Book Title: Vipak Sutra
Author(s): Nemichand Banthiya, Parasmal Chandaliya
Publisher: Akhil Bharatiya Sudharm Jain Sanskruti Rakshak Sangh

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Page 328
________________ प्रथम अध्ययन - एक दिवस का राज्य ३०७ संचिट्ठइ। तएणं से अदीणसत्तू राया कोडुंबिय पुरिसे सद्दावेइ, सद्दावित्ता एवं वयासी-खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया! सुबाहुस्स कुमारस्स महत्थं महग्धं महरिहं विउलं रायाभिसेयं उवट्ठवेह। तएणं ते कोडुंबिय पुरिसा जाव ते वि तहेव उवट्ठवेंति। तए णं से अदीणसत्तू राया बहूहिं गणणायगदंडणायगेहि य जाव संपरिवुडे सुबाहुकुमारं अट्ठसएणं सोवणियाणं कलसाणं एवं रुप्पमयाणं कलसाणं सुवण्णरुप्पमयाणं कलसाणं, मणिमयाणं कलसाणं, सुवण्णमणिमयाणं कलसाणं रुप्पमणिमयाणं कलसाणं, सुवण्णरुप्पमणिमयाणं कलसाणं, भोमेज्जाणं कलसाणं सव्वोदएहिं सव्वमट्टियाहिं सव्वपुप्फेहिं सव्वगंधेहिं सव्वमल्लेहिं सव्वोसहिहि य सिद्धत्थएहि य सव्विहिए सव्वजुईए सव्वबलेणं जाव दुंदुभिणिग्योसणाइयरवेणं महया महया रायाभिसेएणं अभिसिंचिइ अभिसिंचित्ता करयल जाव कटु एवं वयासी-जय जय गंदा! जय जय भद्दा! जय णंदा! भई ते, अजियं जिणाहि जियं च पालियाहि, जियमझे वसाहि, अजियं जिणाहि सत्तुपक्खं जियं च पालेहिं मित्तपक्खं जाव भरहो इव मणुयाणं हत्थिसीसस्स गरस्स अण्णेसिं च बहूणं गामागरणगर जाव सण्णिवेसाणं आहेवच्चं जाव विहराहि त्ति कट्ट जय जय सदं पउंजंति॥२२८॥ कठिन शब्दार्थ - अकामए - निराश होकर, एगदिवसमवि - एक दिन के लिए भी, अणुवत्तमाणे - बात को मान कर, महत्थं - महान् कार्य में काम आने वाली, महग्धं - बहुमूल्य, महरिहं - महान् कार्य में काम आने वाली, महग्धं - बहुमूल्य, महरिहं - महान् पुरुषों के योग्य, गणणायगदंडणायगेहिं - गणनायक (सेनापति) और दण्डनायक (कोटवाल) आदि राज्य कर्मचारियों से, अट्ठसएणं - एक सौ आठ, कलसाणं - कलश, सुवण्णरुप्पमणिमयाणं - मणियों से जड़े हुए सोने चांदी के, सव्वगंधेहिं - सब प्रकार के सुगंधित पदार्थों से, सव्वमल्लेहिं - सब प्रकार की मालाओं से, सव्वोसहिहिं - सब प्रकार की औषधियों से, सिद्धत्थएहिं - सरसों आदि से, सविडीए - समस्त ऋद्धियों से, सव्वजुईएसब कांति युक्त पदार्थों से, दुंदुभिणिग्योसणाइयरवेणं - दुंदुभि आदि वादिन्त्रों के गंभीर शब्दों से, णंदा - हे आनंद के देने वाले, भद्दा - हे कल्याण के करने वाले, जिणाहि- जोतो, Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org


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