Book Title: Vyakhyapragnaptisutram Part 01
Author(s): Divyakirtivijay
Publisher: Shripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust

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Page 551
________________ श्रीभगवत्यङ्ग श्रीअभय. वृत्तियुतम् भाग-१ // 523 // गुणोपेतत्वादिति // 17 सव्वत्थोवा कामभोगि त्ति ते हि चतुरिन्द्रियाः पञ्चेन्द्रियाश्च स्युस्ते च स्तोका एव, नो कामी नो भोगि त्ति सिद्धास्ते च तेभ्योऽनन्तगुणा एव, भोगि त्ति, एकद्वित्रीन्द्रियास्ते च तेभ्योऽनन्तगुणा वनस्पतीनामनन्तगुणत्वादिति // 290 // भोगाधिकारादिदमाह 18 छउमत्थे णं भंते! मणूसे जे भविए अन्नयरेसु देवलोएसु देवत्ताए उववजित्तए, से नूणं भंते! से खीणभोगी नो पभू उट्ठाणेणं कम्मेणं बलेणं वीरिएणं पुरिसक्कारपरक्कमेणं विउलाई भोगभोगाई भुंजमाणे विहरित्तए?, से नूणं भंते! एयम8 एवं वयह?, गोयमा! णो इ(ति)णढे समढे, पभूणं उट्ठाणेणवि कम्मे० बले० वीरि० पुरिसक्कारपरक्क० अन्नयराइं विपु० भोगभो० भुंजमाणे विहरित्तए, तम्हा भोगी भोगे परिच्चयमाणे महानिज्जरे महापज्जवसाणे भ० / 19 आहोहिएणं भंते! मणुस्से(णूसे) जे भविए अन्न देवलोएसु एवं चेव जहा छउमत्थे जाव महापज० भ० / 20 परमाहोहिए णं भंते! मणुस्से जे भविए तेणेव भवग्गहणेणं सिज्झित्तए जाव अंतं करेत्तए?, से नूणं भंते! से खीणभोगी सेसं जहा छउमत्थस्सवि। 21 केवली णं भंते! मणुस्से (णूसे) जे भविए तेणेव भवग्गहणेणं एवं जहा परमाहोहिए जाव महापज्ज० भवइ। सूत्रम् 291 // 18 छउमत्थे ण मित्यादि सूत्रचतुष्कम्, तत्र च से नूणं भंते! से खीणभोगि त्ति से त्ति, असौ मनुष्यो नूनं निश्चितं भदन्त! से त्ति, अयम(था)र्थः, अथशब्दश्च परिप्रश्नार्थः, खीणभोगि त्ति भोगो जीवस्य यत्रास्ति तद्भोगि शरीरं तत्क्षीणं तपोरोगादिभिर्यस्य सः क्षीणभोगी क्षीणतनुर्दुर्बल इतियावत्, णो पभु त्ति न समर्थः, उट्ठाणेणं ति, ऊझैभवनेन, कम्मेणं ति गमनादिना, बलेणं ति देहप्रमाणेन, वीरिएणं ति जीवबलेन, पुरिसक्कारपरक्कमेणं ति पुरुषाभिमानेन तेनैव च साधितस्वप्रयोजनेनेत्यर्थः, भोगभोगाइं ति मनोज्ञशब्दादीन्, से नूणं भंते! एयम8 एवं वयह, अथ निश्चितं भदन्त! एतमनन्तरोक्तमर्थमेवममुनैव प्रकारेण वदथ यूयम्? इति 7 शतके उद्देशक: 7 अनगाराधिकारः। सूत्रम् 291 छद्मस्थादि द्रव्यदेवाधोऽवधिकपरमावधिकेवलीनां भोगत्यागसामर्थ्य प्रश्ना : /

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