Book Title: Dankatha arthat Vajrasen Charitra
Author(s): Bharamal Sanghai
Publisher: Jain Bharti Bhavan Kashi
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कथा
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तौ धृग जीवन मेरो होय । यह निश्चे करि जानौ सोय ॥७॥ जाको भ्रात फिरै दुखकार । ताके जीवनकों धृगकार ॥ तातें मैं अब ढंडों जाय । सोभ्राताकों ल्याउं बुलाय ॥७॥ तवहीं भूपति कैसे कही । हमरी बात सुनो तुम सही॥ सर्पहि दुग्ध प्यावं कोय । तौ वह विषही उगलै सोय ॥७६।।
त्यों तुझ भ्राता सर्प समान । भूलि न दरशन कीजै अान॥ ह तबै कुमर फिरि कैसे कही । हो महराज सुनो तुम सही ॥७॥ ६ भ्राता बिन मो रहनो नही । सो अब बाकौं ल्याऊं सही॥
वार वार बरजै भूपाल । मोह थकी मानै न कुमार ॥७॥ | तबही भूपति कैसे कही । तोकौं जान देउं मैं नहीं ॥ | किंकर अब मैं देउं पठाय । तेरो भ्रात लेउं दुढ़वाय ॥७॥ भूप हुकुमतें जसबल जबै । चारि ओरकों दौरे तबै ॥
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