Book Title: Samvayangasutram
Author(s): Haribhadrasuri, 
Publisher: Agamoday Samiti

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Page 256
________________ श्रीसमवा १४६ वि. पाकश्रुतं. यांगे श्रीअमय वृत्तिः ॥१२५॥ 5OCESSORCHES चेहयाई वषखंडा राबायो अम्मापियरी समोसरचाई धम्मायरिया धम्मकहाणो इहलोइयारलोइयाइडिविसमा मोबपरिचाया पर जाओ सुवपरिग्बहा तपोवहामाई परियाणा पडिमाको संलेहमाओ भत्तपरक्खापाई पागोषवमनाई देवलोधगमणाई सुकुलपचापाषा पुणवोहिलाहा अंतकिरियाओ य माधविनंति, दुहविवागेसु णं पाणाइवायअलिववयणचोरिककरणपरदारबेहुणससंगवाए महतिवकसाथईदियणमाषपाक्प्पओवासुहज्ज्ञवसाणसंचिवाणं कम्माणं पावमाणं पावअनुभागफलविवागा गिरवमतितिरिक्खजोणिबहुविहवसणसवपरंपरापबद्धार्थ मणुवसेवि बागया जहा पाक्कम्बसेसेण पावमा होन्ति फलविवागा वहनासमापिणासनालाकजुटुंगुटुकरचरणनहछेवणजिम्मछेअणअंजणकडग्गिदाहगयचलणमलपकालणउल्लंबणसूललयालउडलटिभंजणतउसीसमतत्ततेलकलकलअहिसिंचणकुंभिषागकंपणविरपंधणहचकत्तध्यपतिययकरकरपल्लीवणादिदारुणाणि दुक्खाणि अपोक्माणि बहुविविहपरंपराणुबद्धा प नुवंति पावकम्मवलीए, अबेयइत्ता हु गस्थि मोक्खो तवेण धिइधणियबद्धकच्छेण साहेणं तस्स बावि हुन्जा, एस्खे य सुहविवागेसु णं सीलसंजमणियमगुणतवोवाणेसु साहूसु सुविहिएसु अणुकंपासयप्पओगतिकालमइविसुद्धभत्तपापाइं पययमणसा हियसुहनीसेसतिव्वपरिणामनिच्छियमई पयच्छिऊणं पयोगसुद्धाइं जह य निव्वत्तेंति उ बोहिलामं जह य परित्तीकरेंति नरनरयतिरियसुरगमणविपुलपरियट्टअरतिभयविसायसोगमिच्छत्तसेलसंकडं अन्नाणतमंधकारचिक्खिलसुदुत्तारं जरमरणजोणिसंखुभियचक्कवालं सोलसकसायसावयपयंडचंडं अणाइअं अणवदग्गं संसारसागरमिणं जह य णिबंधंति आउगं सुरगणेसु जह य अणुभवंति सुरगणविमाणसोक्खाणि अणोवमाणि ततो य कालंतरे चुआणं इहेव नरलोममागयाणं आउवषुपुण्णरूवजातिकुलजम्मआरोग्गबुद्धिमेहाविसेसा मित्तजणसयणधणधण्णविभवसमिद्धसारसमुदयविसेसा बहुविहकामभोगुब्भवाय सोक्खाण सुहविधागोत्तमेसु, अणु 4% ARANASI ॥१२५॥ jain Education HINI For Personal & Private Use Only M ainelibrary.org

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