Book Title: Samvayangasutram
Author(s): Haribhadrasuri, 
Publisher: Agamoday Samiti

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Page 262
________________ श्रीसमवा यांगे श्रीअभय० वृत्तिः १४७१ष्टिवाद: ॥१२८॥ ख्यायन्त इति, शेषं कण्ठ्यं, नवरं संख्यातानि पदशतसहस्राणि पदाणेति, तत्र किल एका पदकोटी चतुरशीतिश्च 2 लक्षाणि द्वात्रिंशच सहस्राणीति ॥ ११॥ से किं तं दिद्विवाए, ? दिठिवाए णं सव्वभावपरूवणया आघविजंति, से समासओ पंचविहे प० त०-परिकम्म सुत्ताई पुव्वयं अणुओगो चूलिया, से किं तं परिकम्मे ?-परिकम्मे सत्तविहे प० तं-सिद्धसेणियापरिकम्मे मणुस्ससेणियापरिकम्मे पुट्ठसेणियापरिकम्मे ओगाहणसेणियापरिकम्मे उवसंपजसेणियापरिकम्मे विप्पजहसेणियापरिकम्मे चुआचुअसेणियापरिकम्मे, से किं तं सिद्धसेणियापरिकम्मे ?, सिद्धसेणिआपरिकम्मे चोदसविहे प० तं०-माउयापयाणि एगट्ठियपयाणि पादोद्वपयाणि आगासपयाणि केउभूयं रासिबद्धं एगगुणं दुगुणं तिगुणं केउभूयं पडिग्गहो संसारपडिग्गहो नंदावतं सिद्धबद्धं, सेत्तं सिद्धसेणियापरिकम्मे, से किं तं मणुस्ससेणियापरिकम्मे ?, मणुस्ससेणियापरिकम्मे चोद्दसविहे पण्णते, तं जहा-ताई चेव माउआपयाणि जाव नंदावत्तं मणुस्सबद्धं, सेतं मणुस्ससेणियापरिकम्मे, अवसेसा परिकम्माई पुट्ठाइयाइं एक्कारसविहाई पन्नत्ताई, इच्चेयाई सत्त परिकम्माई ससमइयाई सत्त आजीवियाई छ चउक्कणइयाइं सत्त तेरासियाई, एवामेव सपुव्वावरेणं सत्त परिकम्माई तेसीति भवंतीतिमक्खायाई, सेत्तं परिकम्माई, से किं तं सुत्ताई?, सुत्ताइं अट्ठासीति भवंतीतिमक्खाया, तंजहा-उजुगं परिणयापरिणयं बहुभंगियं विप्पञ्चइयं [विन(ज)यचरियं] अगंतरं परंपरं समाणं संजूहं [मासाणं] सं भिन्नं अहाच्चयं [अहव्वायं नन्द्यां] सोवत्थि(वत्तं) यं णंदावत्तं बहुलं पुट्ठापुढे वियावत्तं एवंभूयं दुआवत्तं वत्तमाणप्पयं समभिरूल्ढं सव्वओभदं पणाम[पस्सासंनन्यां] दुपडिग्गहं इच्चेयाई बावीसं सुत्ताई छिण्णछेअणइआई ससमयसुत्तपरिवाडीए, इच्चेआईबावीसं सुत्ताई अछिन्नछेयनइयाइं आजीवियसुत्तपरिवाडीए, इच्चेआई बावीसं सुत्ताइ तिकणइयाइं तेरासियसुत्तपरिवाडिए, इच्चे ॥१२८॥ Bain Education Internasional For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org

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