Book Title: Vyakhyapragnaptisutram Part 01
Author(s): Divyakirtivijay
Publisher: Shripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust

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Page 525
________________ श्रीभगवत्यङ्ग श्रीअभय. वृत्तियुतम् भाग-१ // 497 // त्रिविधं कृतकारितानुमतिभेदभिन्नं योगमाश्रित्य, तिविहेणं ति त्रिविधेन मनोवाकायलक्षणेन करणेन, असंजयविरयपडिहयपच्चक्खायपावकम्मे त्ति संयतो वधादि परिहारे प्रयतः विरतो वधादेर्निवृत्तः प्रतिहतान्यतीतकालसम्बन्धीनि निन्दातः, प्रत्याख्यातानिचानागतप्रत्याख्यानेन पापानि कर्माणि येन स तथा, ततः संयतादिपदानां कर्मधारयस्ततस्तनिषेधादसंयतविरतप्रतिहतप्रत्याख्यातपापकर्मा, अत एव सकिरिए त्ति कायिक्यादिक्रियायुक्तः सकर्मबन्धनोवाऽत एव, असंवुडे त्ति, असंवृताश्रवद्वारः, अत एवैगंतदंडे त्ति, एकान्तेन सर्वथैव परान्दण्डयतीत्येकान्तदण्डः, अत एवै कान्तबालः सर्वथा बालिशोऽज्ञ इत्यर्थः॥ 271 // प्रत्याख्यानाधिकारादेव तद्भेदानाह २कतिविहे णं भंते! पञ्चक्खाणे पन्नत्ते?, गोयमा! दुविहे पच्च० प०, तंजहा- मूलगुणपच्च० य उत्तरगुणपच्च० य / 3 मूलगुणपञ्च० णं भंते! कति०प०?, गोयमा! दुविहे प०, तंजहा-सव्व मूलगुणपच्च० य देसमूलगुणपञ्च० य, 4 सव्वमूलगुणपच्च० णं भंते! कति. प०?, गोयमा! पंचविहे प०, तंजहा-सव्वाओ पाणाइवायाओ वेरमणं जाव सव्वाओ परिग्गहाओ वे० / 5 देसमूलगुणपच्च० णं भंते! कइ०प०?, गोयमा! पंच०प०, तंजहा-थूलाओ पाणाइवायाओ वेरमणं जाव थूलाओ परिग्गहाओवे०।६ उत्तरगुणपच्च० णं भंते! कति०प०?, गोयमा! दुविहे प०, तंजहा- सव्वुत्तरगुणपच्च० य देसुत्तरगुणपच्च० य, 7 सव्वुत्तरगुणपच्च० णं भंते! कति० प०?, गोयमा! दसविहे प०, तंजहा- अणागय 1 मइक्वंतं 2 कोडीसहियं 3 नियंटियं 4 चेव / सागार ५मणागारं 6 परिमाणकडं 7 निरवसेसं ८॥१॥साकेयं 9 चेव अद्धाए 10 पच्चक्खाणं भवे दसहा / 8 देसुत्तरगुणपच्च० णं भंते! कइ०प०?, गोयमा! सत्तविहे प०, तंजहा- दिसिव्वयं 1 उवभोगपरिभोगपरिमाणं 2 अन्नत्थदंडवेरमणं 3 सामाइयं 4 देसावगासियं 5 पोसहोववासो 6 0(विशेष० उपासके० प०६-१) [7 शतके उद्देशक:२ | विरतिरधिकारः। सूत्रम् 272 मूलोत्तरगुणप्रत्याख्यानभेदप्रभेद प्रश्नाः / अनागतातिक्रान्तादिदिग्वतादि। // 497 //

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