Book Title: Tiloypannatti Part 3
Author(s): Vrushabhacharya, Chetanprakash Patni
Publisher: Bharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
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तिलोयपणात्ती
[ गाथा । ६०६-६०९ भर्म-धातकीखण्ड द्वीपमें आठ लाख तीन हजार सात सौ कोड़ाकोड़ी तारे हैं ॥६०५।।
अट्ठावीसं लक्खा, कोडीफोडोरण बारस-सहस्सा । पण्णासुत्तर - णव - सय - जुत्ता ताराणि कालोदे ।।६०६।।
प्रर्य-कालोद समुद्र में अट्ठाईस लाख बारह हजार नौ सौ पचास कोडाकोड़ी तारे हैं ।।६०६॥
अद्वत्ताल लक्खा, बायोस - सहस्स बे-सयाणि च । होति हु पोक्खरवीये, तारारणं कोडकोडीमो ॥६०७॥
४६२२२००००००००००००००००। प्रर्य--पुष्कराधं द्वीपमें अड़तालीस लाख बाईस हजार दो सौ कोडाकोड़ी तारे हैं ॥६०७॥
विशेषार्थ एक चन्द्र सम्बन्धी ६६९७५ कोडाकोड़ी तारागण हैं इसलिए लवणसमुद्र प्रादि चारोंमें ४, १२, ४२ और ७२ चन्द्र सम्बन्धी ताराओंका प्रमाण क्रमश: ( ६६९७५ कोडाकोड़ीx४) २६७९०० कोडाकोड़ी, ८०३७०० कोडाकोड़ी, २८१२९५० कोड़ाकोड़ी और ४८२२२०० कोड़ाकोड़ी है।
ताराओंका शेष निरूपणसेसाप्रो बणणायो, जंबवीवस्स बण्णण - समायो।
णवरि विसेसो संखा, अण्णण्णा खोल • ताराणं ॥६०६॥ अर्थ-इनका शेष वर्णन जम्बूद्वीपके वर्णन सदृश है। विशेषता केवल यह है कि स्थिर ताराओंकी संख्या भिन्न-भिन्न है ।।६०८।।।
लवणसमुद्रादि चारोंकी स्थिर ताराओंका प्रमाणएक्क-सयं उरणवाल, लवणसमुद्दम्मि खोल-ताराप्रो । बस - उत्तरं सहस्सा, बीवम्मि य पावईसंडे ॥६०६॥
१३६।१०१०। अर्थ- लवणसमुद्रमें एक सौ उनतालीस और धातकीखण्ड में एक हजार दस स्थिर तारे हैं ॥६०९।।