनः // 3 // . अन्वयः - श्रीभवम्, श्रीसम्भवम, स्तोतुम, नवन:, यः, सुपनीपनीति जिन ! ते, माहात्म्यात्, सः, भवाम्भोनिधेः, पारम्, पनीपदीति, मार्तण्वन, रोदस्योः, दुरितध्वान्तानि, अपनेनयीति, सः, वाजिलक्ष्मा, जिनः, मोक्षस्य, उपरि, वः धियम्, जेजयीतु // ..... वृत्तिः - श्रीभवम्-भवत्युत्पद्यतेऽत्र ति भव उत्पत्तिस्थानम् श्रिया लक्ष्म्या भवः श्रीभवस्तन्तथा, श्रीदातारमित्यर्थः / श्रीसम्भवम्-श्रीसम्भवनामानन् जिनेश्वरम् / स्तोतुम्-भक्त्या शौर्यवीय्यौं दार्यगाम्भीर्य-केवलित्वादिगुणान् वर्णयितुम् / रचितैरितिशेषः। नूयते स्तूयते एभिरिति नबनानि स्तुतयस्तैस्तथा, महात्मभिः स्वयं वा कृतैः गुणादिवर्णनात्मकपद्य: सुपनीपनीति-सु-सम्यक् पुनः पुनरतिशयेन वा पनायतीति सुपूर्वकात् पन्धातोर्यङि लुद्वित्वयोः सतोः पपन् इत्यवस्थायाम् न्यागमे पनीपत् इतिजाते वर्तमानायां तिवि “यतुरुस्तोर्बहुलम्"८।३।६४।। इत्यनेन ईति पनींपनीति तोष्टवीति, यद्यप्यत्र न्यागमो न भवति, अविद्यमानात्, अदुपान्त्येभ्योऽनुनासिकान्तेभ्यो मान्तस्यैव विधानात्, एवञ्च पम्पनीतीत्येव साधु, तथापि शिष्टप्रयोगत्वात्कथञ्चित् समाधेयः / जिन ! है जिनेश्वर ! ते-भवतः / माहात्म्यात्-महिम्नः / सः पम्पनिता / भवाम्भोनिधेःअम्भांसि जलानि निधीयन्ते संस्थाप्यन्तेऽत्रेति अम्भोनिधिः समुद्रः, भवः संसार एवाम्भोनिधिः भवाम्भोनिधिस्तस्य तथा, संसारसागरस्येत्यर्थः / पारम्-पर तीरम् / पनीपदीति--पुनः पुनरतिशयेन वा पद्यते इति पद्धातोर्यङि लुब्द्वित्वयोः सतोः पपदित्यवस्थायाम् "वञ्चस्रस" / 4 / 1150 / / इति न्यागमे पनीपदिति जात P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ श्रीचतुर्विंशति-जिनस्तुतयः/५ anana वर्तमानायां तिवि 'यतुरुस्तु'-४१३६४॥ इति ईति पनीपदीति, प्रजङ्गमीति, यश्चेत्यनुषज्यते / मार्तण्डवत्-सूर्यवत् / रोदस्योः-द्यावापृथिव्योः / दुरितध्वान्तानि-दुरितानि ध्वान्तानि तिमिराणीव, सर्यपक्षे दुरितानीव ध्वान्तानि दुष्कृततमांसि / यथा सूर्यो ध्वान्तसमुदयस्तन्तथा स दुरितवृन्दमित्यर्थः / अपनेनयीति-पुनः पुनरतिशयेन वा अपनयतीति अपपूर्वकाद् नी धातोर्यङि,लुद्वित्वयोः सतोद्वित्वपूर्वभागस्य ह्रस्वत्वे च जाते अपनिनी 'इत्यवस्थायां गुणे अपनेनी' इति जाते वर्तमानायां तिवि, ईदागमे 'नामिनो गुणो' 4 / 3 / 4 / / इति गुणे 'एदैतोऽयायः' 1 / 2 / 23 / / इत्ययादेशे अपनेनयीति दूरीचरीकरीति / सः-एतादृशः / वाजिलक्ष्मा-वाजी अश्वो लक्ष्म विह न लाञ्छनं यस्य स तथा अश्वलाञ्छन इत्यर्थः / श्रीसम्भवः, जिन: जिनेश्वरः / व:-युष्माकम् / धियम्-बुद्धिम् / 'वुद्धिर्मनीषा धिषणा धीः प्रज्ञा शेमुपीमति रित्यमरः / मोक्षस्य-मुक्तः, कैवल्यस्येत्यर्थः / उपरि-विषये / जेजयीतु-पुनःपुनरतिशयेन वा जयत्विति जिधातोर्यङि, लुब्द्वित्वगुणेषु सत्सु 'जेजि' इत्यवस्थायांम् आशिषि तुवि, ईदागमे गुणायादेशयोःसतोः जेजयीतु-उच्चरीकृषीत् / रूपकानुप्राणितोपमालङ्कारः // 'रूपकं रूपितारोपो विषये निरपह नवे' इति सा०द० // 3 // ............ द्वेधारीनभिदादयीति निजकांस्त्वन्नाम शस्त्रस्त्रिधा, * धूपाद्यानभिदादयोति यं गुरून् यो धूपसारादिवत् / पूजाय परिदादयोति पुरतस्ते भोग्यभोगांश्च यः, स ब्रह्मोपरि दादयीतु खलु तान् श्रीसांवरेयः सुखैः // 4 // अन्वयः - यः, त्रिधा, त्वन्नामशस्त्रैः, निजकान्, द्वधा, अरीन्, अभिद. योति, यश्च, धूपसारादिवत्, धूपाद्यान्, अगुरून्, अभिदादयोति, पूजाय, ते, पुरत भोग्यभोगान्, परिदादयीति, सः, श्रीसांवरेयः, खलु, सुखैः, तान्, ब्रह्मोपरि, दादयीतु / / वृत्तिः -य:-यत्प्रकारः / विधा-त्रिभ्यः प्रकारेभ्य इति विधा स्मरणकीर्तनश्रवणरूपत्रिप्रकारैरिति यावत् / त्वन्नामशस्त्रैः-तव भवतो नामाभिधानम् त्वन्नाम तदेव शस्त्रमस्त्रम्, त्वन्नामशस्त्रम् तैस्तथा भवदीयनामायुधैरित्यर्थः / निजकान् निजा आत्मीया एव निजकास्तांस्तथा / स्वार्थे कः प्रत्ययः / द्वधा-आन्तरबाह्यभेदाद् द्विप्रकारान् / अरीन्-शत्रून् अभिदादयीति-पुनःपुनरतिशयेन वा अभिदयते = P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ ६/श्रीचतुर्विंशति-जिनस्तुतयः इति अभिपूर्वकाद् दद् धातोः हिंसार्थकाद्यङि लुटिद्वत्वात्वेषु सत्सु अभिदादय इत्यबस्थायां वर्तमानायां तिवि ईत्वे अभिदादयीति-अभिजेघ्नयीति / धूपसारादिवत्-धूपः सारो यस्य स तथा, सारो धूप इत्यर्थः, सरलद्र :, तद्वत्, यथा सरलद्र मंस्वल्पपरिश्रमेणैव चेच्छिद्यते तथा चेच्छिदीतीत्यर्थः / यश्चेत्यनुषज्यते / धूपाद्यान्-यक्षकर्दमादिप्रमुखान् / अगुरून-कालागुरूश्च / यद्वा--अगुरुप्रमुखान् धूपादीनित्यर्थः / अभिदादयीति-पुनः पुनरतिशयेन बा दयते ददातीति अभिदादयीति, अभिदादयीतीत्यर्थः / प्रक्रियाऽनुपदमुक्तव / तथा ये, ते--तव / पुरतःअग्रे / पूजाय-अर्चासम्पत्त्यै / भोग्यभोगान्-भोग्यान्--उपभोग्यान् भोज्यभिन्नानुपलक्षणत्बाद भोज्यांश्च भोगान् मिष्टान्नादिनैवेद्यान् / परिदादयीति--पुनःपुनरतिशयेन वा परिदयते इति परिदादयीति-परिमिवेविदीति, पुनःपुनर्भृशं वा समर्पयति / तान्--तादृशान् भक्तजनान् / सः-प्रसिद्धः। श्रीसांवरेयः--सम्वरस्य स्त्री सम्बरी तस्या अपत्यं साम्बरेयः श्रीअभिनन्दनः / सुखैः-सुखपूर्वकम् / ब्रह्मोपरि--ब्रह्मणि मुक्तौ / दादयीतु खलु-निश्चयेन दादयीतु / श्रीअभिनन्दन जिन पासका मुक्ति लभन्ते इत्यर्थः / अत्र अभिदादयीति यगुरूनित्यत्र "इवर्णादेरस्वे स्वरे यंवरलम्"१।३।२१।। इत्यत्रेवर्णादेरिति पञ्चम्यन्ततया व्याख्याय यागमा बोध्यः / रूपकोषमयोस्तिलतण्डुलवत् संसृष्टि: // 4 // सर्वे मोमुषतीश ! मेऽद्य रिपवो जात्याद्यलक्ष्मी प्रभौ, प्राग विज्ञापयितुं जगाम पदयोः क्रौञ्चोऽङ्कदम्भात् किल / यस्यापोपुषतीह मामतिशयाश्चित्प्राप्तिसम्पत्तिभिः, स श्रीमानभिदादयोतु सुमतिः शैवं पदं मेघभूः // 5 // अन्वयः - ईश ! सर्वे रिपवः, अद्य, मे, जात्याद्यलक्ष्मीम्, मोमुषति, प्राक्, प्रभौ, विज्ञापयितुम्, क्रौञ्चः, यस्य, पदयोः, अङ्कदम्भात्, जगाम, किल, इह, अतिशयाः, माम्, चित्प्राप्तिसम्पत्तिभिः, आपोपुषति, सः, मेघभूः, श्रीमान्, सुमतिः, शैवम्, पदम्, अभिदादयीतु // - वृत्तिः - ईश! स्वामिन् ! सव-निखिलाः। रिपवः--शत्रवः / अद्यसाम्प्रतम् / मे-मम / जात्याद्यलक्ष्मीम्-जात्या जन्मना स्वाभाविकी या आद्य प्राथमिकी लक्ष्मीः शोभा ताम्, अकृत्रिमोत्कृष्टशोभाम् / मोमुषति-पुनःपुनरति शयेन वा मुष्णन्तीति मुष्धातोर्यङि लुद्वित्वगुणेषु सत्सु मोमुष् इत्यवस्था P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ श्रीचतुर्विशति-जिनस्तुतयः/७ " वर्तमानायामन्तिप्रत्यये नलोपे च मोमुषति चोचोरति, इति शेषः / प्राक्-पुरा। प्रभौ-जिनेश्वरे। विज्ञापयितुम-निवेदयितुम् / कौञ्चः तन्नामा पक्षिविशेषः / यस्य-जिनस्य / पदयोः चरणयोः-शरणे इत्यर्थः / अङ्कदम्भात्-अङ्कस्य केतुचिह्नस्य दम्भो व्याजोऽङ्कदम्भस्तस्मात्तथा, जगाम--ययौ, गतवानिति यावत् / किलेति निश्चये / तथेति शेषः / यस्येत्यनुषज्यते / इह-अत्र, अतिशया:--सहोत्था / देवकृता वाग्गताश्च गुणविशेषाः / माम-मा। चित्प्राप्तिसम्पत्तिभि:-चितां -ज्ञानानां प्राप्तिरेव सम्पत्तिस्ताभिः / आपोपुषति-पुनःपुनरतिशयेन आपुष्णन्तीति आङ्पूर्वकात्पुष् धातोर्यङि लु द्वित्वगुणेषु सत्सु आपोपुष् इत्यवस्थायां वर्तमानायामन्तिप्रत्यये नलोपे आपोपुषति-आवरीभ्रति / सः-तादृशः / मेघभूः-मेघभूपतिसूनुः / श्रीमान्-श्रील: / सुमतिः-तदाख्यो जिनेश्वरः / शैवम्-शिवम्मोक्षस्तस्येदं शैवम् मोक्षसम्बन्धीत्यर्थः / पदम्-स्थानम् / अभिदादयीतु-पुनःपुन-रतिशयेन वा दयतामिति दानार्थदा-धातोरभिपूर्वाद्यङि लुद्वित्वात्वेषु सत्सु अभिदादय् इत्यवस्थामाम्-प्रार्थनायां तुवि प्रत्यये ईत्वे, अभिदादयीतु-अभिसददीतु / अत्र क्रौञ्चस्य तथा विज्ञापनासम्बन्धेऽप्युक्त रतिशयोक्तिः, सा चाङ्कदम्भादित्यपह्लत्या सङ्कीर्यते // 5 // योग्यस्तेऽभिसरीस्मरीति यभिधां पद्मप्रभो स्वे मनःपद्मान्तेऽभिसरीसरीति पदवीं शैवीं समयसीम् / सौसीमेय ! मरीमरीति महता कृत्येन ते भेकवत्, ...... प्राणी सैष दरीधरीतु कमलां सौरों विभोवैभवात् // 6 // - अन्वयः - पद्मप्रभो ! योग्यः, स्वे मनःपमान्ते, ते, अभिधाम् / अभिरीस्मरीति, समश्रेयसीम्, शैवीम् पदवीम्, अभिसरीसंरीति, सौसीमेय ! महता न्येन, भेकवत, मरीमरीति, सैषः प्राणी, ते, विभोः वैभवात्, सौरीम् कमलाम् धरीतु !! _ वृत्तिः - पद्मप्रभः ! हे पद्मप्रभाख्यजिनेश्वर ! य इत्याक्षिप्यते, योग्य: यः / स्वे-स्वकीये / मनःपद्मान्ते-मनश्चित्तमन्तःकरणमिति यावत् पद्म बलमि व मनःपछ तस्यान्ते तदभ्यन्तरे, मनसीत्यर्थः / ते-तव / अभिधाम् नाम भिसरीसरीति-पुनः पुनरतिशयेन बा स्मरतीति अभिपूर्वात् स्मृधातोर्यङि. प, द्वित्वे, 'व्यञ्जनस्यानादेयुक'-४११॥४४॥ इति मलुकि 'ऋतोऽत्'-४।१।३८॥ .... P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ 10 श्रीचतुर्विंशति-जिनस्तुतयः वृत्तिः - असुरसुरगण:-असुरा दानवाश्च सुरा देवाश्च असुरसुराः, .. तेषां गणाः समूहास्तैस्तथा, सर्वेः सुरैरसुरैश्चेत्यर्थः / 'संघाते प्रकरौघवारनिकरव्यूहाः समूहश्च यः कूटं मण्डलचक्रवालपटलस्तोमा गणः" 6.46 / / इत्यमिधानचिन्तामणिः / अत्र यद्यपि द्वन्द्वेऽल्पस्वरत्वाद् अभ्यहितत्वाच्च सुरंशब्दस्यव प्राक् प्रयोगो युक्तः, व्यवहारोऽपि तथैव, तथापि पूर्व निपातप्रकरणस्यानित्यत्वात् समाधेयम् / यैरिति परस्थतच्छद्ववलादाक्षिप्यते, यत्तदोनित्यसम्बन्धात् / ते-तव / परा:-उत्कृष्टाः / गुणकणा:गुणानां शौर्यवीय्यौं दार्यकेवलित्वादीनां कणा लवा: गुणकणा:, अपि / शाशंस्यन्ते.-पुनः पुनरतिशयेन वा शंस्यन्ते स्तूयन्ते इति शंस्धातोर्यङि लुपि द्वित्वे अनादेलु कि, आत्वे, शाशंस् इत्यवस्थायां कर्मणि वर्तमानायामन्ते प्रत्यये क्ये "लुगस्यादेत्यपदे" 2 / 1 / 113 / / इत्यनेनाकारस्य लुकि शाशंस्यन्ते तोष्टूयन्ते / तैः-तांदृशैः सुरासुरगणैः / तव-ते भवत इति यावत् / बलात् प्रभावात् / परा:-वलवन्तः / यद्वा परा इत्युपसर्गः / द्विविधरिपव:द्विविधा आभ्यन्तरा वाह्याश्च द्विप्रकारा रिपवः शत्रवः कामक्रोधादयः / शाशंस्यन्ते-हिंसार्थात शंस धातोर्यङि लूपि कर्मणि शाशंस्यन्ते / प्रक्रिया तूक्तं व जघन्यन्ते / तथा, यः-यादृशो जनः / विरजसा विगतं रजो दुरितं यतस्तेन शुद्ध नेत्यर्थः / विविधतपसा-विविधमनेकञ्च तत्तपस्तपस्या विविधतपस्तेन तथा, अनेकप्रकारकोपवासादिव्रतेनेत्यर्थः / अङ्गम्शरीरम्-चनीस्कन्दीति-पुनः पुनरतिशयेन वा स्कन्दति शोषयतीति स्कन्द् धातोर्यङि लुपि द्वित्वे, अनादिलुगपवादत्वात् "अघोषे शिट:" 4 / 145 / / इति शिटो लुकि "कङश्चन्" 411046 / / इति. चत्वे "कञ्चस्रन्सध्वंस" 411 // 50 // इत्यादिना पूर्वस्य न्यन्तत्वे चनीस्कन्द् इत्यवस्थायां वर्तमानायां तिवि ईदागमे चनीस्कन्दीति-विशोशोषीति / इन्दुध्वज जिनपते !-इन्दु श्वन्द्रो ध्वजश्चिह्न केतुर्लाञ्छनं वा यस्य स चासौ जिनपतिजिनेश्वर इन्दुध्वज जिनपतिस्तदामन्त्रणे / सः-तादृशो जनः / अक्षयपदम्--अक्षयमविनाशि च तत्पदमास्पदमक्षयपदम् शाश्वतं मोक्षपदमित्यर्थः / चनी-- स्कन्दीतु-पुनः पुनरतिशयेन वा स्कन्दतु गच्छत्विति गत्यर्थात् स्कन्द्धातो-- र्यङि लुकि प्रार्थनायां चनीस्कन्दीतु-जङ्गमीतु / तव गुणकणस्यापि स्तुतिः शत्रून् नाशयति तदेव च तपःपूर्वकं मोक्षमपि ददाति किं पुनर्निखिलगुण-- स्तवनमिति भावः / अर्थापत्त्यलङ्कारः / / 8 / / P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ श्रीचतुर्विशति-जिनस्तुतयः/११ वरीवह्यन्ते यर्नतिकृति तवाने नरगजे-' . .... वरीबृह्यन्ते ते हरिहरिरसर्दीपशिखवत् / .