Book Title: Tiloypannatti Part 3
Author(s): Vrushabhacharya, Chetanprakash Patni
Publisher: Bharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha

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Page 669
________________ गाथा । ६५४-६५७ ] ग्रम महाहियारो [ ६०१ अर्थ- निर्माणराज देव तेईस हजार तेईस ( २३०२३ ) और दिगन्तरक्ष पच्चीस हजार पच्चीस ( २५०२५ ) होते हैं ।। ६५३ ।। सत्तावीस-सहस्सा, सत्तावीसं च अध्यक्ख सुरा । उनतीस सहरसाण, उणतीस-जुदाणि सरवरक्खा य ।।६५४।। २७०२७ । २९०२९ । अर्थ- आत्मरक्ष देव सत्ताईस हजार सत्ताईस (२७०२७ ) और सर्वरक्ष उनतीस हजार उनतीस ( २९०२९ ) होते हैं ।। ६५४ ।। एक्कसीस-सहस्सा, एक्कत्तीस हुवंति मरु देवा । - तेत्तीस सहस्वाणि तेत्तीस जुदाणि वसु-णामा ।।६५५ ।। - - - ३१०३१ । ३३०३३ अर्थ- मरुदेव इकतीस हजार इकतीस (३१०३१ ) और वसु नामक देव तैंतीस हजार तैंतीस (३३०३३ ) होते हैं ।। ६५५ ।। पंचतीस - सहस्सा, पंचत्तीसा हुवंति अस्स सुरा । सचत्तीस - सहस्सा, सत्तत्तीसं च विस्त-सुरा ॥ ६५६ ॥ ३५०३५ । ३७०३७ । अर्थ - श्वदेव पैंतीस हजार पैंतीस (३५०३५ ) और विश्वदेव संतीस हजार सैंतीस ( ३७०३७ ) होते हैं ।। ६५६ ।। चत्तारिय लक्खाणि सत्त सहस्ताणि प्रड-सयाणि पि । छम्भहियाणि होदि हु, सव्वाणं पिंड परिमाणं ।। ६५७।। ४०७८०६ । - इन सबका पिण्ड प्रमाण चार लाख सात हजार आठ सो यह ( ४०७८०६ ) - है ।। ६५७ ।। विशेषार्थ - आठ कुलोंके सारस्वत श्रादि सम्पूर्ण लौकान्तिक देवोंका प्रमाण ( ७००+७००+७००७+७००७+००६+६००६+११०११+११०११ = ) ५५४५४ है और आठ अन्तरालोंमें रहने वाले अनलाभ और सूर्याम आदि सोलह कुलोंके लौकान्तिक दवोंका कुल प्रमाण ( ७००७ + १००९ + ११०११ + १३०१३+१५०१५ + १७०१७ + १६०१६ + २१०२१ + २३०२३+२५०२५+२७०२७+२६०२९+३१०३१+३३०३३ + ३५०३५ + ३७०३७ = )

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