Book Title: Anusandhan 2016 05 SrNo 69
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 164
________________ मार्च - २०१६ १५७ तत्त्वोनी प्रामाण्यजनकताने नकारवानो अमारो आशय ज नथी. अमे तो फक्त अटलुं ज कहीओ छीओ के तमे जे तत्त्वोने 'गुण' ओवी सज्ञा आपो छो, ते तत्त्वो ते ते पदार्थनी स्वाभाविक अवस्था ज छे, अलग वस्तु नथी.' चक्षु माटे समलताने आगन्तुक धर्म गणी शकाय, अने तेथी ते आगन्तुक धर्मने 'दोष' गणीने, तेने लीधे सर्जाता अप्रामाण्यने 'परतः' पण कही शकाय. परन्तु निर्मळता तो चक्षुनो पोतीको गुणधर्म छे, पारकी वस्तु नथी के जेनी अपेक्षा राखवी 'परतः' बनी शके. ट्रॅकमां गुणो ज्ञानजनक सामग्री अन्तर्गत ज आवे छे, माटे तेनाथी (-ज्ञानजनक सामग्रीथी) सर्जाता ज्ञानमां प्रामाण्य स्वाभाविकपणे जन्मे छे, ज्यारे दोषो आगन्तुक धर्म छे, माटे तेमनाथी सर्जातुं अप्रामाण्य पण अस्वाभाविक बने छे. ज्ञप्तिमा प्रामाण्यना स्वतस्त्वनो अर्थ छ - पोताना आश्रय (-प्रमात्मक ज्ञान)ना ग्राहक ज्ञानथी ग्राह्य होवू.२ मतलब के प्रमात्मक ज्ञान, स्वसंवेदन (प्रभाकर मते), अनुव्यवसाय (-मुरारि मिश्र मते), ज्ञाततालिङ्गक अनुमिति (कुमारिल भट्ट मते) के साक्षिज्ञान (-वेदान्त मते) द्वारा ग्रहण थाय; ओ साथे ज 'ओ ज्ञान प्रमाण छे, अप्रमाण नहि' ओ रीते तन्निष्ठ प्रामाण्य- पण ग्रहण थई ज जाय छे.३ आ तमाम ज्ञानो माटे समान बाबत छे. तेथी तमाम ज्ञानोनुं भान थाय ते साथे ज ते साचां छे तेवो बोध पण जन्मे ज छे. अर्थात् ज्ञान होय प्रमात्मक के भ्रमात्मक, प्रारम्भिक स्तरे तो स्वतःप्रामाण्यना बळे ते निरपवादपणे साचुं ज जणाय छे. पण ज्ञान पोते जो अप्रमात्मक होय अने पछी पाछळथी अन्य प्रत्यक्ष द्वारा अथवा ओ ज्ञानने अनुसरीने थती प्रवृत्तिनी विफळताथी जन्य अनुमिति द्वारा अथवा आप्तपुरुषनां वचनो द्वारा जो अमां श्रान्तिनो बोध थाय तो प्रामाण्यनो बोध निवृत्त थाय छे अने अप्रामाण्यनुं भान थाय छे. आम प्रामाण्यनो बोध स्वतः (-स्वाभाविकपणे) जन्मनारो छे, अने १. "न चेन्द्रियनैर्मल्यादि गुणत्वेन वक्तुं शक्यम्, नैर्मल्यं हि तत्स्वरूपमेव, न पुनरौपाधिको गुणः । तथाव्यपदेशस्तु दोषाभावनिबन्धनः । - सन्मतितर्कवृत्तिः, पृ. ३ २. "ज्ञप्तौ स्वतस्त्वं नाम ज्ञानग्राहकमात्रग्राह्यत्वम् । येन ज्ञानं गृह्यते तेनैव तद्गतं प्रामाण्यमपि गृह्यते इति ।" - प्रमाणपद्धतिः - परि० १ ३. "यया कारणसामग्या ज्ञानं गृह्यते तयैव तद्गतं प्रामाण्यमपि गृह्यते इति स्पष्टार्थः ।" - न्यायकोशः, पृ. ५५९ .

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