Book Title: Anusandhan 2016 05 SrNo 69
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
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अनुसन्धान-६९
वर्जक, नव कल्पइ विहार करइ, दसभेद संयम धर्म आदरइ, बारह भेदे तप तपइ, सतरह आश्रवद्वार रुंधइ, अढार सहस सीलांगरथ धरइ, बावीस परीसह सहइ, तेत्रीस आशातन टालइ, बइतालीस दोष विशुद्ध मधुकरवृत्तिइ आहार ल्यइ, पंचदोष रहित मंडलि भुंजइ । जे समशत्रुमित्र, समलेट्टकंचण । पंच समिया, तिगुत्ता, अममा, अकिंचणा, अमच्छरा, जिइंदिया, जियकसाया, निम्मलबंभचेरवासा, सज्झाणझाणजुग्गा, दुक्करतवचरणरया, अरसाहारा, विरसाहारा, अंताहारा, पंताहारा, अरसजीवी, विरसजीवी, अंतजीवी, पंतजीवी, तुच्छाहारा, लूहाहारा, सुक्का, भुक्खा, निम्मंसा, निःसोणिया, किसिअंगा, निरागसरणा, कुक्खीसंबला, अज्ञातकुले भिक्षावर्त्तिनो मुनयो भवंति ।
कालीपव्वंगसंकासे किसे धमणिसंतए ।
माइन्ने असणपाणस्स अदीणमणसो चरे ॥१॥ इसा छइ सर्वज्ञपुत्र साधु । संसार भय थकी ऊभगा।
किसउ ते संसार ? नही जिहनउ पार । आदि-अंतरहित । जन्मजरा-मरण-व्याधि-भयकरीनइ भरित-पूरित । कषाय करीनइ सहित । आसा संपत्तिना पास । मोहजालबंधन । रागदोससंपत्ती । उदंडलोलवेला । मिथ्यात्वरूपी उत्तम अंधकार । आठमद संप[ति]ना पर्वत । पंच विषय अभिलाष रूपिया चोर । असंयतीना हिंसामय आवर्त समान । उन्मार्ग भयंकर संसारसमुद्र । जीवरुलि वा नउ थानक ।
ते माहि जे भविक जीव आसन्नसिद्धिगामी जिनमत सांभली जागरूक हूया । संवरतणइ वेगइ जिनोपदिष्टमार्ग सांभली निरतउ जाणी संसारसमुद्र तरिवा भणी पांच महाव्रतरूपीउ वाहण सज्ज करइ । ते वाहण सीलसंपन्ने बंधणे दृढ सुबंध बाधइ । ते वाहणमाहि समकित संपन्नउ अचल अणढोवतउ निरतीचार कूया थंभो थापइ । ज्ञान दर्शन चारित्र रतने करी भरइ । आत्मा रूप नाकुओ। ज्ञानसंपन्नलोचन । समता रूपिणी दृष्टि । शुभध्यान रूप वाउ । जिनोपदेश जीवदया मोक्षमार्गरूप द्वीप संमुख । पंचसमितितणे आउले । त्रिहुं गुप्तितणे नगरे । गामे एगराइयं । नगरे पंचराइयं । वासीचंदणसमाणकप्पे । मेरुनइ परइ अकंप । आकासनी परइ निरालंब । वायुनी परइ अप्रतिबद्ध । भारंड पांखीयानी परइ अप्रमत्त । सूर्य जिम तेजोलेश्यावंत । चंद्र जिम सोमलेश्यावंत ।

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