परीप्रीयन्ते यैः सुचरणगुणास्ते शिवसुखैः, ........... " परीप्रीयन्ते श्रीसुविधिजिनपः सोऽस्तु शिवदः // 9 // ... अन्वयः - यः, नरगजैः / तवाग्र, नुतिकृति, हरिहरि-रसः, वरीवृह्यन्ते, ते, दीपशिखवत्, वरीवृह यन्ते, यैः, सुचरणगुणाः, परीप्रीयन्ते, ते, शिवसुखैः, परीप्रीयन्ते, सः, श्रीसुविधिजिनपः, शिवदः, अस्तु / वृत्तिः - यः-यत्प्रकारैः / नरगजेः-नरा मनुष्या गजा हस्तिन इवेति नरगजास्तैस्तथा नरश्रेष्ठुरित्यर्थः / स्युरुत्तरपदे व्याघ्रपुङ्गवर्षभकुञ्जराः / सिंहशार्दूलनागाद्यास्तल्लजश्च मतल्लिका | मचिका : प्रकाण्डौ द्वौ प्रशस्यार्थप्रकाशकाः" 6176 / / इत्यभिधानचिन्तामणिः / तव-भवतः / अग्र-पुस्तः / पुरोभागे इति यावत् / नुतिकृति-करणं कृत् भावे विवप् बाहुलकात्, नुतेः स्तुतेः कृत् क्रिया नुतिकृत् तत्र, स्तुतिकर्मणि / हरि-हरिरस:-हरिविष्णुश्च हरिरिन्द्रश्च तयो रसा अनुरागा इवं रसा हरिहरि-- रसास्तैस्तथा, विष्णुशक्रानुराग--तुल्यानुरागैः / वरीवृह यन्ते--पुनः पुनरतिशंयेन वा वृह्यन्ते इति वृह धातोर्यङि लुपि द्वित्वे अत्वे च ववृह, इत्यवस्थायां "रीरौ च लुपि" 4 / 1056 // इति री 'अन्तादेशे वरीबृह, इत्यवस्थायां कर्मणि वर्तमानायामन्ते प्रत्यये क्ये च अलुकि बरीवह यन्तेशाशब्द्यन्ते / ते तादृशा नरगंजाः / दीपशिखवत्-दीपशिखतुल्यम् / यथा दीपशिखो वृद्धिमाप्तवान् तथा / वरीवृह यन्ते-पुनः पुनरतिशयेन वृहन्तीति वृह धातोर्यङि द्वित्वे अत्वे ववह य इत्यवस्थायां "ऋ मतां री: 411145 / / इत्यनेन री 'इत्यागमे वरीवृह य इत्यतः वर्तमानायामन्ते प्रत्यये ‘अलुकि वरीवृह्यन्ते-वरीवृद्धयन्ते, राज्यादि वृद्धय ति भावः / तथा यैः-यादृशर्जनैः सुचरणगुणा:-सुचरणं, सुचारित्र्यम्, तद्रूपो गुणस्ते। परीप्रीयन्ते--पुनः पुनरतिशयेनं पूर्यन्ते पाल्यन्ते इति पृ धातोर्यङि लुपि द्वित्वे अत्वे * पपृ इत्यवस्थायां पूर्वस्य री इत्यागमे परीपू इत्यवस्थायां कर्मणि वर्तमानायामन्ते विभक्तौ मध्ये क्ये "ऋतो री" 4 / 3 / 109 // इति रीत्यादेशे अलुकि परीप्रीयन्ते-पापाल्यन्ते / ते, ते-तव / शिवसुखैः-मोक्षानन्दः / परीप्रीयन्ते पुनः पुनरतिशयेन वा पूर्यन्ते इति पृधातोर्यङि लुपि द्वित्वे अत्वे पपृ इत्य- .. P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ १२/श्रीचतुर्विंशति-जिनस्तुतयः वस्थायां पूर्वस्य रीत्यागमे परीपृ इत्यवस्थायाम् ऋकारस्य .. रीत्यादेशे कर्मणिं वर्तमानायामन्ते प्रत्यये, क्येऽकारस्य लुकि परीप्रीयन्ते वरीभ्रीयन्ते / तव मोक्षसुखैस्ते परिपूर्णा भवन्तीत्यर्थः, चारित्र्यवते मोक्षसुखं प्रदाय सर्वथाऽनुगृह णासीति भावः / सः-त्वम् / 'सुविधिजिनप:-श्रीसुविधिनामा जिनेश्वरः / शिंवद:--शिवं मोक्षं ... ददातीति शिवदः-मोक्षप्रद इत्यर्थः / अस्तु-भवतु / अत्र अन्यरसस्यान्यत्राऽसम्भवात् रस इव रस इति सादृश्याक्षेपान्निदर्शनानामालङ्कारः / दीपशिखवदित्युपमा च // 9 // .... ... प्रणेनिन्द्यन्ते यः खलु तव पुरः स्वा अघभराः, - प्रणानन्द्यन्ते ते सुरवरसुखैनिर्वृतिपुरैः। . * वितन्तन्यन्ते यैः सुनवनवनैः शक् तव गुणाः, ... प्रसेसिध्यन्ते ते जिनवदचले शीतलपदे // 10 // ... -अन्वयः - यैः, तव, पुरः, स्वाः, अघभराः; प्रणं निन्द्यन्ते, खलु, ते, - निर्वृतिपुषः, सुरवरसुखैः, प्रणानन्द्यन्ते, शक् ! तव, गुणाः, यैः, सुनवनवनैः, .. वितन्तन्यन्ते; ते; अचले, शीतलपदे, जिनवत्, प्रसेसिध्यन्ते // 10 // -: वृत्तिः - य:-यादृशैर्नरैः। तव-ते। पुरः--अग्रे / स्वा:-निजाः। ---. अघभरा:-अघानां पापानां भरा अतिशया अघभरास्तैस्तथा, पापौघा इत्यर्थः / प्रणेनिन्द्यन्ते-पुन: पुनरतिशयेन वा प्रणिन्द्यन्ते इति प्रपूर्वादुदितो. नान्तान्निन्द धातोर्यङि लुपि द्वित्वे गुणे प्रनेनिन्द् इत्यवस्थायां कर्मणि वर्तमानायामन्ते प्रत्यये क्ये अलुकि 'अदुरुपसर्गान्तरो" 2 / 3 / 77 // इति णत्वे 5 / 'प्रणेनिन्द्यन्ते-उपचोक श्यन्ते / ते-तादृशा नराः / निर्वृतिपुषैः-पुष्यन्तीति. पुषाः, क प्रत्ययः, निवृतेर्मोक्षसुखस्य पुषाः पोषका निर्वृतिपुषास्तैस्तथा। ... ये मोक्षायोद्य ञ्जते न तु बन्धनाय तैरित्यर्थः / सुरवरसुखैः-सुरवराः सुरर श्रेष्ठास्तेषां सुखैः-शर्मभिः / सुरवरसुखतुल्यसुखैरित्यर्थः / प्रणानन्द्यन्ते२. पुनः पुनरतिशयेन वा नन्दन्तीति प्रपूर्वाण्णोपदेशादुदितो नान्तान्नन्द् धातोर्यङि द्वित्वे पूर्वस्यात्वे प्रनानन्द्य इत्यवस्थायां वर्तमानायामन्ते प्रत्यये न अकारस्य लुकि णत्वे प्रणानन्द्यन्ते, प्रमोमुद्यन्ते / तथा, शक् ! शक्नोतीति ., क्विप शक् तदामन्त्रणे हे शक् ! समर्थ ! तव-ते। गुणा:-दयाचारित्र्या दयः / यैः-यादृशेर्नरैः / सुनवनवनैः-सुशोभनर्नवैरपूर्नवनैः स्तवनैः P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ - श्रीचतुर्विंशति-जिनस्तुतयः/१३ कृत्वा, वितन्तन्यन्ते-पूनः पुनरतिशयेन बा वितायन्ते इति विपूर्वात् तन् वातायाङ लुपि द्वित्वे "मुरतोऽनुनासिकस्य"४॥५१॥ इति पूर्वस्य मान्तत्वे ता मुमौ व्यञ्जने रवौ"-१३।१४॥ इत्यनेन स्वानुनासिकत्वे वितन्तनित्यवस्थायां कर्मणि वर्तमानायामन्ते : प्रत्यये क्ये अलुकि "तनः क्ये"४।२।६३॥ इत्यात्वविकल्पात् वितन्तन्यन्ते-वितरीस्तीर्यन्ते / ते-तादृशा जनाः / अचले-न चलमचलम तस्मिन स्थायिनि, अविनश्वरे इत्यर्थः / शीतलपदे-शीतले सर्वोपाधिरहितत्वात शान्ते पदे स्थाने मोक्षे इत्यर्थः / एलेषमहिम्ना शीतलस्य तदाख्यतीर्थङ्करस्य पदे स्थाने' इत्यप्यूह यम् / जिनवत्-जिन इव / जिना यथा मोक्षं गच्छन्ति तथा। प्रसेसिध्यन्ते-पुनः पुनरतिशयेन वा प्रसेधन्तीति प्रपूर्वात् सिध् धातोर्यङि लुकि द्वित्वे पूर्वस्य गुणे प्रसे सिध्य इत्यवस्थायां वर्तमानायामन्ते प्रत्यये अलुकि "स्थासेनिसेध" // 3 // 40 // इति प्राप्तषत्वस्य "गतौ सेधः" 2 / 3 / 61 // इति निषेधात् प्रसेसिध्यन्ते / प्रजङ्गम्यन्ते। श्रीशीतलजिनस्तुतिकर्ता श्रीशीतलपदं मोक्षं गच्छतीति भावः // 10 // .. .. . LIMITED .. श्रीश्रेयांसजिनेन्द्रचन्द्रविभवः शेश्रीयते यैर्मुदा, .. श्रेयोऽनन्तकला दरिधति हिते निःश्रेयसः सम्भवः / .. तेऽन्ते पञ्चपदी सरिस्म्रति तु ते शैवीं रमा यान्ति ते, ते श्रीविष्णुभवा विदादतु पुनस्ते सम्पदामास्पदम् // 11 // - अन्वयः -यः, श्री श्रेयांसजिनेन्द्रचन्द्रविभवः, मुदा, शेश्रीयते, ते, हि, निःश्रेयसः, सम्भवाः, श्रेयोऽनन्तकला:, दरिधति, ये, अन्ते, ते, पञ्चपदीम्, सरिस्म्रति, ते, तु, शैवीम्, रमाम्, यान्ति, ते, श्रीविष्णुभवाः, पुनः, ते, सम्पदाम्, आस्पदम्, विदादतु // 11 // 1. वृत्तिः - यः, यादशैर्जनः / श्रीश्रेयांस-जिनेन्द्रचन्द्रविभवः जिनेन्द्रो जिनेश्वरश्चन्द्रश्चेति जिनेन्द्रचन्द्रः, जिनेन्द्रश्रेष्ठः श्रीश्रेयांसनामा जिनेन्द्रचन्द्रः श्रीश्रेयांसजिनेन्द्रचन्द्रः तस्य विभव ऐश्वर्यं सर्वोत्कृष्टदया-चारिव्यादि / मुदा हर्षेण / शेश्रीयते-पुन: पुनरतिशयेन वा . श्रीयते इति श्रिधातोर्यडि लुपि द्वित्वे अनादि लूपि पूर्वस्य गुणे शेश्रि इत्यवस्थायां कर्मणि वर्तमानायां न्ते प्रत्यये क्ये "दीर्घश्च्वियङ्यक् क्येषु च" 4 / 3 / 108 / इति P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ १४/श्रीचतुर्विंशति-जिनस्तुतयः / दीर्घ शेश्रियते सेसेव्यते / ते-तादृशा जनाः / निश्रेयस:-मोक्षात् / संभवाःसमुद्भवा उत्पन्ना इति यावत् / श्रेयोऽनन्तकलाः श्रेयसां कल्याणानां या अनन्ता अपरिमिताः कलाः गुणास्तास्तथा / दरिध्रति-पुन: पुनरतिशयेन वा धरन्तीति धृधातोर्यङि लुपि:द्वित्वे अत्वे पूर्वस्य रि इत्यागमे दरिधृ इत्यवस्थायां वर्तमानायामन्ति प्रत्यये 'अन्तो नो लुक्' 4 / 2 / 96 / / इति न * लुकि-"इवर्णादेरस्वे" 1 / 2 / 21 / / इति रादेशे :, दरिध्रति-बरिभ्रति / हि निश्चये / “हि हेताववधारणे" इत्यभिधानचिन्तामणिः / ये यादृशा जनाः / अन्ते-समीपे अन्तकाले वा / ते-तव / पञ्चपदीम् पञ्चावस्थाम्, . पञ्चकल्याणकम्, पञ्चनमस्कारमन्त्रं वा। सरिस्म्रति-पुनः पुनरतिशयेन वा स्मरन्तीति स्मृधातोर्यङ लुपि द्वित्वे अनादिलोपे अत्वे पूर्वस्य रि इत्यन्यागमे सरिस्मृ इत्यवस्थायाम् वर्तमानायामन्ते प्रत्यये न लुकि रेफादेशे सरिस्म्रति, चेचिन्तति / ते तु तादृशजनास्तु / शैवीम्-शिवं मोक्षस्तत्सम्बन्धिनीम् / रमाम् लक्ष्मीम् / यान्ति प्राप्नुवन्ति, आदरातिशये वहुवचनम् / ते-एतादृशाः / श्रीविष्णुभवा:-श्रीविष्णुसूनवः / श्रीश्रेयांसनाथाः। पुनरिति वाक्यालङ्कारे ते-तुभ्यञ्च / सम्पदाम्-लक्ष्मीणाम् / . आस्पदम्-स्थानमाकरमिति यावत् / विददातु-पुनः पुनरतिशयेन वा ददत्विति विपूर्वाद् दा धातोर्यङि लुपि पूर्वस्य ह्रस्वत्वे आत्वे च विदादा .. इत्यवस्थायां वर्तमानायामन्तु प्रत्यये न लुकि “इनश्चातः"- 4 / 2 / 96 // इत्याल्लुकि विदादतु-विदाददतु / "ते श्री विष्णुभवा. विदाददतु नस्ते" इत्येवं पाठपक्षे तु-नः, अस्मभ्यं तुभ्यञ्चेत्यर्थो वोध्यः // 11 // सम्मामान्य सुमैः प्रणोनुवति ये श्रीवासुपूज्यं जिनं, रोहिण्यादिकवत् प्रबाभजति ते शैवीः श्रियोऽर्चाबलात् / पर्यन्या इव दाददत्यतिरसैन्यानि सर्वाणि ते, मार्तण्डाः इव विश्वभव्यकमलान् बोबोधयन्त्यन्वहम् // 12 // अन्वयः - ये, श्रीवासुपूज्यम्, र्जिनम्, सुमैः, सम्मामान्य, प्रणोनु-- वति, ते, अर्चावलात्, रोहिण्यादिकवत्, शैवीः, श्रियः, प्रवाभजति, ते, पर्यन्या इव, अतिरसः, सर्वाणि, धान्यानि, दादंदति, मार्तण्डा इव,'अन्वहम् विश्वभव्य-कमलान्, बोवोधयन्ति // P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ श्रीचतुर्विंशति-जिनस्तुतयः/१५ - वृत्तिः -ये-यादशा जनाः। श्रीवासुपूज्यम्-वसुपूज्यस्यापत्यं पुमान् वासुपूज्यस्तन्तथा / जिनम्-जिनेश्वरम्, सुमैः-पुष्पैः / सम्मामान्य-सम्पू-- वन्मिाज धातोर्यङि लुपि द्वित्वे ह्रस्वत्वे आत्वे सम्मामान् इत्यवस्थायां यपि सम्मामान्य सम्पोपूज्य प्रणोनुवति पुनः पुनरतिशयेन वा . प्रणुवन्तीनि प्रपूर्वाद् नु धातोर्यङि लुपि द्वित्वे पूर्वस्य गुणे णत्वे च प्रणोनु इत्यवस्थायां वर्तमानायामन्ति प्रत्यये न लुकि "धातोरवर्णो वर्णस्ये युन"२।११५०।। इत्युवि प्रणानुवति--प्रतोष्टुवति, ते-तादृशा जनाः / अविलात्-पूजाप्रभावात् / रोहिण्यादिकवत्-रोहिणी अदिर्येषान्ते रोहिण्यादिकास्त इव, रोहिण्यादिका यथाऽऽर्चावलात् मुक्तिमधिगता, तथा / शैवी: शिवस्य. मोक्षस्येमाः शैवी:, मोक्षसम्बन्धिनी: / श्रियः-लक्ष्मीः / प्रवाभजति-पुनः पुनरतिशयेन वा भजन्तीति प्रपूर्वाद् भज धातोर्यङि लुपि द्वित्वे : "द्वितीयतुर्यायोः पूवौं" 4 / 1 / 42 // इति तृतीये आत्वे च प्रवाभज् इत्यवस्थायां . वर्तमानायामन्ति प्रत्यये नलुकि प्रवाभजति-सेषेवति / . आशे श्रियतीति यावत् / किञ्च, ते-तादशा मानवाः पर्यन्याः मेघा इव / अतिरस:-प्रचुरानुरागैः, रस्यते इति रसः शब्दः, प्रचुरसाधूपदेशैरिति वार्थः / मेघ-पक्षे-प्रचुरजलैरित्यर्थः / सर्वाणि समग्राणि धान्यानि-धान्यपदस्योपचारांत् सम्पदः / मेघपक्षे शस्यानि / दाददति-पुनः पुनरतिशयेन वा ददन्ते इति 'दद धातोर्यङि लुपि द्वित्वे आत्वे दादद् इत्यवस्थायां वर्तमानायामन्ति प्रत्यये न लुकि दाददति-दादति, तथा, मार्तण्डा इव आदित्या इव / विश्वभव्यकमला--विश्वे विश्वान् वा भव्याः कमलानि इव तान्, सूर्यपक्षे विश्वे भव्यानि कमलानि, लिङ्ग व्यत्ययेनान्वयः / अन्वहम्-अहरहः / वोवोधयन्ति-पुनः पुनरतिशयेनः वा बोधयन्तीति बुध धातोर्यङि लुपि. द्वित्वे पूर्वस्य गुणे बोबुध इत्यवस्थायां णिचि "लघोरुपान्त्यस्य" 4 / 3 / 4 / / इति गुणे बोबोधि इत्यवस्थायां वर्तमानायामन्ति प्रत्यये मध्ये शवि "नामिनो गुणो" 4 / 2 / 4 / / इति गुणे अलुकि वोवोधयन्ति-शेशिक्षयन्ति / सूर्यपक्षे विचाकासयन्ति / रूपकश्लेषोपमासमुच्चयातिशयोक्तीनां सङ्करोऽलङ्कारः // 12 // ये नैर्ग्रन्थ्यपदं सरीसृपति ते जैनेन्द्रशुद्धव्रतैः, . . स्वर्ग सेषिधतीश ! पुण्यविभवैस्त्वत्प्राग्भवो मर्त्यवत् / / देवेन्द्रैः कृतवर्मपुत्र ! नवनैर्वावन्द्यते यस्त्रिधा, स श्रेयो विमलो ददातु विमलो मुक्तः श्रियो नोऽनिशम् // P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ १६/श्रीचतुर्विशति-जिनस्तुतयः ... अन्वयः - ये, जैनेन्द्रशुद्धव्रतः, नैन्थ्यपदम् सरीसृपति, ईश ! ते, पुण्यविभवः, त्वत्प्राग्भवो मर्त्यवत्, स्वर्गम्, सेषिधति, कृतवर्मपुत्र ! यः, देवेन्द्र, नवनैः, विधा, वावन्द्यते सः, श्रेयोविमल:, विमल:, नः, अनिशम्, मुक्तः , श्रियः, ददातु / / : : वृत्तिः - ये-यादृशा जना: / जैनेन्द्रशुद्धवतै:-जैनेन्द्राणां जिनेश्वराणां यानि शुद्धानि