Book Title: Anusandhan 2011 12 SrNo 57
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
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डिसेम्बर २०११
सेत्रुजसिहरि चडीय नाह कहीयं तूं अरचिसु राइणि रूंखह तलइ पाय आणंदिहिं चरचिसु । न्हवण विलेपण पूजा करी आरती ऊतारिसु रोग शोक भावठि भमण हूं दूरि निवारिसु ॥ चंचल मन निश्चल करीय राखिसु जिण तूं नामि मण आणंदिइं मागीइए चरण शरण तुम्ह सामि ॥५।।
इतिश्री आदिनाथ नमस्कार समाप्तः ॥
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केटलाक शब्दो अनन्तकाय - अनन्त आत्माओ- एक शरीर गणाती वनस्पति नरयागइ - नरक गति अजिित्ति – आर्य क्षेत्रे अट्टडाइ - 'अथडाय (?)' त्रिपति - तृप्ति

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