Book Title: Anusandhan 2016 05 SrNo 69
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
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अनुसन्धान-६९
ओलंभा जन-जनतणा, केम सहुं करतार! । ए विण अवर न को गमई, गुणवंतउ भरतार" ॥१०६।।
॥ ढाल - ९ ॥ गणिका वेध-वलूधीय बाली, रडई पडइँ विरहइं विकराली । हुं नव-योवन तइं कां टाली, लागईं प्रिय विण सेजि कंटाली ॥१०७॥ खिण छांहिं खिण ऊभीय तडकइं, सहीअर साथि रीसाणीय भडकई । विरहतj घण साल सु खडकई, प्रिय विण धान किस्युं नवि अडकई ॥१०८।। ते मुझ नाह किहां मदिमातउ, करतउ मनमथ-केलि सुरातउ । पातलीओ मुझ थण-विचि मातउ, मुझ विण इक खिण दूरि न जातउ ॥१०९।। जोवन-वेसि वियोग-विदूना, संभारइं प्रियना गुण जूना । तुम्ह विण कंत! सु वारवहूना, सुंदर-मंदिर-ओरड सूना ॥११०॥ छंडीय सेजि सुभूमि-संथारा, लागई भूषण आगि-अंगारा । । मीठीय साकर ज्युं मुखि छारा, इक प्रिय-नाम गमई मुखि सारा ॥१११।। इणि समयइं आव्युं चोमासुं(सं), मागई थूलिभद्र सूरि-निदेसं । जउ मुझनई तुम्हे द्यउ उपदेसं, तउ गुरुराय! रहुं उप-वेसं ॥११२॥ जाणी भाव वदइं गुरु वाचं, रहउ तुम्हे कोसि-घरइं मुनि जाचं । एक मानउ माहरूं गुरु साचं, देखीय भामिनि-भाव न राचं ॥११३।। तव गुरुनउ मुनि आयस पामी, हरखि चल्या गुरुनइं सिर नामी । गणिका-सुंदरि-तारण-कामी, आवई वेसि-घरइं गज-गामी ॥११४|| तव निय मालि चढी वरसालई, सा प्रमदा प्रिय-पंथ निहालई । देखीय कंत महा मनि माल्हई, प्रिय साहमी पगलां भरि चालई ॥११५।। आवीय कोसि-घरइं रिखि-राया, वचन कहइं मुनि मुंकीय माया । "घउ चउमासितणी अम्ह ठाया, जिम इक नाम जपुं जिनराया" ॥११६।।
॥ दूहा ॥ वचन सुणी हरखी घणूं, दीधी निय चित्र-साल । मन-उछरंगि वधावीया, भरि भरि मोतीय-थाल ॥११७|| मुनि पड-सालई आवीया, ओघइं पुंजी पाय । गमणागमणुं पडिकमी, बइंठा श्रीरिखि-राय ॥११८||

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