Book Title: Supasnaha Chariyam
Author(s): Lakshmangani,
Publisher: Jinshasan Aradhana Trust
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241 || जंतीइ पाव! तर॥१४२० बो विज्बाहरराओपभणइसो को विसेसओ कहसु । भणिो तो दासीए सुटु कयं तए पुढे ॥१४॥
कुमरस्स चरियकरण तुह पवितेमि कण्णजुयलमहं । धवलइ जुन्दा अच्चतमलिणवनेवि य पयत्थे ॥१४४॥ मज्झ विसेसेण पुणो जुतं शा तत्रामगहणमिह समए । मरणसमयम्मि जम्हा सुमरिज्जइ देवयं इटें ॥१४५॥ सो चिय इट्ठो सो चेव देवया मज्झ सामिणीएवि।ता
सुणसुसुणसु पुरिस सुपुरिसचरियं कहिज्जतं॥१४६॥ जेण समक्खं चिय नरवईण गुणस्वविक्कमबलेण।सोहम्मजयपडायव्य अहम! मह सामिणी गहिया ॥१४७॥ जेणं चियगरुयगुणेण सयलसत्यत्यभावियमणेण | दढिओविनाओतुमपि केणवि पओगेण||१४८॥ जेण तुमं दिटेणवि न होसि मुवणम्मि साहसघणेण । तेण अहमत्तणो कीरमाणमिच्छामि इह रक्खं ॥ आयनिऊण एवं जाओ तिवलीतरंगियनिहालो। विज्बाहरो हरी इव पभणइ संहरणजायरसो॥१५०॥ तं सरणं सरमाणा मरणं पावेसि तं महापावे!! मह मंड
लग्गअम्गी लम्मिमइ तस्सवि सरीरे ॥१५१॥ एवं पभणतेणं तेणं आयडिओ सियकिवाणो । दुरीहूओ सव्वोवि परियणो तं तहा SL पृष्टम् ॥१४३॥ कुमारस्य चरितकवनेन तव पवित्रयामि कर्णयुगलमहम्। धवलयतिज्योत्साऽत्यन्तमलिनवर्णानपि पदार्थान् ॥१४४॥मम विशेषण
पुनर्युक्तं तन्नामग्रहमामिह समये मरणसमये यस्मात्स्मयते दैवतमिष्टम् ॥१४॥ स एवेष्टः स एव देवता मम स्वामिन्या अपि । तस्मात्शृणु शृणु कुपुरुष! सुपुरुषचरित्रंकय्यमानम्॥१४६॥ येन समक्षमेव नरपतीनां गुणरूपविक्रमबलेन । सौभाग्यजयपताकेवाधम! मम स्वामिनी गृहीता ॥ येनैव गुरुगुणेन सकशासार्यमावितमनसा । दूरस्थितोऽपि ज्ञातस्त्वमपि केनापि प्रयोगेण ॥१४८॥ येन त्वं दृष्टेनापि न भवसि भुवने साहसघनेन । | तेनाहमात्मनः क्रियमाणामिच्छामीह रक्षाम् ॥१४९॥ आकण्यतज्जातस्त्रिवलीतरङ्गितललाटः । विद्याधरो हर इव प्रभणति संहरणजातरसः ।। तं शरणं सरन्ती मरणं प्राप्नोषि त्वं महापापे! मम मण्डलामाग्निनगिष्यति तस्यापि शरीरे ॥१५१॥ एवं प्रभणता तेनाकृष्टः शितकृपाणः।
जेण तुमं दिविजाहरो हरा
एवं पभणतेण ताज्योत्साध्यन्तमा
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