Book Title: Samvayangasutram
Author(s): Haribhadrasuri, 
Publisher: Agamoday Samiti

View full book text
Previous | Next

Page 238
________________ श्रीसमवा- यांगे श्रीअमय० १४१ज्ञाताधर्मकथाधिकारः वृचिः ॥११६॥ च्छआसावसदोसमुच्छियाणं ४ विराहियचरित्तनाणदसणजइगुणविविहप्पयारनिस्सारसुन्नयाणं ५ संसारअपारदुक्खदुग्गइमवविविहपरंपरापवंचा ६ धीराण य जियपरिसहकसायसेण्णधिइधणियसंजमउच्छाहनिच्छियाणं ७ आराहियनाणदंसणचरित्तजोगनिस्सलसुद्धसिद्धालयमग्गमभिमुहाणं सुरभवणविमाणसुक्खाई अणोवमाइं भुत्तूण चिरं च भोगभोगाणि ताणि दिव्वाणि महरिहाणि ततो य कालक्कमचुयाणं जह य पुणो लद्धसिद्धिमग्गाणं अंतकिरिया चलियाण य सदेवमाणुस्सधीरकरणकारणाणि बोधणअगुसासणाणि गुणदोसदरिसणाणि दिलुते पच्चये य सोऊण लोगमुणिणो जहट्ठियसासणम्मि जरमरणनासणकरे आराहिअसंजमा य सुरलोगपडिनियत्ता ओवेन्ति जह सासयं सिवं सव्वदुक्खमोक्खं, एए अण्णे य एवमाइअत्था वित्थरेण य, णायाधम्मकहासु णं परित्ता वायणा संखेजा अणुओगदारा जाव संखेजाओ संगहणीओ, से णं अंगठ्ठयाए छठे अंगे दो सुअक्खंधा एगूणवीसं अज्झयणा, ते समासओ दुविहा पण्णता, तंजहा-चरिता य कप्पिया य, दस धम्मकहाणं वग्गा, तत्थ णं एगमेगाए धम्मकहाए पंच पंच अक्खाइयासयाई एगमेगाए अक्खाइयाए पंच पंच उवक्खाइयासयाई एगमेगाए उवक्खाइयाए पंच पंच अक्खाइयउवक्खाइयासयाई एवमेव सपुव्वावरेणं अद्भुट्ठाओ अक्खाइयाकोडीओ भवंतीति मक्खायाओ, एगूणतीसं उद्देसणकाला एगूणतीसं समुद्देसणकाला संखेजाई पयसहस्साई पयग्गेणं पण्णत्ता संखेजा अक्खरा जाव चरणकरणपरूवणया आपविजंति, सेत्तं णायाधम्मकहाओ ६॥ सूत्रं १४१॥ 'सेकिंत'मित्यादि, अथ कास्ता ज्ञाताधर्मकथा?-ज्ञातानि-उदाहरणानि तत्प्रधाना धर्मकथा ज्ञाताधर्मकथा दीर्घत्वं | संज्ञात्वाद् अथवा प्रथमश्रुतस्कन्धोज्ञाताभिधायकत्वात् ज्ञातानि द्वितीयस्तु तथैव धर्मकथाः, ततश्च ज्ञातानि च धर्म ॥११६॥ JainEducation For Personal & Private Use Only hinelibrary.org

Loading...

Page Navigation
1 ... 236 237 238 239 240 241 242 243 244 245 246 247 248 249 250 251 252 253 254 255 256 257 258 259 260 261 262 263 264 265 266 267 268 269 270 271 272 273 274 275 276 277 278 279 280 281 282 283 284 285 286 287 288 289 290 291 292 293 294 295 296 297 298 299 300 301 302 303 304 305 306 307 308 309 310 311 312 313 314 315 316 317 318 319 320 321 322 323 324 325 326