Book Title: Karm Vignan Part 08
Author(s): Devendramuni
Publisher: Tarak Guru Jain Granthalay

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Page 499
________________ * मुक्ति के आध्यात्मिक सोपान * ४७९ * ___-कतिपय भिक्षुओं की अपेक्षा गृहस्थ संयम में उत्कृष्ट होते हैं। किन्तु तथाकथित संयम-परायण गृहस्थ अपनी मानी हुई समस्त चल-अचल सम्पत्ति जगत् के चरणों में समर्पित करके फूल-सा हल्का को जाएगा या केवल उसका तटस्थ ट्रस्टी रहेगा, अपना स्वामित्व उस पर से उठा लेगा। वह धन-सम्पत्ति, जमीन-जायदाद ही नहीं, अपितु परिगृहीत स्त्री-पुत्रादि पर से भी ममता, मूर्छा या आसक्ति हटा देगा। जिसने पत्नी पर से पत्नीत्वभाव को दूर कर दिया, पुत्र पर से 'यही मेरा पुत्र है', इस प्रकार का संकीर्ण ममत्व हटा दिया और जगत् के समस्त मानवों जैसा ही वह सहज स्वाभाविक रूप से मानव हो गया, तो उसके लिये घर भी तपोवन हो सकता है। घर में रहते हुए भी उसका घर संयम का नन्दनवन बन जाएगा। ऐसा गृहस्थ साधक अपने वीर्य का दुरुपयोग या व्यय न करके उसे संचित करके भौतिकवासना के क्षय करने में, इन्द्रिय और नोइन्द्रिय के संयम में, विश्व के चराचर सकल जीवों के प्रति वात्सल्य बहाने में उसका सदुपयोग करेगा। जब उसने अपने शरीर और शरीर से सम्बन्धित सजीव-निर्जीव वस्तुओं पर से ममता-मूर्छा दूर करने के पुरुषार्थ की साधना स्वीकार कर ली, तब उसकी संतानैषणा की वृत्ति तो मूल से ही सहज ही उखड़ जाएगी। वह एक कुटुम्ब का न रहकर सारी वसुधा का कुटुम्बी होगा। तब उसका विश्वास सर्वभूतात्मभूत (सव्वभूयप्पभूय) या आत्मवत् सर्वभूतेषु में सुदृढ़ हो जाएगा।' सागारी और अनगारी दोनों के जीवन में संयम का अमोघ प्रभाव इस प्रकार का संयमी साधक चाहे गृहस्थ हो या साधु, जब विश्व के समस्त . प्राणियों के प्रति आत्मौपम्य भावना रखेगा, तब पानी की एक भी बूंद का या आहार के एक भी कण जरूरत के बिना कैसे इस्तेमाल करेगा? जहाँ उसने विश्व के चरणों में सर्वस्व समर्पण कर दिया तथा प्रभु की साक्षी से 'अप्पाणं वोसिरामि' कहकर शरीर और शरीर से सम्बद्ध सजीव व्यक्ति या निर्जीव वस्तु का वह स्वस्थतापूर्वक ममत्व-व्युत्सर्ग करता है, वहाँ वह आवश्यक वस्तुओं का भी संग्रह किसलिए करेगा? वस्त्र भी विभूषा या आडम्बर के लिये अमर्यादित क्यों रखेगा? उसका वचन तो अमूल्य होगा ही, वह उसका व्यय भी असत्प्रवृत्ति में कैसे कर सकेगा? एक भी आत्मघातक विचार को भी वह दिमाग में संचित करके नहीं रखेगा। इसी प्रकार खुद के पास जो अमूल्य बौद्धिक निधि है, उसका भी जाग्रत रहकर जनसेवा में उपयोग करेगा, बाहोश रहकर अपने संयम कार्यों में इस्तेमाल करेगा। वह गाफिल रहकर अपनी इन्द्रियों का उपभोग तथा तन-मन-नमन आदि का उपयोग निरर्थक कार्यों, कषायों-नोकषायों में नहीं करेगा। जाग्रत रहकर अपनी १. (क) “सिद्धि के सोपान' से भाव ग्रहण, पृ. २२-२४ (ख) देखें-'गांधी जी की आत्मकथा' तथा 'रामकृष्ण परमहंस' का वृत्तान्त Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org


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