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( ७३ ) सर्वत्र आत्माको माने गृहण करे तिसीको मान कहते है नान ब्रह्मदर्शन कहते है तिसको वाति नाम जो भजे सो मानव कहा है एसा जो ब्रह्मवेत्ता संन्यासी जो आत्मामे आसक्ति राखे है तथा स्वात्मामे निमग्न है तथा स्वात्मसुखसे पूर्ण है तिस मानवको लौकिक वैदिक कोईभी कर्तव्य नहीं है ॥ प्रश्नः-संन्यासीभी आश्रमी होनेते कर्मका अधिकारी होता है शास्त्रकी आज्ञा सर्वपर समान है और विद्वान् ही धर्मशास्त्रोक्त अर्थको तैसे नियमाको जाननेवाला होता है जब सो विद्वान् न करेगा न करावेगा तो पाषाणसदृश मूढ कर्मोंर्कों करेंगे वा करावेंगे सो तो कहो “ विद्वान् यजते" एसे वेदविषे विशेष करके विद्वान् का ही नाम कहा है यांते वेदाज्ञाको बलवान होनेते ज्ञानी वेदका ज्ञाता है यांते कर्मका अधिकारी है ॥
२॥ उत्तरं-हे सौम्य विद्वान् जो ब्रह्मज्ञानाग्निसे सर्व दैतभ्रमको जिसने भस्म कीया है तथा सर्वत्र ब्रह्म देखनेवाला है एले जीवन्मुक्तको कर्म करना तुम कहते हो सो कर्म अपने वास्ते करे अ. थवा दूसरे वास्ते यह कहो जो स्वार्थ कहो तो इस लोकवास्ते वा परलोकके वास्ते कर्म करे. इस लोक वास्ते कहो तो स्वशरीर यात्रार्थ वा कुटुंवरक्षार्थ
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