Book Title: Vachandutam Uttarardha
Author(s): Mulchand Shastri
Publisher: Prabandh Karini Committee Jaipur

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Page 98
________________ म बचनदृतम राजुल को — इससे तब यश में दुर्बलता ही श्रामी है अतः छोड़ दें श्राप इसे इससे निन्दा ही पायी है ऐसा कहने वाला बेटी ! नहीं कोई अब दिखता है ---- बीरनगर में हरजन उनसे कहता है संस्कारस्ते परिणय कृतो तेन सार्धं न कश्चित् जातः कस्माद्गतिवति सुते ! शोकमग्नासि तस्मिन् रामः स्यात्वां प्रति यदि कथं स त्यजेत्वामकस्मात् तस्मात्तस्मिंस्त्वमपि सुभगे ! रागमावं जहीहि ॥ ७५ ॥ | प्रत्यय - अर्थ - ( सुते तेन सार्धं परिणयकृतः ते कश्चित्संस्कारः न जातः) हे बेटी ! तेरा उसके साथ वैबाहिक कोई दस्तूर नहीं हुआ है तो (कस्मात् गतिवति तस्मिन् शोकमग्ना प्रसि) गये हुए उसके सम्बन्ध में फिर शोकमग्न क्यों हो रही है ? ( यदि त्वां प्रति रागः स्यात्) यदि तेरे प्रति उसका अनुराग होता तो ( स त्वाम् अकस्मात् कथं त्यजेत् ) वह तुझे बिना कारण के क्यों छोड़ता ? (तस्मात् ) इसलिये (सुभगे ) हे सुभगे ! ( तस्मिन् त्वम् अपि रागभावं जहीहि) उसके ऊपर से तू भी अपना राग-भाग दूर कर दे । भावार्थ - "जो आपको न चाहे ताके बाप को न चाहिये” इस नीति के अनुसार जब वह तुझे चाहता ही नहीं है तो तू उसके प्रति रागभाव क्यों रख रही खोट इस रागभाव को, महू है कौन तेरा, तेरा उसका कोई वैवाहिक संस्कार तो हुम्रा नहीं है फिर क्यों उसे अपना मान रही है और उसके चले जाने पर शोकाकुलित हो रही है । तेरा उसका नहीं हुआ है वैवाहिक विधि के अनुसार संस्कार भी तो कोई, फिर अब क्यों होती हैं गम हार बड़ था तेरा कौन उसे तू अपना क्यों कर मान रही अपना होता तो अपनाता और बताता हाल सही उसके जाने पर क्यों होती शोकमग्न तू घरी घरी दूर भगा इस रागभाव को बात यही है खरी खरी अनचाहे पर राग न चढता चढता ऐसा क्यों होता

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