शास्त्राचारादिपरिष्कृतानि व्रतानि तपांसि तैः / नैर्ग्रन्थ्यपदम्-ग्रन्थिबन्धनन्ततो निर्गतो निर्ग्रन्थिमुक्तस्तस्य भावो नैर्ग्रन्थ्यम् तस्य पदम्-मुक्तिस्तान्तथा, यद्वा निर्ग्रन्थो भिक्षुस्तस्य भावो नन्थ्यम्, तस्य पदं साधुत्वमित्यर्थः / सरीसृपति-पुनः पुनरतिशयेन वा सर्पन्तीति सृपधातो-- यडि लुकि द्वित्वे अत्वे पूर्वस्य री इत्यागमे सरीसृप इत्यवस्थायां वर्त-- मानायामन्ति, प्रत्यये न लुकि * सरीसृपति--जङ्गमति / ईश ! प्रभो ! / ते-- व्रतादिना मोक्षपदानुसारः / पुण्यविभवैः पुण्यस्य सुकृतस्य विभवाः प्रभावास्तैस्तथा / त्वत्प्राग्भवः-त्वं प्राग्भवो यस्य सः, प्राग्भवे त्वं सः, अत्र. भवे स त्वमित्यर्थः / मर्त्यवत्-मरणधर्मा मर्त्यस्तद्वतं, यथा त्वत्प्राग्भवो मा व्रतादिपुण्यप्रतापैः स्वर्गं गतास्तद्वत् सापेक्षत्वेऽपि गमकत्वाद् वृत्तिः / सहस्रारकल्पे महापुरीनगर्यां महासेनो नृपः सर्वगुरोः पावें दीक्षां लात्वा व्रतादिपुण्यप्रभावात् स्वर्ग जगामेत्यागमः / स्वर्गम्-सुरलोकम् / सेषिधति-पुनः पुनरतिशयेन वा सेधन्तीति सिध् धातोर्यङि लुपि द्वित्वे पूर्वस्य गुणे सेषिध् इत्यवस्थायां वर्तमानायामन्ति प्रत्यये न लुकि सेपिधति जङ्गमति / यः यादृशो भवान् / देवेन्द्र सुरेन्द्रः / नवनः-स्तवनैः-स्तुतिपूर्वकमित्यर्थः / त्रिधा-मनोवाक्कायैः / वावन्द्यते पुनः पुनरतिशयेन वा वन्द्यते इति उदित्वान्नान्ताद्-वन्द्धातोर्यङि लुपि द्वित्वे पूर्वस्य आत्वे वावन्द् इत्यवस्थायां कर्मणि वर्तमानायां ते प्रत्यये मध्ये क्ये - वावन्द्यते-- तोष्ट्रयते, अभिवावद्यते वा / सः-तादृशो भवान् / श्रेयो विमल:-श्रेयोभिरनन्तकल्याणगुणैविमलो निर्मल:, निर्मलानन्तकल्याणगुणवानित्यर्थः / विमल: श्रीविमलनाथनामा तीर्थपतिः / न:-अस्मभ्यम् / अनिशम्-अनारतम् / "अनारतं त्वविरतं संसक्तं सततानिशम् / नित्यानवरताजस्रासक्ताश्रान्तानि सन्ततम्" 6 / 107 / / इत्यभिधानचिन्तामणिः / मुक्त:--कैवल्यस्य श्रिय:--लक्ष्मीः / ददातु--वितरतु / / 13 / / P.P.AC. GunratnasuriM.S. : Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ .... श्रीचतुर्विंशति-जिनस्तुतयः/१७ तातक्षीति तपो-बहुप्रहरणद्वैधामितारातिकान्, स श्री विष्णुकुमारवच्छिवपदं जागेति ते ध्यानतः / यो वाऽनन्तवदादधाति सुमनःपूजां विभोभिल्लवत्, लालम्भीति सुवैभवं स. समयादल्पादनन्तेशितुः // 14 // अन्वयः - तपोवहप्रहरणैः, द्वधामितारातिका, तातक्षीति, सः, ते, ध्यानतः, श्रीविष्णुकुमारवत, शिवपदम्, जागेति, यो. .वा, अनन्तवत्, विभोः, सुमनःपूजाम्, आदधाति, सः, भिल्लवत्, अनन्तेशितुः, अल्पात, समयात्, सुवैभवम्, लालम्भीति // . ... ... ... वृत्तिः - तपो वहाहरण:-तपांस्येव वहप्रहरणानि नाना नानाविधानि चायुधानि तपो वहुप्रहरणानि, तैस्तथा / य इति पुरः स इति तच्छद्वाल्लभ्यते, यत्तदोनित्यसम्बन्धात् / द्वधामितारातिकान्-द्वधा द्विप्रकारा आन्तरा वाह्याश्च ये अमिता असङ्ख्याताः कुत्सिता अंरातयः शत्रवोऽरातिकास्तांस्तथा / तातोति-पुनः पुनरतिशयेन वा तक्ष्णोतीति तक्ष् धातोर्यङि लुपि द्वित्वे पूर्वस्यात्वे तातः / इत्यवस्थायां वर्तमानायां तिवि प्रत्यये ईदागमे तातक्षीति-पुनः पुनरतिशयेन तनयति / सः तादृशो मानवः / ते-तव / ध्यानत:-ध्यानात् / श्रीविष्णु कुमारवत्-श्रीविष्णुकुमार इव / शिवपदम्-मोक्षम् / जागेति-पुनः पुनरतिशयेन वा . गाते इति गा धातोर्यङि लुपि द्वित्वे पूर्वस्य ह्रस्वत्वे "गहोर्ज:" 4 / 1 / 40 / / इति ज़ादेशे आत्वे जागा इत्यवस्थायां वर्तमानायां तिवि प्रत्यये ईदागमे “अवर्णस्येवो' 1 / 2 / 6 // इत्येदादेशे जागेति-यायेति / यः यादृशो जनः / वेति प्रकारान्तरे विभोः-प्रभोजिनस्येत्यर्थः / अनन्तंवत् अनन्त इव / सुमनःपूजाम्-सुमनोभिः पुष्पैः पूजाऽर्चा सुमनःपूजा तान्तथा / आदधाति-विदधाति / सः तादृशो जनः। अनन्तेशितु:-अनन्तोऽनन्ताख्यश्चासावीशिता शासिता चानन्तेशिता तस्य तथा, तत्सकाशादित्यर्थः / यद्वा-अनन्त ! ईशित ! इति सम्बोधनद्वयम् / अल्पात् स्तोकात्. / समयात्-कालात्, . अचिरादेवेत्यर्थः / भिल्लवत्-किरात इव / सुवैभवम् सुशोभनमैश्वर्यम् सुसम्पदमिति यावत् / लालम्भीति-पुनः पुनरतिशयेन वा लभते इति लभ धातोर्यङि लुपि. द्वित्वे पूर्वस्य आत्वे लालभ् इत्यवस्थायां वर्तमानायां तिवि प्रत्यये ईदागमे "लभः" 4 / 4 / 104 // इति नागमें "म्नां धुड वर्गे" / 3 / 39 / इति नकारस्य मकारे लालम्भीति-अधिजङ्गमीति // 14 // P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ १८/श्रीचतुर्विंशति-जिनस्तुतयः त्वन्नामाविरतं बरिभ्रति मनःपद्मेषु ये पद्मवत्, तेषां कीर्तिसुकेसरैश्च सुरभीचक्रेजवद्विष्टपम् / "ये लालम्भति मूर्तये सुमहनं श्रीसुव्रतेयोत्सुमैः, शक्राद्याश्च सदैव मामहति तांस्तान् धर्मनाथोऽवतात् // 15 * अन्वयः -ये, मनःपद्मषु, अविरतम, पद्मवत् त्वन्नाम, बरिभ्रति, तेषाम्, कीर्तिसुकेसरैश्च, अब्जवत्, विष्टपम्, सुरभीचक्रे, श्रीसुव्रतेय ! ये, मूर्तये, उत्सुमैः, सुमहनम्, लालम्भति, ताज, शक्रादयः, सदैव, मामहात, तान्, धर्मनाथः, अवतात् // 15 / / वृत्तिः -ये-यादृशा जनाः। मनःपद्मषु-मनश्चित्तमेव पद्म कमलम् तेषु / अविरतम्-अविश्रान्तम् / पद्मवत-पद्मरथनामनपतिरिव / त्वनाम - भवन्नामधेयम् / भ्रमरमिवेति ध्वनिः / वरिभ्रति-पुनः पुनरतिशयेन वा . विभ्रतीति भृधातोर्यङि लुपि द्वित्वे पूर्वस्य तृतीयत्वे रि इत्यागमे च वरिभ इत्यवस्थायां वर्तमानायामन्ति प्रत्यये न लुकि रेफादेशे च बरिभ्रति दरिध्रति / तेषाम्-तादृशानां जनानाम् / कीतिसुकेसरैश्च-कीर्तयो यशास्येव सुकेसरा: सुकिजल्काः कीतिसूकेसरास्तैस्तथा, च-पादपूतौ / अब्जवत् कमलवत् / विष्टपम् भुवनम् / “स्याल्लोको विष्टपं विश्वं भुवन जगती जगत्"- 6 // 1 // इत्यभिधानचिन्तामणिः / सुरभीचक्रे-सुरभीकृतमेव, कुर्वन्तीति किमु वक्तव्यमिति भावः / अत एव परोक्षासङ्गतिः। श्रीसुव्रतेय ! श्रीसुव्रताया अपत्यं पुमान् श्रीसूव्रतेयस्तदामन्त्रणे / ये-यादृशा मानवाः / मूर्तये-भवद्विम्बाय। उत्सुमैः-उद्बुद्ध: सम्यग् विकसितरित यावत् / सुमैः पुष्पैः प्रफुल्लप्रसूनैरित्यर्थः / सुमहनम्-सुपूजनम् / लालम्भात पुनः पुनरतिशयेन वा लभन्ते इति लभ धातोर्यङिः लुपि द्वित्वे आत्व लालभ् इत्यवस्थायां वर्तमानायामन्ति प्रत्यये नलुकि नान्तत्वे तस्य मादेशे लालम्भति चरीक्रति / तान्-तादृशान् जनान् / शकाद्याः इन्द्राद्याश्च / सदैव-सर्वदा खलु, सततमिति यावत / मामहति-पूनः पुनरतिशयेन वा महन्तीति मह धातोर्यङि लुपि द्वित्वे पूर्वस्य आत्वे मामह, इत्यवस्थाया वर्तमानायामन्ति प्रत्यये न लुकि मामहति-पोपूजति / तान्-तादृशान् पूजकजनान् / धर्मनाथः तदाख्यो जिनेश्वरः / अवतात्-रक्षतात्, रूपकोपमयोः संसृष्टि: / किञ्च नामधारणात्पूर्वमेव जगत्सुरभीकारोन्तयाकारणात्पूर्वमेव कार्यवर्णनादतिशयोक्तिः / / 15 / / P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ .. .. .. . श्रीचतुर्विंशति-जिनस्तुतयः/१९ ... दुष्टानिष्टभरानिहाजरिहरीद् यः सौवजन्मक्षणे, हित्वा चाक्रिकसम्पदोऽप्यजरिगीदिद्धसंविच्चयः / निःश्रेयःसुखमाश्रियोऽवरिवृतीद् यश्चाचिरेयः प्रभुः, स श्रीशान्तिजिन ! स्तुतः परिपरीत्विष्टार्थकान् शाश्वतान् // अ स्वयः- यः, सौवजन्मक्षणे, इह, दुष्टानिष्टभरान्, अजरिहरीत्, इद्ध संविच्चयः, चाक्रिकसम्पदोऽपि, हित्वा निःश्रेयःसुखम्, अजरि- . गहात्, यश्च, आचिरेयः, प्रभः; आश्रियः, अवंरिवृतीत्, सः, श्रीशान्तिजिनः स्तुतः, शाश्वतान्, इष्टार्थकान्, परिपरीतु // 16 // वृत्तिः - यः-यत्प्रकारो भगवान जिनेश्वरः / सौवजन्मक्षणे: स्वस्येद साव तादृशं यज्जन्मक्षणमुत्पत्तिकालस्तस्मिन् तथा / इह-अस्मिन् ' . मत्यलोके / दुष्टानिष्टभरान-दुष्टा असन्त इत्यर्थः येऽनिष्टा अकल्याणकरा- ... स्तषी भरा अतिशयास्तान् / अजरिहरीत् पुनः पुनरतिशयेन वा अहरदितिधातोर्यङि लुपि द्वित्त्रे पूर्वस्य हकारस्य जत्वे रि इत्यागमे जरिह इत्यस्थायां ह्यस्तन्यां तिवि विभक्तौ ईदागमे गुणे च "अड्धातोरदिः", 14 / 29 / / इत्यति अजरिहरीत् अनानाशीत् / तथा इद्धसंविच्चय:-इद्धःप्रदीप्त: अविद्यादीनभिभूय शुद्धस्वरूपेणावस्थितः संविदां चितं / ज्ञानानामिति यावत् चयो राशिः समूह इति यावत् / स विशुद्धज्ञानसमुदयः .. सन् / चाक्रिकसम्पदः-चाक्रिकाणां चक्रवर्तिनाम्, सम्पदो लक्ष्मीश्चाक्रिकसम्पदस्तास्तथा, अपिस्तादृशसम्पदस्त्यागाशक्तत्वं . प्रतिपादयति / हित्वा-सन्त्यज्य / नि:श्रयःसुखम् मोक्षसुखम् ब्रह्मानन्दमिति यावत् / / अजरिगीत्-पुनः पुनरतिशयेन वाऽग्रहीदिति ग्रहधातोर्यङि लुपि "ग्रहवश्च-" 4 / 2 / 84 / इति वृति. द्वित्वे पूर्वस्य अत्वे रि इत्यन्ते जरिगृह. इत्यवस्थायामद्यतन्यां तिवि मध्ये सिजि 'स्ताद्याशितो' / 4 / 4 / 32 // तीटि "सः सिजस्तेर्दिश्यो-" 4 / 3165 / / इतीदागमे "इट ईति" 4 / 3 / 71 // ति सिज्लोपे दीर्घ उपान्त्यस्य गुणे अटि अजरिगीत-स्व्यचरिकार्षीत् / -श्च, आचिरेय:-अचिराया अपत्यं पूमानित्याचिरेयः श्रीशान्तिजिनः / भुः-समर्थः / आश्रियः-श्रियमभिव्याप्य, श्रीसमन्वित इत्यर्थः / अवरितीत्-पुनः पुनरतिशयेन वा अवर्ततेति वृत् धातोर्यङि लुपि द्वित्वे वस्य अत्वे रि इत्यन्ते वरिवृत् इत्यवस्थायां शस्तन्यां तिवि ईदागमे mmmmmmmm P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ अटि अवरिवृतीत्-व्यनाजरिहरीत् / सः-तादृशः / श्रीशान्ति-जिन:तदाख्यः षोडशस्तीर्थङ्करः / स्तुत:-नुतः / सन्, शाश्वतान् नित्यान् / इष्टार्थकान्-अभिलषितपदार्थान् / परीपरीतु-पुन: पुनरतिशयेन वा पिपत्त इति पृ धातोर्यङि लुपि द्वित्वे पूर्वस्य अत्वे रि इत्यन्तागमे परि पृ इत्यवस्थायां पञ्चम्यां तुवि ईदाग़मे. गुणे परीपरीतु-रारक्षीतु वरीभरीतु वा // 16 // ये श्वेतातपवारणोरुचमरैर्मामान्यते यः प्रभु· भव्याः पापुरतीशितुः पदमहो आरामशोभादिवत् / _ ये वा मोमुदति प्रवीक्ष्य भगवंस्ते तीर्थकृद् वैभवान्, स श्रीकुन्थुविभुर्नतामरविभुर्मामातु सौवाः श्रियः // 17 // अन्वयः - यः, यः, प्रभूः, श्वेतातपवारणोरु-चमरैः, मामन्यते, भव्याः, आरामशोभादिवत्, ईशितुः, पदम्, पापुरति, अहो भगवन् तीर्थकृत् ! ये, ते, वैभवान्, प्रवीक्ष्य, मोमुदति, सः, नतामरविभुः, श्रीकुन्थुविभुः, सौवाः, श्रियः, मामातु // . ...... / वृत्तिः - यः-यादृशैर्जनः / य:-प्रभूः-यादृशः स्वामी। श्वेतातप-- . वारणोरुचमरैः-आतपं सूर्यप्रखरकिरणसम्पर्कादिजनितसन्तापं वारयन्ति दूरीकुर्वन्तीति आतपवारणानि, श्वेतानि धवलानि आतपवारणानि छत्राणि च उरूणि महान्ति चामराणि वालव्यजनानि च श्वेतातपवारणोरुचराणि / तैस्तथा। मामान्यते-पुनः पुनरतिशयेन वा मान्यते इति माञ् धातोर्यङि लुपि द्वित्वे ह्रस्वत्वे पूर्वस्यात्वे मामान् इत्यवस्थायां वर्तमानायान्ते प्रत्यये मध्ये क्ये मामान्यते-पोपूज्यते / ते इत्याक्षिप्यते / भव्याः मोक्षगमनयोग्याः श्राद्धा: / : आरामशोभादिवत्-आरामशोभादिरिव / ईशितु:-जिनेश्वरस्य / पदम्-स्थानम्, मोक्षमित्यर्थः / पापुरति-पुनः पुनरतिशयेन वा पृणन्तीति पृ धातोर्यङि लुपि द्वित्वे पूर्वस्य ह्रस्वत्वे आत्वे च दीर्घारत्वाद् दद्याद्यभावे आत्वे पापृ इत्यवस्थायां वर्तमानायामन्ति प्रत्यये नलुकि "शिदवित्-". 