Book Title: Vyakhyapragnaptisutram Part 01
Author(s): Divyakirtivijay
Publisher: Shripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust
View full book text ________________ श्रीभगवत्यङ्गं श्रीअभय वृत्तियुतम् भाग-१ // 489 // | स्पृष्टादि बाणस्येवेति // 12 एतदेव विवृण्वन्नाह कहन्न मित्यादि, निरुवहयं ति वाताद्यनुपहतं दब्भेहि य त्ति दर्भः समूलैः कुसेहि य त्ति ७शतके कुशैर्दभैरेव छिन्नमूलैः, भूई भूइ न्ति भूयो भूयः, ऽत्थाहे त्यादि, इह मकारौ प्राकृतप्रभवौ, अतःऽस्ताघेऽत एवातारेऽत उद्देशकः१ आहारकाएवापौरुषेयेऽपुरुषप्रमाणे, 13 कलसिंबलियाइ वा कलायाभिधानधान्यफलिका सिंबलि त्ति वृक्षविशेषः, एरंडमिंजिया, नाहारकएरण्डफलम्, एगंतमंतं गच्छइ त्ति, एक इत्येवमन्तो निश्चयो यत्रासावेकान्त एक इत्यर्थः, अतस्तमन्तं भूभागं गच्छति, इह च। वक्तव्यता ऽऽधिकारः। बीजस्य गमनेऽपि (यत्) कलायसिंबलिकादेरिति यदुक्तं तत्तयोरभेदोपचारादिति, 14 उड्डवीससाए त्ति, ऊर्द्धं विस्रसया स्वभावेन सूत्रम् 266 निव्वाघाएणं ति कटाद्याच्छादनाभावात् ॥२६५॥अकर्मणो वक्तव्यतोक्ता, अथाकर्मविपर्ययभूतस्य कर्मणो वक्तव्यतामाह नैरयिकादि दुःखी 16 दुक्खी भंते! दुक्खेणं फुडे अदु० दुक्खेणं फुडे?, गोयमा! दु० दुक्खेणं फुडे नो अदु० दुक्खेणं फुडे। 17 दुक्खी णं भंते! दुःखेननेरतिए दुक्खेण फुडे अदु० ने दुक्खेणं फुडे?, गोयमा! दु० ने० दुक्खेणं फुडे नो अदु० ने दुक्खेणं फुडे, एवं दंडओ जाव वेमाणियाणं, एवं पंच दंडगा नेयव्वा-दुक्खी दुक्खेणं फुडे 1 दुक्खी दुक्खं परियायइ 2 दुक्खी दुक्खं उदी रेइ 3 दुक्खी दु० वेदेति ४दुक्खी दु. निजरेति 5 // सूत्रम् 266 // 16 दुक्खी भंते! दुक्खेण फुडे त्ति दुःखनिमित्तत्वाद्दुःखं कर्म तद्वान् जीवो दुःखी भदन्त! दुःखेन दुःखहेतुत्वात् कर्मणा स्पृष्टो बद्धः, नो अदुक्खी त्यादि, नो नैवादुःखी, अकर्मा दुःखेन स्पृष्टः, सिद्धस्यापि तत्प्रसङ्गादिति, 17 एवं पंच दंडका णेयव्व त्ति, एवमित्यनन्तरोक्ताभिलापेन पञ्च दण्डका नेतव्याः, तत्र दुःखी दुःखेन स्पृष्ट इत्येक उक्त एव 1, दुक्खी दुक्खं परियायई ति द्वितीयः, तत्र दुःखी कर्मवान् दुःखं कर्म पर्याददाति सामस्त्येनोपादत्ते, निधत्तादि करोतीत्यर्थः२, उदीरेइ त्तिल तृतीयः३, वेएइत्ति चतुर्थः 4, निजरेइ त्ति पञ्चमः 5, उदीरणवेदननिर्जरणानितुव्याख्यातानि प्रागिति ॥२६६॥कर्मबन्धाधि | प्रश्नाः / // 489 //
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