Book Title: Vyakhyapragnaptisutram Part 01
Author(s): Divyakirtivijay
Publisher: Shripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust

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Page 538
________________ श्रीभगवत्यङ्गं श्रीअभय वृत्तियुतम् भाग-१ // 510 // प्रश्नाः / रायगिहे जाव एवं व०-खहयरपंचिंदियतिरिक्खजोणियाणं भंते! कतिविहेणं जोणीसंगहे प०?, गोयमा! तिविहे जोणीसंगहे 7 शतके प०, तंजहा- अंडया पोयया संमुच्छिमा, एवं जहा जीवाभिगमे (प० १३२-३७सू० 96-99) जाव नोचेवणं ते विमाणे वीतीवएजा। | उद्देशक:५ खचरजीवयोएवंमहालयाणं गोयमा! ते विमाणा पन्नत्ता॥ 'जोणीसंगह लेसा दिट्ठी नाणे य जोग उवओगे। उववाय-ठिति-समुग्घाय-चवण निरधिकारः। जातीकुलविहीओ॥१॥' सेवं भंते! रत्ति // सूत्रम् 282 // // 7-5 // सूत्रम् 282 अण्डजदादिखहयरे त्यादि, जोणीसंगहे त्ति योनिरुत्पत्तिहेतुर्जीवस्य तया सङ्ग्रहः, अनेकेषामेकशब्दाभिलाप्यत्वं योनिसङ्गहः, अंडय / योनिसंग्रहत्ति, अण्डाज्जायन्तेऽण्डजा हंसादयः, पोयय त्ति पोतवद्वस्त्रवजरायुवर्जिततया शुद्धदेहा योनिविशेषाजाताः पोतादिव वा प्रकारादि बोहित्थाज्जाताः, पोता इव वा वस्त्रसंमार्जिता इव जाताः पोतजा वल्गुल्यादयः, संमुच्छिम त्ति संमूर्छन-योनिविशेषधर्मेण निर्वृत्ताः संमूर्छिमाः हिकादयः / एवं जहा जीवाभिगमे त्ति, एवं च तत्रैतत्सूत्रम्, अंडया तिविहा प०, तंजहा- इत्थी पुरिसा नपुंसया, एवं पोययावि, तत्थ णं जे ते संमुच्छिमा ते सव्वे नपुंसगे त्यादि, एतदन्तसूत्रं त्वेवम्, अत्थि णं भंते! विमाणाई विजयाई जयंताई वेजयंताई अपराजियाई?, हंता अत्थि, ते णं भंते! विमाणा केमहालया प०?, गोयमा! जावइयं च णं सूरिए उदेइ जावइयं च णं सूरिए अत्थमेइ यावताऽन्तरेणेत्यर्थः, एवंरूवाई नव उवासंतराइं अत्थेगइयस्स देवस्स एगे विक्कमे सिया से णं देवे ताए उक्किट्ठाए तुरियाए जाव दिव्वाए देवगईए वीईवयमाणे 2 जाव एगाहं वा दुयाहं वा उक्कोसेणं छम्मासे वीईवएज त्ति, शेषं तु लिखितमेवास्ते, तदेव च पर्यन्तसूत्रतया यावत्करणेन दर्शितमिति / वाचनान्तरे त्विदं दृश्यते जोणिसंगह लेसा दिट्ठी णाणे य जोग उवओगे।। // 510 // उववायठिइसमुग्घायचवणजाईकुलविहीओ॥१॥ तत्र योनिसङ्ग्रहो दर्शित एव, लेश्यादीनि त्वर्थतो दर्श्यन्ते, एषां लेश्या:षड्, दृष्टयस्तिस्रः, ज्ञानानि त्रीण्याद्यानि भजनया, अज्ञानानि तु त्रीणि भजनयैव, योगास्त्रयः, उपयोगौ द्वौ, उपपातः सामान्यतश्च

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