4 / 3 / 20 / / इति ङित्वे "ओष्ठ्यादुर"- 4 / 4 / 128 / / इत्युरादेशे पापुरति परिप्रति / अहो-आश्चर्यम् / भगवतो जिनवरस्य प्रभावः / भगवन्-ऐश्वर्यशालिन् ! तीर्थंकृत्-तीर्थकर ! ये-यादृशाः / ते - P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ श्रीचतुर्विंशति-जिनस्तुतयः/२१ 'भवान् ऐश्वर्याणि, प्रभावानिति यावत् / प्रवीक्ष्य समवलोक्य, उदात-पुनः पुनरतिशयेन वा मोदन्ते इति मुद् धातोर्यङि लुपि द्वित्वे बाय गुणे मोमुद् इत्यवस्थायां वर्तमानायामन्ति प्रत्यये न लुकि मोमुदति जारहृषति, तेभ्य इति , शेषः / सः-तादशः / नतामरविभुः-नता अमरअमवा देवेन्द्रा यत्र स तथा / श्रीकुन्थुविभूः श्रीकुन्थुनामा जिनेश्वरः / स्वायाः। श्रियः-मोक्षलक्षणा लक्ष्म्यः / मामातू-पूनः पुनरातचन वा मयतामिति मे धातो: “आत् सन्ध्यक्षरस्य-" 4 / 2 / 9 // इत्यात्वे डाप द्वित्वे पूर्वस्य ह्रस्वत्वे आत्वे च मामा इत्यवस्थायां वर्तमानायां "तुबि ईदागमविकल्पपक्षे मामातु-प्रणिददातु // 17 // त्वद्ध्यानासिलतायुधैः शमशितैर्याऽजंघनीद् विद्विषो, निष्पापं मुनिमार्गकं त्वमिव वा योऽजवनीत्सद्यमैः। द्वधाऽरातिगणोऽपि येन भवता नानाथ्यते लक्षधा, नन्द्यावर्तसुलाञ्छनोऽक्षरधनो नानातु नोऽरो जिनः // 18 // अन्वयः - यः, शमशितैः, त्वद्ध्यानासिलतायुधैः, विद्विषः, अजधनीत्, वा, यः त्वमिव, सद्यमः, निष्पापम्, मुनिमार्गकम्; अजङ्घनीत्, येन, भवता, द्वधा, अरातिगणः, अपि, लक्षधा, नानाथ्यते, नन्द्यावर्तसुलाञ्छनः, अक्षरधनः, जिनः, नः, नानातु // 18 // वृत्तिः - यः-यादशो जनः / शमशितैः-शमेन विषयेहादिनिवृत्तिलक्षणेन शितानि शाणितानि तीक्ष्णीकृतानीति यावत् शमशितोनि तैस्तथा-- शमपूर्वकैरिति भावः / त्वद्ध्यानासिलतायुधैः-तव भवतो जिनेश्वरस्य ध्यानं चिन्तनमेव असिलता करवाल:, तदेवायुधमस्त्रं तानि त्वद्धयानासिलतायुधानि तैस्तथा, / विद्विषः-कामक्रोधादिलक्षणानरीन् / अजङ्घनीत्-पुनः पुनरतिशयेन वा अहम् इति हन् धातोर्यङि लुपि द्वित्वे पूर्वस्य जत्वे 'अड़े हि हनो' 4 / 1 / 34 / / इति घत्वे मतान्तरे घनादेशाभावे पूर्वस्य मान्तत्वे 'अदो मुमी' इति स्वानुनासिके जड्.घन् इत्यवस्थायां ह्यस्तन्यां तिवि ईदागमे अजङ्घनीत् अजेहिंसीत् / वा-अथवा / यः-यादृशो जनः। त्वमिव भवानिव। सद्यमैः सन्नियमव्रतादिभिः / निष्पापम् निष्कल्मषम् / मुनिमार्गकम्-मुनीनामनगाराणां यतीनामिति यावत् मार्गः / / JulUMAR P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ २२/श्रीचतुर्विंशति-जिनस्तुतयः ग्रन्था मुनिमार्गस्तन्तथा / मुमुक्षपद्धतिमिति भावः / अजङ्घनीत्-पुनः . ' पुनरतिशयेन वा अहनु अगच्छदिति अजङ्घनी-अजङ्गमीत् / प्रक्रिया पूर्ववदेव / तस्येति- शेषः / येन-यत्प्रकारेण / भवता-त्वया। द्वधा द्विप्रकार , आभ्यन्तरो . बाह्यश्च / अरातिगण: कामादि-शत्रुकदम्बकम् / लक्ष धा लक्षप्रकारैः / नानाथ्यते-पुनः पुनरतिशयेन वा नाथ्यते इति नाथ् . धातोर्यङि लुपि द्वित्वे पूर्वस्य ह्रस्वत्वे आत्वे च नानाथ / इत्यवस्थायां / कर्मगि वर्तमानायां ते प्रत्यये क्ये नानाध्यते उपतातप्यते / स इति यच्छवलादाक्षिप्यते / नन्द्यावर्तसुलाञ्छन:-नन्द्यावर्तः सुलाञ्छनं यस्य स तथा, नन्द्यावर्ताङ्कः / अक्षरधनः-अक्षरो मोक्ष एव धनं सम्पत्तिर्यस्य स तथा, ब्रह्मविभव इत्यर्थः / अर:-तदाख्यः / जिन:-तीर्थकृत् / नः-अस्मान् नानाथतु-पुनः पुनरतिशयेन वा नाथत्विति. 'नाथ' धातोर्यङि लुपि द्वित्वे पूर्वस्य ह्रस्वत्वे आत्वे च नानाथ् इत्यवस्थायां वर्तमानायां तुवि प्रत्यये ईदागमविकल्पपक्षे "अघोषे प्रथमोऽशिट:--' 13 // 50 // इति प्रथमत्वे नानात्तु ऐश्वर्ययतु / रूपकोपमयोस्तिलतण्डुलवत् संसृष्टिः // 18 // येतात्रासिषुराशु भाविभविका याज्ञां शिरश्शेखरां, . ते डोढौकतु तान्प्रतीन्द्रनिकरांस्त्वन्मित्रवत् स्वश्रियः / / - श्रीमल्लोजिनपादपद्म युगली यैरर्च्यते यस्य ते, स श्रीकुम्भभवो भवोदधिरजोभीभ्योऽपि पापेतु नः // अन्वयः-ये, भाविभविकाः, शिरश्शेखराम, आज्ञाम, आशु, अतात्रासिषुः, ते, त्वन्मित्रवत्, तान्, इन्द्रनिकरान, प्रति, स्वश्रियः, डोढौकतु, श्रीमल्लीजिन ! यस्य, ते, पादपद्मयुगली, अच्यंते, नः, सः, श्रीकुम्भभवः, भवोदधिरजोभीभ्यः, अपि, पापेतु // 19 // वृत्तिः -ये-यादृशा जनाः / भाविभविका:-भाविनो भावनावन्तश्च ते भविका भव्या मोक्षगमनयोग्या इति यावत् भाविभविकाः / शिरश्शे- ... खराम्-शिरंस उत्तमाङ्गस्य शेखराम्-स्रग्रूपाम् / अत्र यद्यपि शेखर शब्दस्यैव शिरः स्रगित्यर्थस्तथापि विशेषण--समवधाने विशिष्टवाचकपदस्य विशेष्यमात्रपरत्वमिति / आज्ञाम्-निदेशम् / भवत इति शेषः / आशु झटिति / अतात्रासिषुः-युनः पुनरतिशयेन वा अत्रासत इति धातोरात्वे P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ श्रीचतुर्विंशति-जिनस्तुतयः/२३ यङि लुपि द्वित्वे अनादिलोपे पूर्वस्य ह्रस्वत्वे आत्वे च तात्रा इत्यवस्थामद्यतन्यामवि मध्ये सिजि "सिज्विदोऽभुव:-" इति पुसि “यमिरमि" ... 4.4 / 87 // इतीटि. सोऽन्तत्वे च "नाभ्यन्तस्था” 2 / 3 / 15 / / इति षत्वे स कारस्य रुत्वविसर्गयो:- अतात्रासिषुः अदादासिषुः / ते तादृशाः / त्वन्मित्र वत्-भवन्मित्रमिव / तान्-प्रसिद्धान् / इन्द्रनिकरांन्-इन्द्रसमूहान् / प्रति .: प्रतिगताः / स्वःश्रियः-स्वर्गलक्ष्मीः इन्द्रलक्ष्मीरित्यर्थः / डोढौकतु-पुनः पुनरतिशयेन वा ढौकन्तामिति ढौक्.धातोर्यङि लुपि द्वित्वे पूर्वस्य ह्रस्वत्वे तृतीयत्वे च गुणे डोढौक इत्यवस्थायां विधावन्तु प्रत्यये न लुकि डोढौकतुतोत्रौकतु / श्रीमल्लीजिन ! श्रीमल्लिनाथ जिननायक ! यस्य--यादशस्य ते-भवतः / पादपद्मयुगली पादपमानां चरणकमलानां युगली द्वयी पादपद्मयुगली, चरणकमलद्वयमित्यर्थः / अर्च्यते--पूज्यते / तानित्याक्षिप्यते / नः अस्मान् / अस्मदादीनित्यर्थः / स:--तादृशो.. भवान् / श्रीकुम्भभव:-श्रीकुम्भजन्मा / भवोदधिरजोभीम्योऽपि भवः संसार उदधिः सागर इवेति भवोदधिस्तस्मात् या रजः, रजःपरिमाणा स्वल्पतरा या भियो भीतयस्ताभ्योऽपि, अत्यल्पभयेभ्योऽपीत्यर्थः / पापेतु--पुनः पुनरतिशयेन वा पात्विति पाधातोर्यडिः लुपि द्वित्वे पूर्वस्य ह्रस्वत्वे आत्वे च पापा इत्यवस्थायां प्रार्थनायां तुवि ईदागमे गुणे च पापेतु रारक्षीतु / / 19 / / कमैंधांसि निदन्दहीति जिन ! ते जापाग्निना दाववत्, सेन्द्रादीनपि जाजहीसि विभवैर्वधिष्णुभी रामवत् / यस्याङ्घ्रि द्वितयां मुदं सुमनसां लालेति सीतेन्द्रवत्, स श्रीमान् मुनिसुव्रतो जनितते! जोगुपीत्वातितः // अन्वयः - जिन ! ते, दाववत्, जापाग्निना, कमैधांसि, निदन्दहीति, सः, वर्धिष्णुभिः, रामवत् विभवः इन्द्रादीन्, * अपि, जाजहीसि, यस्य, अद्मिद्वितयी, सीतेन्द्रवत्, सुमनसाम्, मुदम्, लाले ति, सः, श्रीमान् मुनिसुव्रतः नः, जनिततेः, आर्तितः, जोगुपीतु / / .... वृत्तिः - जिन ! भगवन्नहन् ! ते तव / नाम्नः, यः; इति शेषः / .. दाववत् / दावाग्नितुल्येन / जापाग्निना जापो जपनमेव अग्निर्वह्निर्जापा ग्निस्तेन तथा / कमैधांसि--कर्माण्येव अदृष्टान्येव एधांसि दारूणि काष्ठा P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ २४/श्रीचतुर्विंशति-जिनस्तुतयः नीति यावत्, तानि तथा / निदन्दहीति--पुनः पुनरतिशयेन वा दहते इति निपूर्वाद् दह धातोर्यङि लुपि द्वित्वे "जपजभ" इति पूर्वस्य मान्तत्वे मकारस्य नकारे निदन्दह इत्यवस्थायां वर्तमानायां तिबि ईदागमे निदन्दहीति भस्मीचरिकरीति / सः-तादृशो जनः / वधिष्णुभिः-वर्धमानैः / रामवत् रामतुल्यैः / विभवः सम्पद्भिः / इन्द्रादीनपि शक्रप्रभृतीन् खलु / अन्येषां का कथेति भावः / जाहसीति-पुनः पुनरतिशयेन वा हसतीति हस् धातो र्यङि लुपि द्वित्वे पूर्वहकारस्य जकारादेशे आत्वे च जाहस इत्यवस्थायां . वर्तमानायां तिबि ईदागमे जाहसीति तिरश्चरीकरीति, इन्द्रादप्यधिकलक्ष्मीको भवतीत्यर्थः / तथा, यस्य यादृशस्य जिनेश्वरस्य। अघ्रिद्वितयी अज्रयोश्चरणयोद्वितयी द्वयी अङ्घ्रिद्वयी-पादद्वयमित्यर्थः / सीतेन्द्रवत्-सीतेन्द्र इव / सुमनसाम्-देवानाम् / मुदम्-हर्षम् / लालेति-- पुनः पुनरतिशयेन लातीति लाधातोर्यङि लुपि द्वित्वे पूर्वस्य ह्रस्वत्वे आत्वे च लाला इत्यवस्थायां वर्तमानायां तिवि ईदागमे एदादेशे लालेति स्वीचरीकति / यत्पादद्वयमवलोक्य सर्वे देवा मोदन्ते इत्यर्थः / सः-तादृशः श्रीमान्-श्रीसम्पन्नः / मुनिसुव्रत:-मुनिसुव्रतनामा जिनेश्वरः / नः--अस्माकम् / जनितते:--जन्मपरम्परायाः / आर्तितः पीडातः। जोगुपीतु-पुनः पुनरतिशयेन वा गोपायतु--इति गुप् धातोर्यङि लुपिद्वित्वे पूर्वंगकारस्य जकारे गुणे च जोगुप् इत्यवस्थायामनुवन्धनिर्देशादायप्रत्ययाभावे ईदागमे "द्वयुक्तोपान्त्यस्य-" 4 / 3 / 14 // इति गुणाभावे जोगुपीतु / उपमालङ्कारः “साम्यं वाच्यमवैधयें वाक्यैक्य. उपमाद्वयोः" इति साहित्यदर्पणे विश्वनाथेन तल्लक्षणमभाणि // 20 // ये शाशङ्कति धर्मतत्त्वकृतये शैवर्द्धये ते विभोः, प्रालोलोकति तेऽङ्गिनो हि नरकान् सप्तापि चार्वाकवत् / ये शाशंसति यं नमि नवनवैः स्तोत्रैः सुरेन्द्रादिवत्, ते शाशंसतु किं नु नो अतिशयाः सर्वेऽपि तेषां रिपून् // अन्वयः - विभो ! , ये, ते, धर्मतत्त्वकृतये, शैवर्द्ध ये शाशङ्कति, ते, हि, अङ्गिनः, चार्वाकवत्, सप्तापि नरकान्, प्रालोलोकति, ये, यम्, नमिम्, सुरेन्द्रादिवत्, नवनवैः, स्तोत्र, शाशंसति, तेषाम्, रिपून्, . ते, सर्वेऽपि, अतिशया:, किन्नु, नो, शाशंसतु / / P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ श्रीचतुर्विंशति-जिनस्तुतयः/२५ वृत्तिः - विभो !-सर्वलोकव्यापक जिनेश्वरप्रभो ! ये यादृशाः जनाः / ते-तव / धर्मतत्त्वकृतये धर्मस्य सुकृतस्य, तत्त्वं याथार्थ्यं धर्मतत्त्वम् तस्य या कृतिः अहिंसादि-पञ्चमहाव्रतपालनक्रिया सा धर्मतत्त्वकृतिस्तस्यै तथा, तामुद्दिश्य, शैवर्द्धये शैव्य: मोक्षलक्षणा मोक्षसम्वन्धिन्यो वा या ऋद्धयः सम्पदस्ता उद्दिश्य च, शाशङ्कति-पुनः पुनरतिशयेन. वा शङ्कते इत्युदित्वात्सनन्ताच्छङ्क धातोर्यङि लुपि द्वित्वे.. पूर्वस्याऽऽत्वे शाशङ्क इत्यवस्थायां वर्तमानायामन्ति प्रत्यये न लुकि शाशङ्कति-सन्देदिहति / ते-तादृशाः / हिः पादपूरणे / अङ्गिनः प्राणिनः / चार्वाकवत्-चाकि इव / तस्य नास्तिकत्वादिति भावः / त्वद्विभवाशङ्कितोऽपि नास्तिका एवेत्यत:-सप्त-सप्त सङ्ख्याकानपि तपनादिलक्षणान् / नरकाद-निरयान् प्रालोलोकति-पूनः पुनरतिशयेन वा प्रालोकन्ते इति प्र: आपूर्वकाल्लोक धातोर्यङि लुपि द्वित्वे पूर्वस्य हस्वत्वे गुणे च प्रालोलोक् . इत्यवस्थायां वर्तमानायामन्ति प्रत्यये न लुकि प्रालोलोकति-प्रदरीदर्शति / नारकीयदुःखानि वोभुजतीत्यर्थः / तथा, ये यादृशा जनाः / यम्-यादृशम् / नमिम् तदाख्यतीर्थङ्करम् / सुरेन्द्रादिवत्-सुरेन्द्रादय इव / नवनवै:-नवप्रकारैः। स्तोत्रैः स्तवैः / शाशंसति-पुनः पुनरतिशयेन वा शंसन्तीति शंस् धातोर्यङि लुपि द्वित्वे पूर्वस्य आत्वे शाशंस इत्यवस्थाया वर्तमानायामन्ति प्रत्यये न लुकि शाशंसति तोष्टुवति / तेषाम्-तादृशानां-स्तोतृणाम् / रिपून-कामादिद्विषः / ते-तव / सर्वे-समेऽपि / अतिशयाः अलौकिकविशेषभावाः / किन्नु-कथम् / नो-न / शाशंसतु-जड्.घ्नन्तु / अपित जेहिंसत्वेव / त्वत्स्तोतृणां समे द्विषो विनश्यन्तीत्यर्थः // 21 // TraiTILLI द्वयक्षेषु प्रभुता शिरोवहनता मेऽबोभवीद् दक्षिणा-, वर्ताख्यापि वरीवरीति विभवाच्छङ्खोऽपि बाभक्ति ताम् / यस्यां किं किल याचितुतव पुरः शङ्खश्रियः शाश्वतीः, स श्रीनेमिजिनः प्रणम्रभुवनस्तात्रेतु तात्रेतु नः // 22 // 41 - अन्वयः - द्वयक्षेषु, शिरोवहनता, मे, अबोभवीत्, विभवान, दक्षिणावर्ताऽऽख्याऽपि, वरीवृतीति, तव, पुरः, शाश्वती:, शङ्खश्रियः, याचितुम्, यस्याम्, किल ताम्, शङ्खोऽपि, वाभक्ति, सः, प्रणम्रभुवनः, श्रीनेमिजिनः, नः, तात्रेतु, तात्रेतु // 22 // P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ २६/श्रीचतुर्विंशति-जिनस्तुतयः वृत्तिः - यक्षेषु-द्वे अक्षे इन्द्रिये येषां ते द्वयक्षास्तेषु / प्रभुतास्वामित्वम् / शिरोवहनता-शिरोधार्यत्वञ्च / मे-मम / अवोभवीत्पुनः पुनरतिशयेन वाऽभवदिति भूधातोर्यङि लुपि द्वित्वे पूर्वस्य तृतीयत्वे ह्रस्वत्वे गुणे च वोभू इत्यवस्थायां ह्यस्तन्यां दिवि ईदागमे गुणे अवादेशे अटि अवोभवीत्-अवोभूत् / विभवात्-त्वत्प्रभावात् / दक्षिणावर्ताऽऽख्या दक्षिणावर्त इति नामापि / वरीवृतीति-पुनः पुनरतिशयेन वा वर्तते इति वृत् धातोर्यङ्गि लुपि द्वित्वे पूर्वस्य अत्वे री इत्यागमे च वरीवृत् इत्यवस्थायां वर्तमानायां तिवि ईदागमे गुणनिषेधे च वरीवृतीति-वेविदीति / अनन्तरम् ते तव / पुरः अग्रे / शाश्वती:-नित्याः / शङ्खश्रियः-सुखविज्ञा नानन्तलक्षणाः सम्पदः / याचितुम्-प्राथितुम् / यस्याम्-दक्षिणावर्ताऽऽ चिह्नभूतः कम्बुः / ताम्-प्रसिद्धाम्, दक्षिणावर्ताख्याम् / वाभक्ति-पुनः पुनरतिशयेन वा भजते इति भज् धातोर्यङि लुपि द्वित्वे पूर्वस्य तृतीयत्वे आत्वे च वाभज् इत्यवस्थायां वर्तमानायां तिवि ईदागम-विकल्पपक्षे 'अघोषे प्रथमः' 1 // 3 // 50 // इति प्रथमत्वे वाभक्ति-सेसेवीत् / सः-तादृशः / श्रीनेमिजिन:-श्रीनेमिनामा तीर्थकृत् / नः अस्मान् / तात्रेतु तात्रेतु-पुनः पुनरतिशयेन वा त्रायतामिति, यङ लुवन्तत्वादेवाऽऽभीक्ष्ण्यावगमे द्विरुक्तिर्भत्क्यादृतिजनितेति न दोषः / कृतात्वात् त्राधातोर्यङि लुपि द्वित्वे पूर्वस्यानादिलोपे ह्रस्वत्वे आत्वे च तात्रा इत्यवस्थायां प्रार्थनायां तुवि ईदागमे गुणे च तात्रेतु-रारक्षीतु / अत्राचेतने याचनादिरूप-चेतनधर्मसमारोपादतिशयोक्तिः / / 22 / / . मूर्ति यायजतीश ! ते सुमनसां भङ्गयेव ये सच्छ्येि , नूनं यायजतीह राज्यविभवैर्देपालवत्तऽङ्गिनः / ये वा जाजपतीद्धमन्त्रमणिवत्त यस्य नामान्यहो, पापूर्याच्छिविनो गुणांश्च सकलान् श्रीपार्श्वनाथः स नः॥ / अन्वयः - ईश ! , ये, सच्छ्येि , सुमनसाम्, भङ्गयेव, ते, मूर्तिम्, यायजति, ते, अङ्गिन:, देपालवत्, इह, राज्यविभवः, नूनम्, यायजति, ये, वा, इद्धमन्त्रमणिवत् यस्य, ते, शिविनः, नामानि, जाजपति, अहो, सः, श्रीपार्श्वनाथः, सकलान्, गुणांश्च, नः, पापूर्यात् // 23 // P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ श्रीचतुर्विंशति-जिनस्तुतयः/२७ वृत्तिः - ईश !-प्रभो!। ये-यादृशा जनाः / सच्छ्येि -उत्तम लक्ष्म्यै / सुमनसाम्-पुष्पाणाम् / भङ्गया--रचनयैव, ते-तव / मूर्तिम्-विम्बम् यायजति-पुन: पुनरतिशयेन वा यजन्तीति यज् धातोर्यङि लुपि द्वित्वे पूर्वस्य आत्वे यायज् इत्यवस्थायां वर्तमानायामन्तिप्रत्यये न लुकि यायजति पोपूजयन्ति / ते-तादृशा अङ्गिन:-प्राणिनः / देपालवत्--देपाल इव / राज्यविभवः राज्यसम्पद्भिः / सहेति शेषः / नूनम्-निश्चितम् / याय-- जति-सङ्गतिं चरीक्रति / राज्यविभवं प्राप्नोतीत्यर्थः। वा-समुच्चये। ये-यादृशाः / यस्य-यादृशस्य / ते-तव / शिविन:-सिद्धिरतः / इद्धमन्त्रमणिवत्--दीप्तमन्त्रमणितुल्यानि / नामानि-अभिधेयानि। जाजपति-भृशं-- जपन्ति / अत्र जप् धातोर्गीयामेव “गृलप्" 314112 // इत्यादिना यविधानाज्जाजपतीति प्रयोगश्चिन्त्य एव / यड्.ोऽभावे यङलुपो गगनकुसुमायमानत्वात, अतः प्रक्रिया न दशिता / किञ्च यद्यपि मान्तत्वे जाजपतीति सर्वथा दुर्लभमेवेति / अहो इति कोमलामन्त्रणे / स:-जादृशः / श्रीपार्श्वनाथ:-तदाख्यस्त्रयोविंशस्तीर्थकृत् / न:-अस्माकम् / सकलान्-सर्वान् / गुणान्-धर्मान् / पापूर्यात्-पुनः पुनरतिशयेन वा पूर्यादिति पृ धातोर्यड्. लुपि द्वित्वे पूर्वस्य अत्वे आत्वे च पाप इत्यवस्थायां प्रार्थनायां यात् प्रत्यये "ओष्ठ्यादुर" 4 / 4 / 118 // इत्युरादेशे "भ्वादेनीमिनः" 2 / 1 / 63 / / इति दीर्घ पापूर्यात् परिप्रियात् // 23 // मूर्ति मामदति स्म वीक्ष्य जिन ते देवाधिदेव प्रभावत्याद्या इव ये परिप्रति हितान् देवर्द्धयः सिद्धयः। येनाजायि हरिर्बलादिह महावीरो वरीवर्त्यसौ, यं सिंहोऽङ्कमिषान्नृसिंहमभजच्छीवर्धमानः श्रिये // 24 // अन्वयः - जिन ! देवाधिदेव ! ते, मूर्तिम, वीक्ष्य, प्रभावत्याद्या, इव ये, मामदति स्म, ता, हि, देवद्धयः, सिद्धयः, परिप्रति, येन, बलात्, हरिः, अजायि, असौ, महावीरः, इह, वरीवर्ति, सिंहः, अङ्कमिषात्, यम्, नृसिंहम्, अभजत्, श्रीवर्धमानः, श्रिये // 24 // वृत्तिः - जिन ! सर्वज्ञ ! देवाधिदेव ! सुराधिनाथ ! ते-तव / P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ २८/श्रीचतुर्विंशति-जिनस्तुतयः मूर्तिम्-विम्वम् / वीक्ष्य-अवलोक्य / प्रभावत्याद्या इव-प्रभावतीनामराश्या तुल्याः / ये-यादृशा जनाः / मामदति स्म--पुनः पुनरतिशयेन वा माद्यति स्मेति मद्धातोर्यङि लुपि द्वित्वे पूर्वस्य आत्वे मामद् इत्यवस्थायां वर्तमानायामन्ति प्रत्यये नलुकि मामदति स्म-जाहृषति स्म / हि पादपूरणे तान्-तादृशान् / देवर्द्धयः--देवसम्पद: सिद्धयः--मोक्षादिलक्षणाश्च / परीप्रति--पुन: पुनरतिशयेन वा पिप्रतीति पृ धातोर्यङि लुपि द्वित्वे पूर्वस्य अत्वे रि इत्यागमे च परि पृ इत्यवस्थायां वर्तमानायामन्ति प्रत्यये नलुपि रेफादेशे परिप्रति--रारंक्षति, ते दद्धिसिद्धयादीन् लभन्ते इत्यर्थः / तथा, येन--भवता / बलात्-प्रसह्य / हरि:-सिंहः / अजायि--जीयते स्म / जि-- धातोः कर्मण्यद्यतन्यां ते "भावकर्मणोः 3 / 4 / 68 // इति णिचि न लुकि च वृद्धाचादेशे अजायि--पराभावि। अस्यै सिंहजेता। इह--अत्र / महावीरः-- महांश्चासौ वीर इत्यन्वर्थः श्रेष्ठवीरः / वरीवर्ति--पुनः पुनरतिशयेन वा वर्तते इति वृत् धातोयंङि लुपि द्वित्वे पूर्वस्य अत्वे री इत्यागमे च वरीवृत्' इत्यवस्थायां वर्तमानायां तिवि ईदागमविकल्पपक्षे गुणे वरीवर्ति-- वेविदीति / सिंहाभिभवात् महावीर इति नामाख्यात इत्यर्थः / तथा, सिंहः मृगपति:-अङ्कमिषात् चिह्नव्याजात् / यम्-यादृशम् / नृसिंहम्--पुरुषश्रेष्ठम् / अभजत् आश्रयत् / पराजितो हि सेवको भवतीति भावः / सः इति लभ्यते / श्रीवर्धमानः--तन्नामा तीर्थकृत् लिपे--मुक्तिलक्ष्म्यै भवत्विति शेषः / अत्र अङ्कमिवाक् भजने 'अजायि' इत्यस्य हेतुत्वेनानुसन्धानात्काव्यलिङ्गम् तच्चाङ्क मिषादित्यपह्लतिसङ्कीर्णम् // 24 // एवं ये वृषभादयो जिन चतुर्विशाः प्रवावन्दिता, लक्ष्मीसागरसूरिराजपनिता रत्नत्रयीनन्दिताः / ते देदीपतु सार्वनिर्वृतिसुखैः सर्वाय संविच्छ्यिः , श्रीमन्तो जिनमण्डनाः शिवपुरः पोपूरतूच्चैः श्रियः // 25 // अन्वयः - एवम्, ये, वृषभादयः, जिनचतुविशाः, रत्नत्रयीनन्दिताः, लक्ष्मीसागरसूरिराजपनिताः, प्रवावन्दिताः, ते, श्रीमन्तः, जिनमण्डनाः, सार्वनिवृतिसुखैः, सर्वाय संविच्छ्यिः , देदीपतु, उच्चैः श्रियः, शिवपुरः. पोपूरतु // 25 // P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ श्रीचतुर्विंशति-जिनस्तुतयः /29 वृत्तिः - एवम् पूर्वोक्तप्रकारेण / रत्नत्रयीनन्दिताः ज्ञानादित्रयीनन्दिता: भुवनत्रयीविख्याता वा / वृषभादयः आदिनाथादयः / जिनचतुविशा:-जिना:-सर्वज्ञाश्च ते चतुविशास्ते तथा, चतुर्विशतिजिनेश्वराः / लक्ष्मीसागरसूरिराजपनिता:-लक्ष्मीसागरा: श्रीसमुदाये सूरयः आचार्या राजानश्चन्द्रास्तैः, लक्ष्मीसागरनामसूरिश्रेष्ठश्च पनिताः स्तुताः / प्रवावन्दिता:-पुनः पुनरतिशयेन वा प्रवन्दिताः इति प्रपूर्वाद् वन्द्धातोर्यङि लुपि द्वित्वे पूर्वस्य आत्वे प्रवावन्द् इत्यवस्थायां कर्मणि भूते क्त प्रत्यये इटि प्रवावन्दिताः प्रणंनमिताश्च / ते-तादृशा जिनाः / जिनमण्डनाः सर्वज्ञश्रेष्ठाः , तदाख्या गुरवश्च / सर्वनिवृतिसुखै:-सकलमोक्षसुखैः सर्वायसंविच्छ्यि:-सर्वा:-आयो यशः संविद् ज्ञानं श्रियः सम्पदः येषान्ते / यद्वा मम यशोज्ञानसम्पदः / देदीपतु-पुनः पुनरतिशयेन वा दीप्यन्तामिति दीप् धातोर्यङि लुपि द्वित्वे पूर्वस्य गुणे देदीप् इत्यवस्थायां प्रार्थनायामन्तु प्रत्यये नलुकि देदीपतु दोद्योततु / उच्चैः श्रियः उच्चैः श्रीर्यासु तास्तथा / ममोच्चैरुत्तमा लक्ष्मीर्वा / शिवपुरः कल्याणग्रामाः / मोक्षस्थानञ्च / पोपूरतु-पुनः पुनरतिशयेन वा पूर्यन्तामिति पूर धातोर्यङ् लुपि द्वित्वे पूर्वस्य ह्रस्वत्वे गुणे च पोपूर इत्यवस्थायां प्रार्थनायामन्तु प्रत्यये न लुकि पोपूरतु वरीवृधतु // 25 // इति पृथक् चतुर्विंशतिजिनस्तवनं नमस्काराश्च // 25 // प्रागैरावतभारतैकजनुषोऽसास्नापिषुर्वासवैः, स्वर्णाद्रौ त्वपरीपरुस्त्रिजगतीर्दानैः स्वसांवत्सरैः / लब्ध्वा ज्ञानमजङ्गमः शिवपुरी येऽनन्तसौख्यां मुनीन्, श्रीसङ्घानभिपतुस्वविभवैः पुण्योद्भवैस्ते जिनाः // 26 // अन्वयः - ये, प्रागैरावतभारतैकजनुषः, वासवैः, अस्नापिषुः, तु, स्वर्णाद्रौ, स्वसाँव्वत्सरैः, दानैः, त्रिजगती:, अपरीपरुः, ज्ञानम्, लब्ध्वा, अनन्तसौख्याम्, शिवपुरीम्, अजङ्गमुः, ते, जिनाः, मुनीन्, श्रीसङ्घान्, पुण्योद्भवैः, स्वविभवैः, अभिपतु // 26 // वृत्तिः - ये-यादृशा यावन्तो वा। प्रागैरावतभारतैकजनुषः-प्रागैवताख्यं यद्भारतखण्डम्, तत्रैकमद्वितीयं जनुर्जन्म येषान्ते तथा। P.P. Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ ३०/श्रीचतुर्विंशति-जिनस्तुतयः असकृज्जन्मान इत्यर्थः / वासवः इन्द्रः / असास्नासिषुः पुनः पुनरतिशयेन वा असिस्नपन्निति स्नाधातोर्यकु लुपि द्वित्वे पूर्वस्यानादिलोपे ह्रस्वत्वे आत्वे च सास्ना इत्यवस्थायां णिचि "अति री" 4 / 2 / 21 // इत्यादिना प्वन्तत्वे "ज्वल ह्वल-" 4 / 2 / 32 / / इत्यादिना ह्रस्वत्वविकल्पे अद्यतन्यामनि तस्य "णिश्रि-" 3 / 4157 // इति डे णिलोपे असास्नापन् इत्येव साधुः ण्यन्तातु सिजअभावादिति असास्नापिषुरिति प्रयोगश्चिन्त्य एव, स्नपिता अभूचरित्यर्थः / यद्वा-असास्नासिषुरिति पाठः, अत्र च असास्ना अनित्यवस्थायां सिचि, अनः पुसि “यमिरभि" 414187 / / इति इटि सत्वे च षत्वे च असास्नासिषुः, सकारस्य रुत्वविसगौं / तु-पुनः / स्वर्णाद्रौ-मेरो। मेरौ स्नपिता इत्यन्वयो वा बोध्यः / स्वसांव्वत्सरै:-निजसंवत्सरभवैः / दान:-वितरणैः / त्रिजगती:-त्रिभूवनानि / अपरीपरु:-पुनः पुनरतिशयेन वा अपिपरुरिति पृ धातोर्यडि. लुपि द्वित्वे पूर्वस्य अत्वे री इत्यन्तागमे च परी पृ इत्यवस्थायां ह्यस्तन्यामन्ति अडागमे अपरी पृ अनित्यवस्थायां "व्युक्त जक्षपञ्चत:-" 4 / 2 / 93 // इति पुसि "पुस्यौ" 4 / 3 / 78 / / इति गुणे अपरीपरुः अवरीभरुः / तथा, ज्ञानम्-केवललक्षणम् / लब्ध्वा सम्प्राप्य अनन्तसौख्याम्-अनन्तमपरिमितं सौख्यं यत्र तान्तथा सकलसुखपूर्णाम् / शिवपुरीम् मोक्षनगरीम् / अजङ्गमुः-पुनः पुनरगच्छन्निति गम् धातोर्यङ् लुपि द्वित्वे पूर्वस्यमान्तत्वे मकारस्य ङकारे जङ्गम् इत्यवस्थायां ह्यस्तन्या मनि पुसि अडागमे सकारस्य रुत्वविसर्गयोरजङ्गमुः अयायुः ते-तादृशाः जिनाः सर्वज्ञाः / पुण्योद्भवैः सुकृतप्रभवैः / स्वविभवैः निजप्रभावैः / मुनीन् यतीन् / श्रीसद्धान्-श्रीसमितीश्च / अभिपतु:-पुनः पुनरतिशयेन वा अभिपिप्रतु इति, पृ धातोरभिपूर्वाद् यङ् लुपि द्वित्वे पूर्वस्य अत्वे रन्तत्वे अभिपर्प इत्यवस्थायामन्तु प्रत्यये न लुकि रेफादेशे अभिपतु वतु // 26 // TETTE या मध्ये सदसं जिनैस्त्रिपदिकादीपी स्म राराज्यते, भास्यन्ते स्म ततोऽपि पूर्वसमयोद्दीपा गणीन्द्रः परैः / देदीपीति ततोऽपि भासितजगत्सिद्धान्तदीपोऽर्कवत्, विश्वान्धकरणं तमोऽप्यपहरन भूयात् स सङ्घः श्रिये // अन्वयः - मध्येसदसम्, या, त्रिपदिकादीपी, जिनः, राराज्यते स्म, P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ - श्रीचतुर्विंशति-जिनस्तुतयः/३१ iya ततोऽपि, पूर्वसमयोद्दीपाः, परैः, गणीन्द्रः, भास्यन्ते स्म, ततोऽपि भासितजगत्सिद्धान्तदीपः, अर्कवत्, विश्वान्धंकरणम्, तमः, अपि, अपहरन्, देदीपीति, सः, संघः, श्रिये, भूयात् // 26 / / वृत्तिः - मध्ये सदसम्-सदसो मध्ये इति मध्ये सदसम्, समवसरणमध्ये इत्यर्थः / या-यत्प्रकारा / त्रिपदिकादीपी--त्रिपदिकादीपिका / जिनैः सर्वज्ञैः / राराज्यते स्म-पुनः पुनरतिशयेन वा राज्यते स्मेति राजू धातोर्यडि लुपि द्वित्वे पूर्वस्य ह्रस्वत्वे आत्वे च राराज् इत्यवस्थायां कर्मणि वर्तमा-- नायां ते प्रत्यये मध्ये क्ये, राराज्यते स्म शोशुभ्यते स्म / ततोऽपि तदनन्तरञ्च पूर्वसमयोद्दीप:-चतुर्दशपूर्वादि-समयोद्दीपैः / परैः-प्रकृष्टः / गणीन्द्र:गणधरैः / भास्यन्ते स्म-दीप्यन्ते स्म / ततोऽपि--तदनन्तरञ्च / भासितजगत्सिद्धान्तदीप:-भासितः प्रख्यापितो जगति लोके सिद्धान्त एव दीपो येन सः, अर्कवत्-सूर्यवत् / विश्वान्धङ्करणम्-विश्वस्य लोकस्य अन्धङ्करणं दृष्ट्युपघातकम् / तमः अज्ञानम् ध्वान्तञ्च / अपहरन-विनाशयन् / देदीपीति-पुनः पुनरतिशयेन वा दीप्यते इति दीप् धातोर्यडि. लुपि द्वित्वे पूर्वस्य ह्रस्वत्वे गुणे च देदीप् इत्यवस्थायां वर्तमानायां तिवि ईदागमे देदीपीति, यमित्यनुषज्यते / सः-तादृशः / सङ्घः-श्रीसङ्घः / श्रिये-कल्याणाय भूयात् स्तात् // 27 // सङ्घो यः परिपर्ति यां प्रमहितुं सम्यक्त्ववैशारदां, ध्यातुं वा दरिदष्टि हृत्सरसिजे श्रीतीर्थकृच्छारदाम् / रक्षायै परिपत्र्वसौ जिनमतं तं क्षीणकष्टारकं, विश्वेष्टः परिपतु सा भगवती श्रीसङ्घभट्टारकम् // 28 // TAITREET अन्वयः - यः, सङ्घः, याम्, सम्यक्त्ववैशारदाम्, श्रीतीर्थकृच्छारदाम्, प्रमहितुम्, परिपर्ति, ध्यातुम्, वा, हृत्सरसिजे, दरिदष्टि, रक्षायै, असौ, तम्, जिनमतम्, परिपतु, क्षीणकष्टाख्यम्, श्रीसङ्घम्ट्टारकम् सा, भगवती, विश्वेष्टः, परिपतु // 28 // वृत्तिः - यः-यत्प्रकारः / सङ्घः-चतुर्विधसङ्घः / याम्-यत्प्रकाराम् P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ . ३२/श्रीचतुर्विंशति-जिनस्तुतयः सम्यक्त्व-वैशारदाम्-सम्यक्त्वे वैशारदा निपूणा, सम्यक्त्व-प्रतिपादयित्री तान्तथा / अत्र वैशारदामिति युक्तम् स्वार्थाद्यणन्तत्वे ङीप्रसङ्गात् / श्रीतीर्थकृच्छारदाम्-श्रीतीर्थकृतो जिनेश्वरस्य शारदा सरस्वती, ताम्, वाणीमित्यर्थः / प्रमहितुम्-पूजयितुम् / परिपति-पुनः पुनरतिशयेन वा पिपर्तीति पृ धातोर्यड्. लुपि द्वित्वे पूर्वस्य अत्वे रि इत्यागमे च परि पृ इत्यवस्थायां वर्तमानायां तिवि ईदागमाभावपक्षे गुणे परिपर्ति-रारक्षीति ध्यातुम्-चिन्तितुम् / वा / हृत्सरसिजे-मनःपद्म / दरिदष्टि-पुनः पुनरतिशयेन वा पश्यतीति दृश् धातोर्यडि. लुपि द्वित्वे पूर्वस्य अत्वे रि इत्यागमे दरिदृश् इत्यवस्थायां वर्तमानायां तिवि ईदागमाभावपक्षे गुणे "यज् सृज्-" 2 / 177 / / इति षत्वे "तवर्गस्य-" 1 / 3 / 60 // इति टत्वे च दरिदष्टि अवलोलोकीति / असौ-एषा शारदा / तम्-तादृशम् / जिनमतम् जिनेश्वरप्रियम् / रक्षायै पालनाय / परिपतु --वरिभर्तु / यद्वा असौ सङ्घः, तम्, जिनमतम्--जिनेश्वरोक्तमार्गम। रक्षायै परिपत्वित्यर्थः / सा-तादशी / भगवती ऐश्वर्य-शालिनी शारदा। क्षीणकष्टारकम्-क्षीणं नष्टं कष्टस्य आरकं कालविशेषो यस्स तन्तथा / यद्वा क्षीणकष्टारकमित्यस्य जिनमतमित्यत्रान्वयो वोध्यः / श्रीसङघभट्टारकम् श्रीसङघेश्वरम् / विश्वेष्ट:--सकलाभिलषितैः / परिपतु वरिभर्तु / सकलाभि-- लषितं दत्त्वा रक्षतु पूरयतु वेत्यर्थः / / 28 / / एभिस्त्रिभिः कल्पैश्चतुर्विंशतिजिनानां स्तुतयो भवन्ति // // इति चतुविशति-जिनस्तुतिव्याख्या समाप्ता // P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ (3) वर्णक्रम-सक्ति-पंचाशिका समश्लोकी गूर्जरभाषानुवाद मण्डिता अनुवादका भानुभाई व्यासः, 'बादरायणा' P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ -श्रीगौतमस्वामिने नमः -वर्णक्रम-सूक्ति-पंचाशिका अहं नमामि सर्वेषां, 7. मन्त्राणां मन्त्रमुत्तमम् / सुवर्णमिव धातूनां, .... मेरुमिव महीभृताम् // 1 // आलोक एव नन्दन्ति, सज्जना न तु दुर्जनाः / अभ्युद्यते सहस्रांशौ, फुल्लन्त्यब्जा न कौशिकाः (1) // 2 // इङ्गितेनावगच्छन्ति, भावं प्राज्ञा जडा नहि / 9 प्रग्रहचालनादेव, चलन्त्यश्वा न गर्दभाः // 3 // ईश्वरपूजको नित्यमैश्वर्यमेति शाश्वतम् / दारिद्रयं किं भजेच्चिन्ता-रत्नाराधनतत्परः // 4 // उद्यमी सर्वकार्याणां, केवलोऽपि प्रसाधकः / तमो हन्ति नभःपारं, यात्येकोऽपि दिवाकरः ॥श। ऊवं गच्छन्ति निष्पापा, लघुतां न त्यजन्ति ये / पङ्कहीनं यथा तुम्बं, यात्यूर्ध्वं त्वरितं जले // 6 // ऋजुरेवार्जवं याति, वक्रो गच्छति वक्रताम् / वेत्रयष्टिस्तथा वंश-मूलमत्र निदर्शनम् // 7 // ऋकारस्येव दैर्घ्य ये, न विमुञ्चन्ति सर्वदा / पदानां वा सुशब्दानामादौ तिष्ठन्ति ते क्वचित् // 8 // 1- तामसाः / इति पाठान्तरम् P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ २/वर्णक्रम-सूक्ति-पञ्चाशिका लुकारो लघुताया हि, माहात्म्येन ऋमित्रताम् / भेजे भुवि सुहृद्भावं, भजन्ते सरला जनाः // 9 // यदि दीर्घतां प्राप्तस्तदा नेच्छन्ति केचन / सर्वसन्माननेच्छूनां, दीर्घता प्रतिबन्धिका // 10 // एक एव गुणो लोके, महाँश्चेत् प्रथयत्यलम् / सद्गन्धस्यैव माहात्म्यात्, कुरङ्गो भुवि विश्रुतः // 11 // ऐन्द्रवृन्दनतः स स्यादिन्द्रं ध्यायति यः सदा / यादृग्बीजं भवेदुप्तं, ताहगेव फलं भवेत् // 12 // ओषधिः सम्भवेन्मूलमात्रं योजकयोगतः।। एकात् परं नियुक्ता हि, गणनां यान्ति बिन्दवः // 13 // औन्नत्यं भजते काले, क्षुद्रोऽपि सरसो जनः / यौवनसमये प्राप्ते, कामिनीकुचकुम्भवत् // 14 // अंनासिक्यमनुस्वारं, वदन्ति वै विपश्चितः / स्वरं येऽनुसृतास्ते तु बिन्दुभावेन संस्थिताः // 15 // अःकण्ठयोऽपि विसर्गोऽपि, स्वरैः सृष्टोऽपि सस्वरः / निष्ठया सोऽनुलग्नस्तं, निष्ठा हि कार्यसाधिका // 16 // कर्मण एव सामर्थ्यमेको दुःख्यपरः सुखी / भाग्यनाप भवो भूति, विभूति श्रीपतिस्तथा // 17 // खलेन सहसौहार्द, विधेयं नैव धीमता। समागते तु मध्याह्ने छायेव नैव दृश्यते // 18 // गर्दभा इव ये मूढा, आग्रहवशवर्तिनः / / दण्डप्रहारमुग्रं ते, प्राप्नुवन्ति पदे पदे // 19 // P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ वर्णक्रम-सूक्ति-पंञ्चाशिका/३= घर्षणं सर्वदा तेजो-वर्धकं नातिघर्षणम् / श्यामं तेन विना भाण्ड-मतिना तेन भिद्यते // 20 // डादयः पञ्च नासास्य-स्थान प्राप्तास्तथाऽपि ते / क्वचिदेव हि लक्ष्यन्ते, द्विस्थानामीद्दशी स्थितिः // 21 // चक्रेणैकेन सूर्यस्य, रथो याति दिगन्तरम् / विशिष्टानां कृते सर्वे, नियमाः सम्भवन्ति वा // 22 // छत्रं तापापहाराय, स्वकरस्थं श्रमाय च / भवेन्नैकान्ततः किञ्चिनिमित्त सुखदुःखयोः / / 23 / / जगद्विश्वं विचित्रं चेद्, वस्तु चित्रं न चित्रकृत् / शते भवति पञ्चाशत्, ज्ञातं गोपालबालयोः / / 24 // झङ्कारं कुरुते पीत्वा, परागं मधुपो भृशम् / " प्राणिनः प्रायशस्तुच्छाः, स्वार्थे मधुरभाषिणः // 25 // अस्योच्चारः सदा क्लिष्टः, प्रारम्भे तु विशेषतः / अन्ते स्थिता हि वक्राः स्युः, सर्वत्र दृश्यते तथा // 26 // टङ्कारः शङ्कराभिख्यदेवप्रख्यापको यथा / तथैवान्येऽपि वर्णाः स्युर्वणरूपा हि देवताः // 27 // ठठं प्रकुरुते प्राप्य, घटः सोपानपद्धतिम् / रीतिरेषा हि सोपानपंक्तेर्ध्वनिविधायिनी // 28 // डयो यथा द्विपक्षाभ्यामुड्डयते विहायसि / ज्ञानक्रियात्मपक्षाभ्यां, तथैवात्मा शिवङ्गमः // 29 // ढकारः सर्वदा मूर्खः, पठ्यते इति विश्रुतः / मूर्खत्वसूचको लोके, जडैः किं किं न दृष्यते // 30 // P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ ४/वर्णक्रम-सूक्ति-पञ्चाशिका णकारं प्राकृताभाषा, न स्थाने कुरुते भृशम् / प्राकृताः प्रायशः स्थान-व्यत्यासकारिणो मताः // 31 // तपसा प्रौढपापानां, नाशो भवति निश्चितम् / वनस्य किमिहाच्छेद्यमदायमनलस्य किम् // 32 // थुत्कारश्चापथुत्कारः, फुत्कारः क्रियते जनः / एतेषां करणं नो सद्, यतश्चाकरणं वरम् / / 33 // दानिनः स्वः स्थिताः सर्वे, ग्राहिणो भूस्तलं गताः / सन्देहश्चेद्दरीद्दश्यौ, सम्यङ्नीरदनीरधी // 34 // धर्मो रक्षति सद्धर्म, सेवते यो दिवानिशम् / . रीतिरियं हि सर्वत्र, शिष्टाः सेवकरक्षिणः // 35 // नम्रत्वेन सदा भाव्यं, नम्राश्चिरविलासिनः / अनम्रा नाशमायान्ति, तणिशतालवत् सदा // 36 // परमात्मप्रभावेण, परात्मपदतां लभेत् / स्पर्शरत्नस्य संसर्गाल्लोहं भवति काञ्चनम् // 37 // फटाच्छटां विषापेतोऽभीक्ष्णं करोति पन्नगः / प्रायेण हीनसामर्थ्यो, डम्बरेणैव माद्यति // 38 // ब्रवीमि श्रेयसे श्रेयस्करं तदवधार्यताम् / . किम्पाकफलवत् त्याज्या, विपाकविरसा रसाः // 39 // भवभीतेन भावात्मा, भावनीयो मुहुर्मुहुः / भावात्मभावनादेवाऽभूवन्नभयदा जिनाः // 40 // महामोहमदोन्मत्तः, सदसन्नैव बुध्यति / जानाति सदसच्चैवमवगच्छत्यसच्च सत् // 41 // . P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ वर्णक्रम-सूक्ति-पञ्चाशिका/= यस्य न दर्शनं सम्यग, दर्शनं तस्य निष्फलम् / नेत्रं नो यस्य तस्याग्रे, यथा रूपनिरूपणम् // 42 // रतिरतिदहेत्तं यो, रतिं नैव विमुञ्चति / विरति सेवते यस्तं, रति व विमुञ्चति // 43 / / लक्ष्मीमिच्छन्ति सर्वेऽपि, लक्ष्मी जानन्ति केचन / ज्ञात्वा लक्ष्मी समीहन्ते लक्ष्मीस्तेभ्यः समीहते // 44 / / वरं वह्निप्रवेशोऽपि वरं सद्यो विषाशनम् / वरं पातो नगोत्त ङ्गाद् वरं नो दुष्टजीवनम् // 45 // शङ्का नैव विधातव्या, कर्तव्ये प्रशमास्पदे / शङ्काशिखिशिखादग्धो, नाप्तवान् शिखिनं वणिक् // 46 // / षट्सङ्ख्या सर्वदा सेव्या षड्रिपुघ्नी पुरस्कृता / देवार्चनं गुरोः सेवाऽधीतिर्दानं तपो व्रतम् // 47 // सतामथ सतीनाञ्च चरितं श्रवणातिथि / विधातव्यां सदा श्रेयः सद्धृतं भवभैषजम् // 48 // हननं कर्मणां कार्य न कार्य प्राणिनां पुनः / प्राणाः प्रियतमा जीव-मात्रस्य नियतं यतः // 49 // क्षमाक्रोधदवाग्नीनां, सुधा शमनकारिणी / क्षमैवैका जगज्जालच्छेदिनी दुःखभेदिनी // 50 // ज्ञप्तिः परमसौभाग्यं, ज्ञप्तिरेव परो निधिः / ज्ञप्तिः सन्तमसध्वंसे, महसामालयं परम् // 51 // P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ चतुविशति-जिनस्तुतिः __ [ गुजराती समश्लोकी - अनुवाद ( अनुवादक-भानुभाई व्यास 'बादरायण' ) 1. अ- अर्हत् जे सर्वमन्त्रोमां, मन्त्र उत्तम ते नमूं। सुवर्णसम धातुमां, मेरुं शो पर्वतो मांही / / आनन्दे तेज धारामां, सज्जनो नहि दुर्जनो / सूर्योदय थतां राचे, कमलो नहि घूवडो॥ 3. इ. . इंगिते समजे प्राज्ञो भावने न जडे कदि / लगाम हालतां मात्र चाले अश्वो न गर्दभो // आ 4. ई- ईश्वर पूज्ये लाधे नित्य सौंदर्य शाश्वत / चिन्तामणि भजै तेने केम दारिद्रय सांपडे ? // 5. उ- . उद्यमी सर्व कार्याने एकले पण साधतो / हणे अंधकार एकाकी नभ पार जतो रवि / / 6. ऊ- ऊर्ध्व निष्पाप जाताने लघुता जे तजे नहि। - तुंबडं पकडील्यु जे तरे पाणी परे सही // 7. ऋ- ऋजुताने ऋजुता घटे वांको वंकाय सर्वदा / सोटी नेतरनी वांसलांस छे उदाहरण सही // 8. ऋ ऋकार जेम दीर्घत्व, कदिये जे तजे नहि / आदि-स्थान न पामे ते शब्दमां पदमां कदि / 9. लु- लकार मित्रता राखे ऋ साथे लघुता वडे / मैत्री जगज्जनो पामे ऋजुता हृदये धरे // P.P. Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ .. गुजराती-अनुवाद/७ 10. लु- लु-समी दीर्घता धारे तेने को नव इच्छतुं। . . सन्मान इच्छनाराने दीर्घता वय॑ छे सदा // 11. ए- एक मात्र महा हो जो.गुण विश्वे प्रकाशतो / - कस्तूरी गंध मात्र थी विख्यात हरणे बन्यो // 12. ऐ- ऐन्द्र-वृन्द नमे तेने जे सदा इन्द्र ने भजे / ....... , जेवं वबाय छे बीज तेवं फल पमाय छे / 13. ओ- ओषधि बनतुं मूक मात्र योजक जो मळे / .. एकडानी पछी आव्ये मींडानी गणना थती // 14. औ- औन्नत्ये पामतो काले क्षुद्रे सरस होय तो! .. जुवानी आवता जेल. कामिनी स्तन वाधता // 15. अं- अं-अनुस्वारना साथी-विद्वानो वदता खरे / . बिन्दुरूपे रहे तेओ स्वरो पाछळ जे पड़े // श्रद्धाथी स्वरने वों श्रद्धा कार्य खरे करे / 17. क- कर्म केराज सामर्थ्य दुःखी एक सुखी बीजो / भाग्ये शंकर ने भस्म-ने लक्ष्मी विष्णुने मळे / 18. ख- खल साथे कदी दोस्ती धीमाने करवी नही। . .: मध्यमा आवता छाया पेठे अदृश्य एकता // 19. ग- गर्दभो जेम जे मूढो बलने वश वर्तता / .. 6 प्रहार दंडनो उग्र पामता ते पदे पदे // 20. घ- घर्षणे वधतुं तेज अतिघर्षणथी नहि। ... - घर्षणे वासणो शोभे अतिथी नाशपामतुं // P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ ८/वर्णक्रम-सूक्ति-पञ्चाशिका 21. ङ- ङ-वगेर मुखे नासा-बडे उच्चार पामता। पांचे क्यारेक देखाए, एवी बेघरनी दशा // 22. च- चक्र एकथी भानुनो, रथ पामे दिगंतने / विशिष्ट व्यक्तिओ माटे, नियमो होय न्होय वा // 23. छ- छत्री तापथी रक्षे छ, भारथी श्रम हाथने / वस्तु निमित्त छे कोना, सर्वथा सुख-दुःखनुं / / 24. ज- जगत् आश्चर्यकारी छ, वस्तुनी तो नवाई / सोमां पचास आवे ए वात लागे नवी नहीं // 25. झ- झंकार भमरो गुंजे, पीने मधु परागर्नु / प्राणीओ तुच्छ सामान्ये, स्वार्थमा मिष्ट बोलता // 26. ञ ञनो उच्चार छ क्लिष्ट, शब्दारंभे वधू वळी। अंतमां होय ते वक्र, सदाये विश्वमां दीसे // 27. ट- टंकार शिवनो वाची, वर्ण विख्यात छ जगे। तेम बीजा बधा वर्णो, देवता वर्णरूप छे॥ 