Book Title: Vyakhyapragnaptisutram Part 01
Author(s): Divyakirtivijay
Publisher: Shripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust

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Page 558
________________ असासयं ति, अयमर्थः, जीवः शाश्वतःपण्डितत्वमशाश्वतं चारित्रस्य भ्रंशादिति // 298 // सप्तमशतेऽष्टमोद्देशकः॥७-८॥ श्रीभगवत्यङ्ग श्रीअभय वृत्तियुतम् भाग-१ // 530 // 7 शतके उद्देशक:९ असंवृतानगाराधिकारः। सूत्रम् 299 असवृतानगास्येहगतादिपुद्रलविकुर्वण पामध्ये ॥सप्तमशतके नवमोद्देशकः॥ पूर्वमाधाकर्मभोक्तृत्वेनासंवृतवक्तव्यतोक्ता, नवमोद्देशकेऽपि तद्वक्तव्यतोच्यते, तत्र चाऽऽदिसूत्रम् १असंवुडे णं भंते! अणगारे बाहिर(रि)ए पोग्गले अपरियाइत्ता पभूएगवन्नं एगरूवं विउव्वित्तए?, णो तिणढे समढे। 2 असंवुडे णं भंते! अण० बाहिरए पो० परियाइ(दिति)त्ता पभूएगवन्नं एगरूवं जाव हंता पभू। 3 से भंते! किं इहगए पो० परियाइत्ता विउव्वइ (गुव्वति) तत्थगए पो परि० विउ० अन्नत्थगए पो० परि० विकु?, गोयमा! इहगए पो० परि विकुम्वइ (उव्वति) नो तत्थगए पो० परि० विकु० नो अन्नत्थगए पो० जाव विकुवति, एवं एगवन्नं अणेगरूवं चउभंगोजहा छ?सए नवमे उद्देसए तहा इहावि भाणियव्वं, नवरं अणगारे इहगयं (इहई-ए) इहगए चेव पो० परियाइत्ता विकुब्वइ, सेसंतंचेव जाव लुक्खपोग्गलं निद्धपोग्गलत्ताए परिणामेत्तए?, __ हंता पभू, से भंते! किं इहगए पो० परियाइत्ता जाव नो अन्नत्थगए पो० परियाइत्ता विकुब्वइ / / सूत्रम् 299 // 1 असंवुडे ण मित्यादि, असंवृतः प्रमत्तः, इहगए त्ति, इह प्रच्छको गौतमस्तदपेक्षयेहशब्दवाच्यो मनुष्यलोकस्ततश्चेहगता नरलोकव्यवस्थितान्, तत्थगए त्ति वैक्रियं कृत्वा यत्र यास्यति तत्र व्यवस्थितानित्यर्थः, अन्नत्थगए त्ति, उक्तस्थानद्वयव्यतिरिक्तस्थानाश्रितानित्यर्थः, नवरं ति, अयं विशेषः, इहगए इतीहगतोऽनगार इति, इहगतान् पुद्गलानिति च वाच्यम्, तत्र तु देव इति तत्रगतानिति चोक्तमिति ॥२९९॥अनन्तरं पुद्गलपरिणामविशेष उक्तः, स सङ्ग्रामे सविशेषोभवतीति सङ्ग्रामविशेषवक्तव्यताभणनाय प्रस्तावयन्नाह प्रश्राः / // 530 //

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