Book Title: Oswal Vansh Sthapak Adyacharya Ratnaprabhsuriji Ka Jayanti Mahotsav
Author(s): Gyansundar Maharaj
Publisher: Ratnaprabhakar Gyanpushpamala

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Page 28
________________ [ २४ ] आचार्य श्री के परम पूजनीय चरणकमलों में अनेक बहुमूल्य रत्न, मणि, मुक्ताफलादि अर्पण किये इतना ही नहीं पर राजा उत्पलदेव ने नम्र शब्दों में यहां तक कहा कि हे प्रभो ! आपके उपकार से तो हम किसी भव में मुक्त हो ही नहीं सकते हैं पर यह हमारा राज्य है इसको आप स्वीकार कर हमको कृतार्थ करने की कृपा अवश्य कीजिए । बात भी ठीक है कि आचार्य श्री के उपकार के सामने राज्य या धनमाल क्या वस्तु है ? सूरीश्वरजी उन राजा और मंत्री के भक्ति पूर्वक नम्र शब्दों को सुन कर मन ही मन राजादि की बुद्धि की आलोचना करने लगे और लगे सोचने कि अहो आश्चर्य ! इन लोगों ने धनमाल और राज 'जो मोक्ष साधन में एक कंटक रूप हैं उनको ही अपना सर्वस्व समझ रखा है । अहो ! यह कितनी अज्ञान दशा कि ये मोह एवं माया को पाश में पड़ कर वास्तव में अपने पथ से च्युत हो रहे हैं ऐसे अज्ञानी लोगों को सदुपदेश देना महान लाभ और अपना खास कर्त्तव्य समझ कर सूरीश्वरजी ने निषेधवाचक शब्दों में प्रत्युत्तर दिया कि " गुरुणा कथितं मम न कार्यं” 2 हे राजन् ! हम त्यागियों को इस अनर्थकारी राज्य ब धनमाल से कोई सम्बन्ध नहीं है । यदि मैं इस नाशवान राज्य का ही इच्छुक होता तो हमारे स्वाधीन राज्य को तिलाञ्जलि देकर इस त्यागमय योग को क्यों धारण करता । हे धराधिप ! राज्य ऋद्धि आत्म कल्याण Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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