28. ठ- ठं ठं ध्वनि घटे थाए, दादरे दडतो रहे / रीति पगथियानी ए, मूंगा ए रही ना शके // 29. ड- डगलां गगने मांडे, पक्षी बे पांखथी यथा / ' ज्ञानने आत्मनी पांखे, जीव तेम थतो शिव // 30. ढ- ढ अक्षर सदा मूर्ख-माणसो मुखथी वदे। मूर्खा शुं शुं बगाडे ना, ढ ये मूर्ख गणाय छ / 31. ण- णकार प्राकृती भाषा, न स्थाने बहु गोठवे / प्राकृत पुरुषो प्राये, स्थान फेर कर्या करे // P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ ... गुजराती-अनुवाद/९ 32. त- तप नाश करे निश्चे, पापो भारे भले रह्या। .. / भेदाये वज्रथी सर्वे, अग्नि कोने न. बाळतो ? / / 33. थ- थू थू धू धू अने. फू फू करवू ए भलुं नहीं। .. ... एथी ना करवू सारू, सज्जनो समजे सही // 34. द- दाता तो स्वर्गमां जाए, पेसे पाताल संग्रही। . होये जो ए विषे शंका, जोइलो मेघ वारिधि // 35. ध- धर्म रक्षा करे तेनी, सेवे जे धर्मने सदा / . . सर्वत्र रीत आ रूडी, भक्त ने प्रभु पाळता // 36. न- नम्र पणे सदा रे वू, नम्रता विलसे घणुं / ना नमे नाशपामे ते, ताड.नेतरनी पडे // 37. प- परात्म तत्त्व ने पाये, प्रभावे परमात्मना। ., पारस मणिना स्पर्श, लोढं सोनुं बने खरे // 38. फ- फेण ऊंची करे सर्प, विषहीणो फरी फरी / / विण सामर्थ्य ना जीवो, राचे आडम्बरे मुधा // 39. ब- बोल आ हितकारी छे, सांभळी हृदये धरो। . किंपाक फूलशा अंते, विहवां रसने त्यजो॥ 40. भ- भवनी होय जो भीति, भाव चेतन भाववो। ... अर्हन् अभयना दाता, शुद्ध भाववडे थयां // 41. म- महा मोहतणो दारू, पीनारां भानने त्यजे / सत्य असत्यने माने, माने असत्य सत्यने / 42. य- यशस्वी दर्शनो जेनां, नथी शुं तस दर्शने / नेत्रहीणा नरो आगे, रूप दर्शन शुं फळे // P.P. Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ 10 वर्णक्रम-सूक्ति-पञ्चाशिका 43. र- रति बाळे बहु तेने, जे रतिने त्यजे नहीं। * वैराग्ये रति जे राखे, रति तेने त्यजे नहीं / / 44. ल- लक्ष्मीने इच्छता सर्वे, जाणे कोइक श्री भली। . जाणीने चाहे लक्ष्मी जे, चाहे तेने सदाय श्री॥ 45. व- वह्निमा पेसवू सारू, झेर खावं भलं वळी। खीणमां पडवु सारू, दुष्ट जीवन तो नहीं // 46. श- शङ्का कल्याणना कार्ये, कदीये करवी नहीं। शङ्कावह्नि वडे दाझ्यो, वणिक् मारे मर्यों नहीं / / 47. ष- षड्रिपु हणवा माटे, छ कार्यो नित्य साधवां। . देवपूजा गुरूसेवा, स्वाध्याय दान ने तप / / 48. स. सज्जनो ने सतीओनां, चरित्रो सुणवा सदा। : जेथी कल्याण साधे ने, संसृति लय पामता // 49. ह: हणवा कर्मने नित्ये, प्राणीने हणवा नहीं। - जीवमात्र सदा लेखे, प्राणने प्रिय विश्वमां // 50. क्ष- क्षमा क्रोधदवाग्निने, शमावे छे सुधा समी। / जगजंजालने छेदे, दुःखथी मुक्ति अर्पती / / 51. ज्ञ- ज्ञप्तिः परम सौभाग्य, ज्ञप्ति भण्डार छ महा। अज्ञान तिमिर फेडे; तेजनी ज्योत एवडी // P.P. Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ (4) श्रीगौतम-स्वामि-चरित्रम् गूर्जर-भाषात्मक-पद्यानुवादगद्यानुवादाभ्यां संयुतम् P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ // सकल-लब्धिसम्पन्नाय श्रीगौतमस्वामिने नमः / / श्रीगौतमस्वामि-चरित्रम् ( भुजड्ग-प्रयात-वृत्त-निवृत्तम् ) यदीयं पवित्रं चरित्रं सुचित्रं, लवित्रं महाविघ्नवल्ली-विताने / समस्त-प्रशस्त-प्रभाव-प्रभूतं, नमो गौतमस्वामिने मङ्गलाय // (2) जनिर्यस्य जाता वसोविप्रगेहे, पथिव्या जनन्या अनन्यात्मदेहे / प्रसन्नं कृतं नाम यस्येन्द्र तिर्नमो गौतमस्वामिने मंगलाय // पठित्वाऽखिलं वेद-वेदांगशास्त्रं, प्रचण्डं क्रियाकाण्डमभ्यस्य सर्वम् / महाकर्मकाण्डीति यः ख्यातिमाप्तो, नमो गौतमस्वामिने मंगलाय // ... (4) . विना मां न कश्चित परो विश्ववेत्ता, न वादी न वक्ता न शास्ता प्रमाता। अभूद् यस्य मानं तथाऽतथ्यमुच्चैनमो गौतमस्वामिने मंगलाय // त्रिलोक्यां समस्यां समस्तार्थवेदी, प्रमत्तप्रवादीय - सम्मान - भेदी / अनन्योऽहमेवेति मत्तोऽभवद् यो, नमो गौतमस्वामिने मंगलाय // समेता नभः - शून्य-बाण-प्रमाणा, विशिष्टार्थमाज्ञातुमाचार्यकल्पाः / यदीयान्तिकं शिष्यभावं गृहीत्वा, नमो गौतमस्वामिने मंगलाय // प्रगायं प्रगायं प्रभतं यदीयं, यशो नीयते विश्वविश्वे विनेयः / यशस्वी वचस्वीति मत्तोऽनवद्यो, नमो गौतमस्वामिने मंगलाय // (8) भतिस्र्थनिरुद्ध गंभीरर्वचोभिर्मनः शवितं यस्य जीवस्य सत्त्वे / सशङ्कोऽपि निःशङ्कवद् वर्तते यो, नमो गौतमस्वामिने मंगलाय // P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ 2/ श्रीगौतम-स्वामि-चरित्रम् (9) अपापाभिधायां नगर्यां समेताः, समे यज्ञमाकर्तुमाज्ञां दधानाः / यदीयां विदेशात् स्वदेशाच्च लोका, नमो गौतमस्वामिने मंगलाय // (10) यदा वेदसूक्तविधि यज्ञसत्कं, प्रसन्नेन चित्तन कुर्वन स्थितो यः / तदा तस्य शब्देन सर्वे ररन्जुर्नर्नमो गौतमस्वामिने मंगलाय // (11) इतः श्रीमहावीरनामा जिनेशः, समालोकितालोकलोको यदीयात् / सुभाग्यावपापां पुरीमाश्रितो वै, नमो गौतमस्वामिने मंगलाय // प्रभोराति सज्जनेभ्यो विवेद्याखिलानुत्तमान् सद्गुणानाकलद् यः / परं तन्न सेहे मदोन्मादमत्तो, नमो गौतमस्वामिने : मंगलाय // . (13) प्रभोः सेवनायै समेताः समेषां, सुराणां समूहाः समुत्साहयुक्ताः / तदाऽऽयान्ति ते स्वान्तिकं योऽनुमेने, नमो गौतमस्वामिने मंगलाय // (14) . यदा नागताः स्वीय-पार्वे सुशस्ते, तदा खिन्नता विकल्पांश्चकार / महाधूर्त-धूर्तोऽयमित्थं य ऊहे, नमो गौतमस्वामिने मंगलाय // अमष्मिन जने जीवतीह प्रवादी, ह्ययं कोऽस्ति सर्वज्ञमानी विवादी। इतीत्थं मनो यस्य संजातमुन, नमो गौतमस्वामिने मंगलाय // क्षणं नो सहे गर्वमद्याहमित्थं, विचार्याचलत् सर्वशिष्यवृतो यः। निजैर्बन्धुभिर्वार्यमाणोऽपि शीघ, नमो गौतमस्वामिने मंगलाय // (17) क्रमेणागतो जीवजातानुकले, प्रभो रम्यसन्देशना - स्थानमले / समीक्ष्यैव दूराद् गतो विस्मयं यो, नमो गौतमस्वामिने मंगलाय // . P.P. Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ श्रीगौतम-स्वामि-चर्चा (18) यशो रक्षणार्थ करिष्येऽधना किं, यदीहागतो नाभविष्यं तदा किम् / मनो यस्य सन्देहदोलाधिरूढं, नमो गौतमस्वामिने मंगलाय // यदि स्याज्जयोऽत्रापि मे भाग्यतस्तत, समग्रऽथ विश्वेऽद्वितीयो भवेयम् / विचार्यत्यमग्रे गतः सालमध्ये, नमो गौतमस्वामिने मंगलाय // (20) तदा स्वर्णसोपानपंक्तिस्थितो यो, महावीरवीरेण धीरेण प्रेम्णा। समाभाषितो नामगोत्रेण पूर्व, नमो गौतमस्वाभिने मंगलाय // (21) इदं नाद्भुतं नाम जानाति मेऽयं, यतो विश्वविख्यातमाख्यं मदीयम् / हदीत्थं महामोहतो (मानतो) यो मुमोद, नमो गौतमस्वामिने मंगलाय // (22) . परं संशयं मे वदेद् गुप्तगुप्तं, हृदिस्थं तदाऽर्हन्नयं निविवादम् / स्थितो यः करोति प्रभूतान विकल्पान्, नमो गौतमस्वामिने मंगलाय // (23) तदोक्तं जिनेशेन भो इन्द्रभूते ? कथं जीवसत्वेऽस्ति ते संशयोऽयम् / तदाऽनम्रभूतोऽपि नम्रोऽभवद् यो, नमो गौतमस्वामिने मंगलाय // (24) ग़भीरेण घोषेण वेदोक्तसूक्तजिनेशेन संस्फोटितः संशयोऽस्य / बभूवाद्यशिष्यः प्रभोर्यस्तदाऽरं, नमो. गौतमस्वामिने मंगलाय // (25) नभो - बाण-संख्ये वयोवत्सरे श्रीमहावीरतीर्थेश्वराने गृहीत्वा / विशुद्ध महासंयमं येन चीर्ण, नमो गौतमस्वामिने मंगलाय // - (26) यदोयान सर्वे क्रमेणास्तेऽनजाद्याः श्रुतौ संशयं सन्दधानाः / >> प्रभावक्यितो दीक्षिता यत्प्रभावान नमो गौतमस्वामिने मंगलाय // P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ 4/ श्रीगौतम-स्वामि-चरित्रम् (27) दशैकोत्तरास्ते गणाधीश्वरत्वं, प्रभो:रवीरस्य तीर्थे समापुः / तदा योऽनिमोऽमद गणानामधीशो, नमो गौतमस्वामिने मंगलाय // (28) त्रिपद्या जिनेन्द्रेण सन्दिष्टयाऽऽशु, कृता द्वादशाङ्गी महानंगभंगी / श्रुतज्ञानपूर्णे प्रसिद्ध न येन, नमो गौतमस्वामिने मंगलाय // (29) जिनेशान्तिके प्रांजलान्तःप्रवत्या, श्रतज्ञानपूर्णोऽपि प्रश्नानकार्षीत् / परेषां प्रबोधार्थमव्यग्रचित्तो, नमो गौतमस्वामिने मंगलाय // (30) विधाने क्रियाणां जिनर्देशितानां, प्रमादं प्रमुच्याभवत् तत्परो यः। तपः षष्ठभक्तं सदैव व्यधत्त, नमो गौतमस्वामिने मंगलाय // अनेके प्रबुद्धा यीयोपदेशाद् , गडीत्वा महासंयमं पूर्णप्रीत्या / प्रपाल्याशु कैवल्यमाप्ता यद, नमो गौतमस्वामिने मंगलाय // (32) स्वपार्वे यदासीन्न तद् येन दत्तं, परस्मै परं पंचमं केवलं तत् / समुद्भूतमत्यद्भुतं यस्य विश्वे, नमो गौतमस्वामिने मंगलाय // स्वशक्त्याऽऽशु गत्वा शुभाष्टापदं यो, जिनान वन्दते तद्भवे स प्रयाता। शिवं संश्रुतं येन वीराज्जिनेशान-नमो गौतमस्वामिने मंगलाय // (34) सुवर्ण चतुर्दार-चैत्यं सुचारु, सदा शोभते यत्र चक्रोशकृत्यम् / समेतस्त्वरा यस्तदोपत्यकायां, नमो गौतमस्वामिने मंगलाय // P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ / श्रीगौतम-स्वामी-चरित्र पू. पं. आचार्य श्रीविजयधर्मधुरन्धर सूरिजी महाराजे रचेला स्तोत्रनो गुजराती - पद्यानुवाद छ जेनुं अद्भुत ने पवित्र वृत्त जगमांहे घj, वळी विघ्नवल्लि छेदवामां परशुसम जे सोहतुं / सघळा प्रशस्त प्रभावथी जे भविकज न मन मोहतुं, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पद-कज नमुं॥ 1 // वसुभूति द्विज गेहे थयो शुभजन्म जस सोहामणो, ने रत्नकुक्षिमात पृथ्वी नयन मन रळियामणो / जस नाम जगमा इन्द्रभूति देवमणिसम दोपतुं, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 2 // जे चौदे विद्या पारगामी वेदशास्त्र-विचक्षण, . अभ्यास क्रियाकाण्डनो करी कर्मकाण्डी विलक्षण / बन्या, नाम जेतुं विस्तषु चोमेर शशि ऊजलुं, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमुं // 3 // नथी कोई मुज सम शास्त्रवेत्ता, वादी, वक्ता के कवि, शास्त्रो तणां जे मर्मने वळी गणता निर्मळ मति / अभिमान मिथ्या जेहना मनमां सदा आवं हतुं, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमुं / / 4 / / सर्वज्ञ छु वळी वादीओने जीतनारो हुं ज छु, छे डोब बीजो मुज समो साक्षात् हुं सुरगुरु / इम चिन्तवी अभिमानशिखरे चित्त जस नित गाजतु, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमुं // 5 // P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ 6/ श्रीगौतमस्वामी-चरित्रनो शास्त्रो तणां परमार्थने जे मळनार हतां घणां, ते पांच सो छात्रो तथा वीजा घणा पण पंडितो। जस पास शिष्यपणुं लईने धन्य निजने लेखता, ते मंगलार्थ श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 6 // गुरुवर्य ! आप सरस्वतीना पूर्ण कृपापात्र छो, वळी वादीगण तम बाळ छो, ने सकल शास्त्र सगुद्र छो। बिरुदावली जस बोळी छात्रो जगत करता गाजतु, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 7 // विपरीत अर्थों वेदपदना करी शंका ऊपजी, शुजीव छे के नहिं अरे ! के मात्र पचभूत छ / शंकित छतां निःशंक थई निजने गणे सर्वज्ञ जे, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पद.ज नमु // 8 // आज्ञा स्वीकारी जेहनी स्वदेश ने परदेशथी, आव्यां घणांये पंडितो ने अन्य जन पण हर्षथी। नगरी अपापामां अनोखो यज्ञ जेणे आदर्यो, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 9 // मेघ - सम गंभीर रवथी वेदसूक्तो उच्चरी, श्रीइन्द्रभूति यज्ञविधि ज्यारे करावे हर्षथी / निरखी सुखी सौ लोक त्यारे हर्षपुलकित थइ जतां, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु॥१०॥ विमल केवलज्ञानथी जे लोक तेम अलोक ने, करतल-बदर जिम निरखतां श्रीवीरविभु शासनपति / नगरी अपापाए पधार्या जेहवा सद्भाग्यथी, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 1 // त्यां सज्जनोथी आगमन श्रीवीरविभुनु सांभळी, ... आश्चर्यकारी तेम लोकोत्तर गुणो भणी करी। प्रमोदने बदले थयु अभिमान मनमां जेहने, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 12 / / P.P.AC.Gunratnasuri M.S.. