________________ 8/ श्रीगौतमस्वामी चरित्रनो सोपान पंक्ति स्वर्णमय चड़ता हता तेओ यदा, श्रीवीर विभु-उपकारीए आभाषीया प्रेमे तदा / कह्मगोत्र गौतम इन्द्रभूति ! शुसुखे आव्या तमे, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नम् // 20 // ते नाम सुणी मनमां विचारे लेश ना अचरज अहिं, त्रण जगतमां विख्यात मारुं नाम को जाणे नहिं / इम चितवी निज चित्तमा अभिमानने जे पोषता, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 21 // मनमां मने जे जीव केरो गुप्त संशय छे खरो, जे आज दिन पर्यन्त कदिये कोइने पण ना कह्यो / ते जो कहे तो मानु आ सर्वज्ञ इम जे चितवे, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 22 // प्रभुए कह्य-त्यारे तरत हे इन्द्रभूति ! शुतने, छ जीवसंशय नव विचारे केम वेद पदार्थने / ते सांभळी गर्विष्ठ पण अति नम्र जेह बनी गया, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 23 // 'विज्ञानघन' ए वेदपदनो अर्थ गंभीर घोषथी, प्रभुए कह्यो ने सांभळी थयो दूरसंशय चित्तथी। प्रतिबोध पामी वीरना जे आद्य शिष्य बनी गया, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 24 // ते एकला पण नहिं अरे ! शतपंच छात्रो साथ लइ, संयम प्रभु श्रीवीर -पासे वर्ष पच्चासे ग्रहे / सर्वत्र जय जयकार वो जेमना सत्कार्यथी, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 25 // निज भ्रातनी दीक्षा सुणी पण चित्तमां संशय धरी, : श्रीअग्निभूति आदि आव्या वीर विभु पासे सही।। दीक्षित थयेला देखी जेने तेह पण दोक्षित थया, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 26 // P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust