Book Title: Ashtapad Tirth Puja
Author(s): Vallabhvijay
Publisher: Hansvijayji Free Library

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Page 33
________________ पार्श्व ए वीर १० निष्कलंकाय चतुर्विंशति जिनाधिपाय पुष्पाणि यजामहे स्वाहा ॥३॥ चौथी धूपपूजा. दोहरा. पूजा धूपकी कीजिये, चौथी चतुर सनेह । जाव वृक्षको सींचिये, मानी अमृत मेह ॥१॥ ( थई प्रेमवश पातलिया.) जविजीवको हितकारी, प्रनु पूजनकी बलिहारीरे ॥ नवि० अंचली॥आये विचरते अवध पुरि वदि आवम फाल्गुन मासे । जस ध्यान सु. कल ऊजासे, हुए घाति करम क्षय चारीरे ॥ ज० ॥१॥ केवलज्ञान दरस तब प्रगटे लोका लोक प्रकाशी, जिम रेखा हस्त विकाशी, आवे सुर सुरपति नर नारीरे ॥ नवि० ॥२॥ समवसरण रचना सुर कीनी नरतजी वंदन आवे, मरुदेवाको संग लावे, माता मन हर्ष अपारीरे ॥ वि० ॥३॥ समजावे बंधनको बेदीमाता मोक्ष पधारी, Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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