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ गुजराती पद्यानुवाद 7 सुर ठोकथी प्रभु वांदवाने देवगण उल्लासथी, आवी रह्या ज्यारे हता त्यारे थयुजस चित्तमां। साक्षात् देवो यज्ञमां आवी रह्या ए तो जुओं, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 13 / / ज्यारे बधा ते देवता मूकी यज्ञने आगळ गयां,। त्यारे हृदयमां खिन्न थई करतां विकल्पो ते घणां / साचे ज आ महाधूर्त छ, नहिं तो बने आव नहिं, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 14 // मुज जीवतां छे कोण जे सर्वज्ञ निजने लेखतो, वळी सर्वगुण सम्पन्नरूपे जेने सह जन मानता। एवा विचारे रोषथी थयु उग्र चित्त जेहनु, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 15 // क्षणवार पण हुं ना सहुं अभिमान एनु एहवु, इम चितवी निज बंधुओथी वारवा जडतां घणु / निज पचशत छायो लईने जेह जितवा नीकल्या, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 16 // आव्या समोसर रणे निहाळया वीर विभुने जे समे, .. अद्भुत अलौकिक रूप निरखी पाम्या विस्मय तें समे। आ कोण ब्रह्मा, विष्णु के शिव एम जस मनमां थयु, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु॥१७॥ मुजने सूचुआ शु? अने आव्यो अहिंआ कारणे? आज्यो अहिं ना होत तो शी हानि मुजने थात रे। जस चित्तमां चिन्ता घणी निज कीर्तिना रक्षण तणी, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 18 // सद्भाग्य योगे थाय जो मुज जीत अहिं आ वादमां, सह पंडितोमां तो बनु बेजोड हं आ विश्वमां। करता विचारो आम ते आव्या समोसरणे मदा, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 19 // P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ 8/ श्रीगौतमस्वामी चरित्रनो सोपान पंक्ति स्वर्णमय चड़ता हता तेओ यदा, श्रीवीर विभु-उपकारीए आभाषीया प्रेमे तदा / कह्मगोत्र गौतम इन्द्रभूति ! शुसुखे आव्या तमे, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नम् // 20 // ते नाम सुणी मनमां विचारे लेश ना अचरज अहिं, त्रण जगतमां विख्यात मारुं नाम को जाणे नहिं / इम चितवी निज चित्तमा अभिमानने जे पोषता, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 21 // मनमां मने जे जीव केरो गुप्त संशय छे खरो, जे आज दिन पर्यन्त कदिये कोइने पण ना कह्यो / ते जो कहे तो मानु आ सर्वज्ञ इम जे चितवे, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 22 // प्रभुए कह्य-त्यारे तरत हे इन्द्रभूति ! शुतने, छ जीवसंशय नव विचारे केम वेद पदार्थने / ते सांभळी गर्विष्ठ पण अति नम्र जेह बनी गया, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 23 // 'विज्ञानघन' ए वेदपदनो अर्थ गंभीर घोषथी, प्रभुए कह्यो ने सांभळी थयो दूरसंशय चित्तथी। प्रतिबोध पामी वीरना जे आद्य शिष्य बनी गया, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 24 // ते एकला पण नहिं अरे ! शतपंच छात्रो साथ लइ, संयम प्रभु श्रीवीर -पासे वर्ष पच्चासे ग्रहे / सर्वत्र जय जयकार वो जेमना सत्कार्यथी, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 25 // निज भ्रातनी दीक्षा सुणी पण चित्तमां संशय धरी, : श्रीअग्निभूति आदि आव्या वीर विभु पासे सही।। दीक्षित थयेला देखी जेने तेह पण दोक्षित थया, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 26 // P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ गुजराती पद्यानुवाद !9 परिवार चम्मालीश शत सह मख्य बुध अग्यार जे, दीक्षित थया स्थाप्या प्रभूए तेहने गणधर पदे / कल्याणकर शासन ती थई स्थापना इम जेहथी, ते मंगलार्थे श्रीगुरु गौतम तणां पदकज नमु // 27 // AAINA प्रभुवदनथी त्रिपदी लइने बीज बुद्धिना धणी, अन्तर मुहूर्त काळमां जे द्वादशांगी रचे गणी / श्रुतरूप गंगोत्पत्ति काजे शोभता हिमगिरि समा, ते मंगलार्थे श्रीगुरु गौतमतणां पदज. नमुं // 27 // विनयथी अतिनम्र तेओ भविकजन हितकारणे, बधुं भणतां होवा छतां प्रश्नो प्रभुने पूछतां / 'गोयम' कही प्रभु वीर तेना जेने उत्तर आपतां, ते मंगलार्थे श्रीगुरु गौतमतणां पदकज नमुं // 29 // प्रभुए प्रबोधली क्रियाओ अप्रमत्त थई कहे, वळी आ जीवन छठ्ठ पारणे ठछ करी को निर्जरे / 'गौतम करो न प्रमाद' इम जेन प्रभुए उपदिश्यु, ते मंगलार्थे श्रीगुरु गौतमतणां पदकज नमुं // 30 / / उपदेश मधुरो सांभळी जस बोध-पामी जन वणा, संसार छोड़ी लेइ संयम ज्ञान केवळने वर्या / जस पाणि-पद्म साचे केवळ दाननी लब्धि सी, ते मंगलार्थे श्रीगुरु गौतमतणां पदकज नमुं॥३१॥ दाता जगतमां कोई निजपास वस्तुने दिये, ना होय जे निजपास तेनुदान किमहिंज संभवे? जेने न केवळ' पास पण दइ दान महा अचरज वयु, ते मंगलार्थे श्रीगुरु गौतमतणां पदकज नमुं॥३२॥ चउवीश जिन जे शैल अष्टापद चडी निज शक्ति, वन्दन करे ते तेना भवमा नक्की मोक्षे संचरे / प्रभुए कहेलां वचन आ सुरपासथी जेणे सुण्यां, ते मंगलार्थे श्रीगुरु गौतमतणां पदकज नमुं॥३३॥ P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ 10/ श्रीगौतमस्वामी चरित्रनो भरते भराव्या देह वर्ण प्रमाण बिंबथी. राजता, आव्या गिरि अष्टापदे रची स्तोत्र जगचिंतामणि / जे रत्नमय चउवीश जिनने स्वर्ण चैत्ये संस्तवे, ते मंगलार्थे श्रीगुरु गौतमतणां पदकज नमु // 34 // 'श्रीविजय धर्म धुरन्धराचार्ये' रचेला स्तोत्रने, जोतां ज दिल हरखी उठ्य ने तरत ते मनमां वस्युं / गौतमतणां गुणगान करता सतत उत्सुक हृदय ने, एथी थयो अतिहर्ष, जे पद्यानुवाद करी शक्यो / / 35 // श्रीनेमिसूरि राजपाटे सूरि अमृत बुधवरा, . गुरु देवसूरि शिष्य सूरि हेमचन्द्र आ मुदा। . निधि वेद अंबर नेत्र (2049) वर्षे भावनगरे भक्ति, पद्यानुवाद रच्यों मनोहर वीर विभु सांनिध्यथी // 36 // (विक्रम संवत् 2049 आश्विनी पूर्णिमा, भावनगर) आचार्य-प्रवर श्रीमद् देवसूरि-महाराजनां शिष्य श्रीहेमचन्द्र सूरि कृत गुजराती पद्यानुवाद पूर्णहुआ / P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ सकल लब्धि-सम्पन्न गौतम स्वामी ने नमस्कार श्रीगौतमस्वामी चरित्र (छन्द भुजंग प्रयात) (गुजराती अर्थ ) जेमनुं चरित्र परम पवित्र छे, आनन्द आश्चर्यजनक छे, महान विघ्नोनी जालने कापी नाखरनार छे अने प्रशंसापात्र अनेक प्रभावोथी सभर छे तेवा मंगलकारी गौतमस्वामीने अमारा नमस्कार हो // 1 // जेमनो जन्म धनवान ब्राहाण परिवारमा थयेलो, जेमनां माता पृथ्वी समान अनन्य उदार चरिता हता, जेमर्नु 'इन्द्रभूति' एवं प्रसन्न कारी नाम हतु तेवा गौतमस्वामीने नमस्कार / / 2 / / तेमणे वेद-वेदांगादि शास्त्रोनो अभ्यास करेलो, विशाल एवा क्रियाकांड कलापनो पण अभ्यास करेलो अने 'महाकर्मकांडी' तरीकेनी जेमनी कीति हती तेवा गौतम स्वामीने नमस्कार / / 3 / / 'मारा सिवाय कोई सर्वज्ञ नथी. वादी, वक्ता के नेता (पण) नथी, एवं तेमने मिथ्या अने दृढ अभिमान हतु' एवा गौतम स्वामीने नमस्कार / / 4 / / त्रैलोक्यमां कोई पण शास्त्रनां समस्त अर्थने जाणनार, प्रचंड वादविवाद करी शकनार हूंज छं, मारो कोई जोटो नथी एव जेमने (मिथ्या) अभिमान हतु तेवा गौतमस्वामीने नमस्कार // 5 // मोटा-मोटा आचार्यों पण जेमनी पासे विशिष्ट शब्द एवं अर्थरचना समजवा आवता, तेमनां शिष्य बनता, तेवा मंगलकारी गौतमस्वामीने नमस्कार // 6 // समग्र विश्वमां मारा यशनां गान गवाय छे, तेथी मारा जेवो यशस्वी अने वाक्पट बीजो कोई नथी, एवा विचारे जे मत्त हता तेवा मंगलकारी गौतम स्वामीने नमस्कार // 7 // P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ 12/ श्रीगौतम-स्वामी-चरित्रनो जीवात्माना अस्तित्व बाबत वेदमां कहेल वातोथी जेनु मन शंकाशील थयु हतु छतां पोते निःशंक थईने फरता तेवा मंगलकारी गौतम स्वामोने नमस्कार // 8 // 'अपापा' नामनी नगरीमा जेमनां आदेशथी देश-विदेशमाथी विद्वानो एवां जनसमाज आवेल तेवा मगलकारी गौतम स्वामीने नमस्कार / / 9 / / . प्रसन्न चित्तथी वेदमंत्रोथी ज्यारे तेओ यज्ञनो विधि करावता हता स्वारे तेमना वेद-घोषथी बधा लोको प्रसन्न थयेळा...तेवा मंगलकारी गौतम स्वामीने नमस्कार / / 10 // "बीजी तरफ जिनेश्वर श्रीमहावीर जगतमां विचरता" सद्भाग्ये ते 'अंपाया' नगरोमां आवी पहोंच्या... तेवा मंगलकारी गौतम स्वामीने नमस्कार // 11 // सत्पुरुषों पासेथी सकलगुण सम्पन्न जिनेश्वरनां आगमननी खबर मळी परन्तु विद्याभिमानथी मत्त एवा गौतम स्वामीए तेनी दरकार करी नहीं / / 12 // जिनेश्वर प्रभुनी सेवा माटे उत्साहपूर्वक देवगण भेळो थयेलो, त्यारे गौतम स्वामीने एम लाग्युके ते देवगण मारी (पोतानी) पासे आवे छे // 13 // / परन्तु देवसमूह तेमनी पासे न गयो त्यारे तेमनु मन भांगी पऽयं, अने तेओ जिनेश्वर धूर्त छे एम विचारवा लाग्या // 14 // . __ हं महान वादी (वाद-विवाद करनार) जीवतो हं त्यारे आ पोताने सर्वज्ञ माननार कहेव-डनार बीजो वादी छे कोण ? एवो तेमने गर्व थयो / // 15 // . . . . . . . हुं एकवार पण आ (जिनेश्वर) ना गर्वने सही लेवानो नथी-एवु विचारी गौतम स्वामी पोताना बधा शिष्यो साथे (जिन प्रभुंनी सामे) वाद-विवाद करवा उपहया त्यारे तेमना स्नही हितेच्छु बंधुजनोएं रोक्या तो पण ते उतावल करीने ऊपड्या // 16 // P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ गुजराती अर्थ /13 जिनेश्वर प्रभुनी पासे पहोंचता तेमने अनेक अननुकूलताओ सांपडी प्रथम तो तेमने जोतांज गौतमस्वामोने परम आश्चर्य थयु....॥१७॥ हुं मारी कीर्ति बचाव ना हवे शुकरु ? जो हुं अहीं आव्यो ज न होत तो ? एका विचारे जेमनु मन डोलायमान थतु हतु....तेवा मंगलकारी गौतमस्वामीने नमस्कार / / 18 / / - मारा सद्भाग्ये अहीं पण जो मने विजय मळे तो समग्र विश्वमां हुं अद्वितीय-त्रेजोड़ बनीश, एवा विचारे ते ओ आगळ धप्या // 19 // त्यारे सुवर्ण सोपानो पर ऊभेला धीर, वीर, महावीर प्रभुए गौतम स्वामीने तमना नाम एवं गोत्रयी प्रेमपूर्वक संबोध्या-बोलाव्या // 20 // मारा विश्वविख्यात एवा नामने आ जाणे छ तेमां कांई नवाई आश्चर्य नथी, परन्तु मारा मनमां जे अत्यना गुप्त विचार छ तेनं तेओ जाणी जाय (अने कहे) तो हुं तेमने खरा 'अर्हन' कहुं....आवा अनेक तर्क वितर्को गौतमस्वामीने करता हता / / 21 / / __ त्यारे जिनेश्वर प्रभुए पूछ यु'हे इन्द्रभूति' जीवना अस्तित्व विषे तने शंका शा माटे छे ? आ (प्रश्न) ओळखवानी साथे अभिमानो गौतम स्वामी नम्र बनो गया // 22 // वेदोना गहन सूक्तोना घोषथी जिनेशे तेमनी ए शंकाने दूर करी त्यारे तेओ प्रमु जिनेशना शिष्य बनी गया तेषा मंगळकारी गौतमस्वामीने नमस्कार // 23 // पचास वर्ष ती ऊमरे जेनां वड़े श्रीमहावीर स्वामी तीर्थकरनी पासे विशुद्ध एवं दीर्घ महाचारित्रने ग्रहण कराव्यु छ तेवा श्रीगौतमस्वामीने मंगल्य वडे नमस्कार करवु // 24 // पछीतो गौतमस्वीमीना अनुयायी एवा विद्वानो पण वेदवाक्योमां ज्यां ज्यां शंका थती हती ने शंका रज करवा आव्या, जिनेश्वरे तेमनी सौनी शंकानुनिवारण कयं अने तेमने दोक्षा आपी // 25 // तेमांथी 110 महावीरस्वामीनां तीर्थमां आवीने गणाधीश्वर बन्या अने गौतमस्वामी ते बधामा प्रधान गणाधीश्वर थया // 26 / / P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
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________________ 14/ श्रीगौतम-स्वामी-चरित्रनो गुजराती अर्थ जिनेश्वर महावीरे. त्रिपदीने स्थाने (द्वादश) अंगोथी सम्पन्न 'द्वादशांगी'नी रचना करी पोतानु वेद-विद्यानु ज्ञान बतावी आप्यु॥२७॥ पोते वेदज्ञानविद् होवा छतां अन्य अज्ञानी जीवोना हित माटे गौतमस्वामीए जिनप्रभुने स्थिरचित्ते अनेक प्रश्नो कर्या // 28 // जिनेश्वरोए देवदेवी क्रियाने करवामां प्रमादने मूकीने जे करवामां हमेंश तत्पर छे अने बळी जेओ छठू तपने करे छे तेवा श्रीगौतमस्वामीने मंगल्यवड़े नमस्कार कर // 29 // ___ महावीर स्वामीना उपदेशथी पूर्णप्रभे महासंयमनी दीक्षा लई यमनियमनु पालन करीने अनेक लोकोए कैवल्यपदनी प्राप्ति करी हती // 30 // , पोतानी पासे जे न हतु छता जेना बड़े बीजाओने श्रेष्ठ पंचम केवलज्ञान बीजाने अपाव्यं हतुं अने जेणे आ विश्वने विशे अद्भुत लख्यु छे तेवा श्रीगौतमस्वामीने नमस्कार करवा / / 31 / / स्वशक्तिथी पवित्र एवा अष्टापद पर्वत उपर जइने जेओ जिनेश्वशेने वंदन करे छे तेओ ते ज भवमां मोक्षमां जाय छे एजेणे वीरभगवान पासेथी सांभळय छे तेवा गौतमस्वामीने नमस्कार करवा // 32 // P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust