Book Title: Apbhramsa Bharti 1990 01
Author(s): Kamalchand Sogani, Gyanchandra Khinduka, Chhotelal Sharma
Publisher: Apbhramsa Sahitya Academy

View full book text
Previous | Next

Page 98
________________ अपभ्रंश भारती छूटने लगीं । उसने धूमावलि के ध्वजदंड उखाड़कर तूफान की तलवार से झड़झड़ कर प्रहार करना प्रारम्भ कर दिया । तरुवररूपी शत्रु- समूह भग्न होने लगे । मेघघटा विघटित हो उठी । इस प्रकार ग्रीष्म राजा पावस राजा से भिड़ गया। तब पावस ने बिजली की टंकार करके इन्द्रधनुष पर डोरी चढ़ा ली । जलधर की गजघटा को प्रेरित किया और बूंदों के तीरों की बौछार शुरू कर दी । 87 जं पाउस रदु गलगज्जिउ । धूली-रउ गिम्भेण विसज्जिउ || गणुि मेह - विदे श्रालग्गउ । तडि करवाल - पहारे हि भग्गउ ।। जं विवरम्मुहु-चलिउ विसालउ । उट्ठउ 'हणु' भरणंतु उण्हालउ || धगधग - धगधगंतु उद्घाइउ । हस हस हस हसंतु संपाइ ॥ जलजलजलजलजल पचलंतउ । जावावलि फुलिंग मेल्लंतउ ॥ धूमावलि - घयदंडुन्भेष्पिणु । वर- वाउल्लि - खग्गु कड्ढेपिणु || झडझड झडझडंतु पहरंतउ । तरुवर - रिउ भड थड भज्जंतउ ॥ मेह - महागय घड विहडंतउ । जं उण्हालउ विठु भिड़ंतउ ॥ धणु अप्फा लिउ पाउसेण तडि - टंकार-फार दरिसंतें I चोऍवि जलहर - हत्थि हड गीर-सरासरिग मुक्क तुरंतें ॥ 28.2 ऋतुसंबंधी ऐसे अनेक सुंदर बिंब स्वयंभू ने अपने काव्य में दिये हैं । प्रातःकाल, संध्या तथा रात्रि के मनोहर बिंब भी स्वयंभू के काव्य में पाये जाते हैं । सूर्यास्त होने पर आरक्त संध्या कवि को ऐसी दिखाई पड़ती है मानो सिंदूर से अलंकृत गजघटा हो या वीर के रक्त-मांस से लिपटी हुई निशाचरी आनंद से नाच रही हो । संध्या बीत गई और रात प्रायी मानो उसने सोते हुए महान् विश्व को लील लिया हो । कहीं पर सैकड़ों जलते हुए दीपक शेषनाग के फणमणियों की तरह चमक रहे थे । जाइ संभ प्रारत पदसिय । गं गय- घड सिंदूर - विहूसिय ॥ सूर- मंस रुहिरालि - चच्चिय । गिसियरि व्व श्राणंदु परणच्चिय ॥ गलिय संझ पुणु रयरिग पराइय । जगु गिलेइ णं सुत्त महाइय ॥ कहि मि दिव्व दीवय-सय वोहिय । फणि-मणिव्व पजलंत सु-सोहिय ॥ 23.9 2-5 प्रातःकाल का यह बिंब देखिए चारों ओर सुंदर सवेरा फैल गया निगल लिया था उसने अब उसे उगल दिया । पिसि - णिसिरिए श्रासि जं गिलियउ । णाई पडीवउ जउ उग्गिलियउ | 1 रातरूपी निशाचरी ने जिस सूरज को पहले 23.12.6 रात को कवि ने निशाचरी के रूप में चित्रित किया है । निशारूपी निशाचरी चारों ओर दौड़ पड़ी । धरती-प्राकाश सब कुछ उसने लील लिया । ग्रह, नक्षत्र उसके लंबे

Loading...

Page Navigation
1 ... 96 97 98 99 100 101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112 113 114 115 116 117 118 119 120 121 122 123 124 125 126 127 128