Book Title: Vyakhyapragnaptisutram Part 01
Author(s): Divyakirtivijay
Publisher: Shripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust

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Page 528
________________ श्रीभगवत्यङ्ग श्रीअभय वृत्तियुतम् भाग-१ // 500 // Nउवभोगपरिभोगपरिमाणं ति, उपभोगः सकृद्भोगः, सचाशनपानानुलेपनादीनाम्, परिभोगस्तु पुनः पुनर्भोगः, सचाशनशयन वसनवनितादीनाम्, अपच्छिममारणंतिय संलेहणाझूसणाराहणय त्ति पश्चिमैवामङ्गलपरिहारार्थमपश्चिमा मरणंप्राणत्यागलक्षणम्, इह यद्यपि प्रतिक्षणमावीची मरणमस्ति तथापिन तगृह्यते, किंतर्हि?, विवक्षितसर्वाऽऽयुष्कक्षयलक्षणमिति, मरणमेवान्तो मरणान्तस्तत्र भवा मारणान्तिकी संलिख्यते कृशीक्रियतेऽनया शरीरकषायादीति संलेखना तपोविशेषलक्षणा ततः कर्मधारयादपश्चिममारणान्तिकसंलेखना तस्या जोषणं सेवनं तस्याऽऽराधनमखण्डकालकरणं तद्भावोऽपश्चिममारणान्तिकसंलेखनाजोषणाराधनता, इह च सप्त दिव्रतादयो देशोत्तरगुणा एव, संलेखना तु भजनया, तथाहि, सा देशोत्तरगुणवतो देशोत्तरगुणः, आवस्य(श्य?)के तथाऽभिधानात्, इतरस्य तु सर्वोत्तरगुणः साकारानाकारादिप्रत्याख्यानरूपत्वादिति संलेखनामविगणय्य सप्त देशोत्तरगुणा इत्युक्तम्, अस्याश्चैतेषु पाठो देशोत्तरगुणधारिणाऽपीयमन्ते विधातव्येत्यस्यार्थस्य ख्यापनार्थ इति // 272 // अथोक्तभेदेन प्रत्याख्यानेन तद्विपर्ययेण च जीवादिपदानि विशेषयन्नाह ९जीवाणं भंते! किं मूलगुणपच्चक्खाणी उत्तरगुणपच्चक्खाणी अपच्चक्खाणी?, गोयमा! जीवा मूलगुणपच्च वि उत्तरगुणपच्च वि अपच्च०वि। 10 नेरइया णं भंते! किं मूलगुणपच्च० पुच्छा?, गोयमा! ने० नो मूलगुणपच्च० नो उत्तरगुणपच्च० अपच्च०, एवं जाव चउरिंदिया, पंचिंदियतिरिक्खजोणिया मणुस्सा य जहा जीवा, वाणमंतरजोइसियवेमाणिया जहा ने० // 11 एएसि णं भंते! मूलगुणपच्च० उत्तरगुणपच्च० अपच्च० यकयरे 2 हितोजाव विसेसाहिया वा?,गोयमा! सव्वत्थोवा जीवामूलगुणपच्च० उत्तरगुणपच्च० असंखेज्जगुणा अपच्च० अनंतगुणा। 12 एएसि णं भंते! पंचिंदियतिरिक्खजोणियाणं पुच्छा, गोयमा! सव्वत्थोवा जीवा पंचेंदियतिरिक्खजो० मूलगुणपच्च०, उत्तरगुणपच्च० असंखेज्जगुणा, अपच्च० असंखिजगुणा / 13 एएसिणंभंते! मणुस्साणं मूलगुण 7 शतके उद्देशक:२ विरतिरधिकारः। सूत्रम् 273 नैरयिकादिषु प्रत्याख्यानभेदप्रभेद तेषामल्पबहुत्व संयतासंयतादि प्रश्राः / // 500 //

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