Book Title: Jain Darshan Vaigyanik Drushtie
Author(s): Nandighoshvijay
Publisher: Mahavir Jain Vidyalay

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Page 130
________________ जैनदर्शन :वैज्ञानिक दृष्टिसे 31 अनय पत्ते भुजिज्जा गोरसं नियमा ॥3॥ यहाँ दूसरी गाथा में स्पष्ट रूप से बताया है कि तीसरे दिन दही अभक्ष्य हो जाता है । तीसरी गाथा में दही के संबन्ध में भोजन विधि बतायी है । विदल का भोजन करने के बाद बर्तन और मुंह दोनों साफ करके दही का भोजन करना या दूसरे वर्तन में भोजन करना । अन्यत्र गाथा इस प्रकार मिलती है - मुग्गमासपभिइ आमगोरसे जो भलइ । उवइ तसरासी-असंखजीवा मुणेयव्वा ॥1॥ विदल भोयणे चेव कंठे जीवा अणंतसो होइ । उयरंमि गये चेव जीवाण न होइ उप्पत्ति ॥2॥ __ पृ. 79 पर बताया है कि मुंगफली जमीकंद नहीं है । मूंगफली का छिलका ज़मीकंद है । यह कैसे? स्पष्टता कीजिये । मक्खन को श्वेताम्बर परम्परा में सर्वथा अभक्ष्य माना है; क्योंकि मक्खन को छाछ से अलग करने के बाद थोड़े ही समय में, प्राय: 48 मिनिट में उसमें त्रस जीवों की उत्पत्ति हो जाती है और यह अनुभवसिद्ध बात है। घोरबड़े (दही-बड़े) के बारे में भी कुछ शंकाएँ हैं; क्योंकि श्रावकों के अतिचार में घोरबड़े अभक्ष्य बताये हैं; किन्तु 'पच्चखाण भाष्य' में छह विगई की तीस निर्विकृतियाँ बतायी हैं, उनमें घोर-बड़े को भक्ष्य बताया है । मेरा अनुमान है कि ऊपर बतायी हुई गाथाओं के अनुसार दही-बड़े यदि कच्चे दही में बनाये हों तो अभक्ष्य हैं; किन्तु पक्के (गर्म किये हुए ?) दही में बनाये हों तो भक्ष्य हैं । यहाँ कच्चा दही किसे कहा जाता है ? कच्चे (गर्म न किया हो ऐसे) दूध में से बनाया गया दही? या दूध गर्म किया हो तथापि दही होने के बाद में गर्म न किया हो ऐसा दही? इस प्रश्न और ऐसे बहुत से प्रश्नों के उत्तर बिना प्रयोग पाना असंभव है; अतः इसके लिए प्रयोगशाला की आवश्यकता है ही। - मुनि नंदीघोष विजय, अहमदाबाद (तीर्थकर : सितम्बर, 89)

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