Book Title: Vruhhajain Vani Sangraha
Author(s): Ajitvirya Shastri
Publisher: Sharda Pustakalaya Calcutta
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१४६४ वृहज्जैनवाणीसंग्रह।
ताको रवि उदय लाल, मोक्षवधू-कुच-अलेप, कुंकुमाम तैसो।। पारस० ॥ कुशल-वृक्ष-दल उलास, इहिविधि बहुगुण-निवास । भूधरकी भरहु आस, दीनदासके सो । पारस० ॥३॥
( २५५ ) देखे जिनराज आज, राजरिद्धि पाई । देखे० ॥ टेक ॥ पहुपवृष्टि महाइष्ट देव दुंदुभी सुमिष्ट, शोक करै भ्रष्ट सो. अशोकतरु बडाई ॥ देखे० ॥ १॥ सिंहासन झलमलात, तीन छत्र चितसुहात, चमर फरहरात मनों, भगति अति बढाई ॥ देखे० ॥ २॥ द्यानत भामंडलमें, दीसे परजाय * सात, यानी तिहुँकाल झरे, सुरशिवसुखदाई ॥ देखे० ॥
( २५६ ) 1 चंदजिनेश्वर नाम हमारा, महासेनसुत जगत पियारा ॥
चंद० ॥टेका। सुरपति नरपति फनिपति सेवत, मानि महा उत्तम उपगारा । मुनिजन ध्यान धरत उरमाही, चिदानंद । । पदवीका धारा ॥ चंद° ॥१॥ चरन सरन बुधजन जे आये, तिनपाया अपना पद सारा ॥ मंगलकारी भवदुखहारी, स्वामी अद्भुत उपमावारा ॥ चंद ० ॥२॥
( २५७ )
• उरग-सुरग-नरईश शीस जिस, आतपत्र त्रिधरे । कुंदकुसुम
सम चमर अमरगन, दोरत मोद परे ॥ उरगला टेक ॥ तरु । * अशोक जाको अवलोकत, शोक थोक उगरे । पारजात संता
नकादिके, वरसत सुमन वरे ॥ उरग० ॥१॥ सुमणि विचित्र ।

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