Book Title: Anusandhan 2011 12 SrNo 57
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 89
________________ डिसेम्बर २०११ शौच अदत्त कांई नवि ग्रहइ । धर्मोपगरण चऊद संग्रहइ । द्रव्यादिक ममता नवि करइ । ब्रह्मचर्य नव भेदे धरइ ॥२०३॥ ए दश भेद यतीना कहिया । भावन बार भेद संग्रहिया । घर घरणी धन वय अस्थिरं । माया म धरु इणि विस्तरि ॥४॥ आव्यइ मरण शरण नही कोइ । नवि आपणु पिआरु लोइ । लाख चउरासी जीवा योनि । भमता भव नीगमीआ सुनिए ॥५॥ एकलु आविउ एकलु जाइ । को कहिनु साथी नवि थाइ । असुचिपणुं तुह देह मझारि । मूत्र परीखा श्लेष्म मलधारि ॥६॥ आश्रवद्वार मिथ्यातिं भरिउ । जीव कसाय अवरतिं आवरिउ । संवरभाव विरति शुभ ध्यांन । धरतां पामइ पंचम न्यांन ॥७॥ नवमी कर्मनीझर भावना । नारक दुक्ख सहियां मन विना । धर्मभावना इणिपरि धरइ । सार मनोरथ धर्म सरइ ॥८॥ लोकभावना चऊदइ राज । चिंतइ पिडि सरइ सवि काज । बोधिभावना दुर्लभ लहइ । शिवपुरगामी ते सद्दहइ ॥९॥ ए बारइ भावन भावीइ । चडती पदवी तु फावीइ । हिव पांचइ चारित्र विचार । पालइ ते पामइ भवपार ॥१०॥ पहिलं सामाइकु ऊचरइ । सर्व सावध मनसां परिहरइ । बीजु चरित च्छेदोपस्थान । पढम चरम वारइ जिन मांन ॥११॥ छजीवकाय जउ जाणइ खरइ । पंचमहाव्रत तउ ऊचरइ । त्रीजुं छइ परिहार विशुद्ध । अरण्यमाहि रइ जूउ बुद्ध ॥१२॥ नव जण सरसु जई तप करइ । अढार महीना जालइ खरइ । जउ उपसर्ग परीसह खमइ । तु गच्छमाहि आवीनइ जमइ ॥१३॥ चउथु चरित सूखिमसंपराय । दशमइ गुणठाणइ चडि जाय । क्रोध मांन माया परिहरइ । लोभ उदय अति सूखिम धरइ ॥१४॥ मन परणाम चोथानी वातु । चारित पंचम जह ख्यात । कषाय सर्वनां काढियां मूल । उदय न आवइ सूखिम थूल ॥१५॥ त्रिण्णि चारित्र हिवइ छतिं गयां । पहिला बि चारित ते रहियां । इणि परि संवर सत्तावन्न । भेद आणइ जे हुइ कृतपुन्न ॥१